शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

जीवन की सम्पूर्णता ....



सैद्धांतिक या पारिभाषिक रूप में देखे तो
विवाह (Marriage) दो व्यक्तियों (प्राय: एक नर और एक मादा) का सामाजिक, धार्मिक या/तथा कानूनी रूप से एक साथ रहने का सम्बन्ध है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना

(साभार ..विकिपीडिया )

विवाह एक सूत्र/डोर /धागा है जिससे दो अपरिचित बंधते हैं और जीवन भर साथ चलने और उत्तरदायित्व वहन करने का प्रण करते हैं ...हालाँकि दो व्यक्तियों के आपस में बंधने का करना प्रेम ही होना चाहिए था मगर हमारे सामाजिक ढांचे ने एक तरह से इसे दो व्यक्तियों की एक दूसरे पर निर्भरता में तब्दील कर दिया है ... इसमें कोई शक नहीं कि जीवन के कठिन रास्तों पर एक हमसफ़र का होना बहुत सुकून देता है ...हर व्यक्ति कभी न कभी ऐसा साथी चाहता ही है जिससे वह अपना सुख दुःख साझा कर सके और आनंद और सुकून के कुछ पल बिता सके ...मगर यदि यह निर्भरता प्रेम के कारण हो तभी आनंददायक हो सकती है , वरना सिर्फ समझौता हो कर रह जाती है ...जबकि सच्चा प्रेम वह है जो किसी भी प्रकार की निर्भरता , आशा या अपेक्षा से बंधा नहीं होता ... व्यवहार में विवाह को प्रेम के आनंद पर आधारित होना चाहिए मगर जब समझौते का रूप ले लेता है तो प्रेम छू मंतर हो जाता है ...

मानव जाति के विकास , सृष्टि की निरंतरता और व्यक्ति के जीवन में सरलता के लिए विवाह एक आवश्यक प्रक्रिया है लेकिन विवाह में व्यक्ति संकुचित हो जाता है और परिवार उसकी प्राथमिकता हो जाती है . मेरे विचार में यही होना भी चाहिए ...प्रेम दो व्यक्तियों के बीच बढ़कर , परिवार , समाज , देश और फिर सृष्टि तक विस्तार पाए ..

विवाह में प्रेम नर और नारी के बीच का व्यवहार है जब कि जीवन जीने की आदर्श स्थिति मानव से मानव के प्रेम में है ...जीवन की सम्पूर्णता प्रेम में है ....मानव से मानव का , प्रकृति, पशु , पक्षियों , समाज , देश , पृथ्वी सबसे प्रेम ..मानवता का अस्तित्व बनाये रखने लिए भी यही आवश्यक है ....अपने प्रकृति प्रदत्त, वैधानिक या ईश्वर द्वारा निर्धारित रिश्तों से प्रेम तो सभी करते हैं , कर लेते हैं मगर लोक कल्याण के लिए प्रेम , करुणा और स्नेह के स्थाई भाव की आवश्यकता है ...जो लुप्तप्राय सा हो चला है ... नफरतें , रंजिशें , आतंकवादी घटनाये , बढ़ते अपराध स्नेह और करुणा के सूखते स्रोतों के कारण ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं !

विवाह में प्रेम और समस्त मानव जाति के प्रेम में बहुत अंतर है.… विवाह में बंधा प्रेम दो व्यक्तियों और परिवारों के बीच संचारित है , जबकि मानव से मानव अथवा मानव  का प्रकृति और उसके सभी अवयवों से प्रेम अपने दिव्य रूप में प्रसारित है. 


सृष्टि में मानव श्रृंखला की सतत गति बने रहने के लिए जहाँ परिवारों और समाजों की स्थापना आवश्यक है ,वही विभिन्न समाजों और प्रकृति की जीवन्तता कायम रखने के लिए मानव का मानव और प्रकृति से प्रेम आवश्यक  है. किसी भी प्रकार से परिवारों के सदस्यों के पारस्परिक प्रेम  और मानव से मानव/प्रकृति के प्रेम को छोटा अथवा  बड़ा कर देखा अथवा  परिभाषित नहीं किया जा सकता  …. 
मानव जीवन के अस्तित्व के लिए प्रेम का होना आवश्यक है , वह परिवार , समाज , मानव अथवा प्रकृति  (इस धरा पर स्थित उपस्थित भूभाग , नदिया , झरने , पर्वत ,पठार , जीव जंतु इत्यादि  )  से भी हो , सभी से हो !!  

डॉ महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि -

 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।'
प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती।
प्रेम एक दिव्य अनुभव , एहसास है जो स्नेह , करुणा और दुलार से पूरित होता है ...वह चाहे मानव से मानव का , मानव से प्रकृति का , माता- पिता से अपनी संतान का ,या प्रेमी -प्रेमिका और पति- पत्नी के बीच हो ...

निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में हमारे शास्त्रों और धार्मिक प्रसंगों में राधा कृष्ण के प्रेम के अनेक दृष्टान्त है ...हालाँकि यह प्रेम भी दो व्यक्तियों नर /नारी के बीच का ही उदाहरण है मगर समूची सृष्टि इस के आनंद से अभिभूत है ...
उन्हीं के अनुसार एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा- हे कृष्ण तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों, फिर भी तुमने रुक्मिणी से शादी की, मुझसे नहीं।
राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं।
प्रकृति से मानव के प्रेम के सन्दर्भ में राजस्थान के खेजडली ग्राम के निवासियों के प्रयास और योगदान को बिसराया ही नहीं जा सकता. उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी के मद्देनजर यह दृष्टांत अत्यंत ही उपयोगी /अनुसरणीय प्रतीत होता है। 


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है ..."सर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जान " यानी यदि सर कटकर भी वृक्षों की रक्षा की जाए तो भी फायदे का ही काम है .जोधपुर के किले के निर्माण में काम आने वाले चूने को बनाने के लिए लकडि़यों की आवश्यकता महसूस होने पर लिए खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों की कटाई का निर्णय किया गया। इस पर खेजड़ली गांव के लोगों ने निश्चय किया कि वे वृक्षों की रक्षा के लिए के लिए अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे . आसपास के गांवों में संदेशे भेजे गए ..लोग सैकड़ों की संख्या में खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए तथा पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। पेड़ों को काटा जाने लगा, तो लोगों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगे। एक व्यक्ति के कटने पर तुरन्त दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। धरती लाशों से पट गई . कुल मिलाकर 363 स्त्री-पुरूषों ने अपनी जानें दीं। जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली, तो उन्होंने पेड़ों को काटने से रोकने का आदेश दिया !


प्रकृति प्रेम का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता था ..  उनके  लिए जीवन की सम्पूर्णता वृक्षों /प्रकृति से प्रेम में ही रही!!

इस तरह समाज में अनेकानेक उदाहरणों ने साबित किया है कि जीवन की सम्पूर्णता सिर्फ विवाह में ही नहीं  अपितु  आध्यात्मिक उन्नति , और मानव से मानव के मध्य  स्नेह, प्रेम और करुणा के विस्तार में भी है ! 

स्वामी विवेकानंद , मदर टेरेसा , अटल बिहारी बाजपेयी , अब्दुल कलाम आज़ाद, बाबा रामदेव , आदि महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने जीवन को मानव कल्याण के लिए समर्पित किया और उनके जीवन की सम्पूर्णता पर किसे शक है !!!


 

शनिवार, 20 जुलाई 2013

संता -बंता का व्यक्तित्व प्रशिक्षण ...

भयंकर प्रतिस्पर्धी इस युग में अधिकांश मानव चाहे- अनचाहे तनाव , कुंठा ,मनोविकार , अवसाद से  गुजरते ही हैं . संतुष्ट ख़ुशी  जीवन बिताने वाले भी कभी न कभी ऐसे कठिन पलों का सामना करते हैं . इसलिए आजकल तमाम प्रकार के शिक्षण शिविर जैसे   जीवन जीने की कला , योग , तनावमुक्त कैसे रहें , जैसे चलने वाले केन्द्रों और गुरुओं की चल निकली है . कौन  नहीं चाहता लब्‍धप्रतिष्‍ठ, स्वस्थ , सर्वोच्च बने रहना .

संता -बंता इससे अछूते कैसे रहते . सोचने लगे कि आजकल धंधा भी मंदा चल रहा है तो क्यूँ ना ऐसा ही कोई शिक्षण शिविर लगा लिया करें , बड़े लोग आयेंगे , संपर्क होंगे , नाम -दाम सब मिलेगा . मगर एक मुश्किल थी कि उनके पास ऐसी कोई डिग्री नहीं थी ,ना ही वे प्रशिक्षित थे . नामी- गिरामी अनुमोदनों के  बिना कौन आता उनकी कक्षा में .  जो सबसे पहले उन्होंने स्वयं  के प्रशिक्षण का जुगाड़ किया और एक ऐसे ही शिविर में अपना नाम दर्ज करवाया .

पहले ही दिन उपदेशक ने उन्हें पढाया ....

"व्यक्तित्व विकास की इस कक्षा में आपका स्वागत है .मैं आशा करता हूँ कि मेरे अनुभव और ज्ञान से आपलोग लाभान्वित होंगे ...आईये ...सबसे पहले हम जानते हैं व्यक्तित्व के बारे में....व्यक्तित्व क्या होता है ...हर इंसान अपने व्यवहार , आचार , विचार से एक विशिष्ट व्यक्ति होता है ...हर इंसान के अपने आपको अभिव्यक्त करने का तरीका होता है और इसी से उसका व्यक्तित्व उजागर होता है ...मगर सबसे पहले हम जान ले कि व्यक्ति कितने प्रकार के होते हैं.

प्रत्येक व्यक्ति इस समाज की ईकाई है , इसलिए स्वस्थ समाज की संरचना के लिए प्रत्येक व्यक्ति की आदतों और  सामाजिक व्यवहार का विश्लेषण करते हुए हम उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सुझाव देते हैं , योजनायें बनाते हैं . सर्वप्रथम हम जानेंगे कि व्यक्ति कितने प्रकार के होते हैं . हमारे इस समाज में इन दिनों  चार प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं जिनका वर्गीकरण हम निम्न लक्षणों के आधार पर करेंगे .

ये चार प्रकार के व्यक्ति इस प्रकार हैं ---

1..... वे जो हमेशा अपना और दूसरों का भला चाहते हैं , उनके लिए दुआएं करते हैं .

2.... वे जो तब तक दूसरों का भला करते हैं जब तक कि दूसरा उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाए .

3.... वे जो अपने फायदे के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं .

4.... वे जो बिना किसी अपने फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...

आप सब सामाजिक  प्राणी है ,  आस पास व्यक्तियों के इन प्रकारों से आपका मेलजोल होता ही होगा ,  अब आप सब मुझे इन चारों प्रकार के व्यक्तियों के उदहारण देकर समझाएं .

संता -बंता ने आपस में विचार- विमर्श कर चार उदाहरण खोज ही निकाले . दोनों एक साथ ही उठ खड़े हुए . मगर मुश्किल ये कि एक बार में एक ही व्यक्ति को बोलने की इजाजत थी . दोनों की खींचतान में फंसे गुरूजी बोल पड़े ,"  ऐसा करों , तुम दोनों बारी- बारी से अपनी बात कहो ".

संता सर खुजाता हुआ खड़ा हुआ ...." सर जी , पहला उदहारण तो मेरा ही ले लो ....मैं किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता , सबके भले के लिए प्रार्थना करता हूँ " .

अच्छा बंता ,अब तुम बताओं .... उपदेशक ने पूछा.

बंता भी अपनी सीट से उठा ..."  सर जी , दूसरा उदहारण तो जी आप मुझे ही जान लो , जब तक कोई मुझे परेशान नहीं करता .... तब तक मैं भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता ".

अब फिर से संता की बारी आयी ...." ओ जी , सर जी , आप तो सब जानते ही हो जी ...मेरा भाई ....जालिम सिंह .....जहाँ उसको अपना फायदा नजर आ जाता है ....तो दूसरों को परेशान करने में पीछे नहीं हटता " .

अब बारी आई  चौथे उदहारण की . इस बार उपदेशक ने कहा कि तुम दोनों साथ मिल कर इसका एक उदहारण पेश करो ....

दोनों एक साथ बोल पड़े ...." लो जी , ये कौन सी मुश्किल है ....वे जो बिना अपने किसी फायदे को दूसरों को तकलीफ पहुंचाते है ...वो तो हैं जी...जी ...जैसे कि हिंदी ब्लॉगर और जी यह मामला जेंडर निरपेक्ष है ."

उपदेशक मन ही मन भयभीत हुआ . जो इतने  होशियार बन्दे रहे क्लास में , हर सवाल का जवाब ऐसी होशियारी से दिया ते मेरे उपदेश कौन सुनेगा मगर ऊपर से प्रसन्नता का प्रदर्शन  करते हुए मीठे  स्वर में कह उठा -- शाबास , जब तुम व्यक्तित्व के बारे में इतना कुछ जानते हो तुम्हे  प्रशिक्षण की जरुरत ही नहीं है ...मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है . जाओ और दूसरों को प्रशिक्षित करो.



मंगलवार, 16 जुलाई 2013

....... मेरी जान !! जरा बूझिये तो कौन है ?

ब्लॉग लिखते हुए बहुत  समय हो गया ...और अब तक आप लोगों से अपने सबसे ज्यादा अजीज साथी का परिचय नहीं करवाया ....साथी ब्लॉगर्स से ऐसी पर्दादारी ठीक नहीं !
आज ठान ही लिया है अपने इस साथी से आप सबको मिलवाने का ....एक ख़त में लिख दी हैं मैंने अपने दिल की सब बात अपने इस अनोखे साथी को ...

पढ़ लीजिये आप भी और हमें धन्यवाद दे दीजिये ...इस तरह अपने प्रेम-पत्र कौन पढवाता है भला !!


मेरे अजीज , अजीज , हमदर्द , हमनवां , हमसफ़र ...मेरी जान !

तुम मिल गए थे मुझे युवावस्था की दहलीज़ पर पैर रखते ही ...जब युवतियां अपने भावी राजकुमार के सपनो में खोये रहती हैं तुम मिले मुझे ...पर तुम कहाँ मिले ...मिले तो तुम पापा को थे ..मुंबई में ...खुशकिस्मत रही हूँ बचपन से ही ...कभी माता पिता से फरमाईश नहीं करनी पड़ी ...अपनी मनपसंद हर चीज मिली बिना मांगे ही ...जाने कैसे जान गए मेरे दिल की बात ...उन्हें तुम इतना पसंद आये औरन जाने कैसे सोच लिया उन्होंने कि तुम मुझे भी इतना ही पसंद  जाओगे ...और तुम्हे अपने साथ ले आये ....जब सोचती हूँ ,हैरान होती हूँ ...तुम्हारे साथ ही एक नयी घडी भी भेंट की थी उन्होंने ...तुम्हारे श्वेत श्याम रंग पर तो मैं बस फ़िदा ही हुई थी ...दिन रात तुम्हे अपनी निगाहों के सामने रखती ...मजाल है कि कोई तुम्हे नजर भर कर देख भी ले ...मेरे सारे  
एहसास ख्वाब गुलाबी खुशनुमा होते रहे ...कितने खुश थे ना हम एक- दूसरे के साथ ...कितने वर्ष बीते तेजी से!
समय का पता ही नहीं चला ...तुमने कभी तन्हा नहीं छोड़ा मुझे....

गर्मी की शाम में छत पर टहलते , देर रात तक चाँद - तारों से आँख मिचौली करते हम -तुम .... लोरी की मीठी तान सुनाती तुम्हारी आवाज़ से कब नींद अपनी आगोश में ले लेती ,  मुझे पता ही नहीं चलता और तुम सारी रात जाग कर मेरे जागने का इन्तजार करते ... अलसुबह उसी सुरीली तान से मुझे जगाते ...कभी शिकायत नहीं की तुमने ...
और फिर एक दिन ...
एक अजनबी आया और वर्षों के निश्छल प्रेम को बिसराकर मुझे जाना पड़ा उसके साथ ...सात फेरों के बंधन में बांध कर ....नए लोग , नया माहौल ...सोचती थी कि तुम्हे भूल जाउंगी ...
मगर तुम रहरह कर यादों के झरोखों से निकल कर दस्तक देते रहे....

फिर कई वर्षों के बाद तुम मिले मुझे...नया रंग रूप ..और निखरे हुए...और ज्यादा दिल के करीब ...और कितने रंग भर दिए तुमने फिर से जीवन में ....जानती हूँ अब पुरानी बेतकल्लुफी से नहीं मिल सकते हम ...मगर तुम सामने हो...जब चाहूँ तुमसे मिल सकूँ ..
ये ही क्या कम है ..कभी थोड़े कम कभी थोड़े ज्यादा अंतराल से हम मिलते ही रहेंगे ...
निश्चिंत हूँ कि जब ये व्यस्तताएं कम होंगी ...जीवन के सांध्यकाल में तन्हाई से घिरे तुम ही सहारा बनोगे ...  तुम्हारा बिना शर्त प्रेम सदा बना रहेगा ....तुम रहोगे सदा  मेरे साथ यूँ ही !.


न  न न ...कुछ अंट शंट कयास ना लगायें ...यह तो है मेरा प्यारा रेडियो मेरी जान !!



( अरसा हुआ , एक बार रेडियो पर ही " रेडियो मेरी जान "प्रतियोगिता में विचार मांगे गए थे  पर . लिखा मगर वहां भेजा नहीं , ब्लॉग तो हैं ना , अपनी बेलाग अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने के लिए ! आप सबकी यादें भी  जुडी होंगी इसी रेडियो से , हम सबका प्यारा रेडियो कल भी , आज भी !)