रविवार, 1 नवंबर 2009

एक खुला ख़त ....अपनी दीदी के नाम



प्रिय
दीदी,

आज बरसों बाद तुम्हे पत्र लिखने बैठी हूँ तो कोई सिरा नजर नही आ रहा है .... कहाँ से बात शुरू करूँ ...अंतराल भी तो बहुत लंबा हो गया है ....मगर दीदी ...जब हम पहले काफी खतो-खुवात किया करते थे ...तब तो ऐसा कभी नही होता था ...कितने लंबे लंबे ख़त हो जाया करते थे ...कहाँ गए ...किससे मिले ...किसने क्या कहा ...कौन सी मूवी देखी ...और भी अंतहीन निरर्थक बचकानी बाते ....लिखते हुए अगर कलम रूकती भी थी तो सिर्फ़ इस डर से की लिफाफे का वजन ज्यादा ना हो जाए ...
ये सच है की सालों बीत गए ...तुम्हारे पास मेरा कोई ख़त नही पहुँचा ....मगर जाने कितने ख़त लिखे तुम्हे मन ही मन ....लिखे और फाड़ दिए बस ...इस आस में की तैरते हुए वे शब्द तुम तक जरुर पहुँच गए होंगे ...तुम ...यानि मेरी प्यारी दीदी...मेरी मां ....
आज जब फिर से तुम्हे ख़त लिखने बैठी हूँ तो सब कुछ चल चित्र सा आँखों के आगे घूम रहा है ...वो अनायास हुई तुमसे पहली मुलाकात ...मैं और संजय घर के बीचों बीच बने चौक में खाना खा रहे थे ....तभी पता चला की ...हमारे कॉलेज की कोई लेक्चरार आयी है ....हमारे घर में कमरा किराये पर लेने ....अपनी किसी लेक्चरार दोस्त के साथ ...अचानक दो अजनबियों को सामने देखकर हडबडाते हुए हम अपनी थाली ले भागे ....बाद में जब तुम हमारी किरायेदार बन गयी थी ...हमारी इस हरकत के लिए बड़े प्यार से लताडा था ...क्यों भागे तुम लोग ...क्या हम तुम्हारा खाना छीन कर ले जाने वाले थे ....कितना लाड दुलार था तुम्हारी झिड़की में की पहले ही दिन सारी लाज और झिझक छोड़ तुम हमारी मेम की बजाय दीदी बन गयी थी ...पहली नियुक्ति थी तुम्हारी हमारे कॉलेज में ...तुम्हारे अधिकार भरे लाड दुलार ने ही इस दब्बू ...डरी सहमी लड़की को मिलनसार और वाचाल बना दिया ...
अपने गाँव में उच्च शिक्षा हेतु कॉलेज की कोई व्यवस्था नही होने के कारण मैं यहाँ इस कस्बे में अपने मामा के घर रह कर पढ़ाई कर रही थी ....अपने माता पिता से दूर मामी के कठोर अनुशासन के बीच स्नेह को तरसती इस किशोरी को तुम्हारी ममतामय शीतल छाँव मिल गई थी ...कॉलेज से आते है तुम्हरी गोद में सर रखकर लेटना और कॉलेज में दिन भर की खट्टी मीठी गतिविधियों की चर्चा करना दिनचर्या का एक प्रमुख हिस्सा बन गया था ...तुम्हे याद है दी ....हमारे इतिहास की कक्षा में जब तुम्हारा पिरिअड होता तो...हम दोनों एक दुसरे से अनजान बने हुए आंखे चुराए रहते थे ...की कहीं क्लास में ही हँसी ना छूट पड़े ...मुझे पहले ही धमका देती थी तुम ..." खबरदार जो क्लास में मेरी ओर देखकर मुस्कुराई तो " ...अभी भी मुस्कराहट पसरी जा रही है चेहरे पर ....
जैसे जैसे हमारी नजदीकियां बढती जा रही थी ...मामी की कठोरता भी ...पता नही क्या था उनके स्वाभाव में ज्यादा दिन किसी से पटरी बैठती ही नही थी उनकी ...कुल चार प्राणी ही तो थे हम ...मामा, मामी, उनका बेटा संजय , और मैं ...मामा के बैंक जाते है मामी पुरे घर में ताले जड़ कर घुमने निकल जाती , संजय अपनी पढ़ाई , दोस्तों और लाइब्रेरी में मस्त रहता ...उस हवेलीनुमा बड़े से मकान में सन्नाटों के बीच बहुत अकेली हो जाती थी मैं ... मामी के दबंग स्वाभाव के कारण सहेलियां भी घर आने से कतराती थी ....अकेले कही जाना तो खैर सम्भव ही नही था ...इन्ही गहरी उदासियों और अकेलेपन के बीच तुम आयी थी खुशनुमा सुबह बन कर ....कभी चाय भी ना बनाने वाली किताबी कीडा इस लड़की को तुमने अपनी प्यारी नसीहतों के जरिये ना सिर्फ़ आटा गूंधना सिखाया ...बल्कि छोले और सेवइयां बनाना भी ....तुम अपने शहर से लेकर आयी थी ...अपनी नानी के हाथ की बनी खास सेवईआं ...कभी तुम अपनी साथी लेक्चरार के साथ घुमने निकल जाती और देर से घर आती तो मैं तुमसे इतनी नाराज हो जाती ...मुंह फुलाकर बैठ जाती ...तुमसे बात नही करती और ना ही तुम्हारी किसी बात का जवाब देती ....तो तुम भी कहाँ मनाती थी ...गुर्राकर कहती ...सीधी तरह से बात करती है या लगाऊं दो थप्पड़ ...बिना पीटे तेरे चेहरे की सुजन नही उतरेगी क्या ...सारा गुस्सा और नाराजगी धुएँ की तरह काफूर हो जाता और मैं फिर एक बार तुम्हारी स्नेह की आंच से भीगती तुम्हारी गोद में सर रखकर पूरे दिन भर का लेखा जोखा सुनती ...
इधर तुम्हारी बातें अक्सर घूम फिर कर एक नाम पर आकर अटक जाती ......अभिरंजन वासवानी ....हमारी कॉलेज के भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर ....जो हमारे सामने वाले मकान में ही किरायेदार भी थे ...सामान्य से कुछ लंबे ...लंबा चेहरा ...घने बाल ...घनी मूंछे .... आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी अभिरंजर सर से सभी प्रभावित थे ....हमारी रसायन शास्त्र की प्रोफ़ेसर डॉ.रत्नेश भी ....साथ साथ कॉलेज आते जाते उनसे तुम्हारी मित्रता कब अनुराग में बदल गयी ...तुम्हारी इतनी घनिष्ठ होने के बावजूद मुझे भी पता नही चला ...मैं अक्सर उनका नाम लेकर तुम्हे छेडा करती थी...एक दिन बहुत लाड में आकर तुम बोल उठी ..." मेरी शादी हो जाने दे ...मैं तुझे कानूनन गोद ले लूंगी ...और फिर हम हमेशा साथ रहेंगे..." मुझे चहकने का एक और बहाना मिल गया ..." अरे वाह ...फिर तो मैं अभी सर को बापूजी कहा करुँगी...."... जब तुमने यह बात अभिरंजन सर को बताई तो अपने लिए बापू शब्द का प्रयोग सुनकर वे दिल खोल कर हँसे थे ...बाद में तुम्ही ने तो बताया था ...तब कहाँ पता था ....ये सब कोरी भावुकता भरी बातें हैं जो यथार्थ के धरातल पर कदम रखते ही दम तोड़ने वाली हैं ...



क्रमशः ...... अभिरंजन के उनकी जिन्दगी में आने से और क्या परिवर्तन हुए...जानिए अगली कड़ी में ...


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21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह.....।
    पत्र लेखन विधा को तो शायद हम भूल ही बैठे हे।
    आलेख सुन्दर रहा।
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा है!

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  2. बेहतरीन संस्मरण सुनाने के लिए साधुवाद...

    जय हिंद...

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  3. बढ़िया...इन्तजार रहेगा जानने का कि अभिरंजन के उनकी जिन्दगी मे आने से क्या परिवर्तन हुए.....

    जारी रहिये.

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  4. रोचक पत्र. चलचित्र सा चलता हुआ और कौतूहल को अपने साथ लेकर.
    बहुत सुन्दर कौतूहल बरकरार है आगे के प्रसंग के लिये

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  5. उधर न ले जाइए ,मुझे तो आपके इस संस्मरण की सहज सरल शैली ही रोके हुए है -जब हम संस्मरणात्मक हो किसी और के बारे में कुछ सुनाते हैं तो प्रकारांतर से बहुत कुछ खुद के बारे में सहज ,अनजान ही कहते जाते हैं -और संस्मरण की यह शैली मुझे बहुत भली लगती है -संस्मरण ऐसे ही तो आत्मकथात्मक बन जाते है !

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  6. बहुत ही सहज रुप और भाषा मे आप यह संस्मरण सुना गई. भाषा की सरलता और इतनी सरलता इसको बहुत सुंदर बना रही है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  7. कितना निश्छल प्यार बिखरा है इस पत्र में .. मीठेपन कि वजह से ही तो पत्र इतने चर्चित हुआ करते हैं .. अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा.

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  8. काल चक्र भी मानस पटल पर अंकित अहसासों को कभी मिटा पाया है क्या ? जीवन के अन्तिम क्षण तक ये यादें बन प्रतिध्वनित होते ही रहते हैं ।
    आभार...।

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  9. aap ki aaj ki post mujhe ab tak ki aap ki sab posts se achhi lagi....agli kadhi ka intaar rahega....

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  10. देर मत कीजिये,अगली कड़ी जल्दी...........दीदी बहुत ही अपनी लगीं

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  11. संस्मरणात्मक शैली ही नहीं ,कथ्य ,भाव सब मन को छूते चले जाते हैं .आगे का इन्तेज़ार रहेगा .

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  12. कहते है किसी दुसरे का पत्र नही पढना चाहिये, लेकिन जब इअतना सुंदर पत्र लिखा हो तो , सुंदर सुंदर भावनाओ से सजाया हो तो गुस्ताखी हो ही जाती है, अब अगले हिस्से का इंतजार है.धन्यवाद

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  13. यह तो ब्लॉग विधा का बहुत उदात्त प्रयोग है! बहुत सुन्दर।

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  14. वाणी,
    मुझे तुम्हारी ये पोस्ट इतनीSSSSSSS अच्छी लगी की मैं बता नहीं सकती....
    बहुत सोच रही हूँ क्या कहूँ.....मेरे मन में न जाने कितने भावः....बस उमड़-घुमड़ रहे हैं....
    ये संस्मरण.....सादगी, निश्चल, पवित्रता और न जाने कितने भावः लिए हुए है.....
    मैं बस इन्हीं भावों में कल से डूब-उतरा रहीं हूँ.....
    पता नहीं कितना कुछ कहना चाह रही हूँ.....मगर शब्द ही साथ नहीं दे रहे हैं.....
    ये मेरी पहली टिपण्णी है....
    दोबारा फिर आउंगी....मेरा मन नहीं भरा है अभी...
    समझी तुम....!!

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  15. हाँ तो वाणी जी,
    हम फिर से आ गए हैं....
    आपका यह पत्र अपनी दीदी के नाम....ह्रदय विह्वल कर गया है...
    अच्छा !! आपने अपनी दीदी का नाम शायद नहीं बताया है.....
    खैर ....यह गुदगुदाता सा संस्मरण ऐसा भय है कि ......बस अब फटाफट इसे आगे बढाइये....हम इंतज़ार में हैं बहिन जी.....

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  16. Mujhe to lag raha hai Gurudatt ki koi film dekh raha hun.Vaise Aata sani ungaliyan jab keyboar per thirakti hain to kaisa samgeet nikalta hai ..bataunga next Sunday ..jab we met! :)

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  17. बहुत ही अपनापन लिये हुये आपका यह संस्‍मरण जो हर एक को अपने साथ जोड़ता चला जा रहा है अपनी अगली कड़ी के लिये, बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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  18. ऐसा लग रहा है वानीजी मानो मै अपने ही छोटे शहर और कालेज के दिनों में पहुँच गई |और विज्ञानं के प्रोफेसर और साहित्य लेक्च्र्रार हमारे सामने ही khade hai अपनी भावनाओ को छुपाते हुए |
    बहुत अपना सा संस्मरण और उतनी ही सुंदर आपकी भाषा शैली |अगली कड़ी का इंतजार |

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  19. संवेदनाएं सिर्फ भावुकता भरी बातें ही नहीं होती, वास्तव में यदि वे न हों तो जीवन एकदम नीरस हो जाए।
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    हाजिर है एक आसान सी पक्षी पहेली।
    भारतीय न्यूक्लिय प्रोग्राम के जनक डा0 भाभा।

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  20. लाजवाब PATR है ........ AGLI KADI की PRATIKSHA RAHEGI .......

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  21. इस तरह बीते दिनो को याद करना कितना अच्छा लगता है ।
    शरद कोकास "पुराततववेत्ता " http://sharadkokas.blogspot.com

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