सोमवार, 30 नवंबर 2009

मेरी बात ...खालिस गृहिणी वाली

इधर कुछ दिनों से सपने में एक महिला बार बार नजर आ जाती है ...चमचा बेलन हाथ में लिए अपनी लाल लाल आँखों से घूरते उलाहने देती हुई - " बड़ा प्रचार कर रखा है अपना साधारण गृहिणी होने का ...कभी की है गृहिणी वाली कोई बात ...जब देखो ...गीत ,ग़ज़ल, संस्मरण , कथा कहानी ......" सपने में उस चेहरे को पहचानने की कोशिश करती हूँ तो नींद उचट जाती है ...अब वो फिर से सपनो में आकर अपनी लाल पीली आँखों से डराए ...उससे पहले ही कर लेती हूँ खालिस गृहिणी वाली बात .............

गृहिणियों या गृह्स्वामिनियों के सामने फिलहाल जो आतंककारी मसला है ...वह है महंगाई ....इस महंगाई ने घर का पूरा बजट बिगाड़ कर रख दिया है ...जहाँ दालें , अनाज , चीनी आदि के दाम असमान छू रहे हैं, वहीं सरस डेयरी ने दूध के दामों में फिर से बढ़ोतरी कर दी है ...महंगाई तो सच ही सुरसा का मुंह बाए खड़ी है ...मगर गृहणियां भी आसान उपायों और प्रयोगों द्वारा इसका मुकाबला करने को कमर कस कर तैयार है ...अब सरकार पर तो कुछ असर हो नही रहा ...तो और उपाय भी क्या है ....वही बात फिर से सामंजस्य की ...महंगाई से सामंजस्य करने में अपना मारवाड़ी होना और विभिन्न प्रदेशों में हुई अपनी परवरिश बहुत मददगार साबित होती है ...
मारवाड़ियों के लिए तो यूँ भी कहा जाता है की " जहाँ ना पहुच रवि ..वहां पहुंचे मारवाड़ी " ...और इस युक्ति को सार्थक करते हुए हमारे सम्बन्धी आसाम से लेकर विशाखापत्तनम तक के क्षेत्र तक बसे हुए हैं ....पिता का पैतृक आवास और मेरा जन्मस्थल आँध्रप्रदेश है और पिता का कर्मस्थल बिहार रहा है ...और राजस्थानी तो हम हैं ही ...हमारा पूरा परिवार प्रांतीय भाईचारे का जबरदस्त उदहारण कहा जा सकता है ...एक भाभी आंध्र के मिर्च के लिए मशहूर कसबे से है तो दूसरी पक्की जयपुरिया ...चाचियाँ और मामियां मुंबई , गुजरात और महाराष्ट्र से हैं ...और हमारा बचपन ददिहाल और ननिहाल दोनों के ही संयुक्त परिवार में गुजरा है ...ईश्वर की कृपा से सभी के सभी ऐसे सेहतमंद ... कि पारिवारिक कार्यक्रम में इकठ्ठा होने पर हमारी सेहत को लेकर उनकी चिंता और सवाल से हम स्वयं को टी बी का अघोषित मरीज मान बैठते हैं ....और इनके कमर के घेरों का विस्तार यूँ ही नहीं है ...घर के सभी पुरूष खाने के जबरदस्त शौक़ीन और घर से बाहर खाना इतना पसंद नहीं...अब चूँकि सेहतमंद पुरुषों के दिल का रास्ता यक़ीनन उनके पेट से ही होकर जाता है ...इसीलिए घर की सारी महिलायें खाना बनाने में निपुण भी हैं ...अब बनायेंगी इतने शौक से तो क्या खायेंगी नहीं...लिहाजा सभी अच्छी खासी है ....पाक कला में उनकी निपुणता के कारण ही इडली, डोसा,बड़ा जैसे दक्षिण भारतीय भोजन से लेकर गुजराती ढोकला , महाराष्ट्रियन पीठ्ला , पूरण पोली आदि का स्वाद हमें एक साथ घर में ही मिलता रहा और ये अनुभव महंगाई से लड़ने में ...कम से कम खाना बनाने के मामले में ...बहुत काम आते हैं ..

महंगाई से इस सामंजस्य या लडाई में मुझे अपना राजस्थानी या मारवाड़ी होना बहुत लुभाता है ...राजस्थान की शुष्क जलवायु और रेतीली जमीन में पानी की कमी का मुकाबला यहाँ के निवासी बड़ी जीवटता से करते रहे हैं ...रूखे सूखे वातावरण और हरियाली की कमी को अपने रंग बिरंगे वस्त्रों से सजाकर प्रकृति को भी धता बताते रहे हैं ....
सबसे पहले दाल पर ही आ जाए ...महंगाई की मार में सबसे ज्यादा चर्चित ...हालाँकि उत्तर और दक्षिण भारत की तरह दाल चावल यहाँ का मुख्य भोजन नही है.... लेकिन दाल बाटी राजस्थान के भोज का मुख्य अंग होता है ...जिसमे सिर्फ़ तुअर या अरहर के दाल का प्रयोग नही होता ...बल्कि कम से कम पांच तरह की दालों को मिलाकर इसे बनाया जाता है ...इसमे दालों की कीमत के हिसाब से उनका प्रतिशत कम ज्यादा कर कीमत को संतुलित किया जा सकता है ...
श्रीवैष्णव होने के कारण हमारे घरों में शुरू से प्याज लहसुन का प्रयोग नही किया जाता रहा इसलिए ये भी हमारे भोजन के प्रमुख अंग नही है ...बिहार में हमारे परिचितों के लिए प्याज लहसुन के बिना स्वादिष्ट खाना बनाया जाना विश्व के सात अजूबों से कम नही होता था ...अब इनकी कीमत ५० रुपये किलो होने पर जहाँ सारी दुनिया त्राहि त्राहि करती है हमारी रसोई पर इसका विशेष असर नही होता ...
पापड़ , मंगोड़ी , कैर , सांगरी , मेथी , काचरी , फलियाँ आदि सूखी सब्जियों का जमा स्टॉक के साथ ही बेसन से बनाई जाने वाली सब्जियां.. कढ़ी , गट्टे ,बूंदी का रायता, आसानी से गमलों में उगाया जाने वाला पौष्टिक गंवारपाठा जैसी सब्जिया ताजा सब्जियों के बढे दामों को संतुलित करने में बहुत सहायक होते है ...वही बाजरे या मक्के के आटे को पानी या छाछ में घोल कर धीमी आंच पर देर तक पका कर बनाई गई राबड़ी , गेहूं,बाजरे और मक्के का दलिया , भी अपने आप में सम्पूर्ण भोजन है । सर्दियों में इसका सेवन गरम रहते ही और गर्मियों में इसे ठंडा कर छाछ या दही के साथ प्रयोग में लाकर हम बड़े मजे से महंगाई से दो दो हाथ कर लेते हैं ।

सर्दियों में गैस और कैरोसिन की किल्लत आमतौर पर गृहिणियों के लिए भारी मुसीबत होती है ...मगर भूसी की सिगड़ी , कोयले की सिगड़ी ,चूल्हा आदि का प्रयोग कर सकने में सक्षम होने के कारण ये कमी भी मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित नही कर पाती है ....

इस सारी गपशप का मतलब इतना सा है गृहिणियों को महंगाई का भजन गाते रहने की बजाय उनका सामना करने के लिए अपने आपको तत्पर करना होगा ...इस मामले में हमारे देश की विभिन्नता में एकता वाली युक्ति बहुत काम आ सकती है ....
और भी बहुत से गृह स्वामी और गृह स्वामिनियां होंगी जो अपने तरीके से महंगाई का सामना करती रही होंगी ...यदि अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर देंगी ...तो इस महंगाई को जी भर का चिढ़ा पाये ....!!

लिख तो दिया है ...अब इसे पढ़ेगा कौन ...ब्लॉग पर जो गृहिणियां है ...वे तो यूँ भी परिचित होंगी ...जो कुंवारे पुरूष हैं वो क्यों पढेंगे ...और जो शादीशुदा है ...अपनी गृहिणियों से ही अघाए होंगे ...अब जो हो सो हो ...सपने में आने वाली उस महिला का सामना करने के लिए एक ऎसी प्रविष्टि की बहुत आवश्यकता थी ...शायद अब ले सकू चैन की नींद ....

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गुरुवार, 26 नवंबर 2009

मेरी बात ...................

पिछले कुछ दिनों से नारियों की बड़ी गहमा गहमी रही ब्लॉग जगत में ...पूरी तरह से नारियों का धमाल ....नारियों का या नारी सम्बंधित विषयों का ....आँचल , पायल , चूड़ी , सब खनक लिए भरपूर ....

मुख्य मुद्दा रहा वस्त्रों के चयन को लेकर ....आज जहाँ नारियां अन्तरिक्ष में कदम रख चुकी है ...इन पर बहुत ज्यादा दिमाग खपाना बेमानी सा ही लगता है ....जींस, पैंट, स्कर्ट आदि वस्त्र अब भारतीय समाज में सहज स्वीकार्य हो गए है ...हालाँकि पूर्ण भारतीय वस्त्र साड़ी अपनी दौड़ में कही पिछड़ी नही है ...इसमे कोई शक नही की साड़ी में भारतीय नारी अपनी पूरी गरिमा से सुशोभित होती है और साड़ी पूरे विश्व में हमारी संस्कृति की एक प्रमुख पहचान रही है ...मगर जिस तरह से समाज में जागरूकता और नारियों की सहभागिता बढ़ी है ....साड़ी का स्थान अन्य विकल्पों ने ले लिया है ....इसमे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ...? आपत्ति का कारण महज मर्यादाविहीन वस्त्रों का होना ही हो सकता है ....हालांकि मुझ जैसी बहुत सी महिलाएं साड़ी में अपने आपको असहज महसूस नही करती ...मगर जिनके लिए यह सुविधाजनक नही है ...कार्यस्थल और व्यवसाय के अनुरूप अन्य वस्त्रों का चयन अनुचित तो नही कहा जा सकता है ....बात इतनी सी है की ...चूँकि वस्त्र शरीर ढकने के लिए होते है ...उनका उपयोग इसी उद्देश्य से किया जाए ....ऐसे वस्त्रों का चयन हो जिसमे ना तो स्त्रियाँ और ना ही पुरूष अपने आपको असहज महसूस करे ....चूड़ी , पायल , बिंदी आदि स्त्रियों के लिए बाधक नही रही हैं ...और अब तो इनको लेकर कोई पूर्वाग्रह नही रह गए हैं ...अपनी सुविधा के हिसाब से इनका उपयोग किया जाता है ....
वहीं यह भी एक सच्चाई है कि पूरी तरह से गरिमामय वस्त्रोंऔर आभूषणों से सुसज्जित स्त्रियाँ भी प्रताड़ना का शिकार होती रही है ...ज्यादातर प्रताड़ना का कारण उनका स्त्री होना ही होता है ....उनके वस्त्र आदि नही ...

अब बात आती है अधिकार और कर्तव्य की ....हम देखते ही है ...दिन प्रतिदिन ...देश की जो हालत बिगडती जा रही है ....ज्यादा से ज्यादा नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक है ....कर्तव्यों के प्रति नही ....यदि संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं तो कर्तव्यों के लिए भी स्पष्ट दिशा निर्देश दिए गए हैं .... परिवार और समाज में पुरुषों की ही तरह नारी को अधिकार प्राप्त हैं ....लेकिन अपनी प्रत्येक बात मनवाने के लिए अधिकार का झंडा हाथ में उठाकर चलना ना तो पुरुषों के हित में है ...ना ही नारियों के ...अधिकार हैं तो कर्तव्य भी ....
प्रकृति ने माँ बनने का गौरवमय अधिकार सिर्फ़ नारी को दिया है ...इस लिहाज़ से उसे कुछ विशेष अधिकार प्राप्त हैं तो उसके साथ कर्तव्य भी ....अधिकारों की रक्षा करते हुए अपने कर्तव्यों को ना भूले ....
अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम सिर्फ़ विरोध करने के लिए विरोध करे ...या उनके परिणामों और दुष्प्रभावों पर पूरी तरह विचार करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ...प्यार और सम्मान युक्त अधिकार प्राप्त करे .....
स्त्रियों की सुरक्षा और सम्मान को बनाये रखने के लिए बहुत से कानून बनाये गए हैं ....मगर आस पास नजर डाले तो इन कानूनों का दुरूपयोग ही ज्यादा किया जा रहा है ....कानून का उपयोग ज्यादातर अपनी गैरजरूरी मांगों को मनवाने में किया जा रहा है .... कुछ पुरुषों के बुरे स्वभाव का दंड पूरे पुरूष समाज को तो नही दिया जा सकता .....यदि स्त्री माँ, बहन, बेटी बहू है... तो पुरूष भी पिता, भाई, पुत्र है ....भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता उन्हें भी उतनी ही है जितनी कि हम नारियों को ....देश और समाज के निर्माण में अपना योगदान हम उनके साथ चलते हुए उनके क़दमों से कदम मिला कर भी दे सकते हैं ....
कई शोधों में साबित हो चुका है कि ...बच्चों के साथ उनकी माँ का होना उन्हें भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है ...जो उनके सुंदर और दृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होता है ....विदेशों में जहाँ पुरूष और स्त्री समानता का बिगुल बजाया जा चुका है ...वहां भी अब यह महसूस किया जा रहा है ....
स्त्रियाँ अपने करियर को प्राथमिकता दे रही है ...उन्हें पूरा हक़ है ...लेकिन जो अपनी मर्जी से या अपने परिवारजनों की मर्जी से अपना घर संभाल रही है ...उन्हें प्रताड़ित या दोयम दर्जे का ही क्यों समझा जाए ....

और एक बात है सामंजस्य की ...कहाँ सामंजस्य नही करना होता है ...वर्षा कम हुई ...धूप ज्यादा है ....भयकर सर्दी ...क्या प्रकृति से सामंजस्य नही करेंगे ....!!
घर से बाहर बस की लाइन में , पार्किंग में , बाजार से सामान खरीदने में , चिकित्सा में , शिक्षा में ...कहाँ कहाँ सामंजस्य नही कर रहे है हम ..अनजान लोगों से ...तो फिर अगर थोड़ा सा सामंजस्य उन लोगो के साथ हो ...जिनसे हमारी जिन्दगी जुड़ी है ...जिनसे हम भावनात्मक रूप से जुड़े हैं , पूरी जिन्दगी जिनके साथ जीने का संकल्प लिया है ...क्या बुरा है ....!!


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रविवार, 22 नवंबर 2009

तुम याद आए ...बहुत याद आए



तुम्हारा
हाथ हाथ में लिए
नहर के किनारे
सरसों के खेतों की पगडंडियों पर
गुनगुनी धूप में
देर तक चलते
दूर जाती ट्रेन की आवाज से पलटते
आबादी से दूर पाकर ख़ुद को
भाग कर हांफते हुए लौटते
कितने गीतों के मुखड़े साथ गुनगुनाये
आज वे गीत जब किसी ने गाये
तुम याद आए.....
बहुत याद आए .......