बुधवार, 23 मई 2012

थैंक्स राम .......(4)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन से आगे ....



महिला संगीत का आयोजन एक बड़े हॉल में था ...पहली बार मिली अंजना होने वाली भाभी से ...ट्रेडिशनल लहंगा ओढ़नी में प्यारी हंसमुख गुडिया- सी लगी ...लीना और अंजना बांह पकड़कर खींच लाई भाई को और होने वाली भाभी को भी  ...कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मां ने अंजना को टोका ..." आंजलि नहीं भरनी है ? "
भूल गयी थी अंजना ,हालाँकि घर लौटते समय मिठाई , पान और माला खरीद ली थी , आखिर माँ ने ही सलाह दी ...कोई बात नहीं , अभी जब वारना करेंगे तब भर देना ...

बीच चौक में कुर्सी पर बैठाया भाई को और उसकी गोद में सूखे मेवे , बतासे , मिठाई और पैसे रख पान का बीड़ा पकड़ा दिया ...घर में उपस्थित सभी महिलाएं दो ग्रुप बना कर दोनों ओर खड़ी हो गयी और फिर उनके बीच शुरू हो गयी दोहों की प्रतियोगिता ..आधुनिक अंदाज़ में महिला संगीत में फ़िल्मी गानों पर नृत्य की धूम के बाद पारंपरिक अन्ताक्षरी का सा लुत्फ़ , गर्व हुआ उसे ...आधुनिकता ने पारंपरिक उत्साह को लजाया नहीं था ...

" एडी म्हारी उजली जी ,कोई फाबो सूंतवा सूंठ
ऐसी चालूं ठुमकती जी कोई रंडुआ छाती कूट "

के जवाब में दूसरी ओर से आया सनसनाता तीर ...

" चार कूंट को नातनो जी कोई बांध्या मूंग मरोड़
पाड़ोसिया को डावड़ो जी कोई रह गयो मूंछ मरोड़ "

अंजना अपने ग्रुप का उत्साह बढ़ाते हुए दोहे याद दिला रही थी ..."

छह छल्ला छह मूँदडी जी कोई छल्ला भरी परात
एक छल्ला का कारण से कोई छोड्या माँ अर बाप !

गीत गाते आँखें भर आई माँ की , अंजना माँ के पास खिसक आई ..पलकों में रुका बाँध आंसुओं की राह निकल पड़ा ...बड़ी काकी भी अंजना के सिर पर हाथ फेरती सिसक पड़ी, ब्याह की रौनक तो छोरियां सा ही है ..वल्लभ का ब्याह में कोणी आई ...
याद आया अंजना को ...वल्लभ की शादी के बाद लौटते पापा कुछ देर के लिए उसके शहर आये थे ...जितनी देर  रुके   , टैक्सी बाहर खड़ी रही , उन्हें तुरंत लौटना था ..कल ज़रूरी मीटिंग है दिल्ली में , बस तुझे देखने की इच्छा हुई तो चला आया ,शादी में सब तुझे बहुत याद कर रहे थे , तेरी काकी की भी आँखें भर आई थी ..."छोरिय कोणी आई "

...अंजना को सहसा यकीन नहीं हुआ था ..दो बेटों की गर्विता माँ पुत्रवती होने के गर्व से तनी रहती थी " छोरियां हो जाव तो नाक कट जाव "..माँ को कितनी बार ताना दिया होगा उन्होंने ...माँ कुछ कहती नहीं थी , अंजना के बिफर पड़ने से पहले बस उसे अपने अंक में समेट लेती थी ...एक दिन पता चलेगा इन्हें कि बेटी की माँ होने का मतलब क्या होता है , उन काकी के बारे में यह सुनकर उसने अनुमान लगाया , आज माँ का गर्वीली मुस्कान से चेहरा खिल उठा होगा ...

पापा के जाने के बाद परिवार में पहला शुभ कार्य हो रहा था ...उन्हें याद कर सबकी आँखें एक साथ भर आयी ..
मारवाड़ म छोरियां स सीख जावा , आज कसी रोळ मचा राखी है , बड़ी बुआ माँ से कह रही थी , सुना अंजना ने ...लीना ने उनके मुंह की बात लपक ली ..." और क्या बुआ ...हमारी वियोगिनी मीरा का सलोनी राधा में कायांतर हो चुका है ...मेरी शादी में कितनी मुश्किल से मनाया था इसे "..

लीना की शादी अचानक ही तय हुई थी ...अंजना को अपने माता पिता के पास असाम लौट जाना था ...उसके पिता वहां एक चाय बगान में प्रशासनिक पद पर कार्यरत थे ... उत्तर पूर्वी राज्यों में स्थानीय निवासियों में प्रवासियों को विशेषकर मारवाड़ियों को लेकर बहुत आक्रोश था , आये दिन होने वाले उपद्रव के बीच चिंतित माता- पिता ने उसे अभी कुछ और दिन हैदराबाद ही रुकने की सलाह दी थी ...राजमंद्री से मौसी का फोन था ...बस हमेशा अपने ददिहाल के परिवार से मिल कर ही चले जाना है तुझे , हम तो जैसे कुछ लगते ही नहीं तेरे , इस बार कुछ नहीं सुनूंगी तेरी , विकास को भेज रही हूँ लिवाने ...दूसरे दिन ही आ गया था विकास , उसे जाना पड़ा ...अपने हमउम्र भाई-बहनों के बीच खूब मन लगा उसका , दो सप्ताह कैसे बीत गाये , पता ही नहीं चला ...विदा करते मौसी भावुक हो गयी थी ," आती -जाती रहा करो"...

हैदराबाद लौटने पर पता चला कि इस बीच लीना का रिश्ता तय हो गया था ...किसी समारोह में देखा था उसे निखिल के परिवारवालों ने और नेवी में कार्यरत अपने बेटे के लिए हाथ मांग लिया था लीना का ...मासी इनकार करती भी तो कैसे , अच्छा परिवार , अच्छी नौकरी ...वह हैरान थी क्या लीना भी राजी है इस रिश्ते के लिए ...काकी ने उसे झिड़क- सा दिया ," और क्या चाहिए था , इतना अच्छा रिश्ता है , लड़का भी देखने में ठीक- ठाक है "
दूसरे दिन सुबह सवेरे ही जा पहुंची थी लीना के घर ...पूरा घर अस्तव्यस्त ,सामान से अटा पड़ा था ...सही मौके पर आयी , मासी ने उसे बाँहों में भर लिया...अच्छा परिवार मिल गया , मैंने सोचा की इस रिश्ते को चूकना ठीक नहीं ...
मगर मासी इतनी जल्दी में ...
हाँ , अच्छा खासा लड़का है , लीना भी मिल चुकी है ..जल्दी क्या बेटा , बेटियों को तो एक दिन पराया होना ही है , लड़का नेवी में हैं , वहां जाने से पहले उसके पेरेंट्स शादी कर देना चाहते हैं ..परसों सगाई है और पंद्रह दिन बाद शादी ...
लीना , तू खुश तो है ...
हां रे , ऐसे क्यों पूछ रही है ...
नहीं , वो ...उस दिन ...वो लड़का ...अंजना अटक रही थी ...
क्या वो लड़का ,छोड़ उसे ...

कुछ कही तड़क गया , छोड़ना इतना आसान !! वही उसे तसल्ली भी थी कि लीना खुश है ...
अगले पंद्रह दिन पलक झपकते ही गुजरने थे ...लीना की चंडाल चौकड़ी(सत्या , पूर्णिमा , ख़ुशी , गीतांजलि ,विनय , ) रात -दिन मुस्तैद रहती थी वहीँ ,रामदास और राजू भी उनके साथ लगे रहते ...मासी को घबराते देख उन्होंने पूरा जिम्मा खुद पर ले लिया था ...कैटरिंग , हलवाई , टेंट के साथ ही दहेज़ में दिए जाने वाले सारे सामान की खरीददारी , पैकिंग ...लीना ने काकी से मिन्नत कर कुछ दिन उसे अपने पास ही रोक लिया था ...दिन भर खरीददारी , फिर शाम को पैकिंग करना , ऐनवक्त पर अफरातफरी से बचने के लिए  सामान   को क्रमवार जमाना और फिर मिलकर सबके लिए खाना पकाना ...उन लोगों ने मासी को परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी ...मासी की कई बार आँखें भर आती ...तुम लोग नहीं होते तो मैं कैसे कर पाती यह सब कुछ ...

एक दिन शाम को सामान की लिस्ट चेक करती , दिन भर के खर्चों का ब्यौरा लिखती मासी के पास बैठी थी अंजना , बाकि लड़कियां खाना बनाते चुहलबाजी में लगी थी ...मासी ने तकिये का सहारा लेते हुए पैर सीधे कर लिए ...थक गयी थी ...तभी रामदास आकर मासी के पास बैठ गया ... मासी , आपके पैर दबा दूं कहता हुआ सचुमच ही उनके पैर दबाने लगा ...
तू दबा ले पैर , मगर इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है ..
मौसी उसे आँखें दिखा रही थी , एक चोर मुस्कान उसने सभी के चेहरे पर देखी , उसे माजरा समझ नहीं आया ...

गेलो पग दाबता कठई गलो भी दबा देव , मासी ध्यान राखजो ...(पागल कहीं पैर दबाते हुए गला दबा दे, ध्यान रखना )सबके सामने व्यक्तिगत बात करते समय मासी से मारवाड़ी में बात करती थी अंजना और लीना ..

क्या बोला मासी , मुझे समझ नहीं आया !
जब ये सब लोग तेलगु में बात करते हैं तो मैं पूछती हूँ कभी कि क्या बोला , समझा दो मासी ...

उनकी अप्रत्यक्ष नोंक झोंक चलती रहती थी ...नाम पूछने वाले हादसे के बाद रामू की कभी हिम्मत नहीं हुई उससे सीधे बात करने की ...पता नहीं तेलगु में क्या गिटर- पिटर करता रहता मीना से , वह कई बार लीना से उलझ जाती " मैनर्स नहीं हैं तुम लोगों में , जानते हो, मुझे तेलगु नहीं आती , फिर भी उसी भाषा में बात करते हो ,"
रामू ने ऐसे हीएक दिन एक कागज -पेन लाकर लीना को देते हुए कुछ कहा ...लीना ने कागज सरका दिया उसके आगे ," देखना , जरा ये प्रॉब्लम सोल्व कर दे , मैंने तो मैथ्स पढ़ी नहीं है "
उसने देखा  ट्रिग्नोमैट्री   का कोई सवाल था , उसका मनपसंद विषय ...उत्साह से ले लिया कागज.
तू इसे सोल्व कर मैं आती हूँ अभी ...लीना रामू के साथ बाहर चली गयी .

ये क्या हो गया है मुझे , सब कुछ ब्लैंक , ये आसान- सा सवाल मुझसे हल नहीं हो रहा ...दिमाग में अजीब -सी बेचैनी महसूस की उसने ...सर को हाथों से पकड़ कर दीवार के सहारे सरक गयी ...क्या हो रहा है ... बेबसी में कुछ बूँदें आंसुओं की ढलक पड़ी , कागज भी गीला होने लगा !

अंजना को इस हाल में देख लीना घबरा गयी ...

क्या हुआ अंजू , तू ठीक तो है ...छोड़ ये सब ...उसके हाथ से छीनते हुए उसने कागज- पेन फेंक दिया !

कुछ नहीं , सिर में बहुत अजीब -सा लग रहा है , जैसे मैं सब पढ़ा- लिखा भूल गयी हूँ !
हो जाता है कभी -कभी , तू आराम कर ले थोड़ी देर , इधर बहुत भाग दौड़ हो गयी ...बहुत परेशान कर रही हूँ ना मैं तुम सबको .

अंजना तकिये का सहारा लेकर लेट गयी , पता नहीं कब उसे नींद आ गयी ..उठी तो शाम का धुंधलका हो चुका था ...
मुझे उठाया नहीं , कितनी देर तक सोती रही मैं ..सबको अपने काम में लगे देख एक अपराध बोध महसूस किया उसने .

कोई गल्ल नहीं है जी ,अब बाकी का काम आप ही कर लेना ...सत्या ने कहा .आज से विनायक के गीत शुरू होंगे शाम को , नाच, गाना , मस्ती सब तुझे ही करने होंगे ...

चुप कर , ये नाच ,गाना, मस्ती तुझे ही मुबारक ...मैं तो दर्शक ही रहूंगी .

और सचमुच उस रात खूब धमाल हुआ ...पधारों म्हारा घरां विनायक के साथ काल्यो कूद पड्यो , टूटी बाजूबंद री लूम जैसे मारवाड़ी गीत तो गुजराती गरबा , पंजाबी गिद्धा , भांगड़ा सब एक साथ ..अंजना चुपचाप बैठी देखती रही , उसे इनमे कोई रूचि नहीं थी ..
दूसरे दिन सगाई का कार्यक्रम था ...लीना के ससुराल जाना था शगुन लेकर और अंगूठी पहनने की रस्म भी वही अदा होनी थी ...यूँ तो दुल्हन का शादी से पहले जाने का रिवाज़ नहीं था , मगर लीना के ससुराल वालों ने नई पहल करते हुए लीना को भी वहीँ बुलवा लिया था ...उस दिन काकी ने सौगंध दी अंजना को ...समाज का काम है , सौ लोंग इकट्ठे होंगे ...आज मैं तेरी नहीं सुनूंगी , बिंदी लगाएगी और बालों में फूल भी , साड़ी नहीं पहने तो कोइ बात नहीं , मगर मेरी इतनी बात तो तुझे माननी ही पड़ेगी ...
ओह! एक निःश्वास छोड़ी थी अंजना ने ...ये क्या रिवाज़ है यहाँ का , लड़कियों को बिंदी लगाना जरूरी है ...हल्के रंग के सादा चूड़ीदार कमीज के साथ बिना बिंदी के देख कई बार टोका था ...एक बार तो ट्रेन में गोरे चिट्टे भाई और बिंदी और फूलों से सजी सांवली भाभी के साथ अंजना को देख एक दक्षिण भारतीय परिवार ने भाभी को टोक दिया था ,"आपकी लव मैरिज है ...शादी मुस्लिम परिवार में हुई है क्या , ये दोनों भाई -बहन एक जैसे दिखते हैं , आप अलग हो "..भाभी ने बाद में बताया था और इस पर वे तीनों देर तक हँसते रहे थे ...

अंजना ने काकी की बात मान ली , दिन भर सिर पर भारी बोझ महसूस होता रहा था मगर काकी खुश थी , आज तूने मेरा मान रख लिया !

अंजना और लीना खोयी थी उन दिनों की याद में कि वल्लभ उनका हाथ पकड़कर तेज धुन पर झूमते भाई बहनों के बीच खींच लाया .....काका झूठ मूठ गुस्सा दिखाते हर कह रहे थे ..." दिन भर नाच गाना , मन नहीं भरा तुम लोगों का अभी " मगर सभी बच्चों ने उन्हें भी खींच लिया तो वे खुद को भी थिरकने से रोक नहीं पाए!

क्रमशः ...

थैंक्स राम ! (1)

अन्जना कई वर्षों के बाद लौट आयी थी इस शहर मे ...गगनचुम्बी अट्टालिकाएं और उन पर लगे बड़े- बड़े होर्डिंग्स ,घुप्प अँधेरी रात में भी रौशनी से जगमगाता निजामों का शहर हैदराबाद ... प्राचीन धरोहरों को बड़े करीने से संभाले यह शहर पुरातन और आधुनिकता का अनोखा संगम है ...जहाँ गुलजार हौज़ , शमशेरगंज , बेगम बाज़ार , सहित शहर की तंग गलियों में क्रिकेट की बॉल के साथ जूझते बच्चे तो वहीं आबिद रोड की चौड़ी सड़कों पर फ़र्राट बाईक दौडाते भी ...

चारमीनार के पास से गुजरते उसके चारों ओर ट्रैफिक की रेलमपेल .  भेलपुरी ,कट्लीस , डोसा , आमलेट की बंडीयां (थडीयां ), बांह भर हरी -लाल चूड़ियाँ खनकाती काले  क्रीमी   नकाब से झांकती सिर्फ़ आँखें . वहीँ चार मीनार के पास सड़कों के किनारे पर स्वादिष्ट चाट के चटकारे लेती महिलाएं.  उसे याद है शाम को घर से पैदल घूमते चारमिनार तक चक्कर काट आना ...  भेलपुरी , चाट का स्वाद , जीभ पर खट्टा -मीठा सा स्वाद तैर आया ...

लाड़ बाजार मे लाख के जडाऊ कड़ों का मोल -भाव करती दर्जन भर महिलाएं ...कुछ भी तो नहीं बदला था ...पत्थर गट्टी पर मोतियों के जगमगाते शो रुम के बीच अलग प्रभाव जमाता गार्डेन वरेली शोरुम . सड़क के दूसरे किनारे पर रेडीमेड सलवार कमीज ,मैचिंग दुपट्टे की छोटी दुकाने पीछे छोड़ता हुआ उसका रिक्शा आगे बढ़ रहा था ....उसे याद आया काकी के साथ छोटे भाईयों को उनके मिशन स्कूल से लेकर लौटते अनगिनत बार यहीं पेड़ के नीच गन्ने का जूस पिया जाता  था .  गुलज़ार हौज़ से घर की और पैदल ही लौटते दुकानों के बाहर चिल्ला कर ग्राहकों को आमंत्रित करते 
" देख लो दीदी . नयी डिजाईन के सलवार कमीज है या अम्मा ऐसे क्या करते . देख तो लो . नहीं जमे तो नक्को होना बोल देना "
कई बार पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता था ...
 
काकी ठसक कर कहती ... क्या करते जी तुम , तुम्हारे मालिक को बोलती अभी .  ऐसे राह चलते लोगों को परेशान करते . हौला समझ के रखा है क्या हमको .
 बेचारे खिसिया कर अपनी राह नापते .

शहर की चहल पहल से आँखे मिलाते पता ही नहीं चला .  उसका रिक्शा छः लाईन पुल को कब का पीछे छोड़ चुका था ... सुल्तान बाजार चौराहे पर बहुमन्जिला इमारत के एक कोने पर तेज धूप मे चमकता आंध्रा बैंक का होर्डिंग ...
 
"बस यहीं रोक दो भैया" ....वर्षों बाद ऐसे रिक्शे पर बैठना हुआ था उसका ...पिता की नौकरी ने उसे मातृभूमि से अक्सर दूर ही रखा मगर जब भी हैदराबाद लौट कर आना होता तो घुटनों को पेट तक सटाए रिक्शे पर बैठे लोगों को देखकर बहुत हंसती थी ...कितने अजीब रिक्शे हैं ...और जब पूरा परिवार इन पर एक साथ लद कर निकलता तो नजारा देखने लायक होता था. रिक्शे पर चार सवारी एडजस्ट की जाती . दो बैठे हुए और दो नीचे पैर लटका कर . अंजना भाग छूटती .
 मुझसे नहीं बैठा जाता . मैं ऑटो से आउंगी .
उसी अंजना को आज क्या सूझा...?

" कहाँ जाना है अम्मा " घर से निकलते ऑटो रिक्शे वालों की पुकार को अनसुना कर जानबूझ कर यह रिक्शा पसंद किया उसने ...इन बीच के वर्षों में उसकी और आर्णव की नौकरी के के चलते कई छोटे -बड़े शहरों में प्रवास करना हुआ .

किसी शहर को जानना हो उसकी ख़ूबसूरती निहारनी हो तो  उसे पैदल घूमो या फिर छोटे रिक्शा में . तेज भागते वाहनों से भी कभी किसी शहर को जाना जा सकता है . अक्सर आर्णव कहता था .

और फिर ये तो उसका अपना शहर है. उसकी भीनी खुशबू को अपने नथुनों में भर लेना चाहती थी. जाने फिर कितने वर्षों बाद उसे यह मौका मिले ..उसे याद आया ,यहाँ पहुँचते ही उसे फोन करना था . पर्स से मोबाइल निकाल कर आर्णव का नंबर मिलाने लगी .


क्रमशः  थैंक्स राम ! (2), थैंक्स राम ! (3), थैंक्स राम ! (4)), थैंक्स राम ! (5), 
थैंक्स राम !  (6) आखिरी किश्त 


बहुत दिनों से नहीं , सालों से कहानियों के पात्र दिल और दिमाग में हलचल मचाते रहे हैं , देखूं... लेखनी से क्या कुछ कहते हैं!!

बारिश से तरबतर एक सप्ताहांत ....


केंद्रीय विभागों की तर्ज पर ही राजस्थान में कर्मचारियों के लिए पांच दिन का सप्ताह किये जाने की घोषणा पिछली सरकार के समय की गयी थी, जिसके अंतर्गत पेट्रोल की खपत में कमी के एक उपाय के रूप में सरकारी विभागों में कामकाज की अवधि सोमवार से शुक्रवार तक की गयी . इसके तहत कार्यालयों में प्रतिदिन के कामकाज के समय में भी परिवर्तन किया गया . पहले के 10 से 5 कार्य करने के समय को 9.30 से 6 बजे तक कर दिया .
सरकारी दफ्तरों में कामकाज किस तरह होता है , हम सभी जानते हैं . ऐसे में पांच दिन के सप्ताह से कामकाज प्रभावित होने की सम्भावना ही ज्यादा थी . सर्दियों में दिन छोटा होने से अँधेरा जल्दी ही घिर आने के कारण भी कर्मचारियों के जल्दी दफ्तर छोड़ जाने की पूरी सम्भावना थी , मगर सरकार ने कर्मचारियों को इस समय के नियम का पालन करने को लेकर सख्ती दिखाई और धीरे -धीरे इसके सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे . कम से कम कर्मचारियों के परिवारजनों ने तो इससे राहत ही महसूस की . दफ्तर का समय सुबह 10 से घटाकर साढ़े नौ करने का ख़ास फर्क नहीं पड़ा , मगर इससे परिवार के लिए एक दिन अतिरिक्त मिलने लगा और यहाँ भी सप्ताहांत मनाने का रिवाज़ निकल पड़ा . सरकारी कर्मचारियों की पेट्रोल की खपत में कमी का तो पता नहीं , पारिवारिक सदभाव बढ़ने में जरुर सफलता मिली होगी ..

इस सप्ताहांत पर जब बहुत समय बाद घर से निकलना हुआ तो गाड़ियों की रेलमपेल के बीच दोनों छूट्टियों के दिन भी गुलजार हो रही सड़कें बता रही थी कि इस शहर को भी पांच दिन का सप्ताह रास आने लगा है .
रविवार को सूनी रहने वाली सड़कें अब गुलज़ार रहने लगी हैं . पिछले वर्षों में प्रोपर्टी मार्केट में बूम आने के बाद चौपहिया वाहनों की बढ़ी संख्या ने भी परिवार के साथ छुट्टियों मनाने वालों की संख्या में वृद्धि की है.
इस शनिवार को ट्रैफिक में फंसे हुए समीर जी की उपन्यासिका के कई अंश आँखों के सामने साकार हुए . लोंग भागे जा रहे हैं बाहर , क्या घर में बैठ कर परिवार जनों के साथ अच्छा वक़्त बिताते हुए छुट्टियाँ नहीं मनाई जा सकती या फिर पर्यटन के लिए शहर अथवा देश से बाहर जाना ही क्या आवश्यक है ...

गर्मी की छुट्टियाँ तो बच्चों की परीक्षाओं,शादियों की भेंट चढ़ी , रही सही कसर अस्वस्थता ने पूरी कर दी , नतीजन पूरी छुट्टियाँ घर में भरपूर आराम करते ही बीती . सोचा इस सप्ताहांत पर अपने ही शहर को नवीन दृष्टि से देख लिया जाए .

शनिवार का दिन झाड़खंड महादेव के दर्शन के लिए निकले . द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित यह शिव मंदिर इसे राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से अलग बनाता है . जन्मभूमि ही द्रविड़ों का प्रदेश है तो इस प्रकार की इमारतें , मंदिर, चित्रकारियां मुझे बहुत लुभाती है , इन स्थलों पर जाने पर बहुत दिन बाद बेटी का अपने मायके आने जैसा ही अहसास होता है . हम महिलाएं उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों , ससुराल की परम्पराओं ,रीति -रिवाजों को निभाते उनमे ही रच बस गयी हो , मगर मायके की एक छोटी सी झलक भी स्मृतिलोक के कितने ही परदे भेद कर बचपन तक ले आती हैं . माँ को भी कई बार गुजरते देखती हूँ इन्ही अनुभूतियों से जब हुलस कर वे अपने मायके के बारे में बताती हैं ...ये रिश्ता बेटियों का बेटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता चलता रहता है .

झारखण्ड महादेव , जयपुर
आर्मी एरिया के पास होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण लुभाता है .मंदिर प्रशासन भी पर्यावरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया . मंदिर के अहाते की छत डालते समय में पीपल या बरगद के बड़े पेड़ों को कटा नहीं गया बल्कि छत का वह हिस्सा खुला ही छोड़ दिया गया है .
मदिर के भीतर पक्षियों के चुग्गे और पानी के लिए बड़ी जगह सुरक्षित है , कबूतरों के ढेर के बीच सफ़ेद कबूतर भी नजर आये . यहाँ बड़ी संख्या में मोर भी हैं , हालाँकि मंदिर के बाहर हरे चारे के ढेरों के पास गायों और सांडों का हुजूम थोडा डराता भी है . मैं देख नहीं पाए , शायद कही आस पास ही मंदिर की अपनी डेयरी भी हो . देश में हर तरफ मंदिरों में भारी संख्या में धन मिलने की ख़बरों के बीच यह सब देखना सुखद लगा .
दूर से देखने पर मंदिर की बाहरी बाउंड्री के रंग इसे कहीं से भी मंदिर होने का आभास नहीं देते . सफ़ेद रंग की दीवार और खिडकियों और दरवाजों पर हरा रंग , बच्चों ने आश्चर्य से पूछा ," यहाँ मंदिर है ?"
भक्ति भी भला किस रंग का अवलंबन चाहती है ! हम इंसानों ने इसे अलग -अलग रंगों में बाँट दिया है .
शाम गहराने लगी तो बिरला मंदिर और मोती डूंगरी गणेशजी के दर्शन कर घर लौट आये ...

बिरला मंदिर , जयपुर बिरला मंदिर से ट्रैफिक का नजारा

दूसरे दिन आमेर किले के लिए निकले घर से , जलमहल तक आते -आते मौसम ने तेजी से करवट ली और बारिश के साथ लबालब सड़कों ने रास्ता रोक लिया . जलमहल की पाल से उमड़ते घुमड़ते बादल और बरसात ने इस पर्यटन स्थल की रौनक को चार चाँद लगा दिए थे .

बरसात में जलमहल का नजारा

बारिश में भीगते भुट्टे खाते लोंग जश्न मनाते नजर आये . पानी के निकास की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत ज्यादा बारिश नहीं होने के बावजूद सड़कों पर नहर बन जाने जैसे हालात को देखते हुए वहीं से वापस लौट आना पड़ा . रास्ते में जयपुर नगर निगम का बोर्ड और उनके शहर को विश्वस्तरीय बनाने की प्रक्रिया का दर्शन कर
लौटे ..
जयपुर विकास प्राधिकरण का आश्वासन


जरा सी बारिश में जो हुए शहर के हालात ...
इस तरह बनेगा हमारा शहर विश्वस्तरीय !
मगर इन्हें नहीं है किसी से कोई शिकायत ....

हवामहल को भी देखा भीगते हुए

झमाझम बारिश के बीच संपत की नमकीन और आलू- प्याज कचौरी का स्वाद लेते हुए लौटे घर तो हमारे इलाके में एक बूँद पानी की नहीं ...कॉलोनी में गाडी को बारिश से भीगे देखते लोग आश्चर्यचकित हुए , कहाँ हो गयी इतनी बारिश ...बच्चे अलग भुनभुनाते रहे " यहाँ इतने पेड़ पौधे लगाने की जरुरत ही क्या है , जब बारिश ना हो तो "
रोज शहर के विभिन्न इलाकों में अच्छी बारिश के समाचार मिल रहे हैं और यहाँ बस बादल गरजते बरसते पानी की कुछ बूँदें बरसाकर चले जाते हैं ...
जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल याद आ रही है ...
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने , किस राह से बचना है , किस छत को भिगोना है ...
वाकई बादल दीवाने ही हो गए हैं ...


सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग को भी अपनी झमाझम टिप्पणियों से मुक्ति दे दी जाये ...ज्यादा नहीं ,बस कुछ ही दिन रह लीजिये हमारी टीका टिप्पणी के बिना भी !


गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें !