गुरुवार, 26 मई 2011

सिनेमाई यादें ......थैंक्स राम !(3)

आपका नाम क्या है .. से आगे


" आपका नाम क्या है " ....उसने सामने देखा ,घुंघराले बालों वाला एक किशोर सामने खड़ा उससे ही मुखातिब था ...
" तुम्हे क्या मतलब है मेरे नाम से "
"नहीं , ऐसे ही पूछ लिया "
" ऐसे ही से क्या मतलब , ऐसे ही राह चलते किसी को भी रोक कर नाम पूछ लेते हो , तमीज नहीं है"...उबल पड़ी अंजना ....
शांत स्वभाव की अंजना का यह रौद्र रूप लीना ने कभी नहीं देखा था ,मगर अंजना ऐसी ही थी , यूँ तो शांत स्वभाव था उसका , मगर गुस्सा होने पर उसकी वाणी धाराप्रवाह आग उगलती थी ...उसने ये भी नहीं देखा कि आस पास लोंग इकट्ठे हो गये हैं ....लीना ने स्थिति सँभालते हुए तेलगु में कुछ कहा उस लड़के से , वह वहां से चला गया ...लीना उसका हाथ पकड़कर खींचती हुई घर ले आई थी ...

" ऐसा कुछ नहीं है अंजू , तू तो यूँ ही इतना गुस्सा हो गयी "
" यूँ ही का क्या मतलब ,बात गुस्सा होने की नहीं है, हिम्मत तो देख उसकी , खा जाता अभी थप्पड़ ...और तूने क्या कहा उस लड़के से , तेलगु में कहने की क्या जरुरत थी , बात ही क्यों करनी थी"
" मैं जानती हूँ उस लड़के को ...यही इसी बाड़े में रहता है "
" क्या , कहाँ रहता है , बता उसका घर , अभी उसके पेरेंट्स से बात करती हूँ , ये तमीज सिखाई है उन्होंने "
"तू क्यों इतना गुस्सा हो रही है , बात तो सुन ले पूरी ...अभी पिछली बार तू यहाँ आई थी तो तुझे देखा था उसने , हमसे नाम पूछा तो कहने लगा नहीं , ये नाम नहीं हो सकता , आप झूठ कह रहे हो , इसलिए जब आज तू अचानक नजर आ गयी तो उसने पूछ लिया "
" जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान , करना क्या है उसको मेरे नाम से, खुद का क्या नाम है उसका , कौन से हीरे मोती जड़े हैं उसके नाम में " अंजना अभी तक डपट रही थी लीना को ..
" उसका नाम रामदास है , अच्छा मैं समझा दूंगी , नहीं पूछेगा " लीना हँस रही थी ....
मासी लौट आई थी काम से ...सब सुन कर हंसने लगी
मासी आप भी ...अंजना ने बुरा -सा मुंह बनाया !
तू रामू की बात पर इतना गुस्सा हो रही है , यहीं नीचे की मंजिल में रहता है , बुरा लडका नहीं है ,बावला है , ऐसे ही पूछ लिया होगा , अच्छा परिवार है , माँ टीचर है , पिता सिंचाई विभाग में इंजिनीअर हैं , उनके मकान का काम चल रहा है , यहाँ कुछ दिनों के लिए ही हैं " मासी लीना से भी दो कदम आगे बढ़कर उसका पूरा इतिहास, भूगोल बताने लगी थी...

" चल, तेरा मूड ठीक करते हैं , मूवी देख कर आते हैं ...दिलशाद में राम तेरी गंगा मैली लगी हुई है " बाड़े से कुछ ही कदम की दूरी पर था दिलशाद टॉकीज..

कम दूरियों पर ही अधिक सिनेमाहॉल , ये भी हैदराबाद की विशेषता मानी जानी चाहिए थी ...मूवी का नाम जाने बिना भी काकियाँ कई बार घर से रवाना हो लेती कि किसी न किसी थियेटर में तो अच्छी मूवी मिल ही जायेगी , पास -पास ही तो हैं ...महेश्वरी के साथ परमेश्वरी , संतोष के साथ सपना , रामकृष्ण में एक साथ तीन स्क्रीन , ऐसी ही एक दोपहर में मूवी तलाशते पहुच गयी थी वे लोंग मधुमती देखने ...

अच्छी मूवी होगी क्या ...काकियाँ सशंकित थी ...
"अच्छी क्लासिकल मूवी है , देख लेते हैं " ककियाँ उसपर भरोसा करके चली तो गयी मगर कलरफुल सिनेमा के दौर में उन्हें श्वेत श्याम देखना पसंद नहीं आया , देर तक कोसती रही उसे ," कहाँ लेकर आई है "

आखिर परेशान होकर इंटरवल से पहले ही निकल आई हॉल से और पास के टॉकीज में ले गयी पाताल भैरवी दिखाने...देखो , ऐसी मूवी देखने लायक ही हो आपलोग और काकियों को पूरी तन्मयता से पूरी मूवी देखते हुए उनकी पसंद पर अपना माथा ठोकती रही ...इस शोरगुल में थियेटर में सोया भी तो नहीं जा सकता था...

अंजना गंगोत्री के खूबसूरत दृश्यों में खोयी हुई थी , अचानक लीना को अपनी पास वाली सीट पर किसी से फुसफुसाते हुए बातें करते सुना ...मगर वे दोनों तो अकेले ही आई थी , ये तीसरा कौन है ..लीना पूरी देर उसी लड़के से बात करती रही ..मूवी ख़त्म होने से कुछ देर पहले वह युवक हॉल से बाहर चला गया ... दोनों बाहर निकली तो उसने लीना से उस युवक के बारे में पूछा ..." यहीं पास में ही रहता है , मेरी ही कॉलेज में है " लीना ने टरकाते हुए संक्षिप्त- सा जवाब दिया ...
लीना के ग्रुप से तो परिचित है अंजना , ये उनमे से नहीं था ...हमेशा को एजुकेशन में पढ़ी है लीना ..होगा कोई ..अंजना ने भी अपना सिर झटक दिया ...

घर पहुँचते ही एक और सरप्राईज उसका इंतज़ार कर रहा था ...ककियाँ अपने बाल -बच्चों के साथ बिलकुल तैयार ही थी , उसके घर में कदम रखते ही बोली ," चल , आज तुझे राम तेरी गंगा मैली देखा लायें , हम बस तेरा ही इतंजार कर रहे थे "
गश खाकर गिरना ही बाकी रह गया था अंजना का , कैसे कहती कि अभी यही मूवी देख कर लौटी है लीना के साथ ...चल ,जल्दी कर , कहते हुए काकी ने उसके हाथ में अपना बैग थमा दिया ...छोटे बच्चे हैं साथ में , दूध भर कर बॉटल , बिस्किट वगैरह भरे हैं बैग में ...बड़बड़ाती थी अंजना कई बार ," इतना क्या शौक है आपलोगों को , आलस भी नहीं आता , कांख में बच्चों को दबाये चल देती हैं झट से , कभी कोई रोयेगा , कोई बिस्किट के टुकड़े बिखेरेगा ,"

घर के बीचों बीच बने खुले चौक की रेलिंग से झांकते फुर्ती से से चलते काकियों के हाथ देखकर ...कभी कपड़े धोती , खाना बनाते , बर्तन साफ़ करते , बच्चों को नहलाते धुलाते ...सोचती अंजना कई बार , क्या जिंदगी है इनकी ,वही रोज की दिनचर्या , ये लोंग इतना खुश कैसे रह लेती हैं ...
कभी उसकी अपनी जिंदगी भी ऐसी ही होगी , अंजना ने तब सोचा नहीं था ...

ढेरों सपने थे , एक खास मुकाम पर पहुंचना है , पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर होना है , बहुत कुछ सीखना है , घर की चारदीवारियों के बाहर की दुनिया को जानना है , कुछ करना है इन सबसे अलग ...

सपने , ढेर सारे सपने ..कुछ पूरे होते हैं , कुछ टूट जाते हैं ...जिन सपनों को देखते इंसान बच्चे से बड़ा होता जाता है , टूटे हुए आईने की तरह उन टूटे सपनों की किरचें भी बहुत लहूलुहान करती हैं , आईने का छोटा टुकड़ा जो बाहर चमड़ी पर नजर आता हो , चिमटी से निकाल दिया जाए तो भी लहू तो बहता ही है , कुछ छूटे छोटे टुकड़े जो चमड़ी की सतह को पार कर भीतर चले जाते हैं , कौन सी चोट ज्यादा घायल करती है , बाहर खून टपकती छोटी खरोंचे या या जिगर के भीतर रिसते ज़ख्म ... कैसे भरा जाता है इन्हें ...शायद समय ही!

" देख ये कलर कैसा रहेगा " मजेंटा कलर की साडी का आँचल लहराते लीना उसे ही कह रही थी ...
मजेंटा की पृष्ठभूमि में हरे रंग के बौर्डर के साथ छोटे फूलों की कढ़ाई ...बहुत पसंद आई उसे साडी ...यही ले लेते हैं ...
" और कुछ बचा तो नहीं रह गया " अंजना ने लिस्ट चेक की ...सब काम हो गया ...

दोनों पैदल ऑटो स्टैंड तक आई...बाटा का शोरूम था अभी भी वहीँ , यहाँ से निकलते कई बार विम्मो दी ठिठक जाती थी ..देखना कोई बैठा है क्या , इधर तो नहीं देख रहा ...विम्मो यानि विमला दी , लीना के कॉलेज की चंडाल चौकड़ी की सबसे वरिष्ठ सदस्य , विमला दी सीनिअर थी , एक साल परीक्षा नहीं दे पाई थी , इस लिए एक ही क्लास में होने के बावजूद सब उन्हें विम्मो दी ही कहते थे ...अशफाक भाई भी इस चंडाल चौकड़ी के लिए अनजाने नहीं थे...वही, बाटा शोरुम वाले ...लीना के ग्रुप के सभी सदस्य उन्हें भाई जान ही कहते थे ...कॉलेज में उनके सीनिअर थे...उनके पिता और बड़े भाई व्यवसाय संभालते थे , अशफाक भाई को भी कहा था उन्होंने ," क्या करोगे पढ़ कर , घर का व्यवसाय है , संभालो इसे " मगर उन्हें अपने व्यवसाय में दिलचस्पी नहीं थी ....उनका लक्ष्य उच्च शिक्षा प्राप्त कर विदेश में नौकरी करना था ...विमला दी और अशफाक के रिश्ते के बारे में अशफाक के पिता और भाई के साथ ही लीना के ग्रुप के सभी सदस्य जानते थे , मगर इससे अनजान थे कि वे विवाह बंधन में भी बंध चुके हैं , अशफाक भाई जान और विम्मो दी दोनों ही पहले आत्मनिर्भर होना चाहते थे ....धर्म के कारण बाद में होने वाले विवादों से बचने के लिए कोर्ट मैरिज कर चुके थे, अभी ग्रुप में कुछ लोगों को ही पता था ...

विम्मो दी कहाँ है आजकल ...
अभी दोनों दुबई में हैं ...दो प्यारे छोटे बच्चे हैं उनके ! शुक्र है सबकुछ राजी खुशी निपट गया , वरना हम लोंग उनके लिए बहुत चिंतित थे ...प्रेम कथा सुखद अंजाम तक पहुंची आखिर ...

दोनों ने ऑटो को रोका ," गुलज़ार हौज़ "!



क्रमशः
विवाह की रस्मों के बीच अंजना और लीना तय करेंगी लीना की सगाई से विवाह तक का यादों का सफ़र ...

शनिवार, 14 मई 2011

परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !

रोज सुबह घर के सामने नीम के पेेेड़ के नीचे पक्षियों के लिए मिट्टी के तसले में पानी भर कर रखती हूँ ...जब चिड़ियों का झुण्ड उसमे पानी पी रहा होता है या फिर उसमे नहा कर अपने पंख झाड़ता किलोल करता है तब पानी के छींटे बहुत सुन्दर दृश्य बनाते हैं . कुछ दिनों से पानी भरते समय देखती हूँ कि पानी बहुत ही गन्दला -सा और पूरा भरा ही रहता है जैसे गन्दा पानी होने के कारण किसी पक्षी ने पिया ही ना हो ...गौर किया तो देखा कि एक कौवा कहीं से रोटी का टुकड़ा लेकर आता है  और पानी के पात्र में डुबो देता है ....इस रहस्य को मैं समझ नहीं पाती कि वह कौवा ऐसा क्यों करता है ...रोटी का टुकड़ा आराम से खाने के बाद भी तो पानी पी सकता है  मगर शायद उसे पानी पीना ही नहीं होता . बस उस पानी को गन्दा करना होता है ...और उसकी इस हरकत के कारण पानी के पात्र में काई भी जम जाती है , बदबू मारता है सो अलग ...रोज उसे मांजना पड़ता है . ताजा पानी रखते ही अगर छोटी चिड़ियाँ पानी पी ले तो उनकी किस्मत वरना एक बार कौवे के आने के बाद बस वे दूर से उस पानी को देख ही सकती हैं . कौवा चोंच मार कर उन्हें भगा देता है और फिर उस पानी में रोटी डाल कर चला जाता है ...अब मैं भी दिन में कितनी बार उसका पानी बदल सकती हूँ आखिर ... उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं  जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है , अब इसका विश्लेषण कौन और कैसे करे कि किसने किससे सीखा ...अब ये काम तो किसी बुद्धिजीवी के लिए ही उचित है ...

बुद्धिजीवी से याद आया कि एक दिन यहाँ टिप्पणी में लिख दिया " किसी भी लेखक /लेखिका की रचनाओं को पसंद करने के लिए भाई , बहन , माता , मित्र आदि का संबोधन देना आवश्यक क्यों है . आखिर कैसे बुद्धिजीवी हैं हम लोग !
और मैंने इसमें कुछ गलत नहीं लिखा या कहा .... ब्लॉगजगत में बहुत से ब्लॉगर्स ऐसे हैं जो आपके लेखन प्रयास पर आपकी त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए अपनी संतुलित प्रतिक्रिया देकर उसे बेहतर बनाने में मदद करते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि उन्हें किसी रिश्ते का नाम देकर ही उनका आभार प्रकट किया जा सकता है ....कुछ ब्लॉगर्स से असीम स्नेह और प्रोत्साहन मिला है मुझे मगर वे भली भांति जानते /जानती हैं कि अपनी भावनाओं या उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मुझे उन्हें किसी रिश्ते के संबोधन की जरुरत नहीं है ... हालाँकि इस आभासी दुनिया में मेरे भी कुछ भाई -बहन हैं और वे भली भांति जानते हैं कि मेरे लिए इन शब्दों /रिश्तों के क्या मायने हैं ...इस विषय पर अमरेन्द्र ने बहुत संतुलित और संजीदा टिप्पणी की है ...

मेरी टिप्पणी पर एक विदुषी बहन चिहुंक उठी और विद्वान् ब्लॉगर का तमगा थमा दिया ...वैसे तो हम शत प्रतिशत महिला ही हैं इसलिए विदुषी कहलाया जाना चाहिए था ...अब कोई हमेशा अपने आपको साधारण गृहिणी कहता रहे और अचानक बुद्धिजीवी ब्लॉगर की जमात के में गैर इरादतन ही सही स्वयं को भी शामिल कर ले तो विदुषियों का ऐतराज़ जायज़ है ...

अब आपको वो किस्सा भी बयान कर ही दें जिसने हमें स्वयं को बुद्धिजीवी समझने की धृष्ट अकल प्रदान की ...क्या है कि कुछ बहुत बेहतर लिखने वाले साहित्यकार टाईप ब्लॉगर्स कभी हमारे ब्लॉग पर दर्शन नहीं देते . उनका लिखा हम पढ़ते हैं .वाकई बुद्धिजीवियों टाइप ही लिखते हैं ..तो हम यही सोचे कि इ लोग विशेष लेखन पर ही टिप्पणी देते हैं ...फिर देखा उन्हें उन विषयों पर टिपियाते जिन पर काफी पहले लिखा जा चुका है और ... एक समान विषय पर ही कहीं बड़ी -बड़ी टिप्पणी , तो कहीं उपस्थिति भी दर्ज नहीं तो हमको लगा कि ये महान लेखक लोग बुद्धिजीवी हैं और सिर्फ बुद्धिजीवियों के ब्लॉग पर टिपियाते हैं  तो हमरे ब्लॉग पर नहीं आने का कारण हमारा साधारण लेखन ही रहा होगा ..मगर जब ढेरों अशुद्धियाँ वाले लेखन , टिप्पणी लेनदेन विवाद , गाय -कुत्ते के साथ फोटो खिंचाने के किस्से और तो और आशिकी की खीर के खटाई होते किस्से में तड़का देते देखा तो अपने साधारण होने का भ्रम मिटने लगा ...
एक दिन पतिदेव अमिताभ बच्चन जी के ब्लॉग के बारे में बात कर रहे थे - देखो , इतना व्यस्त होने पर भी समय निकालते हैं लिखने के लिए ....सही बात है ... मगर वे आज प्रतिष्ठा के जिस मुकाम पर हैं , सिर्फ ये भी लिख दे कि आज मुझे छींक आई , जुखाम हुआ , यहाँ गए , वहां गए तो भी लोग आराम से पढ़ लेंगे .
उन्हें आम ब्लॉगर्स की तरह विषय ढूँढने नहीं पड़ते ...तो जरुरत अपने लिए एक ऊँचा मचान बनाने की है . बाद में आप चाहे जो लिखे , छापे ...

उन्ही विदुषी ब्लॉगर पर किसी की टिप्पणी पढ़ी कि आभासी दुनिया क्या होती है . जो ब्लॉगर हैं , वे वास्तविक ही हैं तो ये दुनिया आभासी कैसे हुई ...
बात तो जमी हमको भी मगर हमारे लिए तो यही सच है कि हम सिर्फ अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर आने वाले नाम से ही परिचित हैं इसलिए हमारे लिए तो ये दुनिया आभासी ही है ...जिस दिन कोई ब्लॉगर सम्मलेन अटेंड कर लेंगे तब शायद हम भी इसे आभासी कहना छोड़ देंगे ...
तो आभासी दुनिया के ही एक विद्वान् /विदुषी ब्लॉगर (पुरुष /महिला सस्पेंस बने रहने दीजिये ) से बात हुई चैट पर कि फलाने ब्लॉग पर फलाना ब्लॉगर सबसे पहले टिपियाता/टिपियाती है ...मुझे तो इसमें कोई भेद नजर नहीं आया क्योंकि ये हर इंसान कि व्यक्तिगत इच्छा है कि वह क्या पढना चाहता/चाहती है . कोई भी पाठक अपनी पसंद का विषय सबसे पहले पढ़ना चाहता है तो संभवतः वही व्यक्ति उसका पहला पाठक भी होगा ...इसमें इश्किया जैसा कोई समीकरण मुझे तो समझ नहीं आया . मैं उनकी सोच को संकुचित मान भी लेती मगर चूँकि बहुत से ब्लॉगर व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे के संपर्क में हैं तो शायद वे ज्यादा जानते होंगे . यह सोचकर मन को समझा लिया ...इसी तरह महान बुद्धिवादीयों के ब्लॉग पर ही नहीं उनकी आपसी फेसबुकिया बातचीत में भी धर्म और जाति- विशेष को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी पढ़ने के साथ ही अपने साधारण होने का भ्रम भी मिटता गया ...देखती हूँ अपने आस- पास भी ऐसे /ऐसी ही आधुनिक /आधुनिकाओं को जो , दिखने/दिखाने में पूरी तरह प्रगतिवादी , नए फैशन की हेयर स्टाईल /परिधानों में , मगर कभी उनसे बात कर लो तो सारी असलियत सामने आ जाती है हालाँकि सभी आधुनिक /आधुनिकाएं इस तरह के दोहरे मापदंड वाले नहीं होते हैं ...जब दिमाग पर पर्दा हो तो सिर्फ बेबाकी और बेपर्दगी से ही आधुनिक नहीं बना जा सकता ...इनसे तो हम पर्देदार ही अच्छे , जिनका दिमाग तो खुला है ...क्योंकि परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !


नोट...कुछ कहानियाँ हैं जो दिमाग से कागज पर उतरना चाह रही है  मगर उससे पहले दिमाग की काट -छांट ज़रूरी थी !

बुधवार, 4 मई 2011

जन आस्था का केंद्र ..."बूटाटी"





स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है ...देश में बुजुर्गों की बढती संख्या और औसत आयु इसे प्रमाणित भी करती है ...आज चिकित्सकों के पास अधिकांश बिमारियों का इलाज़ है और नित नए अनुसन्धान और शोध प्रत्येक बीमारी को जड़ से समाप्त करने के लिए उपचार की विधि की तलाश में संलग्न है ..इतना सब कुछ होने पर भी बहुत कुछ ऐसा है जो चिकित्सा विज्ञान की सीमा से परे है ...प्रकृति के रहस्यों को पूरी तरह जानने में अभी भी विज्ञान असमर्थ है...जब भरपूर इलाज़ लेने के बाद भी कोई व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ नहीं हो पाता है तो वह वैकल्पिक चिकित्सा के अतिरिक्त कई टोटकों को भी अपनाने लगता है ...जहाँ विज्ञान की सीमा समाप्त होती है , वही से श्रद्धा और अंधविश्वास का प्रारम्भ होता है ...उदाहरण के रूप में नजर लगना जैसी किसी बीमारी को हममे से अधिकांश लोंग मजाक में हँस कर उड़ा देते हैं , मगर वही जब अपना कोई परिचित भरपूर इलाज़ के बाद भी ठीक ना हो रहा हो , या बिना किसी कारण सुस्त , उखड़ा या उदास हो तो हम झट नजर उतारने के हथियार इस्तेमाल करते हैं ..

पक्षाघात /लकवा के रोगियों को भी चिकित्सकों के इलाज के बाद श्रद्धा नागौर के बूटाटी ग्राम में खींच लाती है ...अभी पिछले दिनों एक रिश्तेदार अचानक ब्रेन हैमरेज का शिकार होकर लम्बे समय तक कोमा में रही ...कोमा की स्थिति से बाहर आने तक उनके पूरे आधे शरीर पर पक्षाघात का असर हो चुका था ...पिछले कई महीनों से वे ना सिर्फ चलने- फिरने में असमर्थ हैं , अपितु करवट बदलने तक के लिए भी उन्हें मदद की आवश्यकता होती है ... चिकित्सा के दौरान ही उन्हें किसी ने राजस्थान के नागौर जिले के बूटाटी ग्राम के बारे में बताया ..आखिरी उम्मीद के रूप में किसी प्रकार हिम्मत जुटा कर परिजन उन्हें लम्बी दूरी तय करते हुए आंध्र प्रदेश से राजस्थान लेकर आये ...तीन दिन की परिक्रमा के बाद उनकी दशा में इतना सुधार हुआ कि कई महीनों से से लघु शंका के लिए लगी नलियाँ हटा दी गयी ...चार पांच दिन में वे बिना सहारे 3-4 कदम भी चली (जैसा की उनके परिजनों ने बताया )..हालाँकि अभी पूरी तरह बिना सहारे चलना मुमकिन नहीं है , मगर महीनों से सिर्फ बिस्तर पर लेटे मरीज के लिए एक सप्ताह में इतना परिवर्तन भी कम सकारात्मक नहीं है ... बूटाटी धाम के बारे में सुना तो पहले भी कई बार था , और सुनी सुनायी बातों पर यकीन नहीं किया जा सकता मगर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पहली बार देखा ...बताते हैं की लकवा के नब्बे प्रतिशत मरीजों की स्थिति में यहाँ सुधार होते देखा गया है ...

राजस्थान के नागौर जिले में स्थित यह क़स्बा " बूटाटी" पक्षाघात के रोगियों के लिए तीर्थ धाम बन चुका है ... यह मंदिर सिद्ध पुरुष चतुरदास जी महाराज की समाधि है ...लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगाते हैं ... सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है , ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है ...सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है ...अक्सर मरीज स्वयं चलने फिरने में असमर्थ होते हैं ,उन्हें परिजन परिक्रमा लगवाते हैं ... निवास के लिए यहाँ सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं ... यात्रियों को जरुरत का सभी सामान बिस्तर , राशन , बर्तन, जलावन की लकड़ियाँ आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती हैं ...इसके अतिरिक्त पास में ही बाजार भी हैं जहाँ यात्री अपनी सुविधा से अन्य वस्तुएं खरीद सकते हैं ... हर माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को यहाँ मेला लगता है ,इसके अतिरिक्त वैशाख , भाद्रपद और माघ महीने में भी विशेष मेलों का आयोजन होता है !