शनिवार, 17 सितम्बर 2011

अपने- अपने आसमान ...



" पतिव्रता
सुशीला अपने कामातुर कोढ़ी पति को पीठ पर लादे चली जा रही है .अद्भुत है उस पत्नी का प्रेम . अपने अशक्त रुग्ण पति की अवांछित वासना की पूर्ति के लिए स्वयं लिए जा रही है उसे , सुशीला कोई आम नारी नहीं है , वह साधारण ही नारी होती तो उसके सतीत्व की अवहेलना करते इस अनैतिक इच्छा की कामना करने वाले पति को धिक्कारती ,मगर नहीं, उसके लिए उसका पति है उसका ईश्वरहै ,जिस प्रकार भक्त अपने प्रभु के किसी भी कार्य के लिए प्रश्न नहीं करता , सुख- दुःख में व्यवहार समान ही होता है , वैसी ही है यह पतिव्रता नारी . आकाश के सभी देवी देवता उत्सुक सजल दाम्पत्य जीवन की इस अनूठी मिसाल को मंत्रमुग्ध हो ताक रहे हैं"

पंडित शास्त्रीजी का कथा वाचन सुहासिनी बड़े गौर से सुन रही थी .
अचानक कल- कल बहते झरने जैसी मधुर हंसी की आवाज़ से उसकी एकाग्रता भंग हुई .

कौन हँस रहा है ,सोचते हुए उसने चौंक कर पास बैठी महिलाओं पर दृष्टि डाली . सुहासिनी ने देखा कि उपस्थित महिलाओं में से कुछेक बुजुर्ग महिलायें ही ध्यान पूर्वक कथा-श्रवण कर रही थी . वनिताजी दीवार के सहारे पीठ टिकायें जाने क्या सोच कर मंद- मंद मुस्कुरा रही थी , उनका ध्यान कथा की ओर नहीं था . कद में छोटी वनिता जी सबसे पहले मंदिर आती हैं , साड़ी से ही मैच करती बिंदी और चूड़ियों से सजी- धजी , हल्के मेकअप के साथ छोटे जूडे के बीच दमकता चेहरा, चेहरे पर इतनी ताजगी कि लगता ही नहीं कि पिछले पंद्रह दिनों से एकासना कर रही हैं . सुहासिनी का ध्यान खुद की तरफ गया ,बेतरतीब सी जल्दी में पहनी हुई तुड़ी- मुड़ी साडी और लापरवाही से गुंथे हुए बालों की चोटी ,आज फिर साडी के साथ मैच करती चूड़ियाँ पहनना भूल गयी , वही चार लाल चूड़ियाँ . खुद पर नजर डालती सुहासिनी सकुचा -सी गयी . रोज सोचती है कल से अच्छी तरह तैयार होकर आएगी , मगर समय से मंदिर पहुचने की हड़बड़ी में सब छूट जाता है. एक दिन पंडित जी कार्तिक महात्म्य बांचते हुए समझा रहे थे ." कार्तिक व्रतियों के लिए तेल , उबटन, साज श्रृंगार वर्जित है , यथासंभव सादगी से रहते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक है ". ऐसे में सजी -धजी इन महिलाओं को देखकर हैरान होने पर एक बुजुर्ग महिला ने समझाया कि सधवा स्त्रियों के लिए सम्पूर्ण साज -सज्जा त्यागना अशुभ है . पास में ही विमलाजी के हाथ तेजी से चलते हुए रुई की बत्तियां बनाने में लगे हुए थे . एक पंथ दो काज करते हुए पंडित जी की कथा के साथ सिर हिलाते उनके हाथ भी तेजी से चल रहे थे . पूरे मास इस पूजा के दौरान वे ढेरों बत्तियां बना लेती हैं और श्रद्धालुओं को वाजिब कीमत पर देती हैं . भगवान् की भक्ति , सेवा के पुण्य लाभ के साथ अतिरिक्त कमाई भी हो जाती है . राजश्री और कुसुम हमेशा की तरह सिर जोड़कर फुसफुसाहट में लगी थी , उनके हाथों की मुद्राओं और भावभंगिमाओं से अंदाज लगाया सुहासिनी ने कि उनकी बातचीत का केंद्र आगे की पंक्ति में बैठी उनकी सासुएँ ही हैं . सास की कड़ी भेदती नजरों के बीच भी वे एक दूसरे से आपबीती सुनते परनिंदा का लाभ कमाने का समय चुरा लेती हैं . इनके अवलोकन के बीच ही उसने देखा कि उन महिलाओं की फुसफुसाहट से पंडित जी का ध्यान भंग हुआ , तो उन्होंने जोर से कुछ पंक्तियाँ पढ़ते हुए नाराजगी व्यक्त की , सभी महिलाएं चौंक कर सावधान की मुद्रा में उन्हें सुनने लगी .

पवित्र कार्तिक मास में मंदिरों में में सुबह -सवेरे महिलाओं और पुरुषों की आवाजाही बढ़ जाती है . इस मास में तडके तारों की छाँव में व्रतियों द्वारा नदी में स्नान करने का नियम शहरों में घरों में टंकियों में संरक्षित पानी से ही निभाना पड़ता है . पूरे मास सुबह जल्दी हलकी ठण्ड में शीतल जल से स्नान ,सिर्फ एक समय ही आहार ग्रहण करने , चटाई पर सोने ,विभिन्न खाद्य पदार्थों के निषेध के साथ अन्य नियमों का पालन करते हुए भी मुखमंडल पर कहीं भी निस्तेज होने भाव नहीं , कैसे संभव होता है , सुहासिनी अक्सर सोचती थी . पिछले कई वर्षों से कार्तिक मास में सुबह घर के दरवाजे पर बुहारी फेरते, पौधों को पानी डालते से ही नजर आती मंदिर की घंटियों की आवाज़ , भजनों की स्वरलहरियां , बीच -बीच में ठहाकों की आवाज़ प्रायः ही सुन लेती थी .
उसका भी मन होता कि जरा कदम बढ़ा कर हो आये मंदिर तक ,मगर तभी उसे याद आता बच्चों के स्कूल का समय हो गया , वह तेजी से भागी आती ," बच्चों, उठो जल्दी , देर हो जाएगी ". कितना समय लगता है दोनों को जगाने में , सुबह की हलकी ठण्ड के इन दिनों बिस्तर से निकलने में बहुत कुनमुनाते दोनों , फिर जल्दी से ब्रश पकड़ा कर रसोई की ओर लपक लेती , बच्चों को जल्दी तैयार होने का निर्देश देते उसके हाथ तेजी से चलते रहते , दूध गरम करना , चाय बनाना , बच्चों के टिफिन पैक करना , उनकी युनिफोर्म पकडाने से लेकर नाश्ता करवाना , कभी देर हो जाती तो जल्दी से पति को आवाज़ लगाती ," प्लीज़ , उठ जाईये, अभी बच्चों को ऑटो आ जायेगा , नीवी के बाल संवार दीजिये " . घोड़े बेच कर सोने वाला बच्चों की मदद के नाम पर झट उठ बैठता , मातृत्व का गुरुर कई बार इस पिता के आगे नतमस्तक हो जाता है . तब तक किचन का काम निपटाकर टिफिन लिए आँचल से हाथ पोंछती चाय का प्याला पकड़ा देती ," लाईये , मैं बना देती हूँ , मेरा काम हो गया " . बच्चों के जाने के बाद उसे सुस्ताने का समय मिलता तो दोनों पति- पत्नी चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढने के साथ साथ उसमे छपी ख़बरों का भरपूर विश्लेषण करते , इतने में ही उसके दफ्तर का समय हो जाता . पति के दफ्तर जाने के बाद फिर से घर की सफाई , बिस्तर पर गीले टॉवेल ,कपड़ों , किताबों आदि सभी चीजों को सलीके से रखना , यही थी उसकी रोज की दिनचर्या . ऐसे में मुंह अँधेरे उठकर दो घंटे मंदिर जाने की बात तो वह सोच भी नहीं पाती थी . मगर इस बार जब पड़ोस की कविता ने उससे साथ चलने का इसरार किया तो वह इनकार नहीं कर पाई . उसने पति और बच्चों से मदद मांगी तो वे भी सहर्ष तैयार हो गये कि इस बहाने दैनिक जीवन की एकरसता टूटेगी और पुण्य लाभ होगा सो अलग . हालाँकि इसके लिए उसे सुबह थोडा और जल्दी उठना पड़ता , बच्चों का टिफिन तैयार कर अलार्म सेट कर देती . इतनी सारी तैयारियों के बीच उसे संतुष्टि होती कि मंदिर घर के सामने ही है जिसके अहाते में बैठ कर सभी महिलाएं भजन- कीर्तन और कथा- श्रवण करती , जहाँ से पूजा -पाठ करते हुए भी घर पर नजर रख सकती थी कि ऑटोरिक्शा के आने तक बच्चे तैयार हुए या नहीं , यूँ तो अक्सर इस समय तक वह पूजा पाठ निपटाकर घर पहुँच चुकी होती थी .

पंडितजी की तीखी होती बानी के बीच उसने कथा श्रवण में मन लगाया ही था कि फिर से उसी मीठी हंसी की मधुर ध्वनि ने उसे चौंकाया, इस बार बहुत नजदीक, मगर पीछे से आ रही थी , उसने सिर घुमाकर देखा ,दरवाजे के उस तरफ आसमानी साडी में एक खूबसूरत स्त्री उसी की ओर देख मुस्कुरा रही थी . सुहासिनीं की प्रश्नवाचक निगाहों से अचकचाए बगैर ही उसने अपने हाथों से उसे बाहर आने का इशारा किया . एक अनजान स्त्री द्वारा इस तरह बुलाने पर थोड़ी हैरान हुई वह और निगाहों से ही जैसे बरज दिया ." देखती नहीं , कथा चल रही है " . उस स्त्री के होंठ हिले ," वह सब सुन रही हो , जिसे देखा नहीं किसी ने , और मैं जीती जागती तुम्हारे सामने खड़ी हूँ , मुझे नहीं सुन रही हो " उसी मीठी- सी हंसी के बीच उपहास की लकीर देखी उस चेहरे पर .

अजीब हो तुम , मुझे ही क्यों सुनाना चाहती हो , यहाँ और भी तो महिलाएं हैं , सुहासिनी ने फुसफुसाते हुए जवाब दिया .
" हाँ ,हैं , मगर वो तुम्हरी तरह ध्यान से नहीं सुन रही" .
"उल्टा हिसाब है तुम्हारा ,मैं मनोयोग से श्रवण कर रही हूँ तो विघ्न डाल रही हो , जिनका ध्यान कथा श्रवण में नहीं है , उन्हें नहीं बुला रही हो" .

"तुम इतना मन लगा कर सुन रही हो ,तभी तो तुम्हे बुला रही हूँ ,क्योंकि तुम इन सबसे अलग हो . मुझे जो कहना है ,वह तुम ही समझोगी . "

अच्छी मुसीबत है , घबरा गयी सुहासिनी . शास्त्रीजी इस तरह बातें करते देख क्या सोचेंगे , उसने पास बैठी मिथिला को इशारे से बताया और उठकर बाहर आ गयी .

मोगरे और गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू भर गयी उसके नथुने में ,उसने अब गौर से उस स्त्री को देखा . आसमानी साड़ी के लहराते आँचल के बीच कट स्लीव के ब्लाउज से झांकती उसके सुदृढ़ गोरी बाहें , गले के गड्ढे को ढकता मोतियों की माला के बीच अटका एक खूबसूरत सा पैंडल , बालों को करीने से गूंथते हुए बनाया एक ऊँचा जूडा जिसके कोने में खोंसा हुआ लाल गुलाब ,करीने से तराशे लम्बे चमकदार नाखून मानो पारदर्शी नेलपेंट से रंग दिए हों , तर्जनी में गोल सर्पाकार अंगूठी के बीच दमकता मोती, सलीके से बनी साड़ी की पटलियों से होती हुई उसके पैरों तक नजर गयी . पैरों की मैरून नेलपेंट सजी अंगुलियाँ सुन्दर नाजुक सैंडिल में धंसी हुई थी . सुहासिनी के मंत्रमुग्ध अवलोकन से वह स्त्री लजाई नहीं , बल्कि उन्मुक्त हंसी के बीच उसके मोती जैसे दांतों की पंक्तियाँ दामिनी- सी चिलक उठी . अजीब सम्मोहन था उसके पूरे व्यक्तित्व में .

क्या देख रही हो , तिरछे नयनों से ताकते मोहित सुहासिनी से उसने पूछा ..

तुम बहुत खूबसूरत हो , कहती हुई सुहासिनी झेंप गयी . तुम ये बताओ, मुझे क्यों बुलाया इस तरह बीच कथा से .

बताती हूँ , चलो तो मेरे साथ ...उस स्त्री ने सुहासिनी का हाथ थाम लिया . सम्मोहित-सी सुहासिनी उसके साथ चल पड़ी!


क्रमशः

24 टिप्पणियाँ:

  1. सशक्त कथ्य , धारा प्रवाह लेखनी . रोचकता बढती हुई . आगे का इंतजार .

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. उत्सुकता जगाता सुन्दर आलेख...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. बांधें रखता हुआ रोचक लेख .....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. कार्तिक महात्म्य- :)
    खुद नारी द्वारा नारी के सौन्दर्य का वर्णन -राम कसम आनन्द आ गया....लगता है लम्बी कहानी है ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. मंत्र-मुग्‍ध करने वाला लेखन। आगे की कड़ी का इंतजार रहेगा।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. आपके हमेशा के आलेखों जैसी ही उत्कॄष्ट कहानी पर अंत में क्रमश: देखकर १४० किलोमीटर से भागती गाडी को इमरजेंसी ब्रेक लगने से झटका लगा. बस अगला भाग तुरंत लिखें.

    रामराम.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. बड़े रोचक मोड़ पर आ कर क्रमश पढ़ने से वाकई झटका लगा....अगली कड़ी का इंतज़ार...

    जय हिंद...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  8. कहानी का शिल्प बहुत बढ़िया है ..पाठक को बाँध लेता है ...जिज्ञासा बनी हुई है ..आगे क्या होना है ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  9. एक रहस्यमयी एवँ उत्सुकता बढ़ाने वाली कथा। अगले भाग का इन्तिजार रहेगा।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ही रोचक अब तो अगले भाग का बेसब्री से इंतज़ार है

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  11. जब आगाज़ इतना रोचक है तो अंजाम तो होना ही है।

    मुझे इस अंक में जो सबसे आकषित करती बात लगी वह यह कि आपने शब्दों का जो जाल फैलाया है उसमें हम जैसे पाठक फंसे चले आए हैं और इसके अंतिम अंक तक साथ रहेंगे। आपको ही पढ़वाता हूं फिर से देखिए ...

    आसमानी साड़ी के लहराते आँचल के बीच कट स्लीव के ब्लाउज से झांकती उसके सुदृढ़ गोरी बाहें , गले के गड्ढे को ढकता मोतियों की माला के बीच अटका एक खूबसूरत सा पैंडल , बालों को करीने से गूंथते हुए बनाया एक ऊँचा जूडा जिसके कोने में खोंसा हुआ लाल गुलाब ,करीने से तराशे लम्बे चमकदार नाखून मानो पारदर्शी नेलपेंट से रंग दिए हों , तर्जनी में गोल सर्पाकार अंगूठी के बीच दमकता मोती, सलीके से बनी साड़ी की पटलियों से होती हुई उसके पैरों तक नजर गयी . पैरों की मैरून नेलपेंट सजी अंगुलियाँ सुन्दर नाजुक सैंडिल में धंसी हुई थी . सुहासिनी के मंत्रमुग्ध अवलोकन से वह स्त्री लजाई नहीं , बल्कि उन्मुक्त हंसी के बीच उसके मोती जैसे दांतों की पंक्तियाँ दामिनी- सी चिलक उठी . अजीब सम्मोहन था उसके पूरे व्यक्तित्व में .
    *** अद्भुत! सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज़ों पर आपकी नज़र गई है। इसको कहते हैं लेखनी का जादू।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  12. मोहिनी का मोह जाल....आगे क्या???

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  13. उत्सुकता बनी है ....आगे क्या???......बहुत रोचक

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  14. कहानी बहुत ही रोचक है... सुहासिनी को घर के सैकड़ों काम थे पर उसने जब सोच लिया तो वो सुबह तैयार हो मंदिर ,पहुँच ही गयी...स्त्रियाँ यूँ ही सैकड़ों कामों के बीच अपनी संतुष्टि अपने पसंद के पल चुराना जानती हैं.
    क्रमशः तो ऐसी जगह लाकर डाला है कि उत्सुकता परकाष्ठा पर है..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  15. ये सुबह सुबह बच्चों को तैयार करना और तमाम वर्णन एकदम सजीव से लगे। अमूमन हर उस घर में यह कवायद चलती है जहां बच्चे होते हैं।

    इस दौरान मंदिर जाने वाला दिन आ जाय जैसे मंगल या शनिचर तो तैयारी एक दिन पहले से की जाती है ताकि बच्चों को स्कूल भेजने में कम कवायद करनी पड़े और मंदिर का भी वक्त निकल जाय :)

    रोचक अंदाज में लिखी गई पोस्ट। इंतजार है अगली कड़ी का।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  16. oh kramsh: shabd kisne bana diya? sara dhyan hi toot gaya............uffffffffff...

    aage likho jaldi.............

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  17. रोचक! विस्तृत वर्णन प्रभावित करता है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं