शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

बिना बात की बात ...


कल हमारे केस की हीयरिंग है . मुझे वकील साहब के पास जाना है .  मेरे बैग में ज़रूरी समान रख देना ...पापा माँ से कह रहे थे . 
अपने कमरे से सुनकर दौड़ी आई रेवती .
पापा .कल मैं भी आपके साथ चलूँ,.  मुझे भी अपने कॉलेज में कुछ काम है .  आप जबतक अपना काम निपटायेंगे मैं अपनी हॉस्टेल की फ्रेंड्स से मिल लूंगी . आप लौटते समय मुझे साथ ले आना .

ठीक है  लेकिन सुबह जल्दी तैयार रहना.
सुबह जल्दी करते हुए भी रेवती कुछ देर से तैयार हो पाई . पापा के ऑफिस की गाड़ी  घर के गेट पर लग चुकी थी .

जल्दी करो ..रेवती को आवाज़ लगाते हुए पापा कमरे से बाहर निकले . रेवती दुपट्टा सँभालते हुए एक हाथ में कंघी लिए दौड़ती भागी पहुंची . पीछे माँ आवाज़ लगाती ही रह गयी ,. रेवती , बेटा कुछ तो खा लो !
तब तक गाडी का होर्न बज चुका था. जानती है पापा को लेटलतीफी बिलकुल पसंद नहीं . उसे घर पर ही छोड़कर रवाना हो जायेंगे.

क्या पापा , जीप मंगवाई है आपने . कोई कार फ्री नहीं थी !

पापा ने पीछे की सीट पर मुड कर देखा . गैरेज में कोई कार नहीं थी  और मुझे इंतज़ार नहीं करना था . फिर यहाँ की सड़कों के लिए तो जीप ही ठीक है.

बुरा सा मुंह बनाया रेवती ने . सही कहा था पापा ने  वैसे. कम्पनी के कम्पाउंड से बाहर निकलते ही टूटी सड़कों के कारण हिचकोलों के झूले प्रारम्भ हो गये थे .
आम और लीची के बागों से गुजरते इन पगडंडियों की टूटी सड़कें हिचकोलों के दर्द को थोडा कम कर देती है . दोनों ओर बड़े- बड़े पेड़ों की शाखाएं ऊपर जाकर इस तरह मिल जाती हैं कि पता ही नहीं चलता कि इनकी जड़ें सड़क के दो विपरीत छोरों पर हैं . इनके झुरमुटों के बीच से अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए सूरज को कितनी तिकड़में लगानी पड़ती होंगी .
दूसरे छोर पर वृक्षों की हरी पत्तियों के बीच आसमान की लाली के बीच एक क्षीण सी किरण पत्तों से टकराकर इन्द्रधनुषी दृश्य उपस्थित कर रही थी . इन सबके बीच मुंह पर अंगोछा ढके लोटा लिए जाते हुए ,तो कही मोटरसाकिल पर दूध के बड़े ड्रम लटकाए हुए लोग भी नजर आ रहे थे .
लौरिया के अशोक स्तम्भ से गुजरते हुए सोचा रेवती ने . इतिहास की किताबों में खूब पढ़ा है इनके बारे में ,मगर यहाँ किस कदर असरंक्षित है यह स्मारक. घर का जोगी जोगना बाहर का सिद्ध . मानव स्वभाव भी अजीब है . सबसे करीब या आसानी से उपलब्ध वस्तुएं हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करती . यही विचित्रता रिश्तों में भी तो होती है . अपने सबसे करीबी रिश्तों के प्रति हम कितने लापरवाह होते हैं .

चाय तो पीनी है मगर रुकेंगे तो देर हो जायेगी . वकील साहब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे . बहुत तैयारी करनी है . पहले इसके कॉलेज की ओर मोड़ लो . अच्छा है वकील साहब का घर भी पास ही है . पापा ड्राइवर से बात कर रहे थे.
 वे शहर की सीमा में प्रवेश कर चुके थे .
कॉलेज के बाहर पसरे सन्नाटे से आशंकित रेवती ने पता किया ऑफिस में . आज कॉलेज की छुट्टी है .
ओह , फोन करके घर से निकलना था . अब क्या करे . यहाँ किसी परिवार से भी परिचित नहीं है . अब दिन भर पिता के साथ उनकी कानूनी कार्यवाही का साक्षी बनते घूमना होगा .

आज का तो दिन ही खराब है . कोई बुक , नोवेल भी साथ नहीं लाई , कैसे दिन गुजरेगा. वह सोच रही थी कि उनकी गाडी शहर के प्रसिद्ध वकील शिवशंकर श्रीवास्तव के घर के बाहर जा रुकी . ऊँची बाउंड्री से घिरे मकान का कोई हिस्सा बाहर से नजर नहीं आ रहा था . बड़ी कोफ़्त होती है रेवती को , लोग  ऐसे घरों में क्यों रहते हैं कि ना बाहर से कुछ नजर आये ना भीतर से बाहर के लोग नजर आयें .
मैं वकील साहब से बात करके आता हूँ , फिर साथ ही कोर्ट में चलना पड़ेगा ...तुम जीप में ही रहना , हम आते हैं. कहते हुए पापा उस बड़े से बँगले के भीतर चले गये.
आधा घंटा हो गया था पिता को अन्दर गये हुए और उस बड़े बंगलों वाली सुनसान सड़क पर जीप की अगली सीट पर उबासियाँ लेती हुई दोनों हाथों में सिर छिपाकर स्टीयरिंग के सहारे बैठी रेवती मन ही मन खुद से बात कर रही थी . कहीं भी नींद ना आने की भयंकर बीमारी थी रेवती को वरना इस शांत स्थान पर नींद का एक दौर तो आसानी से पूरा हो सकता था . बहुत गुस्सा और झुंझलाहट हो रही थी उसे अपने आप पर . पापा के साथ आने का लोभ क्यों किया उसने .  बस से ही आ जाती तो इतनी बोरियत तो नहीं होती .
" दीदी जी , आपको साहब अन्दर बुला रहे हैं ", जीप के पास से किसी की आवाज़ सुनकर उसने सिर उठाकर देखा. शायद उस बंगले का नौकर था .
जी पापा , आपने बुलाया !
ये मेरी बेटी रेवती है . यहीं कॉलेज के हॉस्टल में रहती है .
नमस्ते अंकल , कहते हुए रेवती ने हाथ जोड़ दिए .
 आज कॉलेज की छुट्टी है . नाहक ही मैं अपने साथ ले आया . रेवती से मुखातिब होते हुए उसके पिता ने कहा ...हमें बहुत समय लगेगा , तुम यही आराम करो.
कोई बात नहीं ,यह भी अपना ही घर है . किशोर , इन्हें दीदी के पास ले जाओ . वकील साहब ने अपने नौकर से कहा.

कानून की मोटी किताबों और फाइलों के अम्बार से सजे उनके ऑफिस में पिता के साथ कम्पनी के केस की हीयरिंग की तैयारियां चल रही थी.
बड़ी सी कोठी की आलिशान बैठक को क्रॉस कर नौकर उसे गेस्ट रूम में ले गया .
आप बैठिये , मैं दीदी को बुलाता हूँ .
बैड , ड्रेसिंग टेबल , स्टडी टेबल पर लैम्प , बड़ी आलमारियां . मन ही मन सोच रही थी रेवती . ये इंतजाम तो मेहमानों के लिए है तो खुद के लिए क्या होगा.
पूरे घर में जैसे सन्नाटा सा था . बंगला उपन्यासों की गंभीर पाठिका रेवती ने सोचा ,बड़ी कोठियां निर्जन होने के लिए अभिशप्त ही होती हैं शायद.
थोड़ी देर में एक युवती एक युवक का सहारा लेकर धीरे -धीरे चल कर कमरे में आई . गर्भावस्था के कारण चलने में उसे थोड़ी परेशानी थी .
दोनों के बीच परिचय का आदान प्रदान हुआ . इस घर की बेटी शर्मीला अपनी पहली जचगी के लिए मायके आई हुई थी . उनके विवाह को अभी डेढ़ साल ही हुआ था . अपने और अपने भाई वीर के परिचय के साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि माँ को आवश्यक काम से लिए शहर के बाहर जाना पड़ा . डिलीवरी में अभी एक महीने से भी ज्यादा का समय है .
तब तक किशोर चाय ले आया .
सचमुच उसे चाय की बहुत तलब हो रही थी .  जीप से उतर कर एक चक्कर भी लगाया था उसने आस पास कि कही कोई चाय की दूकान नजर आये , मगर वहाँ तो दूर- दूर तक सन्नाटा पसरा था , कुछ ऐसा ही सन्नाटा कोठी के भीतर भी महसूस हुआ उसे . इतने बड़े बंगले में घर में कुल तीन प्राणी थे , दो नौकर जो घर के पिछले हिस्से में बनी रसोई में नाश्ते और खाने के प्रबंध में जुटे थे . वह अपनी कॉलोनी के छोटे से बंगले में भरे -पूरे परिवार के शोरगुल के बीच रहने की आदी थी .

चाय ले लो , नाश्ता भी तैयार है ...दीदी किशोर को आदेश दे रही थी , थोड़ी देर में ले आना !
नहीं , आप लोग करें नाश्ता . मैं घर से करके आई हूँ !
संकोचवश साफ़ झूठ बोल गयी रेवती . नाश्ता कहाँ किया था उसने.
शर्मीला दी ने उससे उसकी कॉलेज के बारे में पूछा ...वे आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से बोली .  अच्छा , इसी कॉलेज में पढ़ती हो , ये तो हमारे घर के पास ही है . मैंने भी अपनी बी एस सी यही से की है . 
 शर्मीला की ख़ुशी ने जताया कि उन एकसार लम्हों या स्थानों से गुजरे लोग अचानक ही अपने सहयात्री लगने लगते है. और रेवती को महसूस हुआ जैसे विदेश में एक ही कस्बे के रहने वाले दो अजनबी मिले हों .
फिर वे सभी लेक्चरर्स के बारे में पूछने लगी . फिजिक्स की नयी मैंम आई हैं. कैमिष्ट्री के सर पुराने हैं .  वे अपने ग्रुप की पुरानी शरारतों को याद कर रही थी. जब रेवती ने बताया कि हम भी उन लम्बे और दुबले पतले सर को पेंडुलम सर(उनके सामने नहीं ) कह कर ही बुलाते हैं , तो वे खूब हंसी .
इस हंसी में वीर भी शामिल था और उसने टोक दिया कि मेरा अक्सर आना होता है कॉलेज में . एक बार सहमी रेवती मगर फिर से उसी उत्साह से बोली - तो क्या , मैं थोड़े ना बुलाती हूँ उन्हें पेंडुलम . मेरी अच्छी इमेज है क्लास में . सबसे ज्यादा सवालों के सही जवाब मैं ही देती हूँ .
तीनों की बातों का दौर कई घंटो तक चलता रहा, खेल , राजनीति , कॉलेज लाईफ , प्रतियोगी परीक्षाएं , फ़िल्में ,साहित्य ,शरतचंद्र , प्रेमचंद्र कौन सा ऐसा विषय नहीं होगा जो उनकी बहस में शामिल नहीं हुआ होगा . इस बीच वीर खुद चाय भी बना लाया . दीदी हँसते हुए उसे छेड़ रही थी. कुछ खा रही नहीं हो , चाय तो पी लो .
बीच में वह घडी भी देख लेती . दोपहर हो आई थी . उसे बुरा लग रहा था शर्मीला दीदी के लिए . उन्हें आराम की जरुरत थी और उन्हें उसके कारण इतनी देर वहां बैठा रहना पड़ रहा था . बाहर कुछ क़दमों की आहट सुनकर बोला वीर , अंकल आ गये हैं शायद .
रेवती ख़ुशी से एकदम बाहर लपकने को हुई तो शर्मीला और वीर हँस पड़े .
क्या हम तुम्हे इतना बोर कर रहे थे .
अरे नहीं , झेंप गयी रेवती . बल्कि मैंने आप लोगों को इतना परेशान किया . इतना समय लिया . अच्छा लगा आप लोगो से ढेर सारी गप शप कर के .
रेवती , आ जाओ ... पापा आवाज़ लगा रहे थे . 
रेवती उन लोगों से इज़ाज़त लेकर बाहर आ गयी .

हॉस्टल में सन्डे यानि छुट्टी का दिन बहुत ख़ास होता है . बाथरूम के बाहर अपना टॉवेल ,ब्रश , बाल्टी ,मग और कपड़ों सी लदी फंदी लड़कियां लाईन लगाकर खड़ी थी. आम दिनों से अलग आज देर से सोकर उठना, बालों में शैम्पू करना , कपड़े धोकर सुखाना, अपनी टेबिल , ब्रीफकेस में समान को करीने से रखना . और सबसे बड़ी तैयारी आउटिंग के लिए . रेवती का कोई लोकल गार्जियन नहीं था इस शहर में . इस लिए बहुत सी लड़कियों की तरह उसे किसी के आने का इंतज़ार नहीं था , ना ही आज कहीं बाहर जाने का मन था इसलिए वह अपने बिस्तर में धंसी किताबों में डूबी थी .
तभी अचानक लड़कियों के झुण्ड में हलचल मची . बाथरूम में अपनी लाईन का झगडा भूल सब एक साथ बाहर की ओर लपक ली . उसकी रूममेट माया उसका हाथ खींचते हुए से बोली ," चल बाहर , वीर आये हैं "
कौन वीर , किसके भैया और तुम इतना उत्साहित क्यों हो रही हो ,तुम्हारे भी रिश्तेदार हैं ??
अरे नहीं पागल . वो तो उषा के चचेरे भैया , जो उसके लोकल गार्जियन है, उनके दोस्त हैं. हमारी ऐसी किस्मत कहाँ ! 
 आह भरने का नाटक करते हुए माया ने कहा .
नौटंकी , अभी पूछ लो कि अकबर किसका पुत्र था तो याद नहीं आएगा , और लड़कों की दूर-दूर की रिश्तेदारी तक मालूम है .

रेवती बहुत खीजती है लड़कियों की इस आदत पर. किसी का भी कोई रिश्तेदार आ जाये . इनकी खिंचाई या ताकाझांकी से नहीं बच सकता . कौन कहता है कि लड़के ही छेड़ते हैं लड़कियों को . कोई इन गर्ल्स हॉस्टल के नज़ारे देखे . कोई भी स्टुडेंट का रिश्तेदार कोई हैंडसम लड़का अगर उससे मिलने आ गया तो उसकी खैर नहीं , सवाल कर के परेशान कर देती हैं .  यहाँ आकर उनकी सारी हीरोगिरी हवा हो जाती है .

सुनो , तुम ही करो यह ताका झांकी.

रेवती अलग है इन लड़कियों से . इस उम्र में जहाँ लड़कियों के आदर्श सिनेमा के स्टार होते हैं , उनके चित्र टेबल और दीवारों पर सजाते हैं , उसकी टेबिल पर सजती हैं लतामंगेशकर की वह तस्वीर जो उसने धर्मयुग के बीच के पेज से निकाली थी .

अरे , चल ना एक बार देख तो कितने हैंडसम है वीर जी . उसके दुगुने कद और शरीर की माया उसका हाथ खींचते हुए बाहर ले आई . गेस्ट रूम के बाहर के लौज में कुर्सी पर बैठे वे लोंग अपनी बहनों से बात कर रहे थे ,सामने खुले लॉन में बहुत सी लड़कियां अचानक ही पढ़ाकू बनी किताबों से जूझ रही थी . माया ने टोहका मारा ।  देख उस वनश्री की किताबें , उलटी पकड़ी हैं . दोनों ठहाका मारकर खूब हंसी, हँसते हुए ही अचानक उसकी नजर लाउंज में बैठे वीर की ओर देखा.

ओह ,ये वही वीर श्रीवास्तव है . जिनसे पिछले हफ्ते इतनी लम्बी बातचीत हुई थी. परिचय की एक झलक आँखों में देख कर कुछ कदम आगे बढती रेवती वही रुक गयी . यदि इन लड़कियों को पता चल गया कि उनके हीरो से, जिसकी एक झलक देखने के लिए वे लाईन लगा कर खड़ी रहती हैं , उसकी बहनों की खुशामद करती है कि वो आये तो उनको हमारा परिचय भी देना , उससे रेवती मिल चुकी है , इतनी देर तक गपबाजी कर चुकी है तो खोद -खोद कर सवालों की झड़ी लगा देंगी , और बिन बात की बात मशहूर हो जाएगी.
तुम ही मिलो इन लोगों से . मैं तो चली . माया से हाथ छुड़ा कर रेवती अपने कमरे की ओर बढ़ गयी .
बहुत लोगों के लिए ख़ास हो जाने वाली घटनाएँ किसी के लिए कितनी आम हो जाती है . या जीवन में जो साधारण घट जाता है , वह कितना असाधारण भी हो सकता है ! लौरिया के निकट स्थित अशोक स्तम्भ फिर से याद आया रेवती को !


रविवार, 6 नवंबर 2011

साहित्य से सिनेमा तक ......

कल ही चेतन भगत की रिवोल्यूशन २०२० पढ़ कर समाप्त की . चेतन भगत के लेखन को लेकर साहित्यिक हलकों में अक्सर बहस छिड़ जाती है कि उनका लेखन गंभीर नहीं है , साहित्य नहीं है, मगर फिर भी उनके उपन्यासों की रिकोर्ड़तोड़ बिक्री बताती है कि आजके समय के लोकप्रिय लेखकों में से हैं .

साहित्य देश या समाज की तत्कालीन सामाजिक , आर्थिक और मानसिक परिस्थितियों को प्रदर्शित करते हैं, और चेतन के उपन्यासों में भी वर्तमान पीढ़ी का जीवन पूरी ईमानदारी से झलकता है. युवाओं की सोच , प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने के लिए तथा अपने तयशुदा मुकाम को पाने के लिए किसी भी स्तर तक जाना , उससे असंतुष्ट होकर फिर से अपनी जड़ों को तलाशना , समाज में क्रांति की अलख जगाने जैसे उतार- चढ़ाव वाले जीवन को चेतन अपने उपन्यासों में बखूबी उतारते हैं . चेतन अपने उपन्यासों में पात्रों को सिर्फ प्रस्तुत करते हैं , कोई फैसला नहीं सुनाते . आपाधापी के इस युग में आम इंसान के लिए अपने भीतर के जुझारू इंसान को जगाये रखना बहुत मुश्किल होता है और ऐसे में नायक और खलनायक दोनों की छवि एक-सी ही हो जाती है . अब ये पाठक पर निर्भर करता है कि वह पात्र की किस छवि को देखता है और निर्णय लेता है कि कौन नायक है , कौन खलनायक , किसे अच्छा समझा या किसे बुरा ...

जैसा कि अक्सर कोई उपन्यास पढने के बाद होता है , इस उपन्यास के पात्र गोपाल , आरती और राघव दिमाग बहुत देर तक दिमाग में घूमते रहे . तीनों का बचपन , गोपाल के भीतर पलती ईर्ष्या , आरती का भोलापन , राघव की निष्ठा , गोपाल की खलनायकी और फिर प्रतिस्पर्धा में राघव से पिछड़े गोपाल का संघर्षपूर्ण स्थितियों में हीन भावना से ग्रस्त होकर अपने जीवन को शुक्लाजी जैसे राजनीति के माहिर खिलाडी के हाथ में सौंप देना , फिर ख़ामोशी से अपने प्यार के लिए त्याग करना ...
किसी भी उपन्यास को पढने के बाद देर तक वे पात्र साथ चलते हैं , उस समय उस परिस्थिति से गुजरते उन्होंने कैसा महसूस किया होगा, उनकी खुशियाँ , दुःख , दर्द सब अपने से ही हो जाते हैं . पता नहीं आप लोगों के साथ ऐसा होता है या नहीं.

ऐसा ही कुछ अनुभव गंभीर किस्म की मूवी देखने के बाद भी होता है, जब उनके पात्र हमारे साथ चलते रहते हैं , हम वास्तविक जीवन के चरित्रों से उन पात्रों को रिलेट करने लगते हैं , जबकि हम यह वास्तविकता जानते हैं कि किसी भी उपन्यास या मूवी का पात्र सिर्फ किसी एक चरित्र को नहीं जीता है , कई चरित्रों के समावेश से वह एक पात्र बुना जाता है . मूवी की बात करूं तो हालाँकि आजकल बहुत कम सिनेमा देखना होता है , टीवी पर चौबीसों घंटे फिल्मों के दोहराव ने इनके प्रति उत्सुकता कम कर दी है , मगर फिर भी लीक से हटकर गंभीर फिल्मे आकर्षित करती हैं .

बात हो रही है साहित्य और सिनेमा के हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की . किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को इनके पात्र प्रभावित करते हैं, हम देखते हैं अक्सर संवेदना से भरे दृश्यों में दर्शकों या पाठकों की आँखों से भी आंसू बह निकलते हैं , जबकि प्रबुद्ध पाठक या दर्शक वर्ग सिर्फ कहानी होने के सच को अच्छी तरह जानता है , फिर भी ....

सोचती हूँ जब दर्शकों या पाठकों पर इसका इतना असर होता है तो जो लोंग इसे जीते हैं यानि वे पात्र जो इन चरित्रों का अभिनय करते हैं , उनपर इनका कितना असर होता होगा . अभिनय को गंभीरता से लेने वाले व्यक्ति इससे अवश्य प्रभावित होते हैं . एक बार कहीं अमिताभ बच्चन जी का वक्तव्य पढ़ा कि फिल्मों में माँ-पिता के मरने पर अपनी संवेदनाओं को इतनी बार अभिनीत किया है कि मुझे लगता है ऐसी वास्तविक परिस्थितियों में शायद मैं कुछ महसूस ही ना कर पाऊं .
ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार को भी लगातार दुखी भावुक नायक का अभिनय करते हुए डिप्रेशन से अस्वस्थ होने पर चिकित्सकों ने कुछ दिन तक दुखी एवं उदास चरित्रों के अभिनय से दूर रहने की सलाह दे दी थी .
जब अभिनय करना या उन्हें पढना , सुनना या देखना ही इतना दुःख पहुंचाता है , तो वे लोंग कैसे बर्दाश्त करते हैं, यह दर्द जिनका अपना ही होता है !!!!

ऐसी ही मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर बनी दो फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया था. वहीदा रहमान के मुख्य चरित्र वाली " ख़ामोशी " और कमल हसन और श्रीदेवी की "सदमा " .
ख़ामोशी ,हेमंत दा के सुमधुर संगीत और गुलज़ार के नायाब गीतों के संकलन (हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू , तुम पुकार लो , वो शाम कुछ अजीब थी )से सजी यह फिल्म अपने आप में एक अनूठी फिल्म थी . मानसिक रोगी देव कुमार (धर्मेन्द्र ) और अरुण चौधरी (राजेश खन्ना ) का अपने प्रेम से इलाज़ करने वाली नर्स राधा (वहीदा रहमान ) अपने अभिनय में इतना खो जाती है कि अपने मरीज से प्रेम कर बैठती है , जबकि स्वस्थ होने के बाद वे अपनी नर्स को भूल जाते हैं, ये यादें एक दिन राधा को गहरी खामोशियों में ले जाती है और वह स्वयं एक मरीज बन कर रह जाती है .

इसी प्रकार की दूसरी क्लासिक फिल्म " सदमा " भी थी . यह तमिल फिल्म मुन्दरम पिराई की हिंदी रीमेक थी. इल्याराजा के संगीत और गुलजार के गीत (सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा ) . एक स्कूल में शिक्षक सोमू (कमल हसन ) को एक दिन अपने घर परिवार से बिछड़ी एक युवती लक्ष्मी (श्रीदेवी ) मिलती है , जिसका दिमाग एक बच्चे जैसा ही है . किसी दुर्घटना के कारण उसके दिमाग पर बहुत असर होता है और वह छः वर्ष की बच्ची की तरह ही व्यवहार करने लगती है . उसके इलाज़ की व्यवस्था के साथ ही उसके माता पिता को ढूँढने की जिम्मेदारी निभाता सोमू जब अपने उद्देश्य में सफल होता है तो लक्ष्मी उसे भूल चुकी होती है . फिल्म के आखिरी दृश्य में स्टेशन पर लक्ष्मी को सब भूल कर माता- पिता के साथ जाते हुए देखकर सोमू द्वारा उसे अपनी याद दिलाने की कोशिश वाला दृश्य भुलाये नहीं भूलता ....

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

जो आपके लिए अनमोल हो , हो सकता है कि दूसरों के लिए उसका मोल कौड़ी भर भी ना हो !




श्री राधा दामोदर , जयपुर

तीन दिन की दीवाली की छुट्टियों के बाद दो और दिन शनिवार और रविवार होने के कारण उत्सवी सप्ताह दो और दिन अधिक खींच गया है , अच्छा है , राम -श्यामा के दो अतिरिक्त दिन मिल जाने के बहाने पुराने परिचितों और रिश्तेदारों से भी मुलाकात हो जाती है . उत्तर भारत में अभी छठ तक त्योहारों की धूम रहने वाली है , वही कार्तिक व्रतियों के लिए यह धूम धाम कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाली है .

राधा -दामोदर को समर्पित इस पवित्र कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में विभिन्न तिथियों ( कार्तिक षष्ठी , गोपाष्टमी , आमला नवमी ,वैकुण्ठ चतुर्दशी , भीष्म पंचक ) के अनुसार पर्व विशेष उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं . सुबह -सवेरे महिलाओं और पुरुषों द्वारा तारों की छाँव में किये जाने वाली स्नान -पूजा और भजन , गीतों से पूरा वातावरण पवित्र हो उठता है . कार्तिक मास में दामोदर भगवान् को रिझाने के लिए ग्रामीण आंचलिक बोलियों में गये जाने वाले गीतों की बात ही अनूठी है . इन ( पाँवड़ियाँ , रसोई , बुहारी , आरती आदि ) गीतों के मध्यम से वे श्रीकृष्ण को विभिन्न वस्त्रादि , भोजन , खडाऊ आदि भेट करती हैं . ऐसा ही एक लोक भजन/गीत " श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ" मुझे बहुत प्रिय है . इन गीतों के मध्यम से ये स्त्रियाँ श्रीकृष्ण को अपने मध्य एक आम इंसान ही बना लेती हैं . योगेश्वर कृष्ण अपनी आम इंसानी लीलाओं के माध्यम से ही तो जन -जन से जुड़े हुए थे . वही बालसुलभ मिट्टी खाने , माखन मिश्री चुराने , माता को विभिन्न उलाहने देने , मित्रों के साथ चुहलबाजी जैसी कारस्तानियाँ ही उन्हें आम इंसान से इतना जोड़े रखती हैं कि वह उनके बीच का तू ही हो जाता है .

" श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ"

म्हे थाने पूछा म्हारा श्री भगवान्
रंगी चंगी पाँवड़ियाँ कुण घाली थांके पाँव
म्हे तो गया था राधा खातन के द्वार
वे ही पहराई म्हाने पवरियाँ जी राज़
इतनी तो सुन राधा खातन के जाए
खातन बैठी खाट बिछाए
म्हे तो ए खातन थां स लड़बा ना आया
थे मोहा जी म्हारा श्री भगवान्
थार सरीखी म्हारी पाणी री पणिहार
कान्हा सरीखा म्हारा गायाँ रा गवाल
राधा खातान में हुई छे जो रार
उभा -उभा मुलक श्री भगवान्
सामी पगां थे लड़बा ना जाए
आछो ए राधा मांड्यो छे रार
आप कुवाया पाणी री पणिहार
म्हाने कुवाया थे गायां रा गवाल ...

इस गीत में वर्णित कथा इस प्रकार है कि एक दिन श्री भगवान् के चरणों में रंग -बिरंगी खडाऊ देख कर श्री राधा उनसे पूछती है कि आपके पैरों में इतनी सुन्दर खडाऊ कहाँ से आई . श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि मैं खातन ( बढई की पत्नी ) के घर गया था , उसने ही मुझे इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट की . इस पर जलती- भुनती राधा उस खातन से लड़ने पहुँच गयी कि वह इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट कर श्रीकृष्ण को रिझाना /मोहना चाहती हैं . इस पर खातन उन्हें आड़े हाथों लेते हुए कहती है कि राधा ,तू अपने आपको क्या समझती है. तेरे जैसी तो मेरे पानी भरने वाली पनिहारनियाँ हैं , और तेरे कृष्ण जैसे मेरे गायों को चराने वाले गवाल , मैं क्यों उन्हें रिझाउँगी . राधा का गर्व चूर -चूर हो गया .
श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए कहते हैं ... " राधा , सामने होकर लड़ने गयी इसलिए ही खुद को साधारण पनिहारन और मुझे साधारण ग्वाला कहलाया ".

इस गीत में प्रेम और ईर्ष्या के कारण होने वाली तकरार तो है ही और सबसे बड़ी सीख यह है कि ईर्ष्या से ग्रस्त होकर जानबूझकर किसी से झगडा मोल लेने वाले का अपना मान- सम्मान तो कम होता ही है , बल्कि इसी कारण से वह अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को भी अपमानित होने पर विवश करता है .

इस गीत के बहाने ही उस साधारण स्त्री ने उन आत्ममुग्ध , अपने और अपने परिवार , अपन रुतबे से गर्वोन्मत्त सभी स्त्री- पुरुषों को सन्देश दे दिया जो बेवजह ईर्ष्या से ग्रस्त होकर उन पर अधिकार ज़माने की चेष्टा में अपने सबसे प्रिय व्यक्तियों की जगहंसाई करवाते हैं . यह कत्तई आवशयक नहीं कि जो व्यक्ति आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है , दूसरे के लिए भी उसका उतना ही महत्व हो .
जो आपके लिए अनमोल हो , हो सकता है कि दूसरों के लिए उसका मोल कौड़ी भर भी ना हो !