बुआ आ गयी .दीदी को नही लाई कहती हुई कविता से लिपट गयी।
हाँ .बेटा . मैं तो इधर मार्केट आयी थी . सोचा तुम लोगों से मिलती चलूँ . मम्मी और दादी कहाँ है !
दोनों भतीजियों को साथ लिए कविता ड्राइंग रूम में कदम रख चुकी थी ।
किचन में बर्तनों की खडखडाहट कुछ समय के लिए रुक गयी. हाथ पोंछते हुए माँ भी ड्राइंग रूम तक पहुँच गयी थी .
किचन में बर्तनों की खडखडाहट कुछ समय के लिए रुक गयी. हाथ पोंछते हुए माँ भी ड्राइंग रूम तक पहुँच गयी थी .
आज अचानक कैसे ....कविता को पास बैठाते हुए माँ बोली .
बस ऐसे ही तुम लोगों की बहुत याद आ रही थी . भाभी कहाँ है !
वो अपने कमरे में दो बच्चियों को पढ़ा रही है. अपनी महरी की बेटियाँ हैं. वो किसी मार्केटिंग वाली कंपनी का टास्क जो पूरा करना है.
वाह . यह तो बहुत बढ़िया काम है . काम भी और समाज सेवा भी .
हाँ ..वह तो है . तू बैठ मैं जरा दो बर्तन सलटा दूँ ..चाय बनाती हूँ . कुछ अनमनी सी माँ बोली!
नही माँ रहने दो . अभी मार्केट में जूस पी लिया था .
लाओ बर्तन मैं करा दूँ .
नही बेटा मैं कर लूंगी . तू थोडी देर के लिए ही तो आई है ...बैठ आराम से .
और बच्चा पार्टी तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है ...इस एक्जाम के बाद रिपोर्ट कार्ड आ गया क्या ..दिखाना मुझे .
नही बुआ ....रिजल्ट तो आ गया पर रिपोर्ट कार्ड लेने कोई गया ही नही ...पैरेंट्स के हस्ताक्षर के बिना देते नही है और पापा मम्मी को फुरसत ही नही मिली !
कोई बात नही . अब ले आयेंगे . क्या परसेंटेज रही !
अरे पढ़ती कहाँ है दोनों . बहुत ख़राब मार्क्स आए हैं .
बीच में ही बच्चों की दादी बोल पड़ी .
बुआ . ट्यूशन वाले सर पढाते हैं . कुछ समझ ही नही आता दुबारा पूछो तो डांटने लग जाते हैं !
आज के लिए इतना बहुत है ...अब कल पढ़ना !
बोलती हुई भाभी महरी की बच्चियों के साथ बाहर आ गई .
अरे कविताजी . आप कब आयी . मुझे तो पता ही नही चला और तुम दोनों कब से खेल रही हो ...जाओ अपने कमरे में पढो
मम्मी , ये सवाल समझ नही आ रहा जरा समझा दो इसे !
अभी थोडी देर फुरसत मिली है मुझे . तुम्हारे ट्यूशन सर से पूछ लेना .जाओ मुझे तंग मत करो
रुआंसी सी दोनों बच्चियां अपने कमरे में चली गयी .
कविता वापसी में सारे रास्ते रुआंसी भतीजियों और माँ के मलिन चेहरे के बीच भाभी की समाजसेवा के औचित्य के बारे में ही सोचती रही ...
यह कैसी समाजसेवा !!