और वह सोचती रही उन निशानों को , उन जख्मों को , जिनके कोई हल्के से निशान भी ऊपर से नजर नहीं आते थे ....वह जो उसकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था , बिछड़ा था उससे तब , जब्त किया था उसने ,जीवन की रीत सा ही तो हुआ था मिलना और बिछड़ना भी ...
क्यों किया था उसने ऐसा , समन्दर को कितनी लहरों ने छुआ होता ,क्या फर्क पड़ता है ...फिर उस एक लहर से ही शिकवा !! अपने हिस्से का आसमान तो उसने भी छुआ था , फिर क्या था, जो उसके भीतर ऐसा टूटा , बिना निशान भी जिसका दर्द एडी में हुए उस जख्म जैसा ही ....क्यों !!!
उसने खुद को शाबासी दी , एडी के मवाद जैसा कुछ निकला तो नहीं मगर जाने कौन सा निश्चेतक मस्तिष्क का वह हिस्सा शून्य कर गया कि दर्द हँसता- सा गुजर गया ...और अनजाने में उसने प्रेम के लिए अपने ह्रदय के कपाट हमेशा के लिए बंद कर दिए ... वह प्रश्न अनुत्तरित , वह जख्म अनछुआ ही रह जाता , जो उस दिन उसने कहा नहीं होता ...जख्मों का बिना सूखे भर जाना ठीक नहीं होता ....किस खूबी से छुआ था उसने बिना निशान वाले उस जख्म को !
उसने जोर से आँखें बंद कर ली , चीखी -चिल्लाई , मगर वह शांत सा उसकी अंगुली पकडे उसे आईने के सामने खड़ा कर गया ...देखो , यह तुम हो , जिसके भय से चीख कर अपनी आँखें बंद कर लेती हो , उसने उसे वह सब दिखाया जो वह नहीं देखना चाहती थी .... वह भौंचक थी , यह आईने में उसका ही अक्श था , जिस प्रेम को वह दूसरों में ढूंढती थी , नहीं पाने पर झुंझलाती थी , शिकायत करती थी , रोती थी , चीखती थी , वह स्वयं उसमे ही नहीं था ,या कहूँ खोया नहीं था , सूख गया था....जैसे बहते झरने के स्रोत पर कोई पत्थर की शिला अड़ गयी हो ... अब निर्झरणी- सा बहने लगा उसकी अपनी पलकों से ...आह! प्रेम , तुम मुझमे ही छिपे थे , मैंने तुम्हे कहाँ नहीं ढूँढा !
और दे गया सन्देश ,मैं सूरज अपनी धूप सबके लिए एक सी ही तो बिखेरता हूँ , कोई पौधा पत्थरों की ओट बना कर मुरझा जाए तो मेरा क्या कुसूर....मैं ही हूँ सागर , मेरी लहरें साथ साफ़ धुली चमकदार बालू रेत पर सुन्दर शीपियाँ छोड़ देता हूँ किनारे , सडा गला सब बहा ले जाता हूँ , मुझ जैसी गहराई , विशालता तुममे में ना सही , तुम हो प्रेम की कलकल बहती नदिया -सी , कभी शांत , कभी हलचल मचाती ... सडे गले पत्ते , सब अवांछित किनारे पर आ टिकेंगे , मत सोचो कि किसने क्या कहा , क्या समझा जबकि तुम समझती हो तुम क्या हो, तो किसी को समझाने की कोशिश मत करो , उन्हें खुद समझने दो....नदी को नाला समझने वालों की अपनी किस्मत , उनके हिस्से में तलछट ही है ! जो तुमसे नफरत करते हैं , तुम जैसा ही बनना चाह्ते हैं ....क्या- क्या नहीं समझाया उसने , कभी प्यार से , कभी गुस्से से , कभी डांट कर, कभी गले लगा कर !
आज अनुरागी मन से क्या सुबह की शुरुआत हुयी कि यह तो सिलसिला बन गया :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंये बेबहर क्या राजस्थानी शब्द है ?
आपके इस आलेख में ख्याल का प्रेम या प्रेम का ख्याल जो बतकही के रूप में निकला है वह मन के तंतुओं को स्पंदित कर गया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंशब्दों के जो जादुई चित्रण हैं, जैसे... कुछ घाव जो सूखे बिना भर जाते हैं , जीवन भर तकलीफ देते हैं, ... कभी ललाई लिए एडी से बहता रक्त तो कभी पीले जख्म से रिसता मवाद...हर कुछ दिनों पर अपनी सूरत बदल लेता , ... .आज वहां घाव नहीं है , देखने पर कुछ नजर नहीं आता , मगर भीतर खुजली चलने पर वह हाथ से टटोलकर एडी के उस खोखले स्थान को महसूस करती है , ... समन्दर को कितनी लहरों ने छुआ होता ,क्या फर्क पड़ता है ...फिर उस एक लहर से ही शिकवा ! ...
आदि मन के द्वन्द्व को अभिव्यक्ति देने के लिए काव्यात्मक बिम्ब की तरह प्रतीत हो रहे हैं।
आह! प्रेम, तुम मुझमे ही छिपे थे, मैंने तुम्हे कहाँ नहीं ढूँढा !
प्रत्युत्तर देंहटाएंद्वन्द को उकेरती यह रचना .. बेहद करीबी
लाजवाब
एक बेहतरीन रचना ... कहानी पढ़ते हुए कहूँ या ख़ास मनःस्थिति को कारण बनाऊँ .... ज़ख्म टीसने लगे . कोई ज़ख्म किसी मरहम से या समय से बस उपरी तौर पर भरता है - अन्दर हरा ही होता है ... ज़रा सी ठेस और उपरी परत हट जाती है ... फिर दिल को समझाने के लिए जो भी कतरा उठा लो
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर प्रेमाख्यान।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन भावाभिव्यक्ति .
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रेम की सुन्दर व्याख्या की है आपने.
प्रत्युत्तर देंहटाएंभावनात्मक अभिव्यक्ति, सुन्दर सन्देश!
प्रत्युत्तर देंहटाएंआहा ...मन को प्रेम की गहरी अनूभूति दे गयी पोस्ट
प्रत्युत्तर देंहटाएंगद्य में पद्य है. भाव से भी कविता ही है... सुन्दर.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!यदि किसी ब्लॉग की कोई पोस्ट चर्चा मे ली गई होती है तो ब्लॉगव्यवस्थापक का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि वह उसकी सूचना सम्बन्धित ब्लॉग के स्वामी को दे दें!
प्रत्युत्तर देंहटाएंअधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
प्रेम कही और नहीं है , स्वयं उसके भीतर है ! जीवन क्यारी की महकती बगिया की खुशबू -सा प्रेम ....कस्तूरी मृग की नाभि- सा स्वयं उसमे ही है!
प्रत्युत्तर देंहटाएंहम भी उड़ चले इस बेतरतीब उड़ान के संग....अच्छा लगा..प्रेम को ढूँढने का ये सफ़र..
वास्तव में प्रेम अपने अन्दर ही है। बस महसूस करने की देर है सारी दुनिया से प्रेम होने लगता है। बहुत ही अच्छा ललित निबन्ध।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमर्म को छू लेने वाला आत्मसंवाद....
प्रत्युत्तर देंहटाएंसचमुच बाहर कहाँ, अपने अन्दर ही तो है सबकुछ...
यह एक कविता है :)
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