गुरुवार, 5 नवंबर 2009

एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ...अन्तिम किश्त

अब तक आपने पढ़ा ...एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ..और ...एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ...2
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ख़त कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ...मगर कोई बात नही ...जितना ज्यादा वजन लिफाफे का होगा ...मन उतना ही हल्का होता जाएगा ...
हाँ तो दीदु ...आगे बढूँ ...तुम्हे उस समय यह सब नही बताया अपने खतों में ...बताकर फायदा क्या था ...तुम इतनी दूर थी ...और अपने दुखडे रोने की मेरी आदत भी नही थी ...घर लौटी अपने माता पिता के पास ...पढने के सनकीपन के हद तक शौकीन , अंग्रेजी में लिखे ख़त जेब में लेकर घुमने वाले और माँ को अक्सर पढ़कर सुनाने वाले मेरे गर्वीले पिता को कैसा महसूस हुआ होगा ...पता नहीं ..मगर उन्होंने मुझसे एक शब्द भी नही कहा ...ना कुछ पुछा ...पास के शहर के महाविद्यालय में दाखिला दिला दिया ...हम नियमित तौर पर भारी भरकम खतों के माध्यम से लगातार जुड़े रहे ...तुम्हारे लंबे खतों में जिक्र होता था ...अभिरंजन सर से हुई मुलाकातों का ...किस तरह अपनी माँ से गले मिलकर रो पड़े थे वे ..और उनकी इस भावुकता पर निहाल हो उठी थी तुम ....की किस तरह तुम अपनी एक सहेली के माध्यम से उनसे मिला करती थी ....की किस तरह बहुत साहस कर एक दिन तुम्हारे घर भी पहुँच गए थे...सब कुछ जाना तुम्हारे खतों के जरिये ...बाद के खतों में अपने पिता के दिल की बीमारी से उपजी उनकी मजबूरियों के जिक्र ने मुझे थोड़ा परेशां किया ...मैंने तुम्हे सचेत किया था की कही वे तुम्हे धोखा तो नही दे रहे ...लौटी डाक से तुम्हारा जवाब था ..." मुझे इससे खास फर्क नही पड़ता ...मैं अपने भीतर बसी अभिरंजन की छवि से प्यार करती हूँ ..."
फिर तुम्हारे पत्रों से ही उनसे अलग होने ...तुम्हारी शादी तय होने की जानकारी मिलती रही ...इधर पापा की पुरानी बीमारी विकराल रूप ले चुकी थी ...आंतों के इन्फेक्शन से पीड़ित पिता को इलाज के लिए बड़े शहरों में इलाज के लिए जाना पड़ता और माँ भी साथ होती ...घर पर छोटे भाई बहनों के साथ मैं ...जिन्दगी की दिशा बदलने लगी थी ...लंबे जटिल ऑपरेशन के बाद स्वस्थ हए पिता के सामने जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने का लक्ष्य था ...तीन महीनों के अंतराल में हम दोनों बहनों की शादी तय हुई ...इस बीच तुम एक नन्ही गुडिया की माँ बन चुकी थी ..तुम्हारे ख़त छोटे होते जा रहे थे और उनके बीच अंतराल लंबे ....कुदरत का करिश्मा ही था.... मेरी शादी तुम्हारे शहर में तय होना ...जो अब तुम्हारे लिए पराया हो चुका था ...तुम आयी थी शादी में अपनी गुडिया और जीजाजी के साथ ..और बड़ी बहन की तरह बहुत अच्छी तरह संभाला भी ...शादी के तीसरे दिन तुम आई थी हमारे पुराने शहर में बने आधे अधूरे पुश्तैनी मकान में ...अपने पिता के घर चाय पर निमंत्रण देने ...तुम्हे कितना असहज लगा होगा ...ये तब जाना जब तुमने अपने फ़िल्म वितरक पिता के बंगलेनुमा मकान के बड़े से ड्राइंग रूम में हमारा स्वागत किया...जीजाजी अपने मित्र से मिलने गए हुए थे ...तुम हमें बैठक में अपने छोटे भाई के पास बिठा कर अन्दर चली गयी ...वे पति से बातें करते रहे ..काफी देर तक जब तुम नही आयी तो भैया ने अन्दर जाकर तुम्हे बुलाने को कहा ...अन्दर तुम अपनी भाभी और माँ को कल खरीदी हुई साडियां दिखा रही थी ...मुझे देखकर बोली ..." कल कुछ साडियां खरीद कर लाई हूँ ..ससुराल में सब पूछेंगे ...मायके शादी में गयी थी ..क्या दिया उन्होंने " ...दुनियादारी की इन रस्मों से मेरा कभी पाला नही पड़ा था ...कुछ चुभ सा गया ...कोई टीस उठी ...तुम्हारा ये व्यवहार मुझे स्तंभित कर देने वाला था ...हमारे बीच तथाकथित सामाजिक रुतबे का फर्क चुका था ...आख़िर अब मैं चीफ एकाउंटेंट पिता की पुत्री या बैंक मैनेजर मामा की भांजी नही रही थी ...अब मैं एक साधारण शिक्षक की बहू और जूनियर लिपिक की पत्नी थी ...बस वह हमारी आखिरी मुलाकात थी ...उसके बाद भी मैं अक्सर तुम्हे पत्र लिखती रही ...नए वर्ष ...शादी की सालगिरह आदि पर शुभकामना कार्ड भी भेजती रही ...तुमने कभी उसका जवाब नही दिया ...मैंने भी ख़त लिखने बंद कर दिए ...हाँ ... तुम्हारे घर फ़ोन कर तुम्हारे हाल चाल पूछती रहे ...इन फ़ोन काल्स से ही पता चलता रहा...छोटे भैया की शादी हो चुकी थी ...बड़े भैया की गृहस्थी में भी छोटे बच्चों का पदार्पण हो चुका था ..तुम भी दो बेटियों की मां बन चुकी थी....व्यस्त मैं भी बहुत रही इन वर्षों में ...शादी के बाद फिर से पढ़ाई प्रारम्भ करना ...साथ ही दो नन्ही मुन्नी परियों का आगमन ...मगर मैंने तुम्हे एक दिन के लिए भी नही भुलाया ....बिना शर्त बेइन्तहा प्यार करने का सबक मैंने तुमसे ही सिखा था दीदी ....मगर मेरी वो दीदी कही खो गयी थी ...एक बार फ़ोन पर तुम्हारे छोटी भाभी से बात हुई ...नाम सुनते ही पहचान गयी ..." आपका जिक्र होता रहता है अक्सर जब दीदी छुट्टियों में मायके आती है ..." मतलब भूली तो तुम भी नही थी ...फिर हमारे बीच ये फासले क्यों आ गए थे ...पता नही ...कई बार तुम्हारी कालोनी से गुजरना होता मगर तुम्हारे घर की ओर उठते कदम उस दिन के व्यवहार को याद कर वापस मुड जाते ...
और एक दिन ...अप्रत्याशित सा तुम्हारा फ़ोन आया...तुम्हरी आवाज थोडी अनजानी सी लगी ...तुम अपनी चिरपरिचित शैली में बोल रही थी ..." अच्छा ...मेरी आवाज पहचानी नही ...पिटेगी अब ..." मैं बल्लियों उछल पड़ी ...तुम हमारे परिवार ..बच्चों के बारे में पूछती रही ...तुम सब भूल चुकी थी मेरे पति कहाँ काम करते हैं... हम कहाँ रहते है...सब ....तुमने बताया की तुम अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए रायपुर शिफ्ट कर चुकी हो ...अपने मायके के पास ही कमरा किराये पर लिया है ...अब तुम मुझसे मिलना चाह रही थी ...मैंने तुम्हे पता बता दिया ...मगर साथ ही यह भी की कल मुझे अपनी मां के घर पिता के श्राद्ध पर जाना है ....आने से पहले फ़ोन कर लेना ....या फिर मैं फ़ोन कर बता दूंगी ...
फ़ोन का रिसीवर रखते हुए मुझे फिर वही तुम्हरे पिता की आलिशान कोठी याद आ गयी ..फिर ना कभी तुम्हारा फ़ोन आया ...ना ही मैंने किया ...तुम जानती थी मैं नाराज थी ...इतने वर्षों तक तुमने कोई खोज ख़बर नही ली ....तुम मेरी वो दीदी रही ही नही ...अगर होती तो कभी भी घर आ धमकती और कान उमेठते हुए कहती ...बड़ी आई व्यस्त रहने वाली ..... कितने आश्चर्य की बात है ना ...हम वर्षों एक दुसरे से दूर रहे ...मगर खतों के माध्यम से जुड़े रहे ...और ...आज इतने वर्षों से एक ही शहर में ...बिना दुआ सलाम किए ....मेरे लिए कितना तकलीफदेह है यह सब कुछ ...मगर है तो है ....खो दिया मैंने एक अमूल्य स्नेही रिश्ते को ...अगर मैंने खोया है अपनी मां जैसी दीदी को ... तो उसने भी खोया है अपनी गुडिया को ...जिसने तमाम विपरीत परिस्थितियों में प्रौढावस्था की ओर बढ़ते हुए भी अपने भीतर के निष्पाप बचपन को खोने नही दिया है ...हो सकता है कभी किसी राह पर हम मिल भी जायें ...एक शहर में ही तो हैं ...मगर दुआ हमेशा यही की है ...
गर अजनबी बन कर मिलो कभी जिंदगी की राह में ...बेहतर है ना ही मिलो ....

बहुत प्यार के साथ

तुम्हारी गुडिया


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20 टिप्‍पणियां:

  1. Di......... pehle to maafi chahoonga....... aapse........ deri se aane ke liye........ darasal thoda tension se main busy tha...... plz maaf kar dijiyega......abhi aapki teenon kisht padhin......... pehle to sansmaran laga....lekin jab poora padha to bas padhta hi chala gaya......... achcha laga...........padh kar....
    aakhir mein aapne sahi kaha ki ajnabi ban kar behtar hai na milo..........

    Regards........

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  2. बहुत ही अच्‍छी रही पूरी कहानी अंत भी बहुत भाया, एकदम आज के हालातों का सजीव चित्रण बहुत-बहुत बधाई ।

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  3. कमाल की कहानी कही है आपने...शब्द और भाव पक्ष बहुत ही अच्छा है..रोचकता और प्रवाह बना रहता है...आप एक कामयाब कहानी लेखिका हैं इसमें संदेह नहीं...लिखती रहें...
    नीरज

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  4. kabhi kabhi kuch rishtey itne bheetar tak paith kar jate hain ki kitni bhi koshish karo bhulane ki utni hi shiddat se yaad aate hain.........bahut hi samvedansheel kahani..........dil ki gahraiyon tak utarti huyi.

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  5. par wah didi !yaad to karti hain......aur aap bhi.....beech ke faslon ke madhya kai dusre rishte bhi hote hain,jinse n chahte hue bhi kuch chhupana padta hai

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  6. पत्र-लेखन कला का सुन्दर उपयोग किया गया है।
    बढ़िया कहानी है।

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  7. बेहद सशक्त कहानी, घटनाओं को बडी खूबसूरती से उकेरा है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  8. वाणी जी अच्छा करतीं हैं दिमाग को हारने देतीं हैं ....( आपकी प्रोफाइल से ) जहां भावनाओं की जीत नहीं वह जीवन तो और भी बदतर है भावनाएं ही तो दिल से जुडी है.....खैर आपकी तीन पोस्ट की लम्बी कहानी या संस्मरण या दीदी को लिखा लम्बा ख़त पढ़ा ....बहुत अच्छा लिखतीं हैं आप ....एक संवेदनशील मन की सारी भावुकता है इस ख़त में ....आप में एक अच्छे कहानीकार के गुण हैं ...आप बहुत अच्छी कहानियां लिख सकती हैं ....(क्या लिखती भी हैं....?) आपके यत्र-तत्र कमेन्ट भी पढने लायक होते हैं ....आभार....!!

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  9. संस्मरणात्मक शैली में रिश्तों के उदगम से उत्स तक को समेटती एक मार्मिक आपबीती !

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  10. तार्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
    ताल्लुक बोझ बन जाते तो उसकी तोड़ना अच्छा
    वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
    उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा

    आपकी लेखनी को इक बार फिर सलाम कर रही हूँ...भावः.....शब्दों का चयन....सबकुछ उत्कृष्ट श्रेणी का लगा....हमेशा कि तरह...

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  11. अदा जी की बात ही मेरा भी भाव...
    चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों...

    जय हिंद...

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  12. kamaal ka ant hai aapki kahaani ka ..... khat ke roop main kahaani ko kahna bahot hi mushkil kam hai jisko aapne baakhoobi rang diya hai ....

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  13. ये आदमी की प्रजाति है न, इसके कर्नल के ऊपर प्याज की तरह कई परते हैं। आप छीलते जाइये, नये शेड्स मिलते जायेंगे!
    बहुत बढ़िया लिखा आपने।

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  14. hmmm...red lines zindgee ka sach hai.....or zindgee ke bahut pas se gujrti ye rachna apne aap me mukamal hai....

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  15. Bhaavukta ko aur man ki ansuljhi parton ko kareene se utara hai aapne di..
    Jai Hind...

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  16. वाणी गीतजी,
    यदि यही आपका नाम है तो ठीक, अन्यथा आपके ब्लॉग को ही संबोधित कर रहा हूँ; ऐसा आप मान लें !
    'मेरा ठिकाना हो नहीं सकता...' पर आपकी टिपण्णी पढ़ी और मुदित हुआ ! ऐसी उत्प्रेरक टिप्पणियां और बेहतर लिखने का उत्साह और साहस देती हैं ! आभार व्यक्त करता हूँ !!
    आपके ब्लॉग की ज़मीन देख आया हूँ ! प्रभावपूर्ण 'इंट्रो' लिखा है आपने ! ये सारा खेल संवेदनशील मन और सशक्त मस्तिष्क का है ! जब तक इनकी धार बनी रहेगी, आप लिखने से अपने को रोक नहीं सकतीं !! आपकी कलम चलती रहे, यही कामना है !!
    साभिवादन--आ.

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