शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

समय बदल तो गया है ....

कल सुबह डोरबेल बजी तो गेट पर जाकर देखा ....एक बहुत प्यारी सी साफ़ सुथरी बच्ची अपने हाथों में कगज पेन लिए नजर आई ...
मुझे देखते ही बोली ..." 40रुपीज़ , प्लीज़ " ....

एकबारगी मुझे आश्चर्य हुआ ...किस बात के दे दूं इसे चालीस रूपये ....चंदा मांगने वालों की भी हद है ...बोलकर बताएँगे कि इतने रूपये तो दो ही दो ...

आस पास के विद्यालायों से बच्चे अक्सर आ जाते हैं इस तरह की राशि वसूलने ...हर बच्चे को रसीद बुक थमा दी जाती है कि इतना रुपया तो तुम्हे वसूलना ही है ,किसी भी तरह लाओ , चाहे अपने चेहरे की मासूमियत का फायदा उठाओ , मीठे वचन बोलो , गिडगिडाओ या मनुहार करो ....(देश के भावी कर्णधारों को इसतरह ट्रेंड किया जाता है , भविष्य में कभी मांगने- टांगने में शर्म नहीं आये , चलो ये फिर भी ठीक ही है , कम से कम लाठी बल्लम से जबरन वसूल करना तो सिखाया नहीं जा रहा )
ये आजकल के बच्चे ...ये भी बहुत स्मार्ट हैं ...कौन अपने मम्मी पापा की जेब खाली करवाते हैं ...वो तो अपने जेब खर्च के लिए सेफ रखते हैं ...रसीद बुक भरवाने का काम तो पड़ोसियों से भी किया जा सकता है ...अब आप बताये , कौन माना कर सकता है , अगर ४ घर छोड़ कर आपके पडोसी का बच्चा अपनी मासूम सी शक्ल लिए आपके दरवाजे पर खड़ा मिल जाए
" आंटी जी , हमारे स्कूल में चिकित्सा शिविर लग रहा है , गरीबों को निःशुल्क हेपीटाईटीस का टीका लगाया जाएगा " तो कौन आंटी जी या अंकल जी मना कर पायेंगे , मन ही मन लाख बुदबुदाते रहें कि
" अपने माँ- बाप से क्यों नहीं मांग लेता बे " , मगर शिष्टाचार के नाते जेब खाली ही करनी पड़ती है ...

खैर , उस बच्ची को देखकर मैंने पूछा " आज किस बात का चंदा इकठ्ठा कर रही हो "
वह अचकचा कर मुंह देखने लगी ..." मम्मी ने कहा है सबसे लेने को , वो पीछे रही हैं "
हद हो गयी , अब मम्मियां भी चंदा वसूली में बच्चों का साथ देने लगी ....थोडा आगे बढ़ कर देखा तो ...हमारे मोहल्ले की सफाई कर्मी पड़ोसी के गेट के बाहर सफाई अभियान में जुटी हुई थी ...मुझे देखते ही मुस्कुरा दी ...
" बच्चों की छुट्टियाँ चल रही है , इसलिए अपने साथ ले आई "
अब सुखद आश्चर्य में घिरने की बारी मेरी थी ...मैं पूजा से बात करने लगी ...
पूजा ...यानि सफाईकर्मी माया की बेटी ...शहर के एक अच्छे डे बोर्डिंग (अंग्रेजी माध्यम )स्कूल में पढ़ती है ...और छूट्टियों में माँ की मदद भी करती है ...
मैंने माया से कहा " ये तो बहुत अच्छी बात है , तुम अपनी बेटी को इतनी अच्छी स्कूल में पढ़ा रही हो "
पल्लू से पसीना पोंछते हुए कहने लगी माया ." हाँ , दोनों बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं , अब हम दोनों तो दिन भर काम में लगे रहते हैं , घर जाकर बच्चों को पढाना , उन पर ध्यान देना संभव नहीं हो पाता , इसलिए डे बोर्डिंग में दाखिला करवा दिया है , "
शाबास माया , ये तुमने बहुत अच्छा किया ...पता नहीं क्यूँ , मुझे इतनी ख़ुशी हो रही थी ...
माया बहुत हंसमुख है और अपने काम की पक्की ...सफाई ढंग से नहीं की जाने की शिकायत करो तो झट बोल देती है ," भाभीजी , अभी कल तो इतनी बढ़िया सफाई की थी " आम सफाईकर्मियों से अलग है उसका रहनसहन , बोलचाल ...कई बार अपने घर परिवार की बातें सुनाने लग जाती है ...
अभी थोड़े दिनों पहले बड़ी ख़ुशी ख़ुशी बोली , " आप लोगो के आशीर्वाद से एक प्लाट लिया है , वहां काम चल रहा है , इसलिए ज्यादा समय वहीँ देना पड़ता है "
तीज त्यौहार पर कह देगी ." भाभी जी , लाओ कौन सी साड़ी ला रहे हो "
" हाँ , तू मेरी बहन बेटी है जो हर त्यौहार पर तुझे साडी दूं ,".. मैं चुटकी लेती हूँ ,
" कौन सी नयी मांग रही हूँ " ...मैं उसे नयी साडी भी देती हूँ कई बार , मगर मुझे जरा भी अफसोस नहीं होता ...वह व्यवहारकुशल है , अपनी शिकायत को भी सकारत्मक लेती है , और अब अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा की बात कर तो उसने मेरा दिल ही जीत लिया ...

एक जमाना था जब ये लोंग सिर्फ डांटफटकार के अभ्यस्त होते थे ...अल्प आयवर्ग के लोगों में अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति इतनी जागरूकता देखकर अच्छा लगता है ...क्या कभी पहले इन लोगों के लिए ऐसा सोचा भी जा सकता था ..?
अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों का मुख्य धारा में आना एक सुखद बदलाव है ...सचमुच समय बदल तो रहा है ..

समय तो हमारे हिंदी ब्लॉगजगत का भी बदल रहा है ...पिछले एक साल में कितना परिवर्तन हुआ है ...जब ब्लॉगिंग शुरू ही की थी , बहुत अच्छा माहौल था , ब्लॉगर्स का आपसी सद्भाव देखने योग्य था ...सब एक परिवार की तरह ही लगते थे ....अभी कुछ दिनों पहले ताऊ रामपुरिया जी ने और हरकीरत हीर ने अपनी पोस्ट में यहाँ का माहौल बदलने का जिक्र कर जैसे मेरे ही मन की बात कह दी ...

लगभग रोज या दिन में २-३ पोस्ट लिखने वाले अन्तराल पर लिखने लगे हैं , आलसी नियमित हो गए हैं ..धीमे चलने वाले सुपरफास्ट हो गए हैं , संतुलित टिप्पणियों से मोह लेने वाले हंगामेदार पोस्ट लिखने लगे हैं ...कवितायेँ ,आलेख लिखने वाले ऊँचे पहाड़ों की गोद में जा बैठे है , वही निर्मम सत्य कहने वाले प्रेम के अनुसंधान में लगे हैं , गीत ग़ज़लकार क्रांति की बात करने लगे हैं , नारी का सम्मान करने वाले फिकरे कसने लगे हैं , नारियों के असम्मान के लिए कुख्यात उनके सम्मान और अधिकार की बात करने लगे हैं ...सचुमच माहौल बदला तो है ...पारिवारिक भावना तो पूरी तरह गायब हो चुकी है ...कोई किसी को ललकार रहा है , कोई धमका रहा है , कोई चुटकियाँ ले रहा है , तो कोई आग लगा कर तमाशा देख रहा है ...
कोई जातिवाद पर तो कोई साम्प्रदायिकता पर अड़ा है ...कमोबोश जो स्थिति पूरे देश की है , वही यहाँ भी नजर आने लगी है ....शिक्षा का प्रभाव मानूं या दुष्प्रभाव ....
उच्च शिक्षितों की बढती संख्या इस देश का सौभाग्य है या दुर्भाग्य....
मेरे दिल और दिमाग की रस्साकसी जारी है ...!

24 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे तो विद्यार्थियों द्वारा भिक्षा लेकर अन्न ग्रहण करना वैदिक परमपरा है. भिक्षा मांगने से गर्व का शमन होता है. इसलिए गुरुकुलों के विद्यार्थियों को भिक्षा लेने के लिए भेजा जाता था. वहां शिक्षा का दान किया जाता था.

    लेकिन वर्तमान में बड़ी-बड़ी फीस लेकर शिक्षा देने वाले स्कूलों का चंदा मांगने के लिए विद्यार्थियों को भेजना ठीक नहीं,क्योंकि ये शिक्षा का दान नहीं कर रहे हैं, उसे बेच रहे है.

    समय के साथ सब कुछ बदलता है. इसलिए ब्लॉग जगत में भी अवश्यसंभावी है.

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  2. परिवर्तन की समय की पहचान है ....लेकिन शिक्षा की महत्ता को लेकर लोगों में आए बदलाव बहुत अच्छे लगते है पर ये तो सच है हर परिवर्तन हमारे अनुसार नहीं होता और वो अच्छा हो यह भी ज़रूरी नहीं .....इसलिए आप चिंता न करे :)
    फिर बदल जाएगा सब कुछ

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  3. वाह एक पोस्ट में ही दो पोस्टों का मजा ...
    आपका मुहल्ला भिखमंगों का है क्या जो भेष बदल बदल कर आते रहते हैं ....
    मेरे एक दोस्त पाने रोज रोज आने वाले रिश्तेदारों से परेशान थे -एक दिन बहुत दुखी होकर बोले ,
    मिश्रा जी ,लगता है मेरे घर कोई कोई प्रेत भेष बदल बदल कर आ रहा है -क्या करूँ ?
    अब रही दूसरी बात -अब ब्लॉग जगत के लोग परिपक्व हो रहे हैं -असलियतें सामने आ रही हैं
    शुरुआती सहज औपचारिकताएं -छद्म अब दूर होते नजर आ रहे हैं ,
    जाहिर है एक जैसी चिड़ियाँ एक साथ कलरव करेगीं ---
    दोस्त दुश्मन साफ़ दिख रहे हैं -बुद्धि दुर्बुद्धि सामने है .
    सज्जन से सज्जन मिलें, मिले नीच से नीच ...
    और ये दोनों ही एक दूसरे को नीच कहते हैं ...
    सब कुदरत का मायाजाल है -आप इतनी काहें हलकान होती हैं -
    आप एक अच्छी गृहिणी और सृजनकर्मी हैं बस उसी में मन रमाईये :)

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  4. आपका चिंतित होना स्वाभाविक ही है।
    अच्छा लिखा है आपने।

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  5. आपने दो बातों को क्‍यों मिला दिया? चन्‍दा अलग बात और ब्‍लाग जगत अलग बात। चन्‍दे में भी दो तरह के चन्‍दे। सफाई कर्मचारी के बच्‍चों की पढाई। अब बताइए कि किस पर टिप्‍पणी करें? बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा मिलेगी तो वे स्‍वाभिमान पूर्वक अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे। बच्‍चों से चन्‍दा मंगवाने का काम अनेक स्‍कूल करते हैं, सीखने दीजिए उन्‍हें भी जीवन के सत्‍य। ब्‍लाग जगत में भी ईर्ष्‍या अपने पैर जमाने में लगी है, इसका कुछ नहीं किया जा सकता।

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  6. चंदालुओं के बीच में एक प्यारी सी बिटिया अपना हक लेने आयी, अच्छा लगा.

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  7. "आस पास के विद्यालायों से बच्चे अक्सर आ जाते हैं इस तरह की राशि वसूलने ...हर बच्चे को रसीद बुक थमा दी जाती है कि इतना रुपया तो तुम्हे वसूलना ही है ,किसी भी तरह लाओ , चाहे अपने चेहरे की मासूमियत का फायदा उठाओ , मीठे वचन बोलो , गिडगिडाओ या मनुहार करो ...."

    Alleast यह बात एकदम सत्य है , स्कूल बच्चो पर नाजायज प्रेशर डालते है !

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  8. यह बात एकदम सत्य है|सचमुच समय बदल तो रहा है|

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  9. आपकी यह पोस्ट आपकी चिन्ता को दर्शा रही है ...परिवर्तन होना एक शाश्वत सत्य है ...और उसे स्वीकार करना ही होता है ...नए लोगों का स्वागत भी करना चाहिए ..नहीं तो नए लोगों को प्रेरणा कैसे मिलेगी ? और हर चीज़ निरंतर नहीं चल पाती ..जो रोज लिखते थे उसमें कमी आई है तो कुछ उनकी मजबूरी होगी ...और रही यह बात कि आज ब्लॉग जगत का माहौल पहले जैसा नहीं है ..पहले एक परिवार लगता था ..आज वो बात नहीं है .....इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं देना चाहूंगी ...क्यों कि अभी मेरी ऐसी स्थिति नहीं आई है कि मुझे यह परिवार विघटित होता हुआ सा लगे ...मुझे तो अभी भी परिवार ही लगता है जहाँ अलग अलग सोच के लोंग एक साथ रहते हैं ....

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  10. Aalekh to bahut dilchasp hai,lekin wo ladki chanda kis baat kaa maang rahi thi aur aapne diya ya nahi,ye baat nahi pata chali?

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  11. सच बहुत अच्छा लगता है, इनलोगों के बीच भी शिक्षा के लिए इतनी जागरूकता देख, बस बच्चे भी यह बात समझ लें....माता-पिता बेचारे कड़ी मेहनत कर बच्चों को अच्छे स्कूल में डालते हैं,ट्यूशन के लिए भी भेजते हैं,पर ज्यादातर बच्चे इस अवसर का पूरा फायदा नहीं उठाते...खासकर लड़के...लडकियाँ अक्सर दसवीं भी अच्छे नंबर से पास कर लेती हैं....फिर भी पांचवी,छठी तक तो पढ़ ही लेते हैं...जो एक काफी बड़ा बदलाव है, पिछले जमाने से.

    ब्लॉग जगत भी अपने आस-पास के संसार जैसा ही है...नए रिश्ते बनते हैं...पुराने रिश्तों में बदलाव और कभी कभी दूरी भी आ जाती है, अच्छा पहले भी पढने को मिल जाता था और अब भी...लेखक भले ही बदल गए हों.


    कैसे नहीं आएगी....देश भी तो उन्हीं लोगों से है जो, इस ब्लॉगजगत में लिखते हैं.

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  12. अरे ये लाइन कोट की थी...बोल्ड करने के चक्कर में इरेज़ हो गयी :(

    कमोबोश जो स्थिति पूरे देश की है , वही यहाँ भी नजर आने लगी है

    कैसे नहीं आएगी....देश भी तो उन्हीं लोगों से है जो, इस ब्लॉगजगत में लिखते हैं.

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  13. आशा-निराशा दोनों ही हैं यहाँ. आपने बहुत अच्छी बातें लिखी हैं. मेरे हॉस्टल में भी कुछ कर्मचारी थे जिनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे, पर अंगरेजी माध्यम के स्कूल में पढ़वाना सच में बड़ी बात है.
    और ब्लॉगजगत की क्या कहें? रश्मि दी की बात सही है.

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  14. उच्च शिक्षितों की बढती संख्या इस देश का सौभाग्य है या दुर्भाग्य.... ????

    सचमुच ...यह प्रश्न मुझे भी उलझाता और विचलित करता है...

    सैद्धांतिक रूप में लगता है,प्रत्येक मनुष्य को शिक्षित होना चाहिए...पर जब दीखता है कि व्यक्ति जितना ही शिक्षित है,उसका दंभ भी उतना ही परिपुष्ट है,ह्रदय की उद्दात्तता उतनी ही संकुचित हो गयी है...तो निश्चित ही लगता है ,ऐसे शिक्षा का क्या लाभ है,जो मनुष्यता ही संक्षिप्त कर दे...

    जो लोग दुनियां में हैं,वही ब्लॉग पेज पर लिखते भी हैं...सो अच्छे बुरे तो होंगे ही...इसके लिए प्रसन्न होना चाहिए कि लोगों को पहचानने का,दुनिया देखने का अवसर मिला.....

    वैसे अपना काम किसीके भी अच्छाई से चल जाए तो क्या बुरा है...लेना देना ही क्या है बुराई से...नहीं ????

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  15. वाकई में दी...समय बदल गया है... बहुत खराब समय आ गया है... बहुत ही... वाकई में...

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  16. पर इसी बहाने बच्चों की कई महत्वपूर्ण विषय पता चल जाते हैं और उनके क्रियान्वयन में आने वाली आर्थिक समस्यायें भी।

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  17. (देश के भावी कर्णधारों को इसतरह ट्रेंड किया जाता है , भविष्य में कभी मांगने- टांगने में शर्म नहीं आये , चलो ये फिर भी ठीक ही है , कम से कम लाठी बल्लम से जबरन वसूल करना तो सिखाया नहीं जा रहा )

    अपने सवाल का स्वयम आपने ही सटीक उत्तर दे दिया है.

    वैसे आजकल के स्कूल भी भावी बिजनैस मेनेजर तैयार करने मे ज्यादा विश्वास रखते हैं इसलिये शुरु से ही सारे हथकंडे सिखा कर ट्रेंड कर देते हैं.:)

    रामराम.

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  18. अब जहां तक दूसरे सवाल का प्रश्न है तो इसका सिर्फ़ और सिर्फ़ परिवर्तन का नियम ही उत्तर है. अत: समस्त ब्लागर्स से अनुरोध है कि ना तो शोक करे और ना मायूस हों. जब वो स्थिति नही रही तो ये भी नही रहेगी. तब तक भज गोविंदम भज गोविंदम मूढमते का जाप करना फ़लदायक रहेगा.:)

    रामराम.

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  19. अच्छा विषय लिया है..यह तो यहाँ रोज देखने मिल रहा है.

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  20. चिंता स्वाभाविक है ...
    लेकिन आशा भी कायम है कि स्थिति सुन्दर से सुन्दरतम होगी !!!
    afterall,hope is the last thing that rings eternal in the human breast....
    u have aptly dealt a contemporary thought with all fineness...
    regard,

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  21. हम्म वक्त तो बदल ही गया है ..पर इतना बुरा भी नहीं है :)

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