समंदर इतना खारा क्यों है ??
एक छोटी लड़की जब कभी ख़ुद को तनहा उदास महसूस करती ...घर से सटे बागीचे के कोने में जा बैठती ...की..उसकी आँखों में छिपा समन्दर उसके सामने लहलहा उठता ...दोनों कोहनियों पर सर झुकाए ...समंदर की लहरे ऊँची उठकर कभी उसकी लटों से खेलती ...कि कभी उसके कदमों के तले सरसराहट करते निकल जाती ...छोटी लड़की का विषाद घुलता जाता ...वह मुस्कुराने लगती ..समंदर भी उसे मुस्कुराता देख और हिलोरें खाता और उसकी लहरे जैसे नृत्य करते उसे अपनी फुहारों से भिगो देती ...एक दिन उसकी लहरों कि कुछ बूँदें उसके मुख में खराश भर गयी...लड़की नाराज हो गयी...रूठकर समन्दर के किनारे पड़ी ऊँची शिलाओं पर जा बैठी...समंदर इतना खारा क्यों है....?? समंदर कुछ न कहता ...बस अपनी अठखेलिया करता रहता ...शिलाओं के किनारे ही टकराकर लहरों को लौट जाते देख ...समंदर की बेबसी पर वह छोटी लड़की तालिया बजाकर खूब हंसती...!!
एक दिन फिर वह छोटी लड़की इसी तरह अपनी उदासिओं में गुम समंदर के किनारे आ बैठी ...आज तो समंदर इतना शांत था...कोई लहर उठकर नही आयी उसे भिगोने ...छोटी लड़की ख़ुद को और तनहा महसूस करने लगी ...आँखें भर ना आए कहीं ...पलकों को भींचे बैठी रही ....तभी कुछ खारा सा स्वाद उसके लबों से पर जा ठहरा ...यह तो समन्दर सा खारा ही है ...ऑंखें खोला तो देखा ...उसकी आँखों से आँसू झरकर मुख पर बिखर रहे थे ...मुस्कुरा उठी वह....आज जान चुकी थी.... समंदर इतना खारा क्यों है ...??
आज सभी ने समंदर के खारेपन का यह राज़ जान लिया है ...
समंदर ने कितनों के आंसुओं को ख़ुद में जो छिपा लिया है ....!!
गुरुवार, 16 जुलाई 2009
सोमवार, 15 जून 2009
तुम्हारी ऑंखें
मेरी सूरत की पहचान तुम्हारी ऑंखें
मेरे दिल की निगेहबान तुम्हारी ऑंखें
जो राज़ कह न सके लबों से
वो हर राज़ उगल गयी तुम्हारी ऑंखें
सुना है हमसे नाराज़ हो
यकीन होता तो क्यों कर
तुम्हारे दिल में हमारी मूरत
दिखा गयी तुम्हारी ऑंखें
हर सुबह हमें जगा कर गयी
हर शब् हमें रुला कर गयी
उभरे अश्क अपनी आँखों में
क्या तरल हुई तुम्हारी ऑंखें?
कश्ती टूटी पर पार कर ही आए
ग़मों की वो बहती दरिया
सहारा था तुम्हारा हमें
साहिल थी तुम्हारी ऑंखें
जिनमे संभलकर डूबे हम
जिनमे खोकर संभले हम
प्यार से प्यार जताती
हैं..सनम तुम्हारी ऑंखें
अपनी जुदाई का अफ़सोस क्या
अपने में समाये हैं तुम्हारी ऑंखें
हम किसी राह भी हो आयें
मंजिल है....तुम्हारी ऑंखें
मेरे दिल की निगेहबान तुम्हारी ऑंखें

जो राज़ कह न सके लबों से
वो हर राज़ उगल गयी तुम्हारी ऑंखें
सुना है हमसे नाराज़ हो
यकीन होता तो क्यों कर
तुम्हारे दिल में हमारी मूरत
दिखा गयी तुम्हारी ऑंखें
हर सुबह हमें जगा कर गयी
हर शब् हमें रुला कर गयी
उभरे अश्क अपनी आँखों में
क्या तरल हुई तुम्हारी ऑंखें?
कश्ती टूटी पर पार कर ही आए
ग़मों की वो बहती दरिया
सहारा था तुम्हारा हमें
साहिल थी तुम्हारी ऑंखें
जिनमे संभलकर डूबे हम
जिनमे खोकर संभले हम
प्यार से प्यार जताती
हैं..सनम तुम्हारी ऑंखें
अपनी जुदाई का अफ़सोस क्या
अपने में समाये हैं तुम्हारी ऑंखें
हम किसी राह भी हो आयें
मंजिल है....तुम्हारी ऑंखें
गुरुवार, 11 जून 2009
चंद अल्फाज़
दोस्त दुश्मन में फर्क न कर सकें
ऐसे नादाँ भी हम नहीं
दोस्त छुप कर वार किया करते हैं
दुश्मन कलेजा चाक कर देगा ...ग़म नहीं
उस दिन मुंह फेर कर गया जब वो उदास लम्हा
मैं देर तक सोचती रही तन्हा...
लोग हंस कर मिलते हैं कलेजा छिल कर रख देते हैं
वोह तंज़ भी करता था तो मुस्कुराहटें भर देता था ...
ऐसे नादाँ भी हम नहीं
दोस्त छुप कर वार किया करते हैं
दुश्मन कलेजा चाक कर देगा ...ग़म नहीं
उस दिन मुंह फेर कर गया जब वो उदास लम्हा
मैं देर तक सोचती रही तन्हा...
लोग हंस कर मिलते हैं कलेजा छिल कर रख देते हैं
वोह तंज़ भी करता था तो मुस्कुराहटें भर देता था ...
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