गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरे घर की खुली खिड़की से .....



मेरे घर की खुली खिड़की से
अलसुबह
जगाता है मुझे
चिड़ियों का कलरव गान.....

ठिठोली कर जाती है
रवि की प्रथम किरण
अंगडाई लेते कई बार.....



पूरनमासी का चाँद भी
झेंपता हुआ सा
झांक लेता है बार -बार....

झर-झर झरते पीले फूल
देते हैं दस्तक
खिडकियों पर कई बार.....



मीठी तान छेड़ जाती है
मदमस्त हवा
चिलमन से लिपटकर बार-बा....

खिडकियों से ही नजर आती है
कुछ दूर ...बंद खिड़कियाँ ..
हवेली की ऊँची दीवार......


सुबह-शाम
देख कर उन्हें
सोचती हूँ
कई बार ....

ऊँचे जिनके मकान होते हैं
छोटे कितने उनके आसमान होते हैं ....



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वसंत आया मेरे घर की छोटी सी बगिया में ....



















शनिवार, 16 जनवरी 2010

दुष्टों की चारित्रिक विशेषताएं ..... ..(बालकाण्ड)

पिछले दिनों नजदीकी सम्बन्धी का ऑपरेशन , पिता की पुण्यतिथि और मकर संक्रांति के कारण कुछ व्यस्तता रही ...कभी कभी व्यस्तता मन मस्तिष्क में सुन्नता , खिन्नता या जड़ता उत्पन्न कर देती हैं ....ना ज्यादा कुछ पढ़ा ...ना टिप्पणी ही की ...संक्रांति की रिपोर्ट धरी की धरी रह गयी ...मगर आज प्रण लिया है ...बस ...यह अनमनापन और नहीं ....

आज कुछ लिखना ही है....कुछ पन्ने संभालती हूँ ...पिछले दिनों एक कविता लिखी थी ...वह पन्ना कही खो गया है शायद ...अब फिर से वही सब कैसे लिखा जाएगा ...देखेंगे ...

कुछ पन्ने और हाथ लगे ....ये तो बाल काण्ड की कुछ सूक्तियां हैं ....याद आया .......यूँ तो पहले भी बहुत बार पढ़ा था ...मगर इस बार कुछ खास पंक्तियाँ नोट कर ली थी ...वही लिख देती हूँ ...मन अशांत हो तो अपने आराध्य से बढ़कर कौन ...अब चाहे कुछ लोगों के लिए ईश्वर कपोल कल्पित कल्पना ही हो ....मगर मैं इसे मनोवैज्ञानिक उपचार की तरह ही लेती हूँ ....जब मन बहुत अशांत हो तब कुछ देर आँखे बंद कर अपने आराध्य का ध्यान सचमुच बहुत सुकून देता है ....

बालकाण्ड से कुछ दोहे (सूक्तियां )...इन सूक्तियों में तुलसीदास जी ने दुष्टों के स्वभाव का वर्णन किया है ...

उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीती
जानि पानी जुग जोरी जन बिनती करही सप्रीती

दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित सुनकर जलते हैं , यह जानकार शठ जन उन्हें प्रेमपूर्वक विनय करता है ....

मैं अपनी दिसी किन्ही निहोरा तिन्ह निज ओर लाउब भोरा
बायस पली अहिं अति अनुरागा होहिं निरामिष कबहूँ कि कागा

मैंने अपनी ओर से विनती की है , परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चुकेंगेकौवों को कितना भी प्रेम से पालिए परन्तु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं ......

बहुरि बंदी खल गन सतिभाएँ जे बिनु काज वाहिनेहू बाएं
पर हित हानि लाभ जिन्ह करें उजरे हर्ष बिषाद बसेरे

अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ कि जो बिना ही प्रयोजन अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैंदूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है , जिनको दूसरों के उजड़ने में ही हर्ष और बसने में विषाद होता है ....

खल परिहास होई हित मोरा काक कहहीं कलकंठ कठोरा
हँसहिं बक दादुर चातकहिं हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही

दुष्टों के हंसने से मेरा हित ही होगामधुर कंठ वाली कोयल को कौवे कठोर ही कहा करते हैं जैसे बगुले हंस को , मेंढक पपीहे को हँसते हैं , वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट निर्मल वाणी को हँसते हैं ......


हालाँकि दुष्टों की चारित्रिक विशेषता प्रदर्शित करते दोहे और सूक्तियां और भी हैं ...मगर अभी बस इतना ही ... पूरी कोशिश की है वर्तनियों में कोई अशुद्धि ना रहे , यदि फिर भी रह गयी हो तो क्षमा करते हुए कृपया इस ओर ध्यान आकृष्ट करायेंं ....

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

टिप्पणी करना और टिप्पणी पाने की चाह रखना क्या सचमुच इतना बुरा है .....!!



किसी भी पोस्ट को पढने के बाद मन में जो भी विचार उठते हैं , उनका सम्प्रेषण ही टिप्पणी है ....कलम के धनी साहित्यकारों और इस आभासी दुनिया से दूर काफी नाम कमा चुके लेखकों और लेखिकाओं को टिप्पणी मिलने या नहीं मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता ...मगर जिन्होंने ब्लॉग के माध्यम से ही अपने आप को अभिव्यक्त करना सीखा हो तो लिखने के बाद उसकी प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता रहती ही है ...टिप्पणी से प्राप्त विचारों और सुझावों से अपनी सोच को और व्यापक करने का तथा लेखन में सुधार लाने का हौसला मिलता है...

मैं ज्यादा दूर क्यों जाऊं ...अपना ही उदाहरण पेश ना कर दूँ !

अख़बारों में पढ़ा था कि गूगल ब्लॉग लेखन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कर रहा है ....तो बस ऐसे ही पहुच गयी एक दिन ब्लॉगर.कॉम पर ...सोचा ब्लॉग बना कर देखते हैं...महज कौतुकवश ही...कई दिन बीत गए उसमे यूँ ही सुधार करते ...इस बीच दूसरों के ब्लॉग पढ़ती रही ...मगर लम्बे समय तक साहस ही नहीं हुआ कि उनपर कमेन्ट कर सकूँ ...यूँ तो पढने लिखने का शौक बहुत पुराना था मगर लेखन सिर्फ डायरी तक ही सीमित था ...या बच्चों के विद्यालय में होने वाले वाद विवाद और निबंध प्रतियोगिता में उनकी मदद करते हुए लिखने तक ...२-३ साल तक एक पत्रिका के लिए हल्का- फुल्का सम्पादकीय भी लिखा था, मगर इधर कुछ वर्षों से लिखना बिलकुल बंद सा हो गया था ...अपनी लिखी कवितायेँ आदि अपने एकाध खास मित्रों के अलावा किसी से कभी शेयर नहीं की थी ...एक दिन ब्लॉग पर कुछ लाईंस लिख ही डाली ...और लिख कर भूल गयी ...२-३ बाद अचानक देखा तो इतनी सारी टिप्पणी और स्वागत सन्देश ... और लिखने का हौसला मिला....फिर धीरे धीरे फोलोअर्स बनते गए और टिप्पणीयां भी ....जिनमे अक्सर लेखन और ब्लॉग सम्बन्धी सुझाव मिलते रहे ....और इन टिप्पणी का ही असर है कि एक साधारण गृहिणी की जिंदगी जीते पहली बार किसी अखबार में अपनी लिखी कविता भेजने का साहस कर पायी ...तो मेरे लिए तो ये टिप्पणियां किसी वरदान से कम नहीं है ..क्या अब भी आप कहेंगे कि टिप्पणी देने के लिए ही टिप्पणी करना सही नहीं है ...कौन जाने ये टिप्पणी कितनी छुपी हुई प्रतिभाओं प्रोत्साहित कर सामने आने का मौका और हौसला प्रदान कर दे ...इसलिए टिप्पणी तो जरुर की जानी चाहिए ...भले बिना पढ़े की जाए ....मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती ...!!

अब कई बार किसी सार्थक बहस के बीच भी हास्य उपजता ही है ....ये जरुर है कि कई लोग उसे व्यक्त नहीं करते और अपनी गंभीरता प्रकट करते हुए टिप्पणी  कर देते हैं और कई हास्य प्रधान लोग इस पर चुटकी लेने से बाज नहीं आते ...क्या सार्थक और गंभीर विषय रोते धोते या दार्शनिकता से ही उठाये और निपटाए जा सकते हैं ....!!

हंसी आपको कब कहाँ और कैसे आ जायेगी ...यह कोई निश्चित नहीं है ...यदि हो तो मशीनीकरण होते हुए इसका वास्तविक आनंद ही समाप्त हो जाएगा ... सड़क पर चलते हुए कोई अचानक किसी से टकराकर गिर जाए , कोई सभ्य इंसान सूट-बूट में सज धज कर जा रहो और उसके कपड़ों या सर पर या कौवा बींट कर दे , राह चलते किसी के कपडे कही अटक कर फट जाए , क्या ऐसे मौके पर बहुधा हंसी नहीं आ जाती है ...और कई बार तो शिकार व्यक्ति खुद भी हंस पड़ता है.

 नियम के अनुसार तो ये तो बहुत गंभीर बात है कोई बेचारा सड़क पर गिरा पड़ा और आप हंस रहे हो .  कौवे ने किसी की दुर्गति कर दे आप फिर भी हंस रहे हो ....मगर क्यूंकि हास्य तनाव और परेशानी से निजात दिलाने की एक प्रमुख क्रिया है ...मौके बेमौके गंभीर बातों पर हंसी आ जाती है और आप सामान्य होकर परेशानी से निजात पाने का तरीका ढूँढने लग जाते हो ...क्या हास्य वाकई इतनी ज्यादा आलोचना किये जाने योग्य है....
जीवन में हास्य ...यहाँ देख सकते हैं कि अवसाद से मुक्ति पाने के लिए जीवन में हास्य चिकित्सा का रूप ले चुका है ...

ब्लॉग लेखन करते , पढ़ते और उन पर टिप्पणी करते हुए ब्लोगर्स के बीच एक रिश्ता सा बन जाता है ....इसी कारण उनके बीच अनौपचारिकता कायम हो जाती है ...ऐसे में कई बार गंभीर अथवा सार्थक लेखों पर भी हलकी फुलकी हास्यात्मक टिप्पणी आ ही जाती है ...जब तक इस तरह की हास्यात्मक टिप्पणी किसी को लक्ष्य बना कर ना की जाये...मुझे नहीं लगता कि यह कोई आपत्तिजनक कार्य है ......बिलकुल नहीं ...बस यह ध्यान रहे कि कोई हमारे मजाक से परेशान , दुखी या लज्जित ना महसूस करे ....

तो बंधु , बांधव , सखा , सखियों ...जी खोल कर टिपियायें...हंस हंस कर टिपियायें ....बिना पढ़े टिपियायें , चाहे जैसे टिपियायें ...मगर टिपियायें जरुर ...!!