शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

हमारा जमाना , तुम्हारा जमाना ..


वार्तालाप के दौरान कई बार मुंह से फिसल ही जाता है , हमारे ज़माने में ऐसा होता था ,वैसा होता था , पिता के साथ धौल धप्पा करते उनके सिर चढ़े बच्चों को देख हममे से अक्सर आहें भर लेते हैं , हमारे ज़माने में कहाँ बच्चों की ऐसी हिम्मत होती थी कि पिता के सामने खड़े भी हो सके , हंसी मजाक तो दूर की बात थी . फिर झट से जीभ भी काट ली जाती है , ये क्या बुड्ढों के जैसे बातें करने लगे . वास्तव में हम लोंग ज्यादा समय वर्तमान में नहीं अपितु भविष्य या भूतकाल में ही जीते हैं ....

हमारे कंप्यूटर शिक्षा केंद्र पर कंप्यूटर चलाना सिखाने के अलावा कभी बायोडाटा अथवा कोई ज़रूरी कागज़ का प्रिंट निकालने का काम भी कर दिया जाता था . इसी दौरान एक दिन सेना से रिटायर्ड एक व्यक्ति का अपने कुछ ज़रूरी कागजों को संशोधित कर प्रिंट लेने के लिए आना हुआ . मुझे कंप्यूटर पर टाइपिंग अशुद्धियों को ठीक करते हुए देख कहने लगे , " आजकल तकनीक ने हर काम कितना आसान कर दिया है , हमारे ज़माने में तो टाईपराईटर पर एक- एक पेज बहुत सावधानी से टाईप करना पड़ता था , एक भी गलती हुई तो दुबारा पूरी मेहनत करनी होती थी ."
मैंने कहा , "क्या परेशानी है , आप अभी भी कंप्यूटर सीख सकते हैं और जमाना आपके साथ हो जाएगा ."
वे खुश हो गये , हाँ , ये ठीक है .
फिर पूछने लगे कि क्या वास्तव में मैं सीख सकता हूँ , इसमें मुझे परेशानी तो नहीं आएगी . मैंने कंप्यूटर सीखने वाले दस बारह साल के बच्चों की ओर इशारा किया , देखिये, ये लोंग सीख रहे हैं , क्या आपका सामान्य ज्ञान दस बारह साल के बच्चों जितना भी नहीं है जो आप नहीं सीख सके .
वे आश्वस्त हो गये और कहने लगे कि वास्तव में आजकल तकनीक ने जीवन कितना सरल कर दिया है , अब तो बहुत लम्बा जीने को मन करता है . जीवन के प्रति उनकी ललक और आत्मसंतुष्टि को देखकर बहुत अच्छा लगा कि वे ज़माने के रंग में घुल मिल रहे हैं , जमाना उनके हाथ से फिसला नहीं है .

जब सोचना शुरू किया कि वास्तव में हमारा जमाना , तुम्हारा ज़माने का झगडा क्या है तो विचार पीछा करते हुए एक और पुराने ज़माने की ओर ले गये . ऋषि मुनियों के समय का ज़माना ,जहाँ प्रत्येक मनुष्य की आयु को कम से कम सौ वर्ष मानते हुए उसे चार आश्रमों में विभाजित किया गया था .
पहला ब्रह्मचर्य आश्रम जहाँ बालकों को अपनी संस्कृति और मर्यादाओं से परिचित करवाते तथा पालन करते हुए आने वाले जीवन के लिए उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृढ़ किया जाता था , इस समय वे गुरु के अधीन रहते हुए विद्यार्थी के रूप में अपना जीवन व्यतीत करते थे .
इसके बाद गृहस्थ आश्रम की शुरआत होती थी जिसमे सांसारिक गतिविधियों जैसे विवाह , संतानोत्पत्ति , जीवन यापन के लिए शासन , कार्य या व्यापार की जिम्मेदारी का वहन किया जाता था . जब युवा इन सांसारिक गतिविधियों में प्रवीण होकर जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए परिपक्व होते थे उस समय उनकी अगली पीढ़ी के लोंग तीसरे आश्रम वानप्रस्थ की तैयारी में लग जाते थे .

युवाओं को पूर्ण सत्ता हस्तांतरण जैसी यह व्यवस्था दो पीढ़ियों के टकराव की सम्भावना को जड़ से ही समाप्त कर देती थी . वानप्रस्थ आश्रम में सांसारिक गतिविधियों से हटकर वन में रहते हुए स्वाध्याय , सेवा , यज्ञ , दान आदि द्वारा जीवन का सार्थक उपयोग किये जाने की व्यवस्था सामाजिक ढांचे को संतुलित करती थी . इस समय बड़े बुजुर्ग वन में रहते हुए स्वयं को परिवार के भरण- पोषण अथवा नीति निर्धारण की जिम्मेदारी से मुक्त रखते थे . इस लिए उनका जमाना और नई पीढ़ी का जमाना अलग माना जाता था क्योंकि आश्रमों की व्यवस्था के कारण दोनों पीढ़ियों के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा थी . वे एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे , शासन अथवा गृहस्थी की जिम्मेदारी पूर्णतः युवा पीढ़ी के हाथों में होती थी जिसे वे अपने विवेक का पालन करते हुए अपनी सुविधानुसार ही उठाते थे . पूर्णतः स्वतंत्र होने के कारण उनकी अपनी नीतियाँ होती थी जो उन्हें अपनी अगली पीढ़ी से अलग करती थी और इस तरह दोनों के ज़माने भी अलग अलग ही निरुपित या सीमांकित होते थे .

उसके बाद संन्यास आश्रम का प्रारंभ होता था जिसमे कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर अक्सर सांसारिक गतिविधियों का पूर्णतः त्याग कर दिया जाता था .

समय के बदलने के साथ बढती सुविधाओं ने विभिन्न आश्रमों की अवधारणा अथवा संकल्पना को ही बदल दिया है . समय की मांग को देखते हुए अपनी जिम्मेदारियों के वहन में युवा , अधेड़ और वृद्ध के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं रही है . भरण पोषण के लिए आवश्यक गतिविधियों के अतिरिक्त नीति निर्धारण में भी युवा , अधेड़ और वृद्धों की सामूहिक जिम्मेदारी और अहमियत है . इसलिए इस समय हमारा जमाना , तुम्हारा जमाना कहना ज्यादा उचित नहीं !

हमारा जमाना , तुम्हारा जमाना ..वास्तव में जमाना तो उस समय का ही होता है जिससे हम गुजर रहे होते हैं ,उस समय में गुजर रहे लोगों का नहीं !

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

नृत्य भी ईश्वर के रूबरू होने का एक ज़रिया है !


चौंसठ कलाओं में से एक प्रुमख कला है नृत्य -कला. विभिन्न हाव भाव के साथ एक लयबद्ध रूप में घूर्णन को ही नृत्य कहा जाता है . मानव के इतिहास जितना ही पुराना है
नृत्य का इतिहास .
नृत्य कला हमारी भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख अंग है . हमारे देश में शास्त्रीय और लोक नृत्यों की एक विशिष्ट परंपरा है. ईश्वर को रिझाने के लिए अथवा अपनी ख़ुशी या आभार प्रकट करने के लिए मंदिरों में नृत्य -भजन की क्या बात है. हमारे तो आराध्य भी स्वयं इस कला के प्रणेता हैं . नटराज शिव की ता- ता -थैया पर तो कई बार सृष्टि का आदि -अंत हुआ . कृष्ण का अपने चरणों द्वारा कालिया का मर्दन हो या राधा और गोपियों के संग रास , नृत्य ही तो था.
नृत्य को कब कला और इतिहास का विषय बनाया गया यह अलग बात है , मगर बच्चा जब चलना शुरू करता है तो उसकी ठुमक भी नृत्य का ही एक प्रतीक बन जाती है . ठुमक चलत रामचंद्र की स्वरलहरियों पर किसी भी बालक /बालिका को डगमगाते क़दमों से चलते देख नृत्य का ही आभास होता है . हाव भाव क्या कम होते हैं जैसे एक- एक कदम आसमान पर रखा जा रहा है . चलना सीखने वाले बच्चे के चेहरे का उल्लास नयनाभिराम दृश्य बन जाता है .
आज की युवा पीढ़ी अन्य विदेशी संस्कारों के साथ ही विदेशी नृत्य के प्रति अधिक उत्सुक दिखती है . विभिन्न टी वी शो में होने वाली नृत्य प्रतियोगिताएं से शास्त्रीय और लोक नृत्य लगभग गायब ही हैं . आज हिप हॉप , कंटेम्पररी , बैले , फ्यूजन का ही बोलबाला है . विभिन्न प्रॉप के सहारे जिम्नास्टिक -सा प्रदर्शन करती इन प्रतियोगिताएं को लेकर मेरी धारणा इतनी अच्छी नहीं रही कभी मगर इधर कुछ नृत्य प्रतियोगिताएं में विभिन्न कोरिओग्रफर्स की प्रस्तुति ने प्रभावित किया .
डी आई डी सीजन थ्री जैसे नृत्य कार्यक्रम ने अपनी कोरिओग्राफी और प्रतियोगियों के हाव- भाव , साहस और नृत्य के प्रति समर्पण ने बहुत चौंकाया . अपने भाव -सम्प्रेषण से इस दौर के युवा साबित करते हैं कि इस पीढ़ी में भावनाएं पूरी तरह मरी नहीं हैं . ऐसा ही एक दृश्य इस नृत्य प्रतियोगिया के दौरान नजर आया .

पिता को खो देने के मानसिक आघात से पीड़ित इस युवती अपने पिता को अपने आस पास ना पाने और आभासी रूप में पिता के साथ होने के बीच भावों का प्रदर्शन किसी भी इंसान को भावुक करने की सामर्थ्य रखता है .




इन नृत्य भंगिमाओं में संप्रेषित आध्यात्म जैसे स्वयं ईश्वर से साक्षात्कार करवाता है ....


सोमवार, 19 दिसंबर 2011

जिंदगी सबकुछ सिखा देती है .....

लगभग एक महिना हुआ इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए . वैसे तो कौन लेखन महारथी है या ब्लॉग अथवा फेसबुक पर दोस्तों की बहुत लम्बी लिस्ट है जो इतना लम्बा समय तक ना लिखने से कुछ फर्क पड़ता . लिखते हैं तो अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए ही या लेखन की दुनिया में जाने जाने के लिए या अपनी पहचान बनाये रखने के लिए जो कारण आपको सुविधाजनक और आपके अहम को पुष्ट करे , वही मान लिया जाना चाहिए , हालाँकि सामाजिक और कर्मचारी संगठन से जुड़े पतिदेव को कई बार कौंच देती हूँ कि आपके कार्यों से आपको जानने वाले आपके शहर या राज्य में ही हैं ,हमें तो पूरे विश्व में हमारे लेखन से जाना जाता है . किसी भी व्यक्ति को उसके नाम से जाना जाये , कितनी संतुष्टि देता है ना ...पतिदेव भी मुस्कुरा देते हैं , मैडम, आपकी इस लोकप्रियता का बिल हमी को भरना पड़ता है . आखिर इंटरनेट का बिल तो वही चुकाते हैं :)...

खैर बात हो रही थी लम्बी अनुपस्थिति की . चाचा जी के देहावसान के बाद उनके द्वादसे पर हैदराबाद जाना हुआ . पिछले कई वर्षों से परिजन अपने शहर आने का आमंत्रण दे रहे थे , मगर जाना संभव ही नहीं हुआ . एक दो विवाह समारोह भी हुए थे , मगर उसी समय बच्चों की परीक्षाओं के कारण पतिदेव को अकेले ही इन कार्यक्रमों में शामिल होना पड़ा .
मगर सुख में साथ ना दिया जा सके , मगर दुःख में परिवार जनों की उपस्थिति बहुत हिम्मत देती है . ऐसे में बड़े परिवारों का सकारात्मक पक्ष भी नजर आता है . चाचाजी की उम्र अधिक नहीं थी , साठ से कुछ वर्ष ही ऊपर हुई थी , मगर अस्वस्थता के कारण पिछले दो-तीन वर्षों से निष्क्रिय जीवन ही बिता रहे थे. भाइयों ने कम उम्र में ही अपनी जिम्मेदारियां सँभालते हुए घर की अन्य जरूरतों को पूरा करते हुए भी उनके इलाज़ में कोई कोताही नहीं बरती . मगर होनी को जो मंजूर हो , वही होता है . निष्क्रिय ही सही , घर के प्रमुख सदस्य की उपस्थिति भी बहुत मायने रखती है . पिछले कुछ समय से तेजी से गिरते उनके स्वास्थ्य के कारण नियति को स्वीकार लिया गया था इसलिए माहौल इतना गमगीन नहीं था या फिर ये कहें कि विपरीत परिस्थितियां बच्चों को कम उम्र में ही मजबूत बना देती हैं . श्रीवैष्णव परम्परा के अनुसार ही सारी रस्मे निभायी गयी . अन्य संस्कारों के साथ ही प्रतिदिन दिवंगत को रुचने वाली मिठाई या पकवान बनाना , द्वादसे के दिन कम से कम पांच मिठाई और अन्य पकवानों के साथ "न्यात" जिमाना (मृत्यु भोज ), ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी पहनाने के अतिरिक्त परिवार के प्रत्येक विवाहित सदस्य के ससुराल पक्ष से परिजनों को वस्त्रादि भेंट करना आदि ... इन रस्मों के औचित्य पर सोचते हुए मैंने जो निष्कर्ष निकाला वह यह था कि गहन दुःख के क्षणों में सदमे से उबरने के लिए परिजनों का ध्यान दूसरी ओर आकर्षित करने के लिए या फिर इस अवसर पर दिए जाने वाले धन आदि से परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए इस प्रकार की रस्मों की शुरुआत की गयी होगी जो कालांतर में जबरन थोपे जाने वाले रिवाज या सामाजिक परम्पराएँ बन गयी . जो भी कारण हो , आजकल इन परम्पराओं के औचित्य पर गहन विमर्श किया जाता है , कही -कही तो इन रस्मों से मुक्ति भी पा ली गयी है , आर्थिक रूप से अक्षम लोगों पर परिजन को खोने के बाद इन सभी रस्मों के लिए धन की व्यवस्था उन्हें और दुःख ही पहुंचाती है .

परिवार के सबसे बड़े सदस्य होने की जिम्मेदारी निभाते हुए माँ एक महिना तक चाची के साथ ही रहने वाली थी , हमारे लौटने के दो दिन बाद ही माँ को अचानक सीने में दर्द के कारण हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा , कुछ टेस्ट और एन्जीओग्राफी की रिपोर्ट में मायनर हर्ट अटैक के साथ ही हर्ट में ब्लौकेज होने की पुष्टि हुई और अब वे एन्जीओप्लास्टी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं .

तेजी से हुए इन घटनाक्रमों ने इस विश्वास को और बढाया कि हम लाख उठापटक कर लें , प्लानिंग बना ले मगर अपनी अँगुलियों पर नचाता हमें ईश्वर या नियति ही है . वरना कहाँ तो परिवार के एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए माँ के साथ अपने पूर्वजों के ग्राम जाने की योजना बन रही थी और कहाँ अचानक हैदराबाद जाना हुआ , परिवार का एक सदस्य कम हुआ ,साथ ही माँ को भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा .

जन्म के साथ मृत्यु का दौर अटल और अवश्यम्भावी है , हम सभी जानते हैं . दो बुआ और फूफा का देहावसान हो चुका हैं , उनके बच्चों से मिलते हुए कितना कुछ मन में गुजरता है और मन ही मन माँ की छत्रछाया के लिए ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ , क्योंकि अधेड़ावस्था की ओर बढ़ते हम लोंग अभी भी उनके सामने बच्चे ही बने होते हैं . कम उम्र में ही अपने परिवार की जिम्मेदारी सँभालते इन भाई बहनों से मिलते उनकी मजबूत इच्छाशक्ति और जिजीविषा को सलाम करने को मन करता है .

उम्र बढ़ने के साथ परिवार के पुराने सदस्यों का साथ छूटने के अतिरिक्त नए सदस्यों का जन्म अथवा जुड़ना भी होता है मगर फिर भी लगता है जैसे परिवार सिकुड़ता जा रहा है. जिन परिजनों की गोद में खेले , जिनके साथ बड़े हुए वे पीछे छूट जाते हैं और नए जुड़ने वाले सदस्यों से दूरियों के कारण ज्यादा परिचय नहीं हो पाता .

सभी रस्मों के बाद एक दिन शहर के उस हिस्से में भी चक्कर लगा आये जहाँ बचपन और युवावस्था का कुछ समय गुजारा था . अत्यधिक ट्रैफिक के कारण हुए दबाव से चारमिनार को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए बस स्टैंड के हट जाने के अतिरिक्त कोई बड़ा फेरबदल नहीं लगा मुझे . अक्सर शाम को घूमते हुए चारमिनार के पास चक्कर काट आना , खोमचों पर भेलपुरी का स्वाद लेना बहुत याद आया . मक्का मस्जिद , मदीना बाजार , रेडीमेड कपड़ों या ड्रेस मेटेरियल का होलसेल बाजार पटेल मार्केट , गुलजार हौज़ से ईरानी गली  के बीच पैदल घूमते हुए बहुत कुछ याद आया .

दुःख के क्षण हर व्यक्ति पर अलग -अलग प्रभाव डालते हैं . हमें भीतर से और मजबूत करते जाते हैं , व्यावहारिक बनाते हैं या फिर कभी -कभी संवेदनाहीन भी बनाते हैं, कहा नहीं जा सकता . ईश्वर और प्रकृति हमें हर कदम पर सचेत और सावधान करती है , क्रिया , प्रतिक्रिया और विशिष्ट प्रतिक्रिया के अनुसार लोगों पर इसका असर भिन्न होता है .
 
पड़ोसन आंटीजी भी शारीरिक व्याधि से जूझती हुई पिछले एक महीने से बेड रेस्ट पर हैं . रोज उनके साथ कुछ समय गुजारना , माँ के साथ रहना , बचे समय में अपना घर संभालना , इन दिनों ब्लॉगिग की बजाय मुझे यही ज्यादा सार्थक लग रहा है . अब इस पर आप मुझे घरेलू जिम्मेदारियों से त्रस्त महिला समझे और बहनजी जैसे संबोधन देना चाहे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि मैं जानती हूँ कि आभासी दुनिया से जुड़ने के साथ ही वास्तविक दुनिया के रिश्तों को संभालना , उन्हें समय देकर मैं अपने जीवन को सार्थकता ही दे रही हूँ .

इन दिनों परिवार से जुडी और भी वारदातों (!!) के बीच सभी के व्यवहार पर नजर डालते एक निष्कर्ष भी निकाला , परिवार के सबसे बड़े या अपनी जिम्मेदारी समझने वाले सदस्य के हिस्से में सम्मान और जिम्मेदारियां आती हैं , जबकि छोटे अथवा गैरजिम्मेदार के हिस्से में लाड़- दुलार और पैसा ... ईमानदारी से कहूं इन जिम्मेदारों को देखकर कभी -कभी ख़याल भी आता है कि कोरे सम्मान का क्या अचार डलता है ?
क्या कभी आपके मन में भी किसी जिम्मेदार सदस्य को देखते हुए यह खयाल आता है !!

माँ और पड़ोसन आंटी जी के लिए आपकी दुआओं और शुभकामनाओं की दरकार रहेगी , क्योंकि दुआओं से ही दवाओं में असर होता है !