गुरुवार, 6 मई 2010

साहस उतना ही दिखाना चाहिए जितना हममे है ....विचारों का बवंडर

निरुपमा की मौत ने इंसानियत और नारी विकास के दिखावटी सत्य को धराशायी कर दिया है ...नर और नारी सभी दुखी है ...होना भी चाहिए ...जाने कितना क्या कुछ लोग लिखते जा रहे हैं ...
मगर मैं रुक कर ठहर कर देखना चाहती हूँ ...
निरुपमा के दुःख से दुखी होकर अतिउत्साह में बिना उसके माता- पिता का पक्ष जाने उन्हें अपराधी करार देते हुए लोग अपना एकतरफा फैसल सुनाने में लगे हुए हैं ....क्या इस युग में भी ऐसे माता- पिता हैं जो पुत्री के दूसरी जाति में विवाह करने की बात पर ही बेटी का क़त्ल कर दे ...जिसे पढ़ा- लिखा कर उन्होंने आत्मनिर्भर बनाया ...पत्रकारिता जैसे पेशे को अपनाने की छूट देने वाले माता- पिता की क्या इतनी संकीर्ण सोच हो सकती है ...पत्रकारों के लिए जीवन कितना कठिन होता है ..उनका आत्मनिर्भर होना , स्वयं निर्णय लेने की क्षमता और दुस्साहसी होना कितना आवश्यक है ...कौन नहीं जानता ...निरुपमा का पत्रकार होना उसके अभिभावकों को अनुचित नहीं लगा ...इसका साफ़ मतलब है कि वे अपनी पुत्री के स्वतंत्र और साहसी होने से गुरेज नहीं रखते थे ... ऐसे में सिर्फ अफवाहों के आधार पर उन्हें दोषी साबित कर देना उचित नहीं है ...आरुषि के मामले से सबक लेते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने से पहले एक बार सोच लेना चाहिए कि पहले से दुःख में डूबे माता-पिता के लिए कितना हृदयविदारक हो सकता है ....यदि वे दोषी नहीं हैं तो ...
और यदि वे दोषी हैं तो उन्हें कत्तई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए ....उसके लिए हमें इन्तजार तो करना ही चाहिए ...

ऐसे में नारी की दशा दिशा पर विचार विमर्श करने वालों की तादाद एक दम से बढ़ गयी है ...जब तक नारियों की स्वतंत्रता और उनके उत्थान के लिए पहल अपने घर से नहीं की जाती ...मुझे तो ये सब जबानी जमा खर्च ही लग रहा है ...नारी सम्मान पर बड़ी- बड़ी बातें करने वालों से मैं पूछना चाहती हूँ इतना कि ....यदि उनकी भाभी/चाची या और कोई महिला सदस्य जो उनके परिवार में ब्याह कर आई हैं ...यदि अपने पति द्वारा प्रताड़ित हैं ...और उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना चाहती है ...तब भी क्या वे अपने परिवार के विरुद्ध उस महिला के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखा सकते/सकती हैं ....नहीं ....कोई नहीं करता ऐसा ...नहीं कर सकता ऐसा ...साहस उतना ही दिखाना चाहिए जितना आपमें है ...यदि आप नारी सम्मान की शुरुआत अपने परिवार से नहीं कर सकते तो गाल बजाना छोड़ दे ....

इसलिए ही मेरा जोर इस बात पर रहता है कि हमें वही होना चाहिए जो हम दिखाना चाहते हैं ...हमारी कथनी और करनी का दोगलापन ही सड़ांध मारती इस व्यवस्था का प्रमुख कारण है ...आज जो बड़े-बड़े गुरु महात्माओं का असली सच सामने आ रहा है ....वह इसी दोहरेपन की विसंगति है ...बड़े बड़े पंडालों में प्रवचन करने वाले इन महात्माओ और सरल और सादे जीवन का उपदेश देने वालों ने खुद के जीवन में सरलता और सादगी को ताक पर रखा हुआ है ....सिर्फ जबानी जमा खर्च ....

वेश्याओं को समाज का कोढ़ मानने वाले खुद धार्मिक प्रवचन और धर्म की आड़ में किस तरह संभ्रांत परिवार की महिलाओं तक को इस दलदल में धकेल चुके थे ...कुछ समय पहले पकडे गए एक नहीं दो-तीन नामी गिरामी बाबाओं की पोल खुल ही चुकी है ....इनके मूल में मुझे जो नजर आता है ...वह यही है ...कि समाज के तथाकथित धार्मिक और प्रगतिशील इंसान लगातार वही दिखाते रहे हैं जो उनका वास्तविक चरित्र नहीं है ....वर्ना जिस तादाद में आजकल प्रवचनों और नारी समाज सुधारकों की संख्या में वृद्धि हुई है ...रामराज्य तो स्थापित होकर ही रहता ...

इसलिए ही मैं उन लोगो का सम्मान करती हूँ जो खुद को जाहिर करने की स्पष्टवादिता रखते हैं .... हम जो दिखाना चाहते हैं हम भीतर से भी वैसे ही हों ...जब तक नहीं है ...तक तक मुखौटे लगा कर ना जियें ...


---मेरे विचारों का बवंडर ....

48 टिप्‍पणियां:

  1. असल बवंडरों के विपरीत ऐसे वैचारिक बवंडर मन के आँगन को साफ रखते हैं।
    @ परिवार के विरुद्ध उस महिला के पक्ष में - हर संस्था की एक सीमा होती है। परिवार और विवाह की भी सीमाएँ हैं।
    सुविचारों की सुगन्ध को समीर की तरह अपने अस्तित्त्व में जो धारण नहीं करता वह संत कहलाने योग्य नहीं होता।

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  2. वाणी जी,
    इस केस में मुझे प्रियभांशु की भूमिका बड़ी विचित्र लग रही है...एक विश्वास के साथ बच्चों को मां-बाप पढ़ने के लिए दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भेजते हैं...यहां पढ़ाई के साथ दोस्ती हो जाती है, कोई बुरी बात नहीं...लेकिन क्या ये मां-बाप के भरोसे के साथ विश्वासघात नहीं कि आप वर्जनाओं को तोड़ वो रिश्ते भी बना लेते हैं जिन्हें शादी के बाद ही जायज़ माना जाता है...वो भी अपना करियर सैटल होने से पहले ही...अगर ऐसी नौबत आ भी गई, तो फिर चट्टान की तरह उस लड़की का साथ देना चाहिए था जिसे बिनब्याहे मां बनाने के लिए खुद ही ज़िम्मेदार हैं...ये स्थिति आ गई थी तो बिना वक्त गंवाए प्रियभांशु को निरुपमा से शादी कर लेनी चाहिए थी...मां-बाप की रज़ामंदी लेने का इतना ही ख्याल था तो वो काम ही क्यों किया था जिसे शादी से पहले सही नहीं माना जाता...खैर निरुपमा के मां-बाप को तो उनके किए की सज़ा मिलेगी ही लेकिन कटघरे में प्रियभांशु को भी खड़ा किया जाना चाहिए...

    जय हिंद...

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  3. कथनी और करनी का दोगलापन-सही कहा. एक चिन्तनपरक आलेख.

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  4. कथनी और करनी का अन्तर ही सारी बुराईयों की जड़ में है।

    सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहते
    रू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  5. खुशदीप भईया से सहमत हूँ , और ज्यादा नहीं कहूँगा ।

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  6. Vanee ji,doglapan to apne samaj me haihi..koyi dorai nahi...Khushdeep jo kah rahe hain usme bhi dam hai.

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  7. @ खुशदीप जी ,
    लेकिन क्या ये मां-बाप के भरोसे के साथ विश्वासघात नहीं कि आप वर्जनाओं को तोड़ वो रिश्ते भी बना लेते हैं जिन्हें शादी के बाद ही जायज़ माना जाता है ...
    मैं आपकी इस टिप्पणी से बिलकुल सहमत हूँ ...रश्मि रविजा के ब्लॉग पर हरि शर्मा जी ने ऐसा ही कुछ लिखा है और मैंने उसका समर्थन भी किया है ....

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  8. मुझे पता नहीं क्यों लग रहा है कि ये मामला उतना सरल सीधा नहीं है जितना दिख और दिखाया जा रहा है , सबसे बडी बात तो ये है कि इसका एक असली कैरेक्टर वो प्रियभांशु ही कोई तगडा गेम खेल गया है और उसके मंसूबो को पूरा करने में निरूपमा के झूठी शान वाले मां बाप आ गए हैं । रही सही कसर पूरी कर दी पोस्टमार्टम करने वाले गधों ने जिन्हे भूल भी इसी केस में करनी थी । अभी देखिए न क्या क्या क्या भूलें निकल कर आती हैं सामने

    एक ही हल है जो भी दोषी है उसे तबितय से ठोका बजाया जाना चाहिए ...क्योंकि उस लडकी की मौत के लिए ये सब के सब जिम्मेदार हैं

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  9. @ गिरिजेश राव जी
    जी हाँ ...मैं भी यही मानती हूँ कि परिवार और विवाह की सीमा होती है ...तो लोग दूसरों को उनकी सीमा रेखाओं का उल्लंघन करना क्यों सिखाएं ...मतलब ...यह मनोवृति क्यों कि हमारा घर जैसा है ...वैसे ही रहे ...तुम्हारे घर में तुम्हे कुछ गलत नहीं करने देंगे ...यदि हम ये ठान ले कि सुधार की शुरुआत अपने घर से ही करे ...तब तो हुई ना पते की बात ..और यदि हम अपने घर में नहीं कर सकते तो दूसरों को उकसा कर उन्हें ना घर का ना घाट का ...ना बनाये ...
    क्या मैं गलत हूँ ..??

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  10. दी....दरअसल बात यह है कि वही पुरुष महिलाओं के बारे में निगेटिव बोलता है जिसमें ख़ुद कमी होती है.... या फिर वही पुरुष ज्यादा महिलाओं में इंटेरेस्ट लेता है.... जो मूल रूप से ...व शारीरिक रूप से नपुंसक होता है... महिलाओं का शोषण भी ऐसे लोग ज्यादा करते हैं... आप और हम यहाँ निरुपमा जैसे मैटर पर लम्बी लम्बी बिना मतलब की बहस कर सकते हैं... जबकि यह बात एकदम सही है.,... कि दुनिया का कोई भी माँ-बाप यह कभी नहीं बर्दाश्त करेगा... कि उसकी बेटी या बेटा भी.... सामाजिक बंधनों से पहले .... मातृत्व या पितृत्व ... सुख ले ले.... हो यह भी सकता है कि जब निरुपमा के माता-पिता ने उसके गर्भवती होने का सुना तो उसको मार दिया.... और अगर ऐसा है तो उन्होंने ठीक किया.... अब उसके घर के अन्दर क्या हुआ यह कोई नहीं जानता .... सब उलटी-सीधी बहस में लगे हैं.... दरअसल यहाँ इंटरनेट पर ज़्यादातर लोग खाली हैं.... और कुछ ऐसे नौकरी पेशा हैं... जो ऑफिस से घर लौटते हैं तो ... कुछ काम नहीं होता है.... तो यहीं बेसिर पैर कि बहस कर चले जाते हैं सोने....

    अब यहाँ ब्लॉग जगत में ही देख लीजिये... ज़्यादातर मर्द अपनी अधेड़ अवस्था पार कर चुके हैं... और इनमें से कुछ यहाँ भी सब औरतों के पीछे भागते हैं.... यह अपने को अभी जवान शो करने में लगे हैं... और यह बताने की कोशिश करते हैं .... कि इनके हर पुर्जे अभी भी काम करते हैं.... और यहाँ भी लोग औरतों को डिफेम करने में लगे हुए हैं.... लेकिन आप उनसे बहस करवा लो... जब कभी निरुपमा जैसी सब पर बीतेगी... तो हम सब यही करेंगे.... जिसको प्यार होता है ना ... वो कैसे ना कैसे शादी कर ही लेता है.... कोई माँ-बाप से पूछने नहीं जाता.... निरुपमा एक ऐसी लड़की थी जो छोटे शहर से थी.... बड़े शहर जाकर पंख निकल आये... जिसका नतीजा उसको भुगतना पडा... उसका बॉय फ्रेंड भी आवारा टाइप का है.... एक औसत किस्म का... उसको भी एक लड़की मिल गई... तो अपने को महफूज़ समझने लगा... निरुपमा अपनी मौत के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है.... अगर मेरी बेटी होगी .... और वो मुझे आ कर बताएगी कि उसे प्यार है.... तो मैं उसकी शादी कर दूंगा..... लेकिन अगर वो गर्भवती हो कर आएगी .... तो उसको मैं कुत्ते से भी खराब मौत दूंगा.... एक ऐसी मौत जिससे मौत भी घबरा जाये..... लेकिन .... अगर मेरी बेटी ऐसा करेगी .... तो इसका मतलब यही होगा कि मैंने ही उसको अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं.... इसमें पूरी गलती मेरी ही होगी.... कोई भी मर्द यह कभी नहीं बर्दाश्त करेगा कि उसकी बहन / बेटी.... गर्भवती हो कर आये.... तो फैक्ट यही है कि निरुपमा को आवारा तो नहीं कहेंगे.... हाँ ! लेकिन.... यह ज़रूर है.... कि उसने गलती की.... उसने अपने बॉय फ्रेंड को समझने में गलती की.... अब आप इस बात को कोई नहीं नकार सकता.... कि समाज पुरुष से ही चलता है.... और हर ज़िम्मेदार पुरुष का यही कर्त्तव्य है... कि वो औरत कि रक्षा करे.... उसकी इज्ज़त करे.... जो पुरुष ज़िम्मेदार नहीं होते..... वो आवारा होते हैं.... और ख़ुद महिलाओं को ऐसे पुरुष से बचना चाहिए.... जो मर्द अपनी घर व समाज की औरतों की रक्षा नहीं कर पाते हैं..... और हमेशा स्त्री व्यवहार के बारे में बात करते हैं..... स्त्री को भोग की वस्तु समझते हैं.... वो नपुंसक होते हैं....

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  11. अक्षरशः सहमत ,पुरजोर समर्थन .न तो यह बुद्धिमानी न विवेक और न ही नैतिकता है - परिणय पूर्व दैहिक सम्बन्ध जिसकी परिणति गर्भधारण तक हो जाय ! नतीजा दो मानव जिन्दगी का अवसान!

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  12. @ महफूज़ ...
    एक तो इतने दिन बाद ब्लॉग पर आया है ...और ऐसे गरजता बरसता ...
    पहली बात तो तो मैं इससे सहमत नहीं कि उसके माता पिता ने इसलिए उसको मार दिया होगा ...पत्रकारिता जैसे पेशे के लिए अपने बेटी को प्रोत्साहित करने वाले अभिभावकों की इतनी ओछी सोच रही होगी ...यह बात मेरे गले नहीं उतरती ...
    दूसरी बात ...गलती निरुपमा से हुई है ...या उसके साथ कुछ अनहोनी हुई है ...जब तक आप और हम नहीं जानते ...तब तक सिर्फ उसे दोषी ठहराना ठीक नहीं ...गलती सिर्फ उससे तो नहीं हुई है ...तो सजा सिर्फ उसे ही क्यों ...
    बच्चों को अभिभावकों की दी हुई छूट का नाजायज लाभ नहीं उठाना चाहिए ...लेकिन हत्या किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराई जा सकती ...!!

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  13. बहुत विचारणीय पोस्ट है....ऐसी हत्याओं के केस आसानी से नहीं सुलझाते....आरुशी हत्या कांड में भी आज तक कुछ पता नहीं चल पाया है...और ऐसे ही ये भी एक इतिहास बन जायेगा...भूल जायेंगे कि कभी कोई निरुपमाकी हत्या हुयी है....हर माता पिता क्या सोचते हैं ये उस वक्त की उनकी परिस्थिति पर निर्भर करता है...अब यहाँ भी निरुपमा के केस में माता पिता जब अपनी बेटी को पत्रकारिता के क्षेत्र में भेजते हैं तो ये कहना कि जाति-धर्म के आधार पर तो ऐसा नहीं करेंगे....पर उसके गर्भ धारण को लेकर उनकी क्या सोच रही...कहा नहीं जा सकता..
    आपकी ये बात सोलह आने सही है कि खाली गाल बजाने से क्या होगा...कथनी और करनी में अंतर रख कर लंबे लंबे लेख लिख कर कोई परिवर्तन नहीं होने वाला....सच तो ये है कि कुछ करने की हिम्मत रखें .

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  14. वाणी, विचारों के बवंडर ने तो सबको परेशान किया हुआ है...मैंने अपनी पोस्ट पर भी तुम्हें जबाब दिया है कि हरि शर्मा जी और तुम्हारी बातों से कौन असहमत है??.मैं भी पांच हज़ार बार कहती हूँ..."लड़कियों को अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए"

    पर बात उसके आगे की है...अगर उनकी बच्चियों से ऐसी गलती हो जाती है तो???
    तो क्या करना चाहिए....ये बताये कोई.???

    और महफूज़ के कमेंट्स के लिए एक ही शब्द है disgustin disgusting and more disgusting .ऐसे ओछे विचार हैं उसके? अफ़सोस है कि वो मुझे अपना दोस्त कहता है.

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  15. जब तक पता नहीं चलता कि दोष किसका है अँधेरे में लकीर पीटने से कुछ नहीं होगा................समाज की व्यवस्था का पालन तो सभी को करना चाहिए फिर चाहे लड़का हो या लड़की और ये नियम दोनों पर लागू होता है मगर अंजाम हमेशा लड़की को ही भोगना होता है और यही इस समाज कि सबसे बड़ी विडंबना है .............हत्या किसी समस्या का हल नहीं है या आत्म हत्या भी नहीं और निरुपमा जैसी पत्रकार कोई कमजोर तो होगी नहीं वरना इस पेशे में नही होती तो कहीं ना कहीं कोई गहरी साजिश रची गयीं जिसके तहत इसको अंजाम दिया गया .........अभी देखा जाये तो आरुषी का केस अब तक नहीं सुलझा ..................वहाँ भी ना जाने कितने इलज़ाम लगाये गए माँ बाप और आरुशी पर मगर नतीजा शून्य .............इसलिए बहस से अच्छा है कि हम सब इतनी कोशिश करें कि आने वाली पीढ़ी को अच्छाई और बुराई से अवगत कराएं ताकि भविष्य में फिर ऐसा दोहराव ना हो.

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  16. मैं पहले भी कहता रहा हूं कि किसी पोस्ट को पढ कर टिप्पणी देना भी एक सलीका है और उसका भी एक तरीका होता है , होना भी चाहिए ।
    महफ़ूज जी , आपको मैंने शायद पहले भी कहा है कि संवादों में जीवंतता अच्छी बात है मगर गली चौराहों पर होने वाली बातों और लिखने में थोडा अंतर जरूरी है । और आपने अपने विचारों से अपनी लेखनी से जो स्थान बनाया हुआ है उसके प्रतिकूल न जाया करें । आप भावावेश में अक्सर वो बातें कह देते हैं जो कि न सिर्फ़ अनावश्यक होती हैं ,पोस्ट के संदर्भ में बल्कि ,कभी कभी उग्र सी हो जाती हैं । और सबसे अहम बात है शैली जिसका चुनाव सबसे जरूरी है , अपनी बात को अलग अलग तरह से कहा लिखा जा सकता है । कुल मिला कर ये कि आपकी टिप्पणी से बहुत मायनों में यहां मैं इत्तेफ़ाक नहीं रख पाया । इसमें कोई शक नहीं कि जिस पर बीतती है सिर्फ़ वो जानता है ।

    रही बात निरूपमा के गर्भवती होने की तो अभी तो चैप्टर शुरी ही हुआ है मैं खुद भी यही मानता हूं कि इस तरह की प्रवृत्ति मुझे भी ठीक नहीं लगती , मगर ये कौन जानता है कि उसके साथ दिल्ली में किन हालातों में क्या हुआ । जैसा कि अब निकल कर आ रहा है कि ये आत्महत्या हो सकता है तब । और इन सभी मामलों में यदि मारा ही जाना चाहिए तो फ़िर दोनों को ही मार देना चाहिए । सिर्फ़ लडकी को मार कर कोई मर्द साबित नहीं हो सकता । यदि निरूपमा के भाई मामा पिता ,,,उस .....साले प्रियभांशु को मार डालते ..या अब भी मार डालें तो मुझे रत्ती भर भी दुख नहीं होगा । चलिए मैं अपनी बात कह चुका आगे आपकी मर्जी .....

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  17. वाणी जी आपसे अधिक परिचय नही है लेकिन विचारो का इतना साम्य अलौकिक है. मेरे इचारो का खुल कर समर्थन करने के लिये आभार इसलिये व्यक्य नही करुन्गा क्योकि कौन जाने आपके ही विचार मेरे मन के किसी कौने मै आ विराजे हो.

    खुशदीप और हमारे विचार भी शब्द शब्द मिल रहे है लोग शायद समझे कि हम मिले हुए है लेकिन मुझे लगता है कि सत्य शाश्वत होता है.

    महफ़ूज भाई तो यूसुफ़ पठान है जिस मैच मे चल गये तो छक्के ही लगायेगे. उनकी ये बात पढकर मन पुलकित हो गया "उसको भी एक लड़की मिल गई... तो अपने को महफूज़ समझने लगा"
    हर कोई कैसे मगफ़ूज हो जायेगा. नारद ने भी विश्णु बनने की कोशिश की और अपना उपहास उडाया.

    वाणी जी आपने एक बात कही कि अपने घर मे भाभी चाची के साथ कोई प्रताडना करते है तो क्या उसके खिलाफ़ हम कार्यवाही करेगे. यही मूल बात है. मैने आज से २० साल पहले कन्या सीनियर माध्यमिक विध्यालय हिन्डौन क सालाना कार्यक्रम मे मुख्य अतिथी के रूप मे कहा कि अपने घर और पडौस मे कही भी देखे कि किसी महिला के प्रति अन्याय हो रह है तो पीडित के साथ खडी हो और उसे मोरल सपोर्ट दे. अपने घर परिवार मे ऐसी नौबत देखते है तो सीधे सीधे अपने परिजन को खरी खोटी सुनाते है और पीडित को ये विश्वास भी कि खुद को वेसहारा ना समझे. विवाह जैसे पवित्र सम्बन्ध के बाद भी हम अगर दूसरे परिवार से आयी लडकी को अपने परिवार का अभिन्न हिस्स नही समझते तो शादी सन्सथा एक ढकोसला है और सामाजिक धोखा है.

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  18. संगीता जी से सहमत। ऐसी हत्याओं के केस आसानी से नहीं सुलझाते।

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  19. वाणी दी.... मैंने यह कमेन्ट बिलकुल प्रैक्टिकल लिखा है.... मैंने कोई नारी विरोधी चीज़ नहीं लिखी है.... ना ही मैं ऐसी कोई चीज़ लिख सकता हूँ.... और नारी विरोधी तो बिलकुल भी नहीं.... मैं ख़ुद जानता हूँ कि मुझे प्यार की कितनी ज़रूरत होती है... क्यूंकि बिन माँ का बच्चा ...हमेशा दूसरी नारी में अपनी माँ ही खोजता है.... मैंने यह कमेन्ट अपने पर्सनल विचारों को लिखा है.... और शायद यह बहुत प्रैक्टिकल है.... अगर प्रैक्टिकल बात को कहना गुनाह है तो यह मेरी ही गलती है... कि मैंने लिखा.... मैं तो वैसे भी कमेन्ट नहीं देता हूँ अब .... या फिर मुझे भी अब nice वाला तरीका ही अपनाना पड़ेगा या फिर कमेन्ट ही ना करूँ? अजय झा जी से सहमत हूँ कि शैली को कंट्रोल करना होगा... अब आप ही बताइए.... या ब्लॉग की कोई भी नारी बता दे.... कि क्या मैंने कभी कोई गलत बिहेव किया है? सबसे तो मेरी बात होती है.... यह भी इलज़ाम आप सब पर लगता है कि ....महफूज़ को आप लोगों ने ही चढ़ाया हुआ है.... लेकिन कोई भी बता दे .... क्या मैं कभी गलत रहा हूँ....? अब कुछ प्रैक्टिकल लिख दिया.... तो क्या करूँ? या तो अपने विचारों को ऐसे ही रहने दूं.... कुछ भी ना कहूँ....या फिर... वही करूँ.... सबकी हाँ में हाँ.... अब यह कमेन्ट थोडा तल्ख़ तो है ही.... और क्यूंकि मैं हमेशा ही .... प्रैक्टिकल बात करता हूँ.... अब ऐसा क्या कह दिया.... कि कॉल पर कॉल आ रहे हैं.... क्या विचारों को रखना गुनाह है....? रश्मि जी.... आप ही बताइए.... इसमें disgusting क्या है? सिर्फ यही ना.....मैंने मौत देने की बात कही है.... पर क्या यह प्रैक्टिकल नहीं है....

    कौन सा ऐसा बाप होगा या भाई होगा जो अपनी बेटी/बहन को ऐसा करता देख सकेगा... ? ज्यादा गुस्सा आ गया तो मार भी सकता है.... मैं कैसे नारी विरोधी हो सकता हूँ.... जिसने हमेशा नारी में अपनी माँ को ही खोजा.... जो आज भी माँ को ही खोजता है... कितना कुछ हम और आप आम ज़िन्दगी और ब्लॉग्गिंग की ज़िन्दगी के बारे में जानते हैं.... मेरी बस इतनी खामी है कि मैं खुल कर कह देता हूँ.... और कुछ चीज़ें लोग डाइजेस्ट नहीं कर पाते..... कि यह लड़का कैसे इतना खुल कर लिख देता है....? अब निरुपमा को ऐसे लड़के का साथ करने की ज़रूरत ही क्या थी.... जो उसका साथ नहीं निभा पाया? मैं तो अपने फ्लर्टिंग के बारे में खुल कर बोलता हूँ.... और मजाल है कभी कोई लड़की यह कह दे... कि मैंने कोई गलत किया है उनके साथ.... आज भी सब मेरी दोस्त हैं.... जिनमें से कईयों के बच्चों का अब मैं मामा बन चुका हूँ.... मैं तो यहाँ अपने प्रोफेशन से इतर हो कर बोलता हूँ.... क्यूंकि मेरा प्रोफेशन ऐसा है कि जहाँ ... मुझे आदर्शवादिता की चादर ओढनी पड़ती है.... और दोहरी ज़िन्दगी जीनी पड़ती है.... अब यहाँ वो चादर फेंक कर आता हूँ.... तो क्या मैं गलत हूँ? मैंने तो अपने फ्लर्टिंग के दौरान भी कभी किसी से कोई कमिटमेंट नहीं किया.... क्यूंकि मैं जानता था... वो मैं निभा नहीं पाऊंगा.... और कभी अपना दायरा भी कभी पार नहीं किया...... तो मैं कैसे नारी-विरोधी हो सकता हूँ....

    दरअसल प्रॉब्लम यह है कि ... मैं बहुत गुस्सैल हूँ.... और अपने गुस्से पर कंट्रोल नहीं रख पाता.... और एक प्रॉब्लम और है...कि कोई किसी को आजकल समझना नहीं चाहता..... सब खामी ज्यादा देखना चाहते हैं.... अच्छाई को दरकिनार कर के.... लोग मेरे इस कमेन्ट के लिंक को पास कर रहे हैं कि देखो ...महफूज़ ने ऐसा कमेन्ट दिया है.... अब इसको कोई भी प्रैक्टिकल इन्सान गलत कह देगा तो आत्महत्या कर लूँगा.... और बुरा कहने को तो कोई भी बहाना चलेगा... और एक बात और है यहाँ ब्लॉग्गिंग में मैं रियल महफूज़ बन कर आता हूँ .... सारा घमंड और प्राउड छोड़ कर.... नहीं तो .... (सॉरी फॉर दिस बडबोलापन)..... और क्या यह गलत है ... कि मैं अपनी बात कह रहा हूँ.... कहाँ से नारी-विरोधी हूँ ? कोई मुझे यह बता दे.... मैं सबसे तो कितना नोर्मल रहता हूँ.... फिर क्यूँ मुझे उल्टा सीधा बोलना....? अब मैं मुखौटा लगा कर तो नहीं जीता ना....

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  20. आज से कमेन्ट देना बंद.... अब से सबको "Very good" कहूँगा.... अगर कोई मर भी गया होगा तो यही कहूँगा .... Very good....

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  21. @महफूज़ ये disgusting है.

    "हो यह भी सकता है कि जब निरुपमा के माता-पिता ने उसके गर्भवती होने का सुना तो उसको मार दिया.... और अगर ऐसा है तो उन्होंने ठीक किया...."

    "लेकिन अगर वो गर्भवती हो कर आएगी .... तो उसको मैं कुत्ते से भी खराब मौत दूंगा.... एक ऐसी मौत जिससे मौत भी घबरा जाये..."
    am hurt...really really hurt..

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  22. इस मुद्दे पर काफी बहस पढ़ चुकी हूँ ....और सच कहूँ तो कहीं कुछ कहने का मन नहीं हुआ ...जब अब तक असलियत किसी को पता ही नहीं तो बे वजह बहस का क्या औचित्य हाँ समस्या पर विचार देना सबका हक़ है और यहाँ में खुशदीप जी और संगीता दी की बात से अक्षरक्ष सहमत हूँ.
    वाणी जी ! आपकी बात से कदापि कोई इंकार नहीं ...सच कहा है मर्यादा को कभी भूलना या नहीं खोना नहीं चाहिए ....पर क्या इस तरह कि गलती के लिए सजा मौत होनी चाहिए ? जहाँ तक सवाल इस बात का है कि पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में भेजने वाले माँ बाप कि सोच इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती ....तो माफ़ कीजिये इस बारे में किसी भी माँ - बाप कि सोच क्या होगी नहीं कहा जा सकता फिर वो क्षेत्र चाहे कोई सा भी क्यों न हो...
    @ महफूज़ .बस एक बात बता दें ...आपने कहा .."लेकिन अगर वो गर्भवती हो कर आएगी .... तो उसको मैं कुत्ते से भी खराब मौत दूंगा.... एक ऐसी मौत जिससे मौत भी घबरा जाये"...और अगर आपका बेटा किसी की बेटी को गर्भवती करके आये तो उसके साथ आप कैसा सलूक करेंगे ?.... उसे भी कुत्ते कि मौत मारेंगे? नहीं.....हाँ अगर इंसानियत दिखाई तो शायद उसकी शादी उस लड़के से करने में उसकी मदद करेंगे ....फिर ये बेटियों के साथ ये दोगला व्यवहार क्यों? मेरा प्रश्न सिर्फ इतना सा है .....
    वैसे मुझे लगता है आप क्या सोचते हैं और क्या लिखते कई बार आपको खुद भी नहीं पता होता ...अभी कल ही ...फोजिया कि एक पोस्ट पर आपके बिल्ल्कुल बिपरीत विचारों वाली एक टिपण्णी पढ़ी थी ...जहाँ आपने उस पोस्ट कि तारीफ में कसीदे पढ़े हैं.अब आपके उन विचारो को आपके असली विचार समझा जाये ..या इनको जो आपने यहाँ कहे समझ नहीं आता.....वैसे ये सच है कि आप नारी विरोधी नहीं ...पर विचार व्यक्त करने से पहले अगर उस पर एक बार सोच लिया करें तो महरबानी होगी ...और अगर गुस्सेल हैं तो वो आपकी समस्या है सुधारिए उसे...गुस्सा कोई अच्छी बात तो नहीं.

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  23. i hope no daughter is born in family where people believe that woman should be murdered if they become pregnant without being married .

    i think all those people who feel woman do a crime by getting pregnant forget that woman cant get pregnant without a sperm { yes she can be pregnant without a man by artificial insemination } but ITS ONLY WOMAN WHO CAN GET PREGNANT AND THAT IS SHE IS THE ONE WHO CAN BE PUNISHED

    but what about man ?? are they authorized to sire a child without getting married is there any "code of conduct " for them

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  24. @ महफूज़ ...
    हम सब जानते हैं कि तू बहुत सम्मान करता है सबका ... मगर तुझे गुस्से में होश नहीं रहता ...गुस्से में भी ऐसी बात कहना कि मैं अपनी बहन/बेटी को मार देता ...गलत है ...बहुत गलत है ...यह बात कोई भी अभिभावक बेहतर समझ सकता है ...और भाई होने के नाते तुझे भी समझना चाहिए ...सिर्फ यह कह देना कि मैं सम्मान करता हूँ ...काफी नहीं होता ...सम्मान हमारे व्यवहार में भी झलकना चाहिए ...
    लिखने के बाद सोचने से अच्छा है पहले सोच लिया जाये ...और अपनी गलती हो तो सॉरी बोलने में भी पीछे नहीं हटना चाहिए ...हम तुझे इतना मानते हैं इसलिए ही तुझे समझाते हैं ...

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  25. बहुत हड़बड़ी में हूँ
    इसलिए
    बिना पोस्ट पढ़े, सरसरी निगाह दौड़ा कर इतना ही कहना चाहूँगा कि

    साहस उतना ही दिखाना चाहिए जितना हममे है
    और महफ़ूज़ ने वही किया, टिप्पणी कर

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  26. अरे भाई.... मेरा यह विचार बेटे पर भी लागू होता है.... यह भी मैंने लिखा है.... क्यूँ सब लोग मेरी जान के दुश्मन बन गए हैं....बच्चे की जान लेंगे क्या....अब? सब लोग एक एक शब्द को भी पकड़ कर चलते हैं.... यह सुना था...आज देख भी लिया.... गुर्रर्र .......... सच कहा गया है.... दीवारों से सर फोड़ लो....बिना फंदे के फांसी पर लटक जाओ.... पर कभी किसी नारी से मत उलझो.... ही ही ही ..... कहाँ आज मैं भी उलझ गया... दरअसल आज कल मेरे पास भी कोई काम - धाम नहीं है ना.... आजकल... दो महीने बाद घर लौटा हूँ ना तो थकान उतार रहा हूँ.... खाली दिमाग .... मेरा (शैतान) का घर.... कहाँ की बात कहाँ चली जाती है... बाप रे बाप.... यही नतीजा होता है... खूब सोने का.... ही ही ही ही .... शिखा जी.... रश्मि जी से बोलिए ना फोन उठायें.... यह बच्चा परेशान हो रहा है....

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  27. अमां महफ़ूज मियां ,
    एक तो पता नहीं कहां कहां गायब हो जाते हो और जब आते हो लाठी बल्लम लेकर सीधा कूद जाते हो आप । अब एक एक करके मनाते रहो सबको । ये आपकी थकान तो उतर जाएगी बांकी सबको हो जाएगी यहां टीप टीप के । अब भी गुररर्र...हायं

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  28. इस मामले में कुछ कहना कठिन है - काहे कि ज्यादा तथ्य जाने नहीं।
    पर यह मानता हूं कि व्यक्ति में वैचारिक दोगलापन नहीं होना चाहिये। मुखौटे लगा सतत जिया नहीं जा सकता।

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  29. दी....रश्मि जी से मेरी बात हो गई .... अब सुकून में हूँ... जो लिखना चाहता हूँ.... वो भूल जाता हूँ.... जो अनरिलेटेड होता है.... वो लिख देता हूँ.... असली बात खा जाता हूँ.... मेरी टिप्पणियों का फायदा उठा लिया गया है..... सबने यही कहा था मुझे फोन कर के कि... कुछ सवा कौड़ी के लोग ...मेरी इस टिप्पणी को इशु बनायेंगे... जो कि बना लिया गया .... कुछ लोग अपने आप को बहुत लायक समझते हैं... और आसमां का जब कुछ बिगाड़ नहीं पाते... तो थूकने की कोशिश करते हैं.... यह भूल जाते हैं कि आसमां तो आसमान है... अभी लोग थूक रहे हैं आसमां पर.... पर उसका रिज़ल्ट?

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  30. अरे बाप रे !!
    यहाँ तो सचमच विचारों का सुनामी आया हुआ हुआ है ....वाणी माफ़ी चाहती हूँ देर से आई हूँ...
    इसमें कोई शक नहीं कि संस्कार, संस्कृति, का पालन और विवेक बुद्धि का उपयोग होना ही चाहिए....विवाह से पहले शारीरिक सम्बन्ध का वर्जन होना ही चाहिए......
    लेकिन अगर किसी से ऐसी भूल हो गयी तो...उसकी जान लेने का अधिकार किसी को नहीं है.....किसी को भी नहीं....किसी को भी नहीं.

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  31. गजब......लगता है किसी मध्‍ययुगीन चौपाल पर हैं...तालीबान या खापभूमियों पर हैं।

    एक कहता है ऐसी मौत नहीं वैसी... दूसरा कहता इसे नहीं उसे भी मारो। इस मध्‍ययुगीन तलवारबाजी के अलावा विचार करने का कोई तरीका नहीं। सीधा सवाल- किसी की बेटी या बहन वगैरह होने से क्‍या उसकी देह पर हक भी मर्द को मिल जाता है कि वह अपनी कोख या अन्‍य देहांगों का क्‍या इस्‍तेमाल करे?

    उम्‍मीद ही करते हैं कि हमारे इन ब्‍लॉगवीरों के यहॉं कोई बहन या बेटी जन्‍म ही न ले। शायद किसी साथी ब्‍लॉगर को भी यहॉं बहन या दीदी कहा इन्‍होंने... बचना मेरी दोस्‍त ये अपनी बहन/बेटी के साथ क्‍या व्‍यवहार करने के इच्‍छुक हैं बता चुके हैं।

    अत्‍यधिक कटु विचारों के लिए क्षमा पर असह्य हो रहा है।

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  32. http://tutikiawaz.blogspot.com/2010/05/blog-post_06.html.....

    इसे भी देखें ...plz.

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  33. मै आप की बात से सहमत हुं, होने को तो बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन इस केश मै बहुत गडबड लगती है, ओर असली खेल कोई ओर खेल गया लगता है, मै भी खुशदीप भाई ओर आप से सहमत हुं

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  34. @ यहाँ कोई तालेबानी नहीं है....
    महफूज़ मियाँ....आप हमेशा उल्टा पुल्टा लिख कर खुद को मुसीबत में क्यों डालते हैं...हम सब जानते हैं आप कितने अच्छे इंसान हैं फिर भी ऐसा लिखने कि क्या ज़रुरत है....जब आप गुस्से में हों तो प्लीज नेट पर मत बैठा कीजिये...बात कहीं से कहीं पहुँच जाती है...

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  35. भीषण चर्चा हुयी है यहाँ -बेटी और बेटा अपनी आत्मा अंश हैं -उनसे गलती हो भी जाय तो यह हमारा ही फ़र्ज़ बनता है की हम उन्हें हेल्पिंग हैण्ड दें .....मनुष्य के जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं है -सारे धरम करम इसके नीचे हैं ....यद्यपि यह नैतिक नहीं है तो भी बेटी से भूल हो गयी तो कौन उसे संभालेगा ? पहला फर्ज पिता का ही हैं ..माँ तो उसकी अनुगामिनी है ही ....

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  36. मैं निरुपमा के मामले में कुछ नहीं कह सकती क्योंकि यह मामला अभी हमारे सामने मीडिया द्वारा लाया गया है. पूरी रिपोर्ट सामने आने पर और न्यायालय का निर्णय आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है.
    जहाँ तक करनी और कथनी में फ़र्क की बात है तो मैं वाणी जी से सहमत हूँ. मैं यह भी मानती हूँ कि लड़कियों को अपने शरीर का सम्मान करना चाहिये और इमोशनल होकर किसी ऐसे से सम्बन्ध नहीं बना लेने चाहिये, जो उसे प्यार के नाम पर फुसला रहा हो, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि औरतें प्यार के मामले में "इमोशनल फ़ूल" बन जाती हैं.
    लेकिन अगर अपने बच्चों खासकर लड़की से कोई भूल हो भी जाये , तो मौत की सज़ा देना... ये तो मध्ययुगीन बर्बरता ही होगी.
    ये मैं इस मामले में नहीं एक सामान्य बात कह रही हूँ. क्योंकि इस मामले में तो अभी कोई फैसला नहीं आया है, लेकिन खाप पंचायतों के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं.

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  37. निरुपमा की मौत के क्या कारण थे पता नहीं कब यह पता चलेगा! लेकिन उसके गर्भवती होने के कारण उसका मारा जाना दुखद, शर्मनाक ,बर्बर और हिंसक है। निरुपमा चाहे अपनी लापरवाही से गर्भवती हुई या प्रेमी के झांसे में आकर यह अलग मसला है। लेकिन उसके लिये उसकी जान लेनी की वकालत करने वाले वहशी मानसिकता के हैं। जीवन से अमूल्य कुछ भी नहीं होता।
    इस मसले पर डा.अनुराग की टिप्पणी की टिप्पणी भी गौरतलब है-
    http://samatavadi.wordpress.com/2010/05/07/dr_anurags_comment/

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  38. अच्छा इन्शान एवं बुरा इन्शान ! बुराई की वजह से अच्छाई की एक साख है. संसार में बुराई खत्म होना असम्भव है. अपेक्षा मात्र इतनी है की व्यक्ति अच्छाईओ के साथ जिए......बुराई की भर्त्सना होनी ही चाहिए ......पर भर्त्सनातमक शब्दों में कही हम बुरा वर्ताव ना करे.......
    आलोचना करना है पर स्वस्थ आलोचना हो.....बहस वर्चसव् की ना हो समाज देश एवं परिवारों की भलाई की हो, तभी सार्थक है अन्यथा कोरी बहस बनकर तारीको के पन्नो के साथ उल्ट जाना निहित है. आप द्वारा लिखित विचार समाज को एक नई दिशा-दर्शन देने में सक्षम है.

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  39. @- तो उसको मैं कुत्ते से भी खराब मौत दूंगा.... एक ऐसी मौत जिससे मौत भी घबरा जाये"...

    1-Do we have the right to kill anyone?....She herself was going through tremendous torture and agony before her death.

    2-Do you think Nirupama has committed such a grave error to be sentenced for death , the way kasaab recieved?

    3-Can a woman become pregnant on her own without the involvement of any man with her?

    4-A 23 year old girl is very likely to commit such error. Aren't we supposed support the victim and look for some solution without forcing her to end her precious life?

    5-If Priybhanshu was really in love with her, then he must commit suicide after her death to prove his love as immortal.

    6- Parents obviously have given enough freedom to their daughter.They could not have have taken such a brutal and wrong decision so easily. They must be under huge pressure, that they opted for honour killing. I feel parents were provoked by selfish folk around.

    7-Priyabhanshu MURDERED a girl by making her pregnant before marriage. He misused her emotions and her body. He still thinks a woman is nothing but commodity. He proved it.

    In my humble opinion...

    Nirupama [ All women] are victims.
    Parents [of girls] are so helpless.
    Priybhanshu [saare lafange] are still rocking like 'khula-saand'.

    My sympathy is with Nirupma's parents, who lost their daughter and their izzat both.

    Media and allegations may force them to end their lives.

    Priyabhanshu type of men must get proper punishment , so that other males should not follow his dirty and selfish act.

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  40. वाणी जी , सहमत हूँ आपसे ..
    देर से आया यहाँ की बहस में , नहीं तो कुछ
    कहता पर ठीक ही है .. बहस को लोग कहाँ उदारता-पूर्वक लेते है !
    ........ फिर भी संजय की आँख से देखना भी एक देखना है , कोई
    व्यास मुझे भी दिव्य-दृष्टि देता तो साक्षीभाव से सब देख सकता हूँ , पर
    उसके लिए भी जरूरी है की आसपास धृतराष्ट्र हो , और धृतराष्ट्र राजा न
    हो तो उसे कौन साथ में बर्दास्त करता है !
    ........... जाते - जाते आदत का मजबूर हूँ सो यह भी कहे दे रहा हूँ कि
    महफूज भाई कि'दिल को छू गयी' से हटकर इतनी भारी भरकम (?) टीप
    करें तो उसको कृपांक के साथ पढ़ा जाना चाहिए (जिसकी गुहार वह स्वयं
    कर चुके हैं ), असंतुलन आ जाता है , वैसे महफूज भाई एक सुहृद इंसान
    (आभासी दुनिया के अपने अल्पज्ञान के साथ ) हैं , भावुक हैं सो कर(कह)
    जाते हैं !

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  41. शत प्रतिशत सहमत हूँ आपसे....
    जबतक कथनी करनी में इतना बड़ा फासला रहेगा समाज विसंगतियों में उलझा ही रहेगा...
    लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि दूसरा सही हो इसकी कामना रखने से पहले हमें अपने जीवन में से गलत को निकलना होगा...अपने दिनानुदिन के कार्य व्यवहारों में जिन बातों को छोटा और तुच्छ समझ हम कर लिया करते हैं,जबतक इनसे गुरेज नहीं करेंगे,तबतक व्यापक रूप में किसी बदलाव की अपेक्षा नहीं रख सकते...

    हमारे यहाँ तो स्थिति यह है कि जहाँ किसी ने कहा नहीं कि कौया कान लेकर उड़ गया,बिना कुछ देखे सोचे हम उसके पीछे चिल्लाते हुए हो लेते हैं...आपने एकदम सही कहा...हमने निरुपमा हत्याकांड में सिर्फ उतना भर देखा सुना जितना हमें मिडिया ने दिखाया सुनाया...वास्तविक परिस्थितियां क्या रही होंगी,यह घटना क्यों घटी ,बिना इसका सत्य जाने उसपर अपनी राय देना ,सही नहीं है...

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  42. बहुत देर से पढ़ रहा हूँ पोस्ट ...प्रासंगिक है अब भी !
    ज्ञान जी की बात से सहमत हूँ.."व्यक्ति में वैचारिक दोगलापन नहीं होना चाहिये। "

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  43. ...हमारी कथनी और करनी का दोगलापन ही सड़ांध मारती इस व्यवस्था का प्रमुख कारण है..
    ...बिलकुल सही...सहमत.

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  44. सार्थल लेखन को बढावा दे और ऊल जुलूल पोस्टो पर प्रतिक्रिया से बचे.
    सादर
    हरि शर्मा
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/
    http://koideewanakahatahai.blogspot.com/
    http://sharatkenaareecharitra.blogspot.com

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