गुरुवार, 22 जुलाई 2010

आखिर यह भी तो हमारे देवी -देवताओं का अपमान ही है ...!

कल का दिन प्रसाद के नाम रहा ...कोई -कोई दिन ऐसा हो जाता है ...4-5 पड़ोसिनें  अलग-अलग कारणों से मिठाई व प्रसाद /लावणे (शादी ब्याह या अन्य शुभ अवसरों पर बांटे जानी वाली मिठाई या प्रसाद ) के रूप में लेकर आई ...कहाँ तो पूरा महिना सूखा जाता है मुफ्त की मिठाई खाने में और कहाँ एक दिन में इतनी सारी ...कोई बेसन के लड्डू लेकर आई थी तो कोई बालूशाही /बूंदी के लड्डू , कोई वैष्णो देवी यात्रा से लौटकर प्रसाद वितरण कर रहा था तो किसी की अमरनाथ यात्रा सफल हो गयी थी ...किसी ने अपने घर में विवाह की ख़ुशी में मिठाई बांटी ...
अब इतने मुफ्तखोर हम भी नहीं है ...हम भी किसी तीर्थ यात्रा या किसी विवाह समारोह से लौटने पर इसी तरह मिठाई व प्रसाद बांटते हैं .....मगर कोशिश यही करते हैं कि प्रसाद के साथ तस्वीरें अनावश्यक रूप से ना दी जाएँ ..

शादी -व्याह की मिठाई तक तो ठीक ही था मामला ...मगर अमरनाथ और वैष्णोदेवी यात्रा से लौटे श्रद्धालु द्वारा लाये गए प्रसाद के पैकेट में प्रसाद के अलावा देवी- देवताओं की छोटी तस्वीरें भी थी ...आये दिन इस तरह के प्रसाद प्राप्त होते रहते हैं और इनके साथ ईश्वर की असीम कृपा  भरे ये चित्र भी ... किसी शोक सभा में भी इसी तरह श्रद्धांजलि के रूप में सीताराम जी के चित्र दिए गए तो कोई नए वर्ष की शुभकामनाओं के रूप में श्री कृष्ण की तस्वीरें दे गया ...समझ नहीं आता छोटे से पूजा घर में इन तस्वीरों को कैसे एडजस्ट करूँ .... आखिर कितनी तस्वीरें वहां रखी जा सकती हैं ...और यदि इधर उधर कहीं रख दे तो जूठे/ गंदे हाथों द्वारा छुए जाने अथवा   अन्य प्रकार से तस्वीरों के अपमान का भय ...अब शरीफ लोग तो ईश्वर का अपमान करने या होने की कल्पना मात्र से भयभीत हो ही जाते हैं, बाकी लापरवाहों का क्या !

यही समस्या शादी के अवसर पर दिए जाने वाले निमंत्रण पात्रों को लेकर होती है ....लगभग हर निमंत्रण पत्र पर विघ्नविनाशक अपनी पूरी सुन्दरता के साथ मौजूद होते हैं ...अब आखिर कितने कार्ड संभाल कर रखे जा सकते है और वो भी कितनी देर ...?

इतना ही नहीं , घरेलू उपयोग के अन्य सामान अथवा किराने के रैपर , चाबी के छल्ले , अखबार के विज्ञापनों, की होल्डर , आदि में भी अलग- अलग देवी /देवताओं की तस्वीर नजर आ जाती है ...अब इनमे से कितनी चीजें संभाल कर रखी जा सकती हैं ...तुलसी के बिरवा पर भी कितना इकठ्ठा किया जा सकता है  ...मंदिर के अहाते में बने बरगद, पीपल के पेड़ों पर भी आप कितनी तस्वीरें अर्पण कर सकते हैं ...आखिर वहां से भी साफ़ -सफाई के दौरान कूड़ा घर में ही जाती है यह सामग्री भी ...

क्या इस तरह अपने देवी- देवताओं का सार्वजानिक उपयोग कर हम उनका अपमान नहीं कर रहे हैं ...

प्यार और सम्मान तो हम अपने अभिभावकों का भी करते हैं पर क्या उनकी तस्वीरों का इस तरह सार्वजनीकरण कर अपमानित होते देख सकते हैं ?

अपने इष्ट देवों को हम आत्मीय और अभिभावकों से भी ऊँचा दर्ज़ा देते हैं फिर उनका इस तरह अपमान क्यों ?

इस प्रकार हर स्थान पर बेवजह उनकी तस्वीरों का प्रयोग कर हम उनके प्रति सम्मान प्रकट कर रहे हैं या अपमान ...?

क्या हमारे देवी देवताओं के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का और कोई बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है ...

सोच रही हूँ मैं ...आप भी सोचिये ना ...!

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धुन्धलाया सूरज

सुबह सबेरे उगता सूरज कितना प्यारा लगता है ...अंधियारे को चीरता सतरंगी किरणें बिखेरता ...सब कुछ धुला धुला सा , पाक साफ़ सा ..
नहा धो कर पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जाती अर्चना के पैर थम से गए ...पार्क से होकर गुजारने वाले रास्ते पर एक मकान के बाहर महिलाओं का एक झुण्ड खड़ा था ...मेन गेट के पास एक दो महिलाएं मकान मालिक से उलझ रही थी ।उस मकान के निचले हिस्से में एक तरफ ब्यूटी पार्लर बना हुआ था जब कि उसके दूसरे हिस्से में एक जालीदार पार्टीशन के साथ दो किरायेदार रहते थे । सोमवार का दिन होने के कारण मंदिर में भीड़ बढ़ जाने की चिंता में अपनी पूरी उत्सुकता को समेटे अर्चना मंदिर की ओर ही बढ़ ली ...मगर पूजा अर्चन करते समय ध्यान वही अटका रहा। उसकी उत्सुकता का कारण मकान मालिक और किरायदार दोनों से उसका परिचय होना था ...अभी कुछ दिनों पहले ही उसकी सिफारिश पर यह मकान उसकी सहेली को किराये के लिए उपलब्ध हुआ था ..उसकी किस्मत की मारी सहेली के परिवार मालिक में अब वे माँ -बेटी ही बची थी ... महानगर की ओर बढ़ते इस शहर में बढ़ते अपराधों और घटती सुरक्षा के कारण कोई बिना किसी जानपहचान के किरायेदार नहीं रखता । ब्यूटी पार्लर की मालकिन अर्चना की परिचित थी इसलिए थोड़ी ना नुकुर के बाद उसने इन माँ बेटिओं को निचली मंजिल पर एक कमरा किराये पर देने को राजी हुई थी ...अर्चना घर लौटते दुबारा वहां पहुंची तो भीड़ छंट चुकी थी ...दोनों माँ बेटी कुछ सहमी सी अपने कमरे में बैठी थी । उन्होंने जो बताया एक बारगी तो अर्चना के रोंगटे खड़े हो गए ... उसकी सहेली के कमरे से लगे दूसरे कमरे में मकान मालिक के कॉलेज का एक विद्यार्थी रहता था । उन दोनों कमरों के बीच सिर्फ एक जालीदार दरवाजा था जिसे दोनों तरफ परदे लगा कर वे वे अपनी प्राईवेसी बनाये रखे हुए थे . आज दोपहर को जब दोनों माँ बेटी स्कूल से लौट कर आराम कर रही थी की अचानक उस तरफ कैमरे की फ्लैश लाईट और फुसफुसाहट भरी आवाज़ ने उनका ध्यान आकर्षित किया . चूँकि उनके कमरे में अँधेरा था इसलिए दूसरी ओर से उन्हें देखा नहीं जा सकता था ..मगर साथ वाले कमरे में कैमरे की रौशनी के कारन हुए हलके उजाले में अस्पष्ट से दृश्य नजर आ रहे थे जिसे देखखर माँ बेटी दोनों घबरा गयी . चुपचाप धीरे से कमरे से बाहर निकलते उन्हें याद आया की मकान मालकिन तो अपनी जचगी के लिए मायके गयी हुई है . उपरी मंजिल पर अपने कमरे में लेटे मकान मालिक को वे किस तरह उस घटना का ब्यौरा देंगी ..यह सोचकर उनके कदम वहीँ रुक गए ...मगर इस तरह खामोश होकर बैठे रहना उनकी अंतरात्मा को गवारा नहीं था और कुछ भय भी था ...उन्होंने चुपके से पड़ोस के उस कमरे की कुण्डी बाहर से बंद कर दी और दबे पाँव वे पड़ोस के मकान में अपनी परिचित के पास पहुँच गयी और उन्हें पूरी घटना का ब्यौरा दिया . मामले की गंभीरता को देखते हुए उस परिचित ने आस पास की कुछ और महिलाओं को इकठ्ठा किया और वापस उस मकान में पहुच कर तेज स्वर में मकान मालिक को आवाज़ देने लगी . कुछ नाराजगी भरे अंदाज़ में वह व्यक्ति सीढियों से उतर कर उनके पास पहुंचा तो एक महिला ने उसे लताड़ते हुए उस बंद कमरे की कुण्डी खोलने को कहा . हिचकते और खीझते उस व्यक्ति ने जब कमरा खोला तो उसकी ऑंखें फटी रह गयी ...सभी महिलाओं ने उस लड़के को पुलिस में रिपोर्ट की धमकी देते हुए खूब भला बुरा कहा.. घबरा कर वह लड़का पहली और आखिरी गलती का वास्ता देकर उनके हाथ पैर जोड़ने लगा ..उसके साथ की लड़की शायद नशे के प्रभाव में थी ..

दूसरे दिन सुबह दूध की डेयरी के पास उसकी मायूस सहेली मिल गयी ...वह उससे नया कमरा ढूंढ देने की विनती कर रही थी ...पता चला की उसकी मकान मालकिन रात में घर लौट आयी थी ...साथ ही उस लड़के के अभिभावक भी ...उनके बीच क्या मंत्रणा हुई भगवान् जाने ... अब मकान मालिक उसकी सहेली को दो दिन के भीतर घर ख़ाली करने का नोटिस दे चुका था .आँखें मल कर कई बार देखने पर भी अर्चना को आज सूरज धुन्धलाया सा क्यों लग रहा था ...

शनिवार, 19 जून 2010

भागती जिन्दगी से चुराए गर्मी की छुट्टियों के कुछ पल ..

गर्मी की छुट्टियाँ बस समाप्त ही होने को है ...इन छुट्टियों का सबसे ज्यादा इंतजार होता है बेटियों को और उनके नन्हे मुन्नों मुन्नीयों को ...गर्मी की छुट्टी का मतलब नानी के घर जाबा दे ...दूध मलाई खाबा दे ...मोटो हों आब दे (नानी के घर जाने दो , दूध मलाई खाने दो ,मोटे होकर आने दो )...भागमभाग और बढ़ते प्रतियोगी माहौल में परीक्षाओं की तैयारी या अन्य हौबी कक्षाएं आजकल के बच्चों से गर्मी की लम्बी छुट्टियों की बेफिक्री और ननिहाल सुख़ को लीलती जा रही हैं ...और तिस पर मायका यदि एक ही शहर में हो और आपका एकल परिवार मानो करेला ऊपर नीम चढ़ा ...लम्बी लम्बी छुट्टियों की बात तो भूल ही जानी चाहिए ...भूल गए हैं हम भी जब से पिता के देहावसान के बाद माँ अपने संयुक्त परिवार सहित इसी शहर में निवास करने लगी हैं ...लू चलती भरी दुपहरी में खुद की देखभाल के प्रति हद दर्जे के लापरवाह पति को कुछ दिन को भी अकेला छोड़ कर जाना बड़ा मुश्किल होता है ...मगर जब इस बार पतिदेव कुछ दिनों के लिए व्यस्त थे तो मौका देखकर तीन चार दिन मायके जाने का जुगाड़ भिड़ा ही लिया ...
घर गृहस्थी की चिंता माँ के आँचल तले भी अब वैसी बेफिक्री तो नहीं रहने देती ...मगर कुछ पल के लिए ही सही आनंददायक पल लौटा लाती है ...और बच्चे तो महाखुश ...नानी , मामा -मामी और उनके बच्चों के साथ मस्त ...विवाहिता बेटियों के लिए शादी के बाद मायके में टिकना एक तनी हुई रस्सी पर संभल कर चलने जैसा ही होता है ...माँ के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि हमउम्र होने के कारण बेटियां और बहुएं वैचारिक धरातल पर एक जैसी ही होंगी ...वही भाभियों के मन में एक पूर्वाग्रह कि बेटी तो मां का ही पक्ष लेगी ...दोनों के बीच संतुलन बनाने का शउर जिसने सीख लिया वही इन छुट्टियों को मजे से बिता सकता है .......

बेटियों के लिए उनकी पसंद की ड्रेस के लिए रंग चुनती मां बहुओं के सलवार कमीज ,गाउन आदि पहनने पर मन ही मन भुनभुनाती है तो मैं मुस्कुराये बिना नहीं रहती ...कह देती हूँ ...

" क्या हुआ , हम भी तो ये सब पहनते हैं अपने घर में "...

"तुम्हारी बात और है ...तुम सास के साथ थोड़े ना रहती हो ...उनके सामने तो सर ढकती हो , घूँघट भी ..."

" हाँ मां , वो इसलिए कि ससुराल में पर्दा प्रथा की जानकारी होने के बाद भी आप लोगों ने अपनी मर्जी से रिश्ता किया था ...और मैं सोचती हूँ कि कोई भी घर अपनी परम्पराएँ एकदम से नहीं छोड़ सकता , अब तो वहां भी इतना नहीं रहा ...सिर्फ अपनी पसंद के कपडे पहन सके इसलिए सास के साथ नहीं रहना चाहिए क्या ..."मुझे हंसी आती है ...

" तो मैं कहाँ मना करती हूँ ...सब तो पहनती हैं ये ..और कहाँ सर ढकती हैं ...घूंघट तो कभी भी नहीं निकाला ..."माँ शांत हो जाती हैं ...

पूरी उम्र लगर कर संवारी गृहस्थी की डोर छूटने पर खालीपन महसूस करती सास और घर को अपने तरीके से चलाने के लिए अतिउत्साहित बहू के बीच परिवार के बाकी सदस्यों को संतुलन बना कर चलना होता है ......कौन इनके बीच में पड़े (मुस्कुराहट ).... सास बहूओं की नोक- झोंक कब एक दूसरे के लिए फिक्र में बदल जाती है , पता ही नहीं चलता ...दो दिन के लिए सासू माँ अगर शहर से बाहर हो तो घर और बच्चों को संभालती आंसू बहाती जल्दी वापस घर लौटने का आग्रह करती बहू और बहू की जरा सी तकलीफ और पोते -पोतियों की चिंता में घुलती हाय तौबा मचाती दौड़ती भागती इस सास को देखना मुझे बहुत मनोरंजक लगता है ...

शाम को छत पर लाईन से बिस्तर में अटे देर रात तक माँ से बतियाते , भाई भतीजे भतीजियों के साथ अन्ताक्षरी खेलते , बचपन के दिन याद करते और हंसी ठहाके सुनकर शहरी पडोसी (एयर कंडीशन के बीच सिर्फ धीमी फुसफुसाती आवाज़ों के साथ अपनी शहरी औपचारिकता बनाये रखने वाले ) रश्क तो करते होंगे ...

माँ के घर पर नहीं होने पर बचपन में चोटी पकड़ कर रसोई में अपना मनपसंद हलुवा बनवाने वाला भाई बिहार से फोन पर छेड़ते हुए कह रहा है " जर्दा आम की पेटी भेजी है ...अपने बिन्द के लिए भी ले जाना ...कभी देखे नहीं होंगे पेड से टूटे ताज़ा आम ..." और शिकायत भी " बड़ी हा- हा, ही - ही हो रही है ...करो, खूब मजे करो "

कौन सा रंग नहीं होता इन रिश्तों में ...रूठना , मनाना , गरियाना , पुचकारना ....मुझे कई बार कमेंट्स के तौर पर कही गयी गिरिजेश जी की बात याद आती है ..." परिवार टूटेंगे ..." " विवाह संस्था समाप्त की जानी चाहिए ..."
क्या सचमुच ...
परिवार
के सुख के पीछे छोटे छोटे दुखों को नजरअंदाज करते हम क्या सिर्फ आत्ममुग्धता के ही शिकार है ...
भावनाओं
के धोगों से कच्चे पक्के धागों से बांधे खट्टे मीठे रिश्ते आत्ममुग्ध होने के सिवा कुछ नहीं है ....!!




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