बुधवार, 20 जून 2012

जंगल का लोकतंत्र ....



जंगल में सभी जानवर एक दूसरे के दुश्मन होकर भी हिल -मिल कर रहते थे . शेर , चीता , हाथी जैसे बड़े और बलवान भी तो लोमड़ी ,भेड़िये जैसे धूर्त भी .,यहाँ तक कि खरगोश , हिरन जैसे निरीह जंतु भी. इन सब जानवरों ने मिलकर शेर को राजा बना लिया था . सदियों से राजा बने रहने के कारण शेर को अपने आप पर बहुत घमंड हो गया था . वह भूल गया था कि सभ्यता के विकास और प्राकृतिक उथलपुथल का असर मनुष्यों के साथ जानवरों के स्वभाव और प्रकृति में भी स्पष्ट नजर आने लगता है . 

समय के साथ परिवर्तन अवश्यम्भावी है . शेर के खिलाफ भी जंगल के प्राणियों में खुसर- फुसर शुरू हो गयी . अपने घमंड में सना शेर यह नहीं समझ पाया था कि जनता में व्यवस्था से पनपा असंतुष्टि का भाव सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका निभाता है . बलवान शेर से मुकाबला किसी एक अकेले जानवर के लिए संभव नहीं था . सभी जानवरों ने विचार विमर्श कर निर्णय लिया कि हाथी बलवान तो होते ही हैं और झुण्ड में रहना उनकी शक्ति को और बढाता है ,वही धूर्तता में लोमड़ी का कोई सानी नहीं है इसलिए यदि ये दोनों एक साथ शेर के खिलाफ एकजुट हो जाए तो उसका घमंड तोडा जा सकता है .

जंगल में सभा हुई और सर्वसम्मति से हाथी और लोमड़ी को मिलकर जंगल का प्रशासन सँभालने का भार सौंपा गया .शेर के सामने पदत्याग के सिवा चारा नहीं था .अब चूँकि लोमड़ी और हाथी को एक साथ व्यवस्था का सञ्चालन करना था तो दोनों ने आपसी सहमति से तय किया कि दोनों बारी -बारी से 6 महीने के लिए जंगल का राज्य संभालेंगे . जब हाथी राजा होगा तो लोमड़ी को उसके निर्देशों का पालन और सहयोग करना होगा , वही कार्य लोमड़ी के जंगल की बागडोर सँभालने पर हाथी को करना होगा .सबसे पहले लोमड़ी को राज्य सँभालने का मौका मिला . लोमड़ी स्वभाव से ही धूर्त होती है , उसने पद सँभालते ही अपनी मीठी बोली से सभी जानवरों को अपने पक्ष में करने का अभियान प्रारंभ कर दिया . 

अपनी स्थिति कमजोर देखकर शेर अभी तो चुप बैठा था मगर भीतर ही भीतर उसने हाथियों को भड़काना शुरू कर दिया . उसने हाथी को समझाया कि 6 महीनों तक लोमड़ी अपनी पैठ जमा चुकी होगी , जानवरों के साथ खजाने पर भी उसका आधिपत्य हो जाएगा , तुम तो बस राजा बनने के सपने ही देखते रहना . हाथी को भी अब शेर की बातों में दम नजर आता था . उसने व्यवस्था बनाये रखने के लिए लोमड़ी के लिए गए हर निर्णय का विरोध करना शुरू कर दिया . आये दिन हाथियों और लोमड़ी में तकरार होने लगी जिसका असर प्रबंधन पर भी नजर आने लगा . जिस अव्यवस्था से उकताकर जानवरों ने इन्हें अपना राजा बनाया था , वह तो ठीक हुई नहीं , उलटे जानवरों के छोटे- छोटे झुण्ड बनकर उनमे आपस में बैर भाव शुरू हो गया . 

अब बेचारे जानवर रोज माथा पीटते थे . इससे तो शेर ही भला था, सिर्फ एक तानाशाह ही तो था , उसे तो जैसे- तैसे झेलते थे , अब तो हर तरफ से मार पड़ने लगी थी . हाथी और लोमड़ी के बीच बढती कलह को देखकर आखिर जंगल में मध्यावधि चुनाव करवाए गए . जंगल की जनता खिचड़ी सरकार की करमात देख चुकी थी इसलिए इस बार शेर को भारी समर्थन से राजा बनाया गया . अब चूँकि सत्ता की चाबी शेर के हाथ में थी , वह फिर से बलशाली हो गया था . उसने अपने गुप्तचरों को सभी उन प्रमुख जानवरों के पीछे लगा दिया जिससे उसे खतरा हो सकता था . गुप्तचरों ने सूचना दी कि भालू और लोमड़ी अभी चुप बैठे हैं , मगर मौके की तलाश में है . अब शेर को उनका शिकार करना था , मगर जंगल के लोकतंत्र में भी बिना किसी साबित अपराध के सजा नहीं दी जा सकती थी . शेर ने कुछ दिन धीरज रखा . 

शीत ऋतु में ठण्ड के आते -जाते दौर ने शेर को भी नहीं बख्शा . जुखाम के कारण छींक -छींक कर बेहाल हुआ जा रहा था . वो राजा ही क्या जो अपनी किसी भी कमजोरी या बीमारी को भी इस्तेमाल ना कर सके . .उसके दिमाग ने भी अपनी बीमारी को हथियार बनाकर षड्यंत्रकारियों से बदला लेने का उपाय ढूंढ लिया . पूरे जंगल में खबर फैला दी गयी. शेर अस्वस्थ है , उसे जुखाम हो गया है . सभी जानवर बारी- बारी से अपने राजा का हालचाल पूछने राजा की गुफा के बाहर इकठ्ठा हुए . जंगल के वैद्य को बुलाया गया . वैद्य को पहले ही ताकीद कर दी गयी थी कि सभी जानवरों के सामने राजा की बीमारी का पूर्वनियोजित कारण और उपाय ही बताना है . वैद्य जी ने  परीक्षण  करते हुए अपना आला बैग में रखा और गंभीर मुद्रा में सर हिलाते हुए राजा को गंभीर संक्रमण के कारण बीमार होना घोषित किया . वैद्य ने बताया की जुखाम नामक रोग वायु के साथ कीटाणुओं के फैलने से होता है . जंगल के ही किसी प्राणी में इस रोग के कीटाणु हैं , यदि जल्दी ही इसकी रोकथाम ना की जाए तो सभी जानवरों को इस रोग से संक्रमित होने का गंभीर खतरा है .

 वैद्य के सामने एक- एक कर सभी जानवरों का परिक्षण किया गया . अपनी षड्यंत्रकारी योजना के अनुसार भालू और लोमड़ी को रोक कर बाकी जानवरों को वैद्य ने संक्रमण मुक्त होने का स्वास्थ्य प्रमाण पत्र दे दिया . भालू और लोमड़ी चकित . वे जुखाम से पीड़ित नहीं थे . लोमड़ी ने कहा ," वैद्य जी , हमें जुखाम नहीं है , बल्कि हमें अपनी जिंदगी में कभी जुखाम नहीं हुई . " "ह्म्म्म....तो तुम्हारे परिवार में किसी को हुआ होगा ." "नहीं महाराज , हमारे परिवार में भी कोई इस रोग से पीड़ित नहीं है ." "तो तुम्हारे दादा -परदादा को रहा होगा ". "मगर वे तो कबके सिधार चुके ." ..तो क्या हुआ . यह एक गंभीर रोग है . इसके कीटाणु वर्षों तक सुरक्षित रहते हैं , जब उन्हें जुखाम हुआ होगा और छींकें आयी ही होंगी , तब ये कीटाणु वातावरण में फ़ैल गए होंगे जिन्होंने आज मुझे बीमार कर दिया है . आखिर भालू और लोमड़ी को जंगल प्रदेश छोड़ कर जाने का फरमान सुना दिया गया . साथ ही यह चेतावनी भी दी गयी कि समय -समय पर जंगल में सभी जानवरों का परीक्षण किया जाएगा , जिसमे भी इस रोग के कीटाणु मिलेंगे , उन्हें जंगल छोड़ कर जाना पड़ेगा . 

राजा और वैद्य के षड़यंत्र को समझते हुए भी रोग के फैलने या अपने परीक्षण में संक्रमित पाए जाने के डर से अन्य किसी भी जानवर ने इसका विरोध नहीं किया ... अब शेर का जंगल पर एकछत्र शासन था !!


रविवार, 10 जून 2012

कुछ अशुद्ध शब्द जो अंतर्जाल पर बहुतायत में हैं ...(हिंदी को पढ़ते हुए --2)


रविवार की एक शाम यूँ ही घूमते -घामते  एक पर्यटक स्थल के प्रवेश द्वार पर कुछ सूचनाओं को पढ़ते हुए  जयपुर विकास प्राधिकरण के एक बोर्ड के "व्यस्क " शब्द पर  नजर टिक गयी .  सही शब्द व्यस्क या वयस्क  क्या होना चाहिए.  इस पर वाद विवाद होता रहा . प्रतिष्ठानों,  पार्कों, चिकित्सालयों जैसे स्थानों पर लिखी गयी सूचनाओं को लिखने अथवा चित्रित करने का कार्य  अक्सर अशिक्षित पेंटर ही करते हैं इसलिए इनमें मात्राओं की गलतियों की अनदेखी कर दी जाती है.  परंतु पिछले कुछ वर्षों में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल से लेकर प्रिंट मिडिया तक पर कई बार हिंदी के अशुद्ध शब्द आँखों से होकर गुजरते रहे हैं . यहाँ लिखने वालों के अशिक्षित होने का तो सवाल ही नहीं है . विचार करने पर पाया कि  मुद्दा शिक्षित या अशिक्षित होने का नहीं है . कई बार टाईपिंग के कारण होने वाली गड़बड़ियों के कारण भी शब्द अशुद्ध लिख दिए जाते हैं . परंतु क्या सचुमच ऐसा ही है !
 क्या यह अशुद्धियाँ सिर्फ  टाईपिंग की गलतियों के कारण ही है !!

बच्चों की स्कूली शिक्षा के दौरान  उनकी हिंदी की जाँची हुई कॉपी में भी मात्राओं की भयंकर अशुद्धियों को देखकर कई बार बहुत खीझ हुई है .
  बच्चे बड़ी सफाई से कहते -  एक क्लास  में साठ बच्चे हैं. मैम आखिर कितने ध्यान से चेक करेंगी और वह भी इंग्लिश मीडियम से पढने वाले बच्चों की हिंदी की कॉपियां  . ऐसे में मुझे अपने समय के गुरु /गुरुआईन  बहुत याद आते . हिंदी अथवा अंग्रेजी में श्रुतलेखन में अशुद्ध पाए जाने वाले शब्दों को लिखकर दुहराने की सजा मिलती थी . दुहराव  की संख्या संख्या दस से पचास तक भी हो सकती थी .  बच्चे जब किसी शब्द के बारे में पूछते तो भ्रम होने की अवस्था में शब्द को लिखकर देखते ही सही मात्रा याद हो आती . इसे चाहे रट्टा मारना ही कहें परंतु गणित के पहाड़े और हिंदी और अंग्रेजी के शब्द  इसी प्रकार याद कराये जाते थे . अब जब विद्यार्थियों को अशुद्ध  लिखने के लिए टोका ही नहीं जाता तब वे शुद्ध और अशुद्ध शब्द का अंतर कैसे पता कर पायें .  सिर्फ अपनी पुस्तक से ही तो सही लिखना पढ़ना  सीखा नहीं जा सकता . विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान और गलतियों या अशुद्धियों को सही कर पाने में ही विद्यालय और शिक्षकों की उपयोगिता   है . आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में कैलकुलेटर और लैपटॉप पर पढ़ने वाली अथवा हिसाब किताब करने वाली पीढ़ी के लिए कुछ भी रटने की आवश्यकता नहीं है . कुछ याद ना आये तो गूगल है ही . अँगुलियों पर ही जुबानी हिसाब किताब कर पाने वाली हमारी पीढ़ी  कई बार सोच में पड़ जाती है  . क्या यह स्थिति सही है . कहीं  इस प्रकार भावी पीढ़ी के दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित तो नहीं हो रही !!!  
वर्तमान पीढ़ी के गूगल या अन्य सर्च माध्यमों पर निर्भरता को ध्यान में रखते हुए अंतर्जाल   पर लेखकों  की  शब्दों की शुद्धता और सही सूचनाओं को प्रस्तुत करने करने की जवाबदेही बनती है .  मेरी  अपनी ही एक पोस्ट में शेर शब्द के प्रयोग करने पर कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर झूम रहे थे . जब लेखन की शुद्धता पर ध्यान देना शुरू किया तब उनका तंज़ समझ आया :). 
कुछ ऐसे ही शब्द हैं यहाँ जो प्रिंट अथवा दृश्य माध्यमों में भी टंकण अथवा फौन्ट्स की त्रुटि के कारण अधिकाधिक अशुद्ध ही लिखे पाए जाते हैं .... 

शुद्ध   --   अशुद्ध 

दीवाली -- दिवाली 
कवयित्री  -- कवियित्री
परीक्षा   --   परिक्षा
तदुपरांत -- तदोपरांत 
निःश्वास -- निश्वास 
त्योहार --  त्यौहार
गुरु      -   गुरू 
निरीह -- निरिह   
पारलौकिक -- परलौकिक 
गृहिणी   --  गृहणी /ग्रहिणी
अभीष्ट -- अभिष्ठ 
पुरुष  --  पुरूष 
उपलक्ष्य -- उपलक्ष 
वयस्क --  व्यस्क 
सांसारिक --  संसारिक
तात्कालिक -- तत्कालिक  
ब्राह्मण  --  ब्राम्हण 
हृदय -- ह्रदय 
स्रोत --स्त्रोत 
सौहार्द --  सौहाद्र 
चिह्न -- चिन्ह 
उददेश्य --  उदेश्य 
श्रीमती -- श्रीमति 
आशीर्वाद --आर्शीवाद 
मध्याह्न  --- मध्यान्ह 
साक्षात्कार --साक्छात्कार 
रोशनी -- रौशनी 
धुँआ -- धुआँ  

मात्राओं का सही ज्ञान नहीं होने के कारण अथवा टंकण या फॉन्ट की गड़बड़ी के कारण  अंतर्जाल  पर  कई ब्लॉग्स  (मेरे या आपके भी हो सकते हैं ) , समाचारपत्रों , साहित्यिक पत्रिकाओं तक में  ये अशुद्धियाँ प्रचुरता में हैं . 

यकीन नहीं होता ना , सर्च कर देखें !!! 
कुछ त्रुटियाँ इस लेख भी हो तो अनदेखा ना करें , टोकें अवश्य  !

रविवार, 3 जून 2012

हिन्दी इतनी सरल भी नहीं.... ( हिंदी को पढ़ते हुए )

हमारी हिन्दी की क्या बात है . हिन्दी से मेरा मतलब है हिन्दी भाषा , वह हिंदी नहीं जो आमतौर पर ईर्ष्यावश लोग एक  दूसरे की कर दिया करते हैं . 
हिन्दी यानि हमारी राष्ट्रीय भाषा . सिर्फ कागजों में दर्ज हो भले ही क्योंकि अक्सर सरकारी कामकाज अंग्रेजी में होते ही देखे हैं . कुछ प्रदेशों में तो ग्रामीण इलाकों में हिन्दी बोलने समझने वाले ढूंढें नहीं मिलेंगे . वही कुछ पढ़े -लिखे बुद्धिजीवी हिन्दी वालों की हिंदी करने में कहीं पीछे नहीं रहते . ख़ुशी यही है कि हम हिन्दी भाषी प्रदेश में हैं तो कम से कम अपनी अभिव्यक्ति के लिए तो दूसरी भाषा का मोहताज़ नहीं होना पड़ता .  

हिन्दी का अपना वृहद् शब्दकोष है जिसने उर्दू , फारसी , संस्कृत , अंग्रेजी के अनगिनत शब्दों को आत्मसात किया है . हिन्दी में शब्द किसी भी वस्तु , व्यक्ति या रिश्ते का सम्पूर्ण परिचय दे देते हैं . अंग्रेजी की तरह नहीं कि तू भी यू , तुम भी यू , आप भी यू ही , किसी पुरुष या स्त्री से यह कह कर मिलवाओ कि मीट माय  आंटी  या मीट माय अंकल ...तो सामने वाला सिर खुजाता ही रह जाए ...अब किसी अंकल की बात कर रहा है . तेरे पिता या माता का भाई और वो भी कौन सा छोटा या बड़ा  या फिर कहीं पड़ोस वाले अंकल की बात तो नहीं कर रहा . ऐसे ही ये आंटी कौन है , तेरी माँ की बहन या पिता की  या पड़ोसी अंकल की ....अंग्रेजी में इनके लिए अलग संबोधन नहीं है शायद उन्हें रूचि ही नहीं होती यह सब जानने में किंतु हम भारतीय तो सब कुछ जान लेना चाहते हैं , खोद -खोद कर पूछते हैं . शायद इसलिए ही शब्दकोष ने हमें यह सुविधा दी है कि ज्यादा मगजमारी ना हो . 

साहित्य के लिए प्रयुक्त शुद्ध हिन्दी और बोलने के लिये आम हिंदी में क्लिष्टता और सहजता का अंतर है . हिन्दी के विद्वानों और आम इंसानों को उनके बोलने और लिखने के अंतर से जाना जा सकता है . हमारे जैसा आम भारतीय हिंदी बोलता तो है परंतु हर किसी का (हमारा भी )हिन्दी भाषा पर सम्पूर्ण आधिपत्य नहीं है और इसलिए कई बार शब्दों की हेराफेरी में  अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं . ऐसे ही कुछ शब्दों की पड़ताल है यहाँ जो दिखने/लिखने  में एक जैसे ही लगते हैं  परंतुअर्थ में भिन्न है .

1. प्रणय -परिणय 
प्रेम अथवा प्रीति का नाम प्रणय है जबकि परिणय विवाह को कहते हैं !
उनके प्रणय की परिणिति परिणय में हुई .

2. संपन्न -समापन 
संपन्न शब्द का प्रयोग समाप्ति का द्योतक है .
समापन अर्थात समाप्ति से पूर्व का अंतिम समारोह . 
समापन समारोह संपन्न हुआ . 

3. श्रम -परिश्रम 
श्रम का तात्पर्य शारीरिक श्रम से होता है जैसे श्रमिक का श्रम .
परिश्रम जिसमे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का  श्रम शामिल हो , जैसे राम परीक्षा में परिश्रम से उत्तीर्ण हुआ .

4. शंका -आशंका 
शंका अर्थात जिज्ञासा , जानने की उत्सुकता , आपत्ति 
आशंका का प्रयोग संदेह के अर्थ में किया जाता है . " देशों के मध्य बढ़ते तनाव के मद्देनजर गृहयुद्ध की आशंका है ".

5. वेश्या -वैश्या 
वेश्या कुलटा स्त्री है , जो अपने शरीर का व्यापार करती है ...जबकि वैश्या वैश्य स्त्री है ,वह आचार्या भी हो सकती है .

6. भागवत - भगवद् गीता 
भागवत   अठारह पुराणों में से एक पुराण है जबकि भगवद् गीता महाभारत का वह  अंश है जिसमे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश दिया था . 

7. नृत्य -नृत 
नृत्य एक कला है , जिसमे भावप्रधानता होती है जबकि नृत नृत्य का बाह्य अनुकरण है . नृत्य नृत और नाट्य का मिश्रण है जबकि नृत  में तालों का प्रयोग होता है.  

8. विस्तर   -विस्तार 
विस्तार का अर्थ फैलाव है जबकि  विस्तर अर्थात विस्तार प्राप्त किया हुआ . 

9. प्रेमिका -प्रिया 
प्रेमिका प्रेम करती है जबकि प्रिया वह है जिससे प्यार किया जाए . 

10. ब्रह्म -ब्रह्मा 
ब्रह्म एक विचार है , व्यक्ति नहीं जबकि ब्रह्मा हिन्दुओं के एक देव हैं . 

ऐसे अनगिनत और भी  शब्द हैं जिनकी पड़ताल उनके भावार्थ के रूप में की जा सकती है .हिन्दी की अधूरी रह गयी शिक्षा के कारण हिन्दी को पढ़ते हुए इन शब्दों के हेरफेर ने खूब चौंकाया . जब इन्टरनेट पर खंगाला तो पाया कि कई शब्दकोशों में भी इनके अंतर / अर्थ को स्पष्ट विभाजित  नहीं किया गया है . शायद  भाषा को  दुरुहता से बचाना और आमजन में लोकप्रिय बनाना इसका एक प्रमुख कारण रहा हो . ब्लॉग जगत के  हिंदी विद्वान /विदुषी इस पर प्रकाश डालें तो मुझ सहित आम हिंदी भाषी का भला हो जाए !