सोमवार, 25 जनवरी 2010

पिता के साथ बिताये आखिरी ३ दिन ...पिता की याद

पिताजी को गुजरे आज १२ वर्ष हो गए ...मगर जेहन में उनके साथ बिताये आखिरी तीन दिन हमेशा की तरह ताज़ा ही हैं ...

माँ के घर उपरी मंजिल का निर्माण कार्य चल रहा था जिसके कारण माँ यही आई हुई थी ...पापा को अपने किसी काम से दिल्ली आना पड़ा था ...26 जनवरी और रविवार की छुट्टी होने तथा उनकी तबियत कुछ नासाज होने के कारण 3 दिन के लिए जयपुर आ गए थे ...24 को मां का फ़ोन आया रात में 8 बजे

" तेरे पापा दिल्ली आये हुए थे ...उन्हें कुछ सर्दी जुखाम है ...तो मैं उन्हें ले आई हूँ दिल्ली जा कर ..."

" अच्छा ...पापा को आप लाई हैं ...या आप उनके साथ आई हैं " मैं हंसती हूँ माँ पर ...

उस वर्ष बहुत ठण्ड थी जयपुर में ...हम लोग रात में ही मिलने गए पापा से ....
कुछ उदास से लेटे थे ....मुझे देखते ही जाने क्यों उनकी ऑंखें नम हुई ...कभी उनको रोते नहीं देखा था जिंदगी में ....
" मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही ...मुझे हॉस्पिटल में एडमिट कर देना "
उनके सर पर हाथ लगा कर देखा ..." कहाँ पापा ...क्या हुआ है आपको ...बुखार भी नहीं ...हल्का सा सर्दी जुखाम है ...मगर फिर भी आपको ऐसा लगता है तो अभी चलते हैं हॉस्पिटल ..."

" बेटा...ये तीन दिन भारी हैं ...निकल जाए तो "....
माँ पास खिसक आई ...क्या बोल रहे हो आप ....जरा सा जुखाम खांसी में ऐसे घबरा जाते हो ...इतना बड़ा ओपरेशन हुआ तब तो नहीं घबराये ....
चलिए पापा जी , अभी दिखा लेते हैं डॉक्टर को ...पतिदेव और छोटा भाई दोनों एक साथ बोल पड़े ...

मगर तब तक वो संभल चुके थे ...."अरे नहीं मैं ठीक हूँ अभी ...सुबह देखेनगे " ....
मैं कुछ असमंजस में थी ...बच्चों को सुबह स्कूल जाना था ....
" पापा ...मैं यही रूकती हूँ ...ये बच्चों को घर ले जायेंगे ..."

वो मुस्कुराने लगे थे ..." मैं ठीक हूँ ...अभी तू घर जा और कल बच्चों को लेकर रहने के लिए ही जाना...दो दिन की छुट्टी भी तो है "

दूसरे दिन बच्चों के स्कूल से आने के बाद मैं वहीँ रहने चली गयी ...भाई पापा का चेकअप करवा कर ले आया था.....सब कुछ नोर्मल था ...मगर मैं देख रही थी कि बात करते अचानक पापा कही खो जाते थे ...उन्हें इस तरह कभी नहीं देखा था ...पढने के इतने शौक़ीन कि शायद ही कोई ऐसी पत्रिका होगी जो हमने नहीं देखी हो.. धर्मयुग , कादम्बिनी , इंडिया टुडे , रविवार, माया , सरिता , नवनीत , रीडर डायजेस्ट , सोवियत संघ सहित बिजनेस और ऑटो मोबाइल से सम्बंधित अनगिनत पत्रिकाएं उनके ब्रीफकेस की शोभा बढाती रहती थी ...उनके ऑफिस से आने के बाद हम इस फेर में रहते थे कि पिटारी खुले तो कोई पत्रिका मिल जाए...और हमारी बेचैनी को भांपते हुए एक साथ २-३ पत्रिका लेकर खाने की मेज पर बैठते और हमारी उद्विग्नता का मजा लेते रहते ...उनसे पत्रिका मांगने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती थी ...कभी मूड होता तो खुद ही दे देते वर्ना मांगने पर भी टका सा जवाब मिल जाता " अभी मैं पढ़ रहा हूँ " ...

इस बार भी बहुत सी पत्रिकाएं थी उनके पास मगर वे उसे पढ़ नहीं रहे थे ....ऐसा पहली बार हुआ ...वर्ना उनके हाथ कभी खाली नहीं होते थे ... ओफ़िशिअल वर्क उनके लिए नशे की तरह था ...मुझे याद है कि एक बार उन्हें २-३ दिन तक लगातार हिचकियाँ ही आती रही जिसके कारण ऑफिस नहीं जा पा रहे थे तो घर में ही ऑफिस बन गया था ...चारो ओर फ़ैली फाईल्स और ऑफिस स्टाफ के बीच घिरे फॅमिली डॉक्टर से कंसल्ट भी करते जा रहे थे -और कार्य समाप्त होने पर ही हॉस्पिटल में एडमिट हुए .....अपने कार्य के प्रति उनका अनूठा समर्पण था ...बीमार होने पर कई बार ऐसा भी होता कि लोग घर उनके हाल चाल पूछने आते और मरीज ऑफिस में फाईल्स में सर खपाते मिलते ... ऑफिस के जरुरी डोक्युमेंट नहीं हो तो उनके हाथ में कोई न कोई पत्रिका या अखबार होता ही था ...खाना भी वे कुछ पढ़ते हुए ही खाते थे ...मगर इस बार ऐसा नहीं था ....बात करते हुए बार बार कही खो जाते थे ...हम समझ नहीं पाए उनके मन में क्या चल रहा था ...और जब समझे तब तक बहुत देर हो चुकी थी ...

उनके कार्यस्थल पर पिछले 4 सालों से हर २६ जनवरी को कोई न कोई मनहूस घटना घटती थी ...चीफ केमिस्ट, चीफ इंजिनियर , और मिल मालिक सहित एक मुलाजिम पिछले 4 सालों में एक एक कर प्रत्येक 26 जनवरी को दिवंगत हो चुके थे ...ये पांचवा साल था ...मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी ....और पता नहीं माँ भी कैसे इस बात को भूल गयी थी ...शायद कही यह भय तो नहीं बैठ गया था उनके मन में ....यदि महज डर ही था तो भी घटना तो घट कर ही रही ...

पास के कसबे से छोटी बहन भी अपने पति के साथ उनसे मिलने आ पहुंची थी ...बहुत खुश हो गए उसे देखकर...माँ को समझाते रहते कि बेटियों की शादी कर दी ...अब उनको अपना घर सँभालने दो ...मगर खुद ...अगर किसी काम से दिल्ली आना पड़ता तों कुछ घंटो के लिए ही मिलने जरुर आते थे ...एक दो बार तों ऐसा भी हुआ कि एअरपोर्ट से जिस वाहन से आये आधा- एक घंटा रुक कर वापस उसी से रवाना हो गए ...तमाम व्यस्तताओं के बीच रिश्ते निभाने की उनकी अद्भुत क्षमता थी ...

24 की रात अचानक उन्हें खांसी का दौरा पड़ा ...मधुमेह के मरीज होने के कारण उन्हें सर्दी जुखाम और खांसी बहुत जल्दी हो जाती थी ...रात भर तो खांसते रहे मगर दवा के असर से सुबह तक बिलकुल ठीक हो गए ...अपनी सम्पादित पत्रिका उन्हें दिखाई तो बहुत खुश हुए ...उसके विज्ञापनों के बारे में देर तक बात करते रहे ....फिर बोले मैं दिल्ली जाऊँगा तों वहां बात करूँगा ...यह मेरे लिए अप्रत्याशित सा था ...

२५ की रात को खाना खाकर सब सोने जा चुके थे ...वे टीवी देख रहे थे ...मेरी तबियत उन दिनों कुछ ठीक नहीं थी ...उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए नियमित दवा के अतिरिक्त नींद की गोली भी लेनी पड़ती थी ..मैं भी दवा लेकर सो गयी थी ...अचानक देर रात कुछ हलचल से नींद खुली ...
माँ कह रही थी कि तेरे पापा को कुछ घबराहट हो रही है ...डॉक्टर को दिखाने ले जाना है ...तुझे उठाया नहीं कि तू दवा लेकर सोयी थी ...
मैं हडबडाई ..."क्या हुआ पापा ..??"
बोले ..."कुछ नहीं ...बस ऐसा लग रहा है जैसे कुछ ताकत ही नहीं बची शरीर में "...अपने वस्त्र बदलते एक बार निढाल से बैठ गए...
कुछ नहीं हुआ है पापा , आप दो तीन दिन से ठीक से खाना नहीं खा रहे ...शायद शुगर कम या ज्यादा हो गयी है

...अभी डॉक्टर को दिखा देते हैं ...मैं उनके जूते उठा लाये थी ...एकदम से बोल पड़े

" नहीं बेटा , मेरे जूतों को हाथ नहीं लगाओ ...बेटियां नहीं लगाती हैं "...
तब तक भाई ऑटो लेकर आ चुका था ...बाहर निकलते हुए बोले ...

" गाड़ी कोणी लयो कईं "...बस यही आखिरी शब्द थे जो उनके मुंह से सुने थे ...

इतनी रात में कहाँ गाड़ी मिलती , सबसे पहले यही मिला इसे ले आया ....भाई बोला ...
माँ , छोटी बहन के पति , छोटा भाई और उसका एक मित्र ...ये सभी उनके साथ थे .. घर में भाभी छोटे बच्चे के साथ अकेली थी मैंने भाग कर पति को फ़ोन किया कि फलाना हॉस्पिटल में पापा को दिखाने ले गए हैं ...आप भी वही पहुँचो ...
हॉस्पिटल में डॉक्टर के चेक अप करते करते ही अचानक .............सब कुछ ख़त्म हो गया ...

वर्ष पर वर्ष बीत गए हैं ...मगर वो तीन दिन हमेशा साथ रहते हैं .... क्या यह सब होना था ....या अनहोनी थी ....5 वर्ष तक एक ख़ास तारीख को एक- एक कर महत्वपूर्ण अफसरों का काल का ग्रास बन जाना ...सवालों का यह जमघट कई बार मेरी नींद उड़ा देता है ....क्या था यह ....सिर्फ संयोग ...दुर्योग ....क्या ...??

पिता को समर्पित बहुत पहले लिखी एक कविता .....



बहुत आती है घर में कदम रखते ही
पिता की याद...
पिता
के जाने के बाद
ड्राइंगरूम की दीवारों पर रह गए हैं निशान
वहां थी कोई तस्वीर या
जैसे
की वो थे स्वयं ही
बड़ी बड़ी काली आँखों से मुस्कुराते
सर पर हाथ फेर रहे हो जैसे
जो की उन्होंने कभी नही किया
जब वो तस्वीर नहीं थे ..स्वयं ही थे
क्यों लगता है मुझे
कम
होती जा रही है उनकी मुस्कराहट
कभी कभी उतर आते हैं
मकडी
के जाले उन पर
कभी कभी धूल भी जमा हो जाती है
नजर ठहर जाती है उनकी तस्वीर पर
याद जाते हैं वो लम्हे
जब वो तस्वीर नही थे...
स्वयं
ही थे
एक दिन देखे थे
बहुत सारे बिखरे हुए
दिखी थी एक चिडिया तस्वीर के पीछे
अपना
घर बनाते हुए
काश कि मैं भी एक चिडिया होती
दुबककर बैठ जाती उसी कोने में
महसूस करती उन हथेलिओं की आशीष को
जब वो तस्वीर नही थे ...
स्वयं
ही थे
और एक दिन घर में कदम रखते ही
बहुत
आयी पिता की याद
तस्वीर थी नदारद
रह गया था एक खाली निशान
कैसा कैसा हो आया मन ...
आंसू
भर आए आँखों में
पर पलकों पर नहीं उतारा मैंने
उनका
कोई निशान
चिडिया करती थी बहुत परेशान
फट गया था तस्वीर के पीछे का कागज भी
सबकी अपनी अपनी दलीलें
लगा दी गयी गहरे रंगों से सजी पेंटिंग कोई
किसीको नजर आती उसमे चिडिया
किसीको नजर आता उसमें घोंसला
मगर मुझे तो नजर आता था
तस्वीर के पीछे का वही खाली निशान
कई दिन गुजर गए यूंही
देखते
हुए खाली निशान
अब भी बहुत आती थी
घर
में कदम रखते ही
पिता
की याद
एक दिन फिर से सज गयी तस्वीर उनकी
भर गया फिर से खाली निशान
अब भी आती है
घर
में कदम रखते ही
पिता
की याद
पर कभी कभी याद जाता है
वही
खाली निशान
बन गया है जिन्दगी में
जो
खाली स्थान
पिता के जाने के बाद
बहुत आती है घर में कदम रखते ही
पिता
की याद....
पिता
के जाने के बाद




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44 टिप्‍पणियां:

  1. दिल को छूती, भावुक करती पोस्ट!!

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  2. वाणी,
    एक पुत्री की ओर से पिता को अर्पित श्रद्धा सुमन....हृदयस्पर्शी है आलेख...
    तुम्हारे दुःख में हमसभी शामिल है.... नियति के खेल निराले हैं ...एक ही तारीख में कई लोगों का दिवंगत होना आश्चर्यजनक है...लेकिन शायदकुछ सवालों के जवाब होते ही नहीं हैं...
    पूरी आशा है पापा जहाँ भी हैं तुम पर असीम प्रेम बरसा रहे होंगे और गर्व कर रहे होंगे....
    समस्त ब्लाग परिवार की ओर से भाव भीनी श्रधांजलि समर्पित है उनको...!!

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  3. वाणी जी,
    आप की यह रचना जैसे सिर्फ रचना समझा कर नहीं पढ़ी बल्कि अपने को आप के दुःख में शामिल कर के महसूस किया है! माँ बाप से बिछड़ना उन का साया अपने सर से उठ जाने का ग़म जिंदगी भर कभी भूल नहीं सकते! बाद में हम सिर्फ उन के चित्र या फोटो ही देखते रह जाते है. मुझे आज भी अपनी माँ को याद कर के ऐसे ही लगता है के कैसे ऐसे वोह सामने बाते करते हुए एक दम दिवार पर लटकी फोटो में चली गयी! उन का होना अनहोना सा हो कर कहाँ चला गया ! आप की इस रचना को पढ़ कर अपने दर्द की याद ताज़ा हो आई. सच हे गया वक़्त कभी लौट कर नहीं आता है!

    आशु

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  4. वाणी जी आपने तो सुबह सुबह रुला ही दिया। माँ बाप का रिश्ता ही ऐसा होता है जिन्हें हम किसी दिन भी भुला नहीं सकते और ये भी कटु सत्य है कि उन्हें एक न एक दिन जाना ही होता है। भगवान आपको ये गम भूलने की हिम्मत दे। शुभकामनायें

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  5. पूरी पोस्ट पढ़ते -पढ़ते भावुक हो गया ,मेरी तरफ से भावभीनी श्रधान्जली .

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  6. पूरी पोस्ट पढ़ते -पढ़ते भावुक हो गया ,मेरी तरफ से भावभीनी श्रधान्जली .

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  7. इक था बचपन, इक था बचपन,
    छोटा सा नन्हा सा बचपन,
    बचपन के इक बाबूजी थे,
    अच्छे सच्चे बाबूजी थे,,
    दोनों का सुंदर सा बंधन
    इक था बचपन...

    जय हिंद...

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  8. बहुत मार्मिक पोस्‍ट लिखा है .. कभी कभी समझ में नहीं आता कि हमें इतना प्‍यार देने वाले .. दिन रात हमारी चिंता करने वाले .. इस तरह आंखें कैसे मूंद लेते हैं !!

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  9. सुबह सुबह भावुक हो गया मन इसको पढ़ कर ...माता पिता वह अनमोल तोहफा है जो हमेशा साथ रहते हैं .....

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  10. वाणी रुला दिया तुमने.....मैं कुछ भी लिखने में असमर्थ हूँ....बस इतना कह सकती हूँ...कि तुम्हारे जिए एक एक पल को रूह से महसूस किया...कैसे हम रिश्तों को for granted ले लेते हैं....कविता पढने की हिम्मत अभी मुझमे नहीं है....फिर आती हूँ..पहले घर फोन करने जा रही हूँ....इतना जरूर बोलूंगी..अंकल जहाँ भी होंगे उन्हें तुम पर अपार गर्व होगा...

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  11. वाणी जी,
    कुछ कहने को शब्द नहीं हैं, शायद ज़रुरत भी नहीं है मगर आपकी भावना बहुत आसानी से समझी जा सकती है.
    मेरी ओर से श्रद्धांजलि!

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  12. bhavbheenee post...man par gahara asar chod gayee..beete dino kee hamara mastishk sanjo leta haiaur samay samay par beete acche lamho ko jeevant kar deta hai..
    yade na lutane wala khazana hai.......
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.......

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  13. आपके लेख को पढ़कर बरबस ही वोह काली रात फिर से जेहन में आ गयी जिसे मै कभी भूल नहीं सकता, अश्रुपूरित नमन तो मेरे पूज्य पिताजी को

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  14. बहुत ही मार्मिक पोस्ट, यह पोस्ट एक श्रद्धा सुमन है उनकी याद में. बहुत भावुक कर दिया आपकी इस पोस्ट नें.

    रामराम.

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  15. भावुक कर गयी यह पोस्ट.
    कुछ स्थान एक बार खाली हो जाने के बाद कभी नही भरते...लेकिन मन तो मन है

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  16. वाणी जी, अभी एक साल ही हुए हैं मां को खोए , मगर जिस तरह से कि आपने कहा मैं भी कुछ कुछ अप्रत्याशित रूप से मां को खो बैठा और यही बात बहुत ज्यादा सालती है । माता पिता की जगह कोई नहीं ले सकता , खुद इश्वर भी नहीं , आपने सच में ही भावुक कर दिया
    अजय कुमार झा

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  17. वाणी जी ! ऐसे विषय पर लिखा डाला है आपने कि..कुछ नहीं कहा जायेगा मुझसे.मेरे पापा को गए भी ६ साल हो गए हैं .यकीन मानिये ४ पंक्तियों के आगे नहीं पढ़ पाई मैं और शायद पढ़ भी नहीं पाऊँगी कभी, आँखों में पानी भर आया है और अभी पूरा दिन बाकि है छलकीं तो कुछ काम नहीं हो पायेगा :) इसलिए मॉफी चाहती हूँ पोस्ट न पढ़

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  18. aankhen nam kara dee aapne..
    Gantantr diwas kee anek shubhechhayen!

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  19. वाणी जी ,

    बहुत भावुक रचना है....ऐसी स्थिति सबके साथ आती है जीवन में....और आपकी रचना के साथ सब उससे खुद को जुड़ा पा रहे होंगे....आपकी कविता एक भाव पूर्ण श्रृद्धांजलि है....शुभकामनायें

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  20. सच है कुछ सवालों के जवाब नहीं होते...
    ... हृदयस्पर्शी और भावुक कर देने वाली पोस्ट...

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  21. जीवन में पिता की रिक्तता का कोई विकल्प नहीं । सच है समय का मरहम एक अन्तराल दे देता है यादों के अनन्ताकाश को । काल चक्र का पहिया जब पुन: उसी तिथि को सामने ला खड़ा करता है अचानक सब कुछ हरा सा हो जाता है ।

    हमारी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि...!

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  22. aapka lekh padh ker neshabad hoon mein..
    shraddha suman ki bhavporn shradhanjali arpit
    ho unko.... shat shat naman

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  23. बहुत ह्रदय विदारक होता है पिता का जाना .
    मैं समझ सकता हूँ ....पिता जी की याद हो आयी

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  24. दी.... आँखें नम हो गयीं..... बहुत भावुकता से लिखा है आपने..... ३१ को मेरे पिताजी की भी बरसी है.... आपने आज रुला दिया.....

    उत्तर देंहटाएं
  25. .
    .
    .
    आदरणीय वाणी जी,

    वैसे तो किसी के भी जीवन में पिता की रिक्तता का कोई विकल्प नहीं... पर बेटी के लिये तो पिता के मायने ही अलग हैं... यह बात पहले नहीं समझता था मैं...पर आजकल जब अपनी बिटिया के साथ-साथ पल-बढ़ रहा हूँ... तो समझ आने लगी है यह बात...कि उस का तो सुपरमैन हूँ मैं...

    वाकई बहुत भावुक कर गई आपकी यह पोस्ट,
    मेरी ओर से श्रद्धांजलि!

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  26. वानिजी
    आपने तो रुला ही दिया मन को आत्मा को छूता हुआ आत्मीय आलेख |सच संसार में माँ पिता एक बार जाने के बाद उस रिक्तता को कोई नहीं भर सकता |कुछ ऐसा ही दुर्यो ग ही कहूगी हमारे परिवार में भी हुआ था करीब ३० साल पहले लगातार तीन साल एक ही परिवार के तीन लोग २५ नवंबर को हमसे बिदा ले चुके थे जिसमे पहले मेरे फूफाजी फिर बहूत कि कम उम्र में मेरे पिता और तीसरे साल पिता के मामाजी |और तीनो में गहरी आत्मीयता थी |
    पहले जब भी कभी किसी के माता या पिता कि म्रत्यु के बारे में सुनते तो दुःख होता था किन्तु जब अपने पिता कि म्रत्यु का समाचार सुना साफ महसूस किया कि पैरो तले कि धरती कैसी खिसकती है |

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  27. भावुक कर गई आपकी रचना सच में।
    एक शेयर याद आ गया..अच्छी तरह से याद नहीं

    जब देखता हूँ तस्वीरों को सोचता हूँ,

    आखिर इंसान कहाँ चले जाते हैं।

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  28. अत्यंत मार्मिक वर्णन. आपकी इस पोस्ट को पढ़ते-पढ़ते मुझी भी अपने स्व० पिताजी के साथ गुजरे अंतिम लम्हें सताने लगे..
    पिता के न रहने पर ही उनका मूल्य अधिक समझ में आता है.
    ...स्व० पिता जी के प्रति आपकी हृदयस्पर्शी शब्दांजली और भी बेचैन कर देती है.

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  29. ओह क्या कहूँ आपकी इस रचना के बारे में, शायद शब्द कम पड़ जायेंगे, लाजवाब लगी आपकी ये रचना, दिल को छू गयी आपकी ये रचना ।

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  30. @@ एक बेटी की अनुभूतियों के साथ गुजरते अपनी संवेदना जाहिर कर मेरे दुःख में भागीदार बनने के लिए आप सबका बहुत आभार ....!!

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  31. दिल को छू गयी आपकी यह रचना ..... पिता की याद भावूक कर जाती है मन है ..........

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  32. कितना विचित्र संयोग है...अभी-अभी उधर आनंद वर्धन जी के ब्लौग पर उनके पिता की स्मृति में लिखा गया उनके ही पिता की डायरी पढ़ कर आ रहा हूं...इधर भी....

    क्या कहूं...कविता पढ़ कर गुमसुम-सा हूं। दूर बैठे बिहार के एक सुदूर गांव में बैठे अपने पापा को मिस करने लगा हूं अचानक से...bloging is bad, i tell you ma'm!

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  33. प्रिय बहन, तुम्हारे लेख ने तो फिर से १२
    वर्ष पुरानी यादे ताजा कर दी .सच आज भी जब
    वो दिन याद आता है तो मन बैठ जाता है सोचने समझने की शक्ति ख़त्म हो जाती है मैंने तो पापा को यहाँ से स्वस्थ हालत में भेजा था पता नहीं क्या और कैसे हो गया
    हां २६ तारीख का डर मेरे मन में भी सता रहा था
    इसीलिए पापा जब जयपुर चले गए तो मैं भी आश्वस्त था की चलो वहा कुछ नहीं होगा लेकिन .........
    ये भी एक संजोग ही था की उस रात करीब २
    बजे के समय अचानक पापा का चेहरा सपने में आया मैं एकदम हडबडा के उठा उसके बाद फिर नींद ही नहीं .. और जब फ़ोन की घंटी बजी तो दिल अज्ञात भय से सिहर उठा फ़ोन उठाने की हिम्मत ही नहीं हुई किसी तरह जब फ़ोन उठाया तब जीजाजी ने कहा की पापा की तबियत ज्यादा ख़राब है तुमलोग जल्दी आ जाओ उसके बाद तो ...................

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  34. बहुत भावुक रचना है....ऐसी स्थिति सबके साथ आती है जीवन में..

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  35. आँखें नम कर गयी पोस्ट ...... विनम्र नमन

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  36. उनके पढने लिखने वाले संस्कार आपको मिले हैं -उसे सजोये रखना और सृजनात्मक बने रहना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है !

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  37. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  38. oh vani ji -

    kahne ke liye mere paas shabd nahi hain - lekin aapki bhaavna samajh sakti hoon |

    unhe mera pranam ...

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