गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

नैतिकता की यह परिभाषा किसके लिए है !!!


पिछले दिनों ब्लॉग जगत में अजित जी की पोस्ट " क्या पुरुषों की बेचारगी और बढ़ेगी " में एक घरेलू समस्या का जिक्र किया गया था . पति ने एक महिला के साथ अपने सम्बन्ध/चुम्बन को अपनी गलती मानते हुए प्रायश्चित करने का संकल्प लिया और अपनी पत्नी से सबकुछ सच बता दिया , पत्नी बहुत आहत हुई , बात मारपीट और अदालती कार्यवाही तक पहुँच गयी . इस पोस्ट पर बहुत से महिला /पुरुष ब्लॉगर्स ने अपने विचार प्रकट किये . कुछ के अनुसार पुरुष गलत था , कुछ के अनुसार उसकी स्त्री , और कुछ ने उस दूसरी स्त्री को दोषी ठहराया .


अभी कल ही आराधनाजी की एक अच्छी कविता पढ़ी जिसमे वह दोस्त को संबोधित करते हुए कह रही हैं कि सही मायने में मुक्ति वही मानी जायेगी जब मुझे अपनी मित्रता के लिए अपराध बोध नहीं होगा , ना ही उसके साथ अपनी पुरानी सी ही मित्रता निभाते हुए कुलटा कहलाने का भय नहीं होगा ..

" या कि बिगड़ जायेगी मेरी 'भली लड़की' की छवि,
चूम सकूँगी तुम्हारा माथा
या कि होंठ,
बिना इस बात से डरे
कि जोड़ दिया जाएगा तुम्हारा नाम मेरे नाम के साथ
और उन्हें लेते समय
लोगों के चेहरों पर तैर उठेगी कुटिल मुस्कान

जब मेरे-तुम्हारे रिश्ते पर
नहीं पड़ेगा फर्क
तुम्हारी या मेरी शादी के बाद,"

कविता निस्संदेह अच्छी है . जिसका सन्देश है कि मित्रता को पुरुष और स्त्री के खांचे में नहीं बांटा जा सकता है . जिस तरह दो पुरुषों या दो स्त्रियों की मित्रता समाज द्वारा मान्य है , एक पुरुष और स्त्री की मित्रता पर सवाल क्यों उठाये जाए . उसे भी सहज मित्रता के रूप में ही क्यों ना लिया जाये , उसे अशालीन या शालीनता से परिभाषित क्यों किया जाए.

यह तो हुए दोनों प्रविष्टियों की बात . अब मेरे दिल और दिमाग की रस्साकशी यह है कि है कि जो लोंग अजित जी कि पोस्ट पर अपनी महिला मित्र का चुम्बन लेने को अनैतिक मानते हुए उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ा आये , उनकी पत्नी द्वारा उठाये गये क़दमों को उसके साहस से जोड़ कर पीठ ठोंक आये , वे इस कविता को कैसे पसंद कर सकते हैं .
आखिर इस कविता में भी तो यही कहा गया है कि सच्चे अर्थों में मित्रता वही है कि एक स्त्री या पुरुष के रिश्तों पर शादी होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए.

उलझ गयी हूँ मै नैतिकता की यह परिभाषा जिसे हम क्या सिर्फ पुरुष के लिए होनी चाहिए , या सिर्फ स्त्रियों के लिए होनी चाहिए या दोनों के लिए समान ही हो ....

शिखा जी ने भी यहाँ एक समसामयिक संतुलित दृष्टिकोण रखा है .
लिव इन रिलेशनशिप में ज्यादा फायदा किसे है , और यदि इन रिश्तों में कानून दखल करता है और वही अधिकार देता है जो एक पत्नी को मिलने चाहिए तो फिर विवाह करने में क्या आपत्ति है , क्या सिर्फ इस भय से लोंग विवाह नहीं करना चाह्ते कि तलाक मिलने में परेशानी होगी तो इसका अर्थ तो यह ही हुआ कि अविश्वास तो इन रिश्तों में पहले से ही है , तो जो लोंग प्रेम के कारण रिश्ते या विवाह करना चाह्ते हैं , वे ऐसे रिश्तों को अपनी सहमति कैसे दे सकते हैं जिनमे प्रेम या विश्वास पहले कदम पर ही नहीं है ...

यह समय गंभीरता से मनन का है स्त्री मुक्ति के नाम पर हम कहीं एक अंधी खाई की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं या फिर पुनः पाषाण युग को आमंत्रित कर रहे हैं , एक सार्थक बहस के लिए आप आमंत्रित हैं !

कल करवा चौथ है ...अखंड सौभाग्य की कामना रखने वाले सभी व्रतियों और जिनके लिए व्रत रखा गया , उन सबको बहुत शुभकामनायें!

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

दशहरे की तैयारी रावण मंडी में ....

बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयदशमी पर्व की तैयारी पूरे देश में जोर शोर से चल रही है . रामलीलाओं के मंचन के साथ ही रावण के पुतलों को बनाने और जलाने की तैयारियां अपनी चरम पर है . पहले जहाँ चंदे इकठ्ठा कर कोलोनियों के बड़े और बच्चे बुजुर्गों के निर्देशन में सुखी लकड़ियाँ और रंगीन कागजों से लपेट कर दहन स्थल पर ही रावण का निर्माण करते थे , आजकल कारीगरों ने उनकी इस मेहनत को कम कर दिया है . जेब में पैसे लेकर जाओ और अपनी पसंद का रावण छांट लाओ .

जयपुर के गोपालपूरा बाई पास पर गुजर की थड़ी से लेकर किसान धर्म काँटा तक रावण की मंडी सज गयी है . राजस्थान के जालौर जिले के अतिरिक्त अन्य जिलों से भी कारीगर यहाँ रात दिन रावणों के निर्माण में परिवार सहित जुटे हुए हैं . बांस की खपच्चियों पर लेई की मदद से रंगीन कागज लपेट कर विभिन्न चित्ताकर्षक रावण के साथ ही मेघनाद और कुम्भकरण आदि की छवियाँ तैयार की जाती हैं .



रावण की यह मंडी राह चलते राहगीरों को इतना आकर्षित करती है कि इस मार्ग से गुजारने वाले एक बार रुक कर इसे देखते जरुर हैं , साथ ही अपनी कोलोनियों के सार्वजानिक स्थलों पर रावण दहन की तैयारियों के लिए इनका मोलभाव भी करते हैं . कहा जाता है कि यह एशिया की सबसे बड़ी रावण मंडी है . यहाँ दो से तीन फीट के रावण के साथ ही तेईस फीट तक के रेडीमेड रावण उपलब्ध हैं जिनकी कीमत 150 -200 के साथ 7000 तक है .

सिर तानकर खड़े इन रावणों को देखकर लोंग चुटकी लेने से नहीं चूकते कि दो दिन की और बात है फिर तो तुम्हे खाक में मिलना है , तन ले जितना तनना है अभी ...यही तो मानव जीवन पर भी लागू होता है , लालच , लोभ ,अहंकार में आकंठ डूबे लोंग हर वर्ष रावण की ऐसी दुर्गति देखकर भी अपने जीवन पर दृष्टि नहीं डाल पाते .

हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ रामायण/ रामचरितमानस का एक प्रमुख पात्र रावण है . कहा भी जाता है कि रावण ना होता तो रामायण भी नहीं होती . राम का जन्म ही रावण के संहार के उद्देश्य से हुआ था . यहाँ रावण कोई एक व्यक्ति नहीं , बल्कि दुर्गुणों का प्रतीक माना जाता है , परन्तु ऐसे लोगों की कमी भी नहीं जो रावण को असाधारण बुद्धि का ज्ञाता मानते हैं . वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हुए रावण को वीर , पराक्रमी , गायनी , ज्योतिष एवं वास्तुकला , नीति व राजनीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान् माना जाता है . वह इंद्रजाल और सम्मोहन विद्या का ज्ञाता भी था . रावण ने राजनैतिक और कुटनीतिक चतुराई दिखाते हुए अपने साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार किया . रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की. चारों वेदों का ज्ञाता होने के अतिरिक्त रावण संगीत में भी दखल रखता था . वह विना बजाने में कुशल था , साथ ही उसने वायलिन जैसे एक वाद्य यन्त्र का निर्माण भी किया था जिसे रावण हत्था कहा जाता है. रावण पुलस्त्य मुनि के पुत्र विश्र्वश्रवा का पुत्र था , उसकी माता कैकसी दैत्य पुत्री थी , इसलिए ही उसमे विद्वान् ब्राहमण के गुण होने के साथ ही असुर प्रवृति भी थी .

बड़े से बड़े जहाज को डुबोने के लिए एक छिद्र ही काफी है , रावण के पतन के लिए यह उक्ति बिलकुल उपयुक्त साबित होती है . सभी गुणों से संपन्न होने के बावजूद परायी स्त्री के हरण अर्थात उसकी चरित्रहीनता के कारण ही उसका पतन हुआ .
रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।" शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं। (http://bharatdiscovery.org से साभार ).

अहंकार को भयंकर दुर्गुण मानते हुए यह भी प्रचलित है कि अहंकार तो रावण का भी नहीं टिका . कहा भी जाता है कि एक अज्ञानी यदि चरित्रवान है तो उसके अज्ञान को क्षमा किया जा सकता है , क्योंकि वह अच्छे और बुरे का फर्क समझता है , मगर यदि एक विद्वान् इस अंतर को नहीं समझता तो वह स्वयं अपना और अपने कुल का भी नाश करता है . अपने शौर्य और विद्वता के अहंकार और मद में डूबा रावण प्रकृति के संतुलन को समझ नहीं सका और उसके सोने की लंका का सर्वनाश हुआ .


बुधवार, 28 सितंबर 2011

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय , शिवाड (राजस्थान)


श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
शिवालय , शिवाड (राजस्थान)

पिछले दिनों जयपुर लगभग 98 किलोमीटर दूर द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर जाना हुआ . भव्य साज सज्जा से युक्त यह मंदिर भक्ति भाव युक्त दर्शनार्थियों के अलावा पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो रहा है .
दरअसल महाराष्ट्र के मनमाड के वेरुल स्थित ग्राम में विराजित ज्योतिर्लिंग को भी द्वादशवे ज्योतिर्लिंग ही माना जाता रहा है , मगर शिवाड स्थित मंदिर के शिलालेखों और प्राप्त ऐतिहासिक और धार्मिक दस्तावेजों से इस स्थान की द्वादाश्वे ज्योतिर्लिंग के रूप में मान्यता स्थापित होती है .

द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . पुरातनकाल में इस स्थान का नाम शिवालय था जो अपभ्रंश होता हुआ , शिवाल से शिवाड नाम से जाना जाने लगाशिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर के दक्षिण में भी तीन श्रृंगों वाला धवल पाषणों का प्राचीन पर्वत है, जिसे देवगिरी के नाम से जाना जाता है . यह महाशिवरात्रि पर एक पल के लिए सुवर्णमय हो जाता है जिसकी पुष्टि बंजारे की कथा में होती है कि जिसने देवगिरी से मिले स्वर्ण प्रसास से ज्योतिर्लिंग की प्राचीरें एवं ऋण मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में करवाया . १८३७ में ग्राम शिवाड स्थित सरोवर की खुदाई करवाने पर दो हजार शिवलिंग मिले जो इसके शिवलिंगों के आलय होने की पुष्टि करता है . मंदिर के परंपरागत पराशर ब्राह्मण पुजारियों का गोत्र भी शिवालय है .

कई विद्वान् , धर्माचार्य , पुरातत्वविद, शोधार्थी आदि इस स्थान की यात्रा कर इसे वास्तविक घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग होने की पुष्टि कर चुके हैं .

शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता के अनुसार भक्तिमयी घुश्मा के पुत्र को उसकी बहन ने सौतिया डाह के कारण टुकड़े -टुकड़े करके उसी सरोवर में फेंक दिया था ,जिसमे घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंगों की पूजा कर विसर्जित करती थी . घुश्मा की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने उसके मृत पुत्र को जीवित कर दिया तथा घुश्मेश्वर नाम से इस स्थान पर अवतरित हुए .

ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद किशना एवं जानकी के पाषाण स्तंभों की परिक्रमा आवश्यक मानी जाती है . कहा जाता है कि शिवाल ग्राम के किशन खाती की गाय जंगल में ज्योतिर्लिंग पर खड़ी होती तो उसके दूध की धरा स्वतः बह ज़ाती थी. किशना ने गाय का पीछा कर यह प्रत्यक्ष देखा तो अज्ञानतावश शिवलिंग पर कुठार प्रहार किया , जिससे खून का फव्वारा फूट पड़ा . किशना भय के मारे कुछ दूर भागा तो पाषाण का हो गया . गाय किशना की पत्नी जानको को घटनास्थल पर लेकर आई . जानकी ने प्रभु से प्रार्थना की तो भगवान् ने किशना को पुनः शरीर देकर जानकी को आशीर्वाद दिया कि उसकी पूजा करने के बाद किशना जानकी की परिक्रमा अवश्य होगी .

११२१ में मंडावर के राजा शिववीर चौहान ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तथा अखंड ज्योति एवं शिवरात्रि जागरण एवं मेला आरंभ किया जो आज तक निर्बाध रूप से जारी है .


इस स्थान की विशेषता है कि अधिकांश समय यहाँ ज्योतिर्लिंग जलहरी में जलमग्न रहता है. जलहरी का जल चमत्कारी माना जाता है. कहा जाता है कि पारे के सेवन से उत्पन्न डाह एवं सफ़ेद दाग इस जल के सेवन से प्रायः नष्ट हो जाते हैं . भारत वर्ष के कोने- कोने से यात्री अपनी वेदना , आशाओं को संजोये हुए इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने आते हैं .


किसी विशेष परिस्थिति में इसके जल स्तर के गिरने को किसी संकट के आगमन की पूर्व सूचना माना जाता है .
शिवाडस्थ ज्योतिर्लिंग के दक्षिण में स्थित देवगिरी पर्वत में ऊँचाई पर एक शक्तिपीठ स्थापित है , जो इस स्थान के प्राचीन होने का पुख्ता प्रमाण है . प्राचीन ग्रन्थ श्री घुश्मेश्वर महात्म्य के अनुसार प्राचीनकाल में ज्योतिर्लिंग क्षेत्र शिवालय में एक योजन विस्तार में चारों दिशाओं में चार द्वार थे जिनका नाम पूर्व में सर्प द्वार , पश्चिम में नाट्यशाला द्वार तथा उत्तर में वृषभ द्वार व दक्षिण में ईश्वरद्वार था तथा पश्चिमोत्तर में सुरसरि सरोवर था .
वर्तमान में ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के चारों ओर पुरोक्त चारों द्वारों के प्रतिक चार गाँव हैं जो सारसोप (सर्व सर्प्द्वर ), नत्वादा (नाट्यशाला द्वार ), बहड़ (वृषम द्वार ), ईसरदा (ईश्वर द्वार ) के नाम से जाने जाते हैं . पश्चिमोत्तर में सिरस गाँव सुरसरि सरोवर के स्थान पर बसा हुआ है .

वाशिष्ठी नदी के किनारे बिल्व पत्रों एवं मंदार के वन ...

घुश्मेश्वर महात्म्य ग्रन्थ के अनुसार ज्योतिर्लिंग के शिवालय क्षेत्र में वाशिष्ठी नदी बहती थी , जिसके किनारे मंदारवन(आकड़ों का वन ) तथा बिल्वपत्रों के वन थे जिनसे घुश्मेश्वर की नित्य पूजा की जाती थी .
ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के पास बनास नदी बहती है जो पूर्वकाल की वाशिष्ठी नदी ही है तथा इसके किनारे बिल्वपत्रों का वन आज भी विरल रूप में स्थित है . मंदार वन के स्थान पर मंडावर ग्राम है जहाँ आकडे (मंदार ) बहुतायत में उत्पन्न होते हैं .

मुहूर्त मार्तंड ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार ग्रन्थ में प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ के रचनाकार पंडित नारायण ने ग्रन्थ के संक्रांति प्रकरण के अंत में निम्न प्रकार अपने वंश , जनक , जन्मस्थान का उल्लेख किया है ---

" जिन्होंने विष्णु के चरणों में अपनी आत्मा को अर्पित किया है , ऐसे विष्णु चरणों से पवित्र कौशिक वंश में द्विजश्रेष्ठ श्री हरि, जिनसे शम , दम , तप , अध्ययन , जितेन्द्रियता , उदारता आदि गुणों से अलंकृत ब्राहमणों से पूजित अनंत नाम द्विज श्रेष्ट उत्पन्न हुए , उनके पुत्र नारायण ने मुहूर्तों के भण्डार इस मुहूर्तमार्तंड ग्रन्थ की रचना की जो पुराण प्रसिद्ध देवगिरी पर्वत के पास उत्तर में स्थित शिवालय सरोवर के उत्तर की ओर स्थित टापर ग्राम में रहता है .
ग्राम तापर , शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग के उत्तर में यथास्थान स्थित है तथा अनेक महान विभूतियों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रहा है .

विक्रम संवत १०८१ (वर्ष 1023) में महमूद गजनवी के सिपहसालार मसूद द्वारा इस स्थान का विध्वंस किया गया . इस मंदिर के प्रांगन में मिले प्रस्तर खंड , मूर्तियाँ आदि अवशेष सातवीं शताब्दी के आसपास निर्मित मंदिरों की शैली के हैं , हरा -नीलापन लिए इन बलुआ पत्थरों पर भी युगल देव मूर्तियाँ उत्कीर्ण है .

मंदिर का वास्तुशिल्प पाणिनी के अष्टांगिक योग पर आधारित है . इस शिल्पकला में समाधि प्रिय शिव का सानिध्य योग बल से ही संभव मान कर निर्माण किया जाता है . इस मंदिर में यम एवं नियम की पांच- पांच सोपान (सीढियाँ ), नंदी (आसन ), पवनपुत्र (प्राणायाम ), कछुआ (प्रत्याहार ), गणेश (धारणा ), माता पार्वती (ध्यान ), भगवान् शंकर (समाधिस्थ ) विराजमान है जो कि अष्टांगिक योग पर आधारित वास्तुकला की पुष्टि करते हैं . १९९८ में खुदाई पर मिली कश्यपावतार की समुद्र मंथन मूर्ति अष्टांगिक योग में प्रत्याहार का प्रतिनिधित्व करती है .

सवाई माधोपुर होकर जयपुर आने वाली रेलवे लाईन पर ईसरदा स्टेशन से उतरकर बस या तांगे द्वारा शिवाड पहुंचा जा सकता है .