रविवार, 6 अक्टूबर 2013

गिरा अनयन नयन बिनु बानी.... शब्दों के चितेरे तुलसीदास


रामचरितमानस हिन्दुओं का एक प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ है। शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में देवी भगवती /अम्बे की आराधना के  अतिरिक्त  रामचरितमानस के नवाह्न पारायण का भी विधान है। 

रामचरितमानस सिर्फ एक धार्मिक ग्रन्थ की भांति ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की  चमत्कृत कर देने वाला महाकाव्य /कृति के रूप में भी  उल्लेखनीय है।  तुलसीदास की काव्य प्रतिभा अलौकिक प्रतीत होती है ,  अब वह श्रीराम के अलौकिक रूप /शक्ति के प्रभाव /वर्णन के कारण है या प्रकृति प्रदत्त , यह राम ही जाने। 

अपनी सम्पूर्ण धार्मिक  , आध्यात्मिक  चेतना को एकत्रित कर सिर्फ प्रभु को सर नवाते इस अमूल्य कृति का पाठन करें , या एक सामान्य पाठक के समान  तुलसीदास की अभूतपूर्व काव्य प्रतिभा युक्त रोचकता और नाटकीयता  में  एक मर्यादित समाज की संकल्पना की मीठी झील की तरह रस के भंवर में गोते लगाये , प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा और मनसा पर निर्भर है।   

तुलसीदास अपनी   कृति में एक मर्यादित समाज में चहुँ ओर सुख शान्ति की कामना सहित  समाज में प्रत्येक संभावित  रिश्ते के लिए अत्यावश्यक मापदंड या जीवनदृष्टि निर्धारित  करते प्रतीत होते हैं।  समाजों में मानव के बीच पलने वाले प्रत्येक रिश्ते से जुडी भावनाएं , मानव मन के विभिन्न आयाम , गुण -अवगुण , चरित्र  , कार्य , कुछ भी तुलसीदास की दृष्टि और शब्दों से बाकी नहीं रहा।   उनके काव्य लेखन की विराट  प्रतिभा ने आधुनिक युग में भी मानव मन की किस दशा पर  उनके नेत्रों और शब्दों की धार को समाहित नहीं किया , कुछ शेष  नहीं रहा.

तुलसीदास जी ने शील और गुण के आदर्श प्रस्तुत करते हुए साबित किया कि अध्यात्म सिर्फ संन्यास या वैराग्य ग्रहण करना ही नहीं है , समाज में रहते हुए सामाजिक  जिम्मेदारियों को पूर्ण करते भी सन्यासी रहा  जा सकता है। समाज के कल्याण के लिए उच्च  आदर्शों और  मर्यादा की स्थापना करते हुए  दुष्टों  पर भी अपनी दृष्टि केन्द्रित करते हैं।  प्रजावत्सल राजा के सम्पूर्ण गुणों की मर्यादा तय करते हुए  भी साधारण व्यक्ति के सभी मनोभावों को विभिन्न चरित्रों के  भ्रातृत्व , पितृत्व ,  मातृत्व   माया , मोह , ममता , लोभ , ईर्ष्या , चुगलखोरी ,  आदि सभी गुणों -अवगुणों को शब्दों में चित्रित किया है।   
  
रामचरितमानस के  प्रथम सर्ग  बालकाण्ड में तुलसीदास  विभिन्न दृश्यों जैसे श्रीराम और उनके भ्राताओं  के जन्म ,स्वयम राज दशरथ और रानियों के साथ जनमानस की ख़ुशी , नगर की शोभा ,   बाल्यकाल की क्रीड़ायें , गुरुकुल के कठोर अनुशासित जीवन के लिए जाते पुत्रों से भावविह्वल माता -पिता , जनकनंदिनी सीता से श्रीराम का प्रथम दर्शन आदि  में चमत्कृत करती शब्दों की भाषा  से समस्त  मानवीय भावनाओं और  संवेदनाओं को उद्धरित करते हैं।  

बालकाण्ड में श्रीराम और सीता के प्रथम मिलन का दृश्य बहुत ही मनोरम बन पड़ा है।  अपने गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में श्रीराम अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ सीता  स्वयंवर में उपस्थित हैं। राम और लक्ष्मण  गुरु की पूजा अर्चना के लिए   बाग़ से फूल  चुनने पहुंचे ,   जनकनन्दिनी सीता भी सखियों के साथ बाग़ में सरोवर के नजदीक  गिरिजा मंदिर में पूजन के लिए आती है। तुलसीदास ने इन दृश्यों में शब्दों की सुन्दर चित्रकारी द्वारा राम और सीता के मनोभावों का मनोरम वर्णन किया है।  मानव रूप में जन्मे  राम मानव मन के किसी भी कोमल भाव से अछूते नहीं रहे , युवावस्था में भावी जीवनसंगिनी को निरखते राम के मन में प्रेम और क्षोभ एक साथ हिलोरे मारता है , वहीँ सीता भी भावी जीवनसाथी के रूप में राम की कामना के साथ पिता जनक के प्रण का स्मरण कर दुखी होती हैं। तुलसीदास के शब्दों में सीता के प्रथम दर्शन के बाद एकांत में चन्द्रमा से सीता के मुख की तुलना करते  किशोर /युवा मन की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं.

तुलसीदास शब्दों के चितेरे रहे.  शब्दों की  कारीगरी से मानव मन के विभिन भावनाओं का कुशल चित्रण करते हैं. तुलसीदास अपने शब्दों के भाव कौशल से किशोर हृदयों के प्रथम मिलन के विलक्षण मनोहारी दृश्यों की रचना करते हैं। स्वयं तुलसीदास के शब्दों में ही देखें … 

राम के सौंदर्य का बखान करती सखी कहती है 
"  गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।।
यानि वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है। 

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही
कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहते हैं- (यह ध्वनि ऐसी आ रही है) मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥

ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा (को निहारने) के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए.
शाब्दिक अर्थ है " नीमि (निमि पलकों के झुकने  को कहते हैं ) ने पलकों में रहना छोड़ दिया यानि  नयन खुले के खुले रह गए " . 
भावार्थ निमि जो जनक के पूर्वज रहे हैं , ने होश्राप मुक्त होने पर अपने रहने के लिए पलकों में स्थान माँगा था। चूँकि जनकनंदिनी सीता उनकी  पुत्री हुई , और मर्यदावश बेटी दामाद के मिलन को देखना  उचित नहीं माना जाता। इसलिए ऐसा भान हुआ कि राम और सीता के मिलन को देख निमि  पलकें छोड़ कर चले गए। 

देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥

सीताजी की शोभा देखकर श्री रामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। (वह शोभा ऐसी अनुपम है) मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो।
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥

जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें, किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं।

सीताजी भी श्रीराम की छवि से चकित और मुग्ध हैं… 

थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥

श्री रघुनाथजी की छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो।

लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥

जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥

नेत्रों के रास्ते श्री रामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं, कुछ कह नहीं सकती थीं।
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥

जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं- बड़ी देर हो गई। (अब चलना चाहिए)। कल इसी समय फिर आएँगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥

धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥

सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और (उनका ध्यान करती हुई) अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं।

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।

निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥
मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्री रामजी की छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है। (अर्थात्‌ बहुत ही बढ़ता जाता है)।

रात्रि के नीरव एकांत  में   प्रेम से वशीभूत हो चन्द्रमा के मुख से देवी सीता की तुलना करते मनन करते  हैं ....

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥

बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
(उधर) पूर्व दिशा में सुंदर चन्द्रमा उदय हुआ। श्री रामचन्द्रजी ने उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजी के मुख के समान नहीं है।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥
खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर (उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण) विष इसका भाई, दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकी (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥
फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देने वाला है, राहु अपनी संधि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को (चकवी के वियोग का) शोक देने वाला और कमल का बैरी (उसे मुरझा देने वाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत से अवगुण हैं (जो सीताजी में नहीं हैं।)।

किशोर मन की समस्त अवस्थाएं- सौन्दर्य , चकित , प्रेम , लज्जा , भय ,क्षोभ , अभिव्यक्ति में शेष कुछ न रहा ! 

अद्भुत … 

कुछ और यहाँ  भी ....

बुधवार, 4 सितंबर 2013

बहुत कुछ दुनिया में यूँ ही होता है निःस्वार्थ !!

कल सुबह पेड़ पौधों को  निहारती फुर्ती से  कदम बढ़ाती एक महिला जाते -जाते मुड़ कर आई और गुड़हल के फूलों की और इशारा करते हुए बोली। 

क्या आप एक फूल दे दोगे मुझे !

हां . क्यों नहीं  !

उसे हाथ बढ़ाकर फूल तोड़ते देख मुझे एकदम से हंसी आ गयी क्योंकि उनसे फूल नहीं टूट पा रहा था।  

इससे पहले कभी फूल  तोड़ा नहीं !!

मेरी कही इस बात पर बड़ी सी मुस्कराहट के साथ बोली "कल टीचर्स डे है तो सोचा बेटी फूल ले जाए चौकलेट के साथ , आस पास कही मिला नहीं।   मैं पत्तों के साथ तोड़ना चाह रही थी और यह भी भय   की ज्यादा ना टूट जाए। "

 ओहो ! पराई बगिया में भी कोई इतनी एहतियात रखता है!?? मन ही मन खुश होते हुए मैंने कहा - लाओ मैं तोड़ देती हूँ।

अभी कुछ दिनों पहले ही जन्माष्टमी पर छोटे बच्चे डलिया लेकर घूम रहे बच्चों के  उचकते  नन्हे हाथ फूलों तक नहीं पहुंचे तब भी उन्हें फूल तोड़ कर दिए।  जब पौधा ही कोताही नहीं करता रोज  फूलों को खिलाने में तो हम क्यों करे। पुराने घर की  बगिया में ढेरों ग्राफ्टेड गुलाब चुन कर दिए छोटे बच्चों को उनके शिक्षक /शिक्षिकाओं के लिए।  

ऐसे बेगरज किये छोटे कार्य कई बार  छोटी ख़ुशी दे जाते हैं , कई  छोटी खुशियाँ मिलकर बड़ी खुशियाँ बन जाती हैं।  विश्वास बना रहता है कि दुनिया में बहुत कुछ बिना वजह भी होता है।  

बच्चों को भी अपार ख़ुशी मिलती है अपने शिक्षक /शिक्षिकाओं के लिए फूल और तोहफे जुटाने में. याद आया कि कल शिक्षक दिवस है , बच्चे स्कूल में थे तो याद रहता था ,  मैम को ऐसा कार्ड देना है , फूल कौन से ले जायेंगे ,  सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य गान आदि की तैयारियां अलग से ! बच्चों के अपनी ख़ास पसंद वाली मैम के लिए ख़ास उत्साह होना लाजिमी है।

अपने विषय में प्रवीणता  और सुव्यवहार से गुरु सहज ही अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो जाते हैं। अपने कोमल और उदार स्वभाव  से कई बार शिक्षक  अभिभावकों से भी ज्यादा आदर सत्कार और स्नेह प्राप्त करते हैं। 

बच्चों में बचपन से ही गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान का भाव निरोपित करने  में अभिभावकों की भूमिका भी कम नहीं होती। शिक्षकों की  डांट फटकार अथवा सजा देने के कारण को समझकर बच्चों को समझाते अभिभावक बच्चों के मन में उनके प्रति सम्मान को सुरक्षित रखते /रख  सकते हैं।  बाकी प्रेम और  स्नेह  -व्यवहार को आत्मसात करने की शक्ति यूँ भी बच्चों में होती है।

बड़े होने पर भी हम अपने उन गुरुओं को नहीं बिसराते जिन्होंने हमें सुसंस्कार दिए। 

कई बार अनजाने ही श्रद्धा उपजती है उनके प्रति भी जो हमारे शिक्षक नहीं है  जिन्होंने हमें पढाया नहीं परंतु अपने व्यवहार और व्यक्तित्व से ही इतना  प्रेरित करते हैं कि सामने उपस्थित हो तो शायद मुंह से बोल भी न फूटें  लेकिन मन ही मन श्रद्धा से हाथ  जुड़ जाते हैं। 

बचपन की एक घटना याद आती है।  छोटे कसबे में घर के पास ही दो स्कूल और  कॉलेज होने के कारण हमारे आस- पास के घरों में किराये पर रहने वाले शिक्षकों और विद्यार्थियों की भी संख्या काफी तादाद में थी। पास में ही जातियों के आधार पर बंटे हुए छात्रावास भी जिनके आपसी मनमुटाव के कारण आये दिन लड़ाई- झगड़ों के समाचार मिलते ही रहते थे। 

एक दिन बुखार के कारण स्कूल नहीं जाना हुआ।  सड़क से लगती जालीदार खिडकियों के सहारे पलंग पर लेटे यूँ ही आँख लगी थी कि जोरदार शोर शराबे के बीच बाहर झांकर देखा तो कोई दस पंद्रह लड़के " पकड़ो पकड़ो"  का शोर करते किसी एक लड़के का पीछा करते हमारे घर के में गेट के पास आ ठहरे थे ।  उनके हाथों में  हॉकी स्टिक , लाठियां भी थी। भय और घबराहट से नानी को पुकारते मैं तीन सीढियाँ एक साथ लांघ गई। लड़कों की भीड़ पड़ोस के प्रोफ़ेसर साहब के घर के बाहर रुकी थी क्योंकि जिस लड़के का पीछा करते हुए वे आये थे  वह उन प्रोफ़ेसर के घर में छिप गया था। ये सभी छात्र एक ही कॉलेज से थे , और प्रोफ़ेसर उनके शिक्षक। 
छात्र  बाहर खड़े अनुरोध करते रहे - सर ,आप एकबार इस लड़के को बाहर निकाल दें , हम चले जायेंगे।  
प्रोफ़ेसर साहब अड़े हुए थे  कि मैं अपने  सामने किसी लड़के से मारपीट नहीं होने दूंगा . तुम चले जाओ।  
थक हार कर लड़के वापस लौट गए।  
क्रोधित युवा भीड़ का अपने प्रोफ़ेसर के सामने नतमस्तक होते देखने का  यह अनुभव मुझे हमेशा याद रहता है।

उस प्रोफ़ेसर का उस छात्र  से कोई सम्बन्ध नहीं था , मगर उन्होंने उसकी सहायता की , यूँ ही निःस्वार्थ  … 
आये दिन जब शिक्षकों और  विद्यार्थियों की झड़प के बारे में सुनती हूँ तो  उक्त घटना और बेतरह याद आती है।  
आध्यात्मिक गुरुओं / शिक्षकों द्वारा चेले , विद्यार्थियों के शोषण की ख़बरों के बीच क्या आज भी हम भी हम गुरु पर इतना भरोसा कर सकते हैं !! ना ही आजकल विद्यार्थियों में इतनी सहिष्णुता बची है। 

कौन दोषी है . कौन पाक साफ़ . इस समय में पहचान मुश्किल होती जाती है क्योंकि षड्यंत्रकारी दोनों ही ओर है ! 
और शायद इसलिए ही आम जन के बीच यह यकीन भी उठता जाता है कि कई बार सहायता , स्नेह , प्रेम यूँ ही / यूँ भी होता है निःस्वार्थ  !!




शिक्षक दिवस की बहुत शुभकामनायें !!

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

जीवन की सम्पूर्णता ....



सैद्धांतिक या पारिभाषिक रूप में देखे तो
विवाह (Marriage) दो व्यक्तियों (प्राय: एक नर और एक मादा) का सामाजिक, धार्मिक या/तथा कानूनी रूप से एक साथ रहने का सम्बन्ध है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना

(साभार ..विकिपीडिया )

विवाह एक सूत्र/डोर /धागा है जिससे दो अपरिचित बंधते हैं और जीवन भर साथ चलने और उत्तरदायित्व वहन करने का प्रण करते हैं ...हालाँकि दो व्यक्तियों के आपस में बंधने का करना प्रेम ही होना चाहिए था मगर हमारे सामाजिक ढांचे ने एक तरह से इसे दो व्यक्तियों की एक दूसरे पर निर्भरता में तब्दील कर दिया है ... इसमें कोई शक नहीं कि जीवन के कठिन रास्तों पर एक हमसफ़र का होना बहुत सुकून देता है ...हर व्यक्ति कभी न कभी ऐसा साथी चाहता ही है जिससे वह अपना सुख दुःख साझा कर सके और आनंद और सुकून के कुछ पल बिता सके ...मगर यदि यह निर्भरता प्रेम के कारण हो तभी आनंददायक हो सकती है , वरना सिर्फ समझौता हो कर रह जाती है ...जबकि सच्चा प्रेम वह है जो किसी भी प्रकार की निर्भरता , आशा या अपेक्षा से बंधा नहीं होता ... व्यवहार में विवाह को प्रेम के आनंद पर आधारित होना चाहिए मगर जब समझौते का रूप ले लेता है तो प्रेम छू मंतर हो जाता है ...

मानव जाति के विकास , सृष्टि की निरंतरता और व्यक्ति के जीवन में सरलता के लिए विवाह एक आवश्यक प्रक्रिया है लेकिन विवाह में व्यक्ति संकुचित हो जाता है और परिवार उसकी प्राथमिकता हो जाती है . मेरे विचार में यही होना भी चाहिए ...प्रेम दो व्यक्तियों के बीच बढ़कर , परिवार , समाज , देश और फिर सृष्टि तक विस्तार पाए ..

विवाह में प्रेम नर और नारी के बीच का व्यवहार है जब कि जीवन जीने की आदर्श स्थिति मानव से मानव के प्रेम में है ...जीवन की सम्पूर्णता प्रेम में है ....मानव से मानव का , प्रकृति, पशु , पक्षियों , समाज , देश , पृथ्वी सबसे प्रेम ..मानवता का अस्तित्व बनाये रखने लिए भी यही आवश्यक है ....अपने प्रकृति प्रदत्त, वैधानिक या ईश्वर द्वारा निर्धारित रिश्तों से प्रेम तो सभी करते हैं , कर लेते हैं मगर लोक कल्याण के लिए प्रेम , करुणा और स्नेह के स्थाई भाव की आवश्यकता है ...जो लुप्तप्राय सा हो चला है ... नफरतें , रंजिशें , आतंकवादी घटनाये , बढ़ते अपराध स्नेह और करुणा के सूखते स्रोतों के कारण ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं !

विवाह में प्रेम और समस्त मानव जाति के प्रेम में बहुत अंतर है.… विवाह में बंधा प्रेम दो व्यक्तियों और परिवारों के बीच संचारित है , जबकि मानव से मानव अथवा मानव  का प्रकृति और उसके सभी अवयवों से प्रेम अपने दिव्य रूप में प्रसारित है. 


सृष्टि में मानव श्रृंखला की सतत गति बने रहने के लिए जहाँ परिवारों और समाजों की स्थापना आवश्यक है ,वही विभिन्न समाजों और प्रकृति की जीवन्तता कायम रखने के लिए मानव का मानव और प्रकृति से प्रेम आवश्यक  है. किसी भी प्रकार से परिवारों के सदस्यों के पारस्परिक प्रेम  और मानव से मानव/प्रकृति के प्रेम को छोटा अथवा  बड़ा कर देखा अथवा  परिभाषित नहीं किया जा सकता  …. 
मानव जीवन के अस्तित्व के लिए प्रेम का होना आवश्यक है , वह परिवार , समाज , मानव अथवा प्रकृति  (इस धरा पर स्थित उपस्थित भूभाग , नदिया , झरने , पर्वत ,पठार , जीव जंतु इत्यादि  )  से भी हो , सभी से हो !!  

डॉ महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि -

 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।'
प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती।
प्रेम एक दिव्य अनुभव , एहसास है जो स्नेह , करुणा और दुलार से पूरित होता है ...वह चाहे मानव से मानव का , मानव से प्रकृति का , माता- पिता से अपनी संतान का ,या प्रेमी -प्रेमिका और पति- पत्नी के बीच हो ...

निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में हमारे शास्त्रों और धार्मिक प्रसंगों में राधा कृष्ण के प्रेम के अनेक दृष्टान्त है ...हालाँकि यह प्रेम भी दो व्यक्तियों नर /नारी के बीच का ही उदाहरण है मगर समूची सृष्टि इस के आनंद से अभिभूत है ...
उन्हीं के अनुसार एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा- हे कृष्ण तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों, फिर भी तुमने रुक्मिणी से शादी की, मुझसे नहीं।
राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं।
प्रकृति से मानव के प्रेम के सन्दर्भ में राजस्थान के खेजडली ग्राम के निवासियों के प्रयास और योगदान को बिसराया ही नहीं जा सकता. उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी के मद्देनजर यह दृष्टांत अत्यंत ही उपयोगी /अनुसरणीय प्रतीत होता है। 


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है ..."सर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जान " यानी यदि सर कटकर भी वृक्षों की रक्षा की जाए तो भी फायदे का ही काम है .जोधपुर के किले के निर्माण में काम आने वाले चूने को बनाने के लिए लकडि़यों की आवश्यकता महसूस होने पर लिए खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों की कटाई का निर्णय किया गया। इस पर खेजड़ली गांव के लोगों ने निश्चय किया कि वे वृक्षों की रक्षा के लिए के लिए अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे . आसपास के गांवों में संदेशे भेजे गए ..लोग सैकड़ों की संख्या में खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए तथा पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। पेड़ों को काटा जाने लगा, तो लोगों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगे। एक व्यक्ति के कटने पर तुरन्त दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। धरती लाशों से पट गई . कुल मिलाकर 363 स्त्री-पुरूषों ने अपनी जानें दीं। जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली, तो उन्होंने पेड़ों को काटने से रोकने का आदेश दिया !


प्रकृति प्रेम का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता था ..  उनके  लिए जीवन की सम्पूर्णता वृक्षों /प्रकृति से प्रेम में ही रही!!

इस तरह समाज में अनेकानेक उदाहरणों ने साबित किया है कि जीवन की सम्पूर्णता सिर्फ विवाह में ही नहीं  अपितु  आध्यात्मिक उन्नति , और मानव से मानव के मध्य  स्नेह, प्रेम और करुणा के विस्तार में भी है ! 

स्वामी विवेकानंद , मदर टेरेसा , अटल बिहारी बाजपेयी , अब्दुल कलाम आज़ाद, बाबा रामदेव , आदि महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने जीवन को मानव कल्याण के लिए समर्पित किया और उनके जीवन की सम्पूर्णता पर किसे शक है !!!