मंगलवार, 3 नवंबर 2009

एक खुला ख़त ...अपनी दीदी के नाम ...भाग 2

पिछली पोस्ट के सन्दर्भ में ...
अधिकांश टिपण्णीयां इसे संस्मरण समझकर की गयी हैं ...मगर यह सिर्फ़ संस्मरण नही है ..संस्मरण में घटनाएँ ज्यों की त्यों रखी जाती है ...मगर यदि कहानी की तरह लिखा जाए तो रोचकता बनाये रखने के लिए इसमे कई कल्पनाये भी जुड़ जाती है ...मेरा अनुरोध है कि इसे कहानी की तरह ही पढ़ा जाए ...लेखन शैली जरुर संस्मरणात्मक है ....

अब आगे ...
घर आमने सामने होने के कारण ...लुका छिपी ..तांक झांक चलती रहती थी ...उधर से गुलाम अली की ग़ज़ल ..." तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है " सुनायी जाती तो इधर तेज आवाज में रेडियो की खटर पटर शुरू हो जाती ...कभी कभी कटोरी चम्मच से सुर में सुर मिलाया जाता ....महाविद्यालय में वार्षिकोत्सव की तैयारी प्रारम्भ हो चुकी थी ...सांस्कृतिक व खेलकूद प्रतियोगिताएं में भाग ना लेने के कारण कॉलेज जाना कम ही होता था ...छोटे मामा छुट्टियों में घर आए हुए थे ....फुरसत के दिनों में पढ़ना लिखना मौज मस्ती करते हुए दिन हँसी खुशी बीत रहे थे ..
तभी एक दिन दोपहर में ...तुम कॉलेज से आई और सीधे अपने कमरे में चली गई ..बिना कुछ बोले ...काफी देर तुम्हारा इंतज़ार करने के बाद दरवाजा खटखटाया तो तुमने बहुत ही अनमने ढंग से मुझे टरकाते हुए जवाब दिया ..." अभी मैं बहुत थक गई हूँ ...कुछ देर आराम करने दे ..." और फिर अपना दरवाजा बंद कर सो गयी ...मैं देर तक तुम्हारे इस अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में सोचती रही ....दुसरे दिन घर में छोटे मामा और उनके दोस्तों के सुगबुगाहट में जो शब्द कानों में पड़े ...कलेजे को चीरते से ...मैं दनदनाती तुम्हारे कमरे में पहुँच गयी ..." तुम आज कॉलेज नही गयी..क्या हुआ ...और ये क्या सुन कर रही हम मैं ... मुझे यकीं नही हो रहा ...मेरी दीदी से सम्बंधित कुछ ऐसा भी हो सकता है जो मुझे पता नही ...और मामा और उनके दोस्तों को पता है ..." एक साँस में इतने सारे सवाल कर गई तुमसे ....बिखरे बालों और उतरे चेहरे के साथ जब तुमने उन समाचारों की पुष्टि की तो मेरे क़दमों के तले जमीं ही खिसक गयी .....शांत ...संस्कारवान ...सुरक्षित माने जाने वाले उस कस्बे में इस तरह की घटना बहुत ही अप्रत्याशित थी ....कॉलेज से घर लौटते के लिए अक्सर हम जिस छोटे सुनसान रास्ते का उपयोग करते थे ...जहाँ 3 हॉस्टल एक साथ बने हुए थे ...वहीं से घर लौटते समय अचानक किसी ने तुमपर हमला कर दिया था ...गनीमत थी की अभी सर साथ थे ...उनके साथकुछ हाथापाई भी हुई ...तुम सुरक्षित घर लौट आयी ...मगर बहुत घबरा गयी थी ...हम बहुत देर तक खामोश हाथ में हाथ लिए बैठे रहे ...मगर ...मेरी बहादुर दीदी ...ऐसे होसले पस्त नही होने थे उसके ...शाम तक फिर वही चहल पहल लौट आई ....जब छोटे मामा और उनके दोस्तों को इस ख़बर को चटखारे लेकर सुनते सुनाते देख जो तकलीफ हुई ...वह इस दुर्घटना से किसी भी तरह से कमतर नही थी ...उस रोज लड़की होने की अपनी बेबसी और आत्मीय रिश्ते के वैधानिक नही होने पर कितना गुस्सा ...कितनी घुटन ..महसूस हुई ...उसे शब्दों में बयान नही किया जा सकता ...घर वालों को तुमसे सहानुभूति होने की बजाये उन्हें मुझे तुमसे दूर रखने की कोशिश ज्यादा रुचिकर लगने लगी थी ...उन्हें पुरजोर कोशिश नही करनी पड़ी ...क्योंकि तुम्हारा प्रोबेशन पिरिअड जल्दी ही ख़त्म होने वाला था ...तुमने अपने घर रायपुर लौटने की तैयारी कर दी ...छोटे मामा जा ही चुके थे ...फिर उसी सन्नाटे की आहट पाकर मुझे उदास होते देख तुमने अपने जाने से पहले मेरे पापा को आने का टेलीग्राम कर दिया ...मम्मी पापा तो नही आए मगर उन्होंने दोनों छोटे भाइयों को भेज दिया ...मामी पहले ही परेशां थी और मेरे दो शैतान भाइयों को देखकर तो उनका पारा सातवे आसमान तक पहुँच गया था ...मगर किया भी क्या जा सकता था ..फायनल एक्जाम थे ..बीच में छोड़ का नही जाया जा सकता था ...तुम्हारे जाने के बाद कुछ अच्छा नही लग रहा था ...मैं अक्सर छत पर टहलते अपनी उन यादों को समेटने की कोशिश लगी रहती ...सामने वाले मकान में जब कभी अभीरंजन नजर आते ...तुम्हारी याद और बेतरह आती ...ऐसे में एक दिन बैंक से मामा दनदनाते हुए आए ...मामी को एक तरफ़ ले जाकर कुछ खुसर फुसर किया ...उनके चेहरे के बदलते भाव कुछ अनहोनी होने की आशंका व्यक्त कर रहे थे ...मामा ने तो मुझे कुछ नही कहा ..मगर मामी बड़े प्यार से अभिरंजन सर और मेरे रिश्ते के बारे में पूछने लगी ...मैं सन्न रह गयी ...उस व्यक्ति के साथ रिश्ता !!!..जिसे मैं अपना पिता मान बैठी थी ...उन अभी सर के साथ जिनसे क्लास तक में कभी सवाल पूछना तो दूर ...उनके सवालों का जवाब देने तक की हिम्मत नही होती थी ....मामी ने झिझकते हुए बताया कि मामा के कोई दोस्त है बैंक में ...जो अभिरंजन सर के भी दोस्त हैं ...कुछ बताया है उन्होंने ...मगर हमें तुम पर पूरा विश्वास है ...तब ही जाना मामा मामी के वास्तविक स्नेहिल रूप को ...नारियल के सख्त खोल के भीतर छिपी मुलायम सी गिरी जैसा उनका प्यार ....जब अभिभावक सख्त होते हैं तो शायद उसके पीछे उनकी मंशा मायावी दुनिया की कुटिल चालों से अपने बच्चों को बचाना ही होता है ...घर में पूरा समर्थन मिला.. मगर जाने क्यूँ घर से बाहर हर नजर व्यंग्य से घूरती सी महसूस होती रही ...और एक दिन तो हद ही हो गयी ...सुबह कॉलेज जाने के लिए जैसे ही घर से बाहर निकली ...सामने वाले मकान की दीवारों पर बड़े बड़े अक्षरों में अभिरंजन के साथ अपना नाम लिखा देखा ...उल्टे पैरों अन्दर लौट कर बहुत हिम्मत से मामी और संजय को यह बात बताई ...हालाँकि बाद में संजय ने उसपर पुताई कर छिपा दिया था ...मगर मुझे हर वक्त सोते जागते वे शब्द मुंह चिढ़ते से प्रतीत होते ...अभी सर को पता लगा तो उन्होंने संजय से कहलवाया था ..." बेबी को बोलना ..परेशां नही होगी ...आवारा किस्म के लोग इस तरह की हरकत किया करते है ...सब भूलकर अपनी पढ़ाई में मन लगाओ .." मैं समझ नही पा रही थी ...इस तरह दुश्मनी निकालने वाला अजनबी शख्स कौन था ...मैंने किसी का क्या बिगाडा था ...हाँ ..कुछ लोगों के प्रेम पत्र जरुर बेरंग लौटाए थे ...और अपनी क्लास मेट के साथ बदतमीजी करने वाले एक परिचित को लताडा था ...क्या मेरा यह गुनाह इतना बड़ा था ...इन सवालों से रात दिन उलझते किस तरह एक्जाम दिए ...क्या पढ़ा ...क्या लिखा ...कुछ याद नही ...हमेशा फर्स्ट डिविजन से उत्तीर्ण होने वाली ...विद्यालय में सबसे अधिक मार्क्स प्राप्त कर सबसे बुद्धिमान छात्रा का खिताब जितने वाली मैं ...किताबों से दूर भागने लगी ...परीक्षा परिणाम वही हुआ जो ऐसे हालातों में होना था .... मेरा सुनहरे कैरिअर का सपना बरबाद हो चुका था ....मम्मी पापा के पास लौट गयी मैं ...कभी पलटकर यहाँ नही आने के लिए ...मगर स्थान बदलने से दुखद यादे बदली या भूली जा सकती तो क्या सभी यही नही कर लेते ...



कहानी में अभी और बहुत ट्विस्ट हैं ...देखिये अगले अंक में

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्‍छी लग रही है कहानी, रोचकता बरकरार है अगले अंक की प्रतीक्षा के साथ शुभकामनायें ।

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  2. वाणी जी ......... गलती से मैंने भी इसे sansmaran लिख दिया था ........ पर आपने बहूत ली लाजवाब शैली में लिखा है इसे ........ रोचकता बनी हुयी है ..... अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी .......

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  3. kon dhunde jwaab logo ke..log to bas swaal karte hai......sthaan badlne se dukhd baate peechha nahi chhodti.....main bhes badal kar gali se nikla..mujhe dushman meri raftaar se pahchan gye mere....agli kadi ka intzaar.....

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  4. कहानी अनुभव के दायरे में क्रमशः आगे बढ़ रही है।

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  5. संस्मरण हो या कहानी उसके कहने का ढंग रोचक हो तो पाठक को बाँधे रखता है इसका शिल्प ऐर शैली कहानी की है इस लोये कथानक रोचक हो गया है। दिल को छू लेने वाली कहानी है ।ागली कडी का इन्तजार रहेगा।

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  6. बहुत ही रोचक और मर्मस्पर्शी कथा....
    आज दोनों ही भाग एकसाथ पढ़ डाले...अगले भाग की व्यग्रता से प्रतीक्षा है...
    ...................

    आप जितना अच्छा लिखती हैं,उतने ही सुलझे आपके विचार भी हैं...अनेक स्थानों पर आपकी टिप्पणी ने मुझे आपके प्रति श्रद्धा नत कर दिया...आपके विचारों से मैं अत्यंत प्रभावित हुई हूँ.....

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  7. रोचक है शुरू से अभी तक पढ़ा अच्छा लगा ..अगले अंक की प्रतीक्षा है .

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  8. ऐसा पढ़ना अलग अनुभव है।
    व्यथित करता है।
    शायद यही लेखन की सार्थकता है।

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  9. bahut hi khoobsoorti se prastut kiya gaya hai............agli kadi ka intzaar hai.......ek utsukta bani huyi hai.

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  10. हमें तो सब कुछ जाना पहचाना लग रहा है ...इक्कीसवी सदी में बहुत कुछ बदला नहीं है ..बस तस्वीर थोडी सी तिरछी हुई है .ओर कस्बाई शहरों में आज भी ऐसे ही करेक्टर सर्टिफिकेट लेने पड़ते है

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  11. सहज सरल अभिव्यक्ति में कठिन पलों का गंभीर चित्रण
    संस्मर हो या कहानी
    कहन के बिना आती नहीं रवानी
    बधाई हो वाणी

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  12. कुछ ख़त बैरंग लौटाए......किसी को लताडा.....अरे ये सब करोगी तो पोस्टर तो छपेंगे ही न.....हा हा हा ..
    शब्दों का चयन.....भाषा...शैली सब कुछ उत्कृष्ट ....पाठकों को बाँधने की कला में पारंगत हो तू छोकरी....
    सही जा रही है ....बस अब कहानी के ट्विस्ट का तो इंतज़ार है....

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  13. आगे का इन्तेज़ार है . बहुत सुन्दर लेखन !

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