ज्ञानवाणी

दिल दिमाग की रस्साकशी

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गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

लिख ही दूँगी फिर से प्रेम गीत ....

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लिख ही दूँगी फिर कोई प्रेम गीत अभी जरा दामन सुलझा लूं .... ख्वाब मचान चढ़े थे कदम मगर जमीन पर ही तो थे आसमान की झिरियों से झांकती थी टिप - टि...
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