रविवार, 26 जुलाई 2009

मैं तुमसे प्यार नही करती ...!!

मेरे कुछ शेरों में शामिल है तेरा नाम भी
मेरी कुछ शामों में शामिल है तेरा ख्याल भी
मेरे कुछ आंसुओं का कारण है तेरी कमी भी
मेरी कुछ मुस्कुराहटों में शामिल है तेरी याद भी
मगर फिर भी यह सच है ....
मैं तुमसे प्यार नही करती ...!!
मैंने तुमसे कभी प्यार नही किया ...!!

देखे होंगे कुछ ख्वाब कभी
कि चांदनी रात में टहलते कभी छत पर लेकर हाथों में हाथ
सुरमई शाम में कभी सूरज को ढलता देखते एक साथ
गीतों गज़लों को सुन कर कभी आह! कभी वाह! करते साथ साथ
खेतों कि पगडंडियों पर कभी खामोश चलते साथ
मगर इन ख्वाबों के हकीकत होने का इन्तिज़ार मैंने कभी नही किया...
यह सच है मैंने तुमसे प्यार कभी नही किया॥!!

उसके दर से आने वाली हर राह पर आंख बिछाना
हर आहट पर चौंक कर दरवाजे तक हो आना
विरह की दाह में जलकर बेचैन हो जाना
कभी भूखे प्यासे रहना कभी नींदें गंवाना
दीवानावार इस तरह तेरा इन्तिज़ार मैंने कभी नहीं किया ...
यह सच है की मैंने तुमसे प्यार कभी नहीं किया ...!!

मैं तुमसे प्यार नही करती ॥!!
मैंने तुमसे प्यार कभी नहीं किया ..!!

16 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता... तुम भी दिल अपना टटोलकर देखो, फासला बेवजह नहीं होता.... उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले... बहुत निकले ये अरमां फिर भी कम निकले। बहुत ही अच्‍छी और भावपूर्ण कविता...बधाई।

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  2. वाणी जी यही तो प्यार है शायद दिल से मान कर भी शब्द नहीं दिये बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है अपने आप को धोखा देने की शुभकामनायें

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  3. भावों की अभिव्यक्ति अच्छी लगी। लीजिए पेश है आपके भाव से मिलती जुलती पंक्तियाँ-

    भला कहते हो कैसे मुझे तुमसे प्यार।
    भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  4. रचना बहुत ही सुंदर बन पडी है. भावों की अभिव्यक्ति बहुत सशक्त है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  5. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! अब तो मैं आपका फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आपके ब्लॉग पर आती रहूंगी! मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है !

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  6. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  7. वास्तव में तुमसे प्यार नहीं किया....सुंदर रचना..

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  8. ओह, कितना विचित्र है कि कविता की सेंसिटीविटी के स्तर पर नहीं उतर पा रहा हूं।
    एकाग्रता की कमी है शायद।

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  9. यह तो अज्ञेय ,अद्भुत है !

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  10. बहुत देर से ही सही पर इस कविता का सांगोपांग चेतन में उतर रहा है । जैसा ज्ञान जी ने कहा कविता की सेंसिटिविटी का स्तर अबूझ है - अबूझ कह कर अन्याय तो नहीं कर रहा ? प्रेम का संश्लिष्ट स्वरूप है ही ऐसा कि अनुभूति के कुछ अन्यतम क्षणों में वह एकदम से निर्विकार बना देता है और अचानक ही विपरीततः स्वीकार का सहज सत्य समझाने लगता है । अजीब है कि एकदम से जिसे अपनी अनुभूतियों के प्रत्येक फलक पर आपने अनुभव किया उसे ही यह कहते तनिक भी नहीं झिझकतीं आप कि -
    "मैं तुमसे प्यार नहीं करती !!
    मैंने तुमसे प्यार कभीं नहीं किया...!!!

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  11. आपको पहली बार ही पढा है .बहुत सुन्दर
    भावाभिव्यक्ति है |प्यार करके भी प्यार करने वाले को अहसास न करवाना
    यही तो प्यार है |
    आभार

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  12. प्यार कभी आँखों को रोशन कर जाता है.
    वही प्यार आँखों से बहकर अँधेरा कर जाता है
    ----
    सभी कुछ अहसास पे टिका है

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  13. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया ... लाजवाब दिलचस्प लिखा है आपने...........कुछ हट कर......

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  14. नहीं, मैं तुमसे प्यार नहीं करती...बिलकुल नहीं करती....hm !
    हाय ! रुलाना चाहती हैं आप, मैम !

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  15. बहुत ही कोमल,गहरे भावों को शब्दों में पिरोया है......

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