बुधवार, 4 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ......(1)




करीने से सजा कर रखे गए लाल बड़े अक्षरों से लिखा नाम " वायब्रेंट मिडिया हाऊस  " . शीशे की पारदर्शी दीवारों से झांकती अन्तःसज्जा  …  राह चलते कितनी बार कदम रुके होंगे , कितनी बार चीते की खाल जैसे चित्रकारी से सजी अपनी स्कूटी  को रोका होगा उसने  !


कब से संजों रखा था सपना उसने किसी दिन इस ऑफिस में बतौर संपादक नहीं तो , पत्रकार या कर्मचारी के रूप में ही सही  . बड़े घोटालों के खुलासे , सफेदपोशों के काले कारनामे , अन्याय के विरुद्ध डट कर खड़े रहना ,  जाने  कब ख़बरों  ही ख़बरों में वह इस हाउस से जुड़ गयी थी और जब अपने लिए करियर चुनने  का अवसर आया तब उसने यही अपनाया।  

घर में सबने टोका , बहुत मुश्किल है यह लड़कियों के लिए , क्यों पड़ती हो झंझट में।  पत्रकारिता में क्या है ,  लिखो घर सजाने के बारे में , परिवारों को एकजुट रखने के बारे में , अच्छा खाना बनाने की टिप्स , सौंदर्य और ग्लैमर की दुनिया के बारे में जानकारी देना , कविता , कहानियां भी लिखती हो , क्या यह काफी नहीं है ....
कोई समझाता विस्तृत आकाश है तुम्हारे सामने  , तुम्हे  पत्रकार ही क्यों बनना है ! कितना खतरा है इसमें और तुम लड़की  जात , कैसे करोगी सामना !
परिजनों की चिंता स्वाभाविक थी। 

जैसे और लड़कियां कर रही हैं , तुमने नहीं देखा मेघा , निष्ठा  को। कितना आत्मविश्वास है उसमे।  कितनी बेबाकी से भ्रष्ट राजीनीति , अफसरशाही , कालाबाजारी , घोटालों पर लिखती है , आज लड़कियां कहाँ नहीं हैं , क्या नहीं कर रही हैं , पुलिस ,सेना ,गुप्तचर विभाग , वकालत और जाने क्या क्या , क्या उनका परिवार नहीं है  , तुम नाहक फ़िक्र क्यों करती हो।
माँ के गले में बांहे डाल  उसे आश्वस्त करने की कोशिश करती।

मीडिया  हाउस में ऊर्जावान पत्रकारों की   नयी भर्तियों के बारे में जैसे ही  पता चला , वह मिली उत्कल से  . उत्कल और तेजस्वी  पडोसी और सहपाठी होने के कारण अच्छे मित्र भी थे। बारिश के पानी  में साथ कुलांचे भरने , नाव बहाने से से लेकर स्कूल के पास सटे मूंगफली और मूली के खेतों में सेंधमारी तक के कार्य उन्होंने एक साथ ही किये थे।  माध्यमिक विद्यालय तक आते दोनों के विद्यालय बदल गए . उत्कल के पिता कई प्रमोशन पा कर अपने विभाग के उच्चाधिकारी बन चुके थे , हर प्रमोशन के साथ ही उनका रहन -सहन उच्च से उच्चतर होता गया , उत्कल की माँ सोने से लदती  गयी , गैरेज में खड़े दुपहिया का स्थान महंगे  चौपहिया ने ले लिए ,गाड़ियां महँगी होती गयी  और इसी अदला बदली में उत्कल सरकारी विद्यालय से प्रमोट होकर सबसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित  अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय का विद्यार्थी हो गया।  तेजस्वी और उसके परिवार के साथ  उसके  व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ , हालाँकि उत्कल के माता- पिता जब तब अपने रुतबे का शंख बजाये बिना नहीं रहते।
 इंजीनियरिंग की पढ़ाई  पूरी कर  उत्कल शहर के ही जाने माने संस्थान   से जुड़  चूका था , तेजस्वी  अपनी पढ़ाई पूरी कर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं  का सामना करते हुए अपने सपने को पाल रही थी।   उत्कल भी  विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही  उसके सपने पूर्ण करने में अपनी सलाह और प्रेरणा देना नहीं भूलता।   उत्कल ने ही मीडिया हॉउस की चीफ एडिटर का पता देते हुए उसे सलाह दी कि आवेदन करने से पहले वह पहले एक बार उससे मिल ले। उसके बाद ही अपना आवेदन दाखिल करे। 
परिचय से लेकर साक्षात्कार तक उसका आत्मविश्वास कई बार डगमगाया।  बॉब कट हेअर   स्टायल और मिनी स्कर्ट वाली फॉर्मल आउटफिटमें टाइटफिटेड माला ने उसे ऊपर से नीचे आँख भर देखा तो वह एक बार सकपका गयी।  उसने भी खुद पर एक नजर डाली , सलवार कमीज पर  लापरवाही से ओढ़ा स्टोल और रूखे बालों में गुंथी हुई चोटी ।  खुद को कोसा उसने , कम से  कम बाल खुले ही रख लेती , मगर घबराहट को छिपाते हुए चेहरे पर आत्मविश्वासी मुस्कान लाने में कामयाब हो ही गई 

 बात यही ख़त्म नहीं हुई , धड़धड़ाती अंग्रेजी में पूछे गए माला के सवालों ने फिर से उसके दिल की धड़कने बढ़ा दी।  अंग्रेजी ज्ञान बुरा नहीं  था उसका , मगर  हिंदी माध्यम से ली गयी शिक्षा पटर पटर अंग्रेजी बोलने पर अंकुश लगा देती।  उसने धीमे शब्दों में अपना परिचय देते हुए अपने आने का मकसद बताया।  

ओहो , पत्रकार बनने आई हो ,होठों को तिरछा कर भीषण हंसी को रोकते माला ने  हिंदी में ही कहा । चोर  नजरों से तेजस्वी ने देखा ,उसके पास ही खड़े एक कर्मचारी के होठों पर भी  तीव्र मुस्कराहट थी।  गले में लटके बैज पर नाम भी देखा उसने -साहिल  मिश्रा !

तेजस्वी ने एक गहरी सांस ली और अपने सपने को याद किया।
जी हाँ ! वैदेही  मैम कब और  कहाँ मिलेंगी। तन कर खड़े रहते उसने जवाब दिया.
वैदेही के नाम से माला  कुछ संयत हुई।  कार्य के प्रति अपने समर्पण के साथ ही बेबाकी और साहस के लिए जाने जाने वाली  अनुशासनप्रिय उपसम्पादक  वैदेही का अपना रुतबा था.
माला से  केबिन का पता लेकर  चल पड़ी तेजस्वी वैदेही से मिलने ।  
वैदेही उससे बड़े प्यार  से मिली , उत्कल ने उसे तेजस्वी के बारे में बता दिया था। उसकी शैक्षणिक योग्यता के साथ ही  उसके पसंदीदा विषय को भी जानना चाहा .

 तुम्हे  किस विषय पर लिखना अधिक पसंद है.

देश की  सामाजिक , राजनैतिक और प्रशासनिक  व्यवस्था पर  चिंतन और बेबाक लेखन मुझे बहुत पसंद है। 

स्त्री सशक्तिकरण अथवा स्त्रियों से ही जुड़े अन्य मुद्दों में तुम्हारी  रूचि नहीं है ? वैदेही का चौंकना लाज़िमी था !

सामाजिक व्यवस्था मतलब नारी नहीं हुआ !

हम्म्म्म  …मगर जैसी हमारी सामाजिक व्यवस्था है , उसमे स्त्री एक  कमजोर पक्ष मानी जाती है. उसे विशेष संरक्षण , सहानुभूति , देखभाल की आवश्यकता है।

मैं समाज के प्रत्येक अंग के चिंतन ,विकास और संरक्षण पर ध्यान देना और दिलाना चाहूंगी। 
तेजस्वी को अपनी चोंच से अंडे का खोल फोड़ कर बाहर आने वाली चिड़िया की कहानी याद थी. 

वैदेही ने उसे आवेदन और चयन की कार्यविधि समझाई। 

तेजस्वी मानती रही है कि खूबसूरती   देखने वाले की  आँखों में होती है , यह सिर्फ इंसान पर ही लागू होता है . घर में  उसकी भाई बहन से कई बार कहा सुनी हो जाती. उसकी टेबल को कोई हाथ ना लगाये , जो चीज जहाँ से ली वहीं  रखे . कई बार माँ  समझाती भी उसे - थोडा इग्नोर भी किया करो ,मगर  उसे  घर , स्टडी टेबल , ऑफिस  सब व्यवस्थित ही चाहिए।
जब उसे सुन्दर रंगों और शीशे से घिरे व्यवस्थित केबिन से सजा धजा ऑफिस अपने कार्यक्षेत्र के लिए मिला  तो उसकी प्रसन्नता  का ठिकाना ही नहीं था। उसका सपना सच होने जा रहा था !


क्रमशः .... 


चित्र गूगल से साभार लिया गया है , आपत्ति होने पर हटा दिया जाएगा !

सोमवार, 11 नवंबर 2013

" श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ"



 यमुना के तट वंशी बजाये , कालिया नाग को नाच नचाये , कंस को उस लोक पठाये , राधा -रुक्मिणी -मीरा के मन में समाये, सुदामा -अर्जुन- द्रौपदी के सखा कहाये  । मानव जीवन के  प्रत्येक सोपान यानि उम्र की सीढियाँ चढ़ते हुए कितने ही प्रतिमान बनाये।  धरती पर प्रेम की सभी सम्पूर्ण अवस्थाओं  को रस ले- ले निभाया . कृष्ण ने युगों  तक इस धरती के लिए प्रेम की व्याख्याएं गढ़ी नहीं बल्कि अपनाकर(जी) कर  दिखाई।  
हिंदी पंचांग में हिंदुओं के लिए पवित्र कार्तिक मास  का बहुत महत्व है।  राधा -दामोदर को समर्पित इस पवित्र कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में विभिन्न तिथियों ( कार्तिक षष्ठी , गोपाष्टमी , आँवला नवमी ,वैकुण्ठ चतुर्दशी , भीष्म पंचक ) के अनुसार पर्व विशेष उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं . सुबह -सवेरे स्त्रियों और पुरुषों द्वारा तारों की छाँव में किये जाने वाली स्नान -पूजा और भजन , गीतों से पूरा वातावरण पवित्र हो उठता है .
कार्तिक मास में दामोदर भगवान् को रिझाने के लिए ग्रामीण आंचलिक बोलियों में गाये जाने  वाले गीतों की बात ही अनूठी है . इन  गीतों ( पाँवड़ियाँ , रसोई , बुहारी , आरती आदि ) के माध्यम  से वे श्रीकृष्ण को विभिन्न वस्त्रादि , भोजन , खडाऊ आदि भेट/अर्पित  करती हैं .  अपनी सरल सरस भाषा में स्त्रियाँ /पुरुष योगेश्वरश्रीकृष्ण को अपने मध्य का एक आम इंसान ही बना लेते हैं और श्रीकृष्ण अपनी  इंसानी लीलाओं के माध्यम से ही तो जन -जन से जुड़े हुए थे . वही बालसुलभ मिट्टी खाने , माखन मिश्री चुराने , माता को विभिन्न उलाहने देने , मित्रों के साथ चुहलबाजी जैसी कारस्तानियाँ ही उन्हें स्त्री /पुरुष  से इतना जोड़े रखती हैं कि वह उनके बीच का तू ही हो जाता है .

कार्तिक मास में श्रीकृष्ण को खड़ाऊ भेंट /अर्पित किये जाने वाला ऐसा ही एक लोक भजन/गीत " श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ" मुझे बहुत प्रिय है!
राधा दामोदर , जयपुर 

" श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ"
म्हे थाने पूछा म्हारा श्री भगवान्
रंगी चंगी पाँवड़ियाँ कुण घाली थांके पाँव
म्हे तो गया था राधा खातन के द्वार
वे ही पहराई म्हाने पवरियाँ जी राज़
इतनी तो सुन राधा खातन के जाए
खातन बैठी खाट बिछाए
म्हे तो ए खातन थां स लड़बा ना आया
थे मोहा जी म्हारा श्री भगवान्
थार सरीखी म्हारी पाणी री पणिहार
कान्हा सरीखा म्हारा गायाँ रा गवाल
राधा खातान में हुई छे जो रार
उभा -उभा मुलक श्री भगवान्
सामी पगां थे लड़बा ना जाए
आछो ए राधा मांड्यो छे रार
आप कुवाया पाणी री पणिहार
म्हाने कुवाया थे गायां रा गवाल ...

इस गीत में वर्णित कथा इस प्रकार है कि एक दिन श्री भगवान् के चरणों में रंग -बिरंगी खडाऊ देख कर श्री राधा उनसे पूछती है कि आपके पैरों में इतनी सुन्दर खडाऊ कहाँ से आई . श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि मैं खातन ( बढई की पत्नी ) के घर गया था , उसने ही मुझे इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट की . श्रीराधा को यह सहन नहीं हुआ।  जलती- भुनती राधा उस खातन से लड़ने पहुँच गयी कि वह इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट कर श्रीकृष्ण को रिझाना /मोहना चाहती हैं .   इस पर खातन राधा को  आड़े हाथों लेते हुए कहती है कि " राधा ,तू अपने आपको क्या समझती है. तेरे जैसी तो मेरे पानी भरने वाली पनिहारनियाँ हैं , और तेरे कृष्ण जैसे मेरे गायों को चराने वाले गवाल , मैं क्यों उन्हें रिझाउँगी ."  राधा का गर्व चूर -चूर हो गया .
भक्त के प्रेम के वश में बंधे श्रीकृष्ण तिरछे मुस्कुराते हुए कहते हैं ... " राधा , ये तूने क्या किया , मैं तो भक्तों के प्रेम में बंधा हूँ , उनके लिए उन जैसा ही सामान्य हूँ , सामने होकर लड़ने गयी तब भी मैं तो ग्वाला ही रहा , तुमने स्वयं को भी पनिहारन कहलवाया ".
श्रीकृष्ण का प्रेम सामान्य मानव में भी अद्भुत साहस  भर देता है।  इसी साहस ने उस स्त्री के मुंह से ये बोल बुलवाये। अपनी विविध लीलाओं से मन को मोहने वाले मनमोहन श्रीकृष्ण  प्रभावी सन्देश देकर जनमानस में अपनी छवि अंकित करते हैं।  श्रीकृष्ण ने जिसकी अंगुली पकड़ी , निर्भय हुआ !!

इस गीत में प्रेम और ईर्ष्या के कारण होने वाली तकरार तो है ही और उससे भी बड़ी सीख  है कि ईर्ष्याग्रस्त होकर जानबूझकर किसी से झगड़ा मोल लेने वाले का अपना मान- सम्मान तो कम होता ही है , बल्कि इसी कारण से वह अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को भी अपमानित होने पर विवश करता है .

इस गीत के बहाने ही उस साधारण स्त्री ने उन आत्ममुग्ध , परिवार , अपने रुतबे से गर्वोन्मत्त सभी स्त्री- पुरुषों को सन्देश दे दिया कि जो बेवजह ईर्ष्या से ग्रस्त होकर उन पर अधिकार ज़माने की चेष्टा में अपने सबसे प्रिय व्यक्तियों की जगहंसाई करवाते हैं . एक तो यह कत्तई आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है ,उसका  दूसरे के लिए भी उतना ही महत्व हो . दूसरी ओर यह भी है कि वह ख़ास व्यक्ति उस आम व्यक्ति के प्रेम /भक्ति /स्नेह के लिए उस जैसा साधारण ही बना रहना /दिखना चाहता हो. 
जो आपके लिए अनमोल हो , हो सकता है कि दूसरों के लिए उसका मोल कौड़ी भर भी ना हो ! 

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

डूबते सूरज को अर्ध्य देने वाला इकलौता छठ - पर्व .....

आज छठ पूजा है , छठ व्रती और श्रद्धालु शाम को ढलते सूरज को अर्ध्य देंगे।  यह इकलौता ऐसा पर्व है जहाँ डूबते सूरज को  दिया जाता है।आज वर्षों बाद इस दिन बेचैनी नहीं है।    माँ वर्षों से करती रही है इस व्रत को , उनका विश्वास रहा कि पापा इस व्रत के कारण ही अपनी जिंदगी के अनमोल दस वर्ष और जी पाये। पापा भी इस कठिन व्रत की पालना के समय उनका पूरा ध्यान  रखते थे।  व्रत के लिए आवश्यक फल फूल सब्जियाँ   , दौरे , सूप जैसी समस्त सामग्रियों को लाने और ढंग से धोकर जमाने तक में भूखी प्यासी माँ की सहायता के लिए सहायक उपस्थित होते थे।  
पिता के जाने के बाद व्रत करते हुए भी इन सब चीजों की व्यवस्था माँ स्वयं करती , बाजार जाती , सब्जी फल सूप वगैरह खुद चुन कर लाती , मन हमेशा चिंताग्रस्त बना रहता। माँ को सबने बहुत समझाया  कि वे अब इस व्रत को त्याग दें , जिनके लिए करती थी वही  नहीं रहे , और जिन संतानों के लिए करती रही है ,   वे स्वयं खुद कर लेंगे अपनी सुरक्षा के लिए , मगर माँ होते हुए समझ सकती हूँ   ममता की लाचारी। दिल के दौरे के बाद हुई  एन्जियोंप्लास्टी के कारण  आखिर माँ को यह व्रत दूसरे को सौंपना ही पड़ा।  कहते हैं कि इस व्रत को छोड़ा नहीं जा सकता , किसी दूसरे को अर्पण किया जाता है , यानि वह व्यक्ति इस व्रत को करने का संकल्प लेता है ! पिछली छठ को बिहार जाकर इस व्रत को त्याग आई माँ और यही कारण है कि आज मैं कुछ निश्चिन्त हूँ। हालाँकि उन माताओं की भी चिंता मन में है जो अपने परिवार के समुचित सहयोग के बिना इस व्रत को कर रही होंगी। 
माँ के व्रत के बहाने जयपुर के गलता घाट  की रौनक , प्रसाद , व्रतियों के सूप में दूध का अर्ध्य , सात स्त्रियों से प्रसाद माँगना , सिन्दूर लगाना , पहाड़ी पर  सूर्य देवता के दर्शन आदि की कमी भी महसूस हो ही रही है !

तीन दिन तक बिना पानी -खाने के अलावा रात में जाग कर ठेकुवे का प्रसाद बनाना , रात भर खुले आसमान के नीचे दूसरे दिन  उगने वाले सूर्य का इन्तजार करना , ठन्डे पानी में गीले बालों और  वस्त्रों के साथ खड़े रहना  निश्चित ही इतना आसान नहीं है। परिणाम स्वरुप अक्सर व्रती स्त्रियां चिड़चिड़ी हो जाती हैं। दौरे को रखने , अर्ध्य देने आदि के दौरान कई बार लड़ने झगड़ने के स्वर सुनाई देते हैं। 
 एक बार का दृश्य याद है जब सूर्योदय के अर्ध्य के बाद व्रती स्त्री के पति द्वारा लाये गए चाय के ग्लास को उठाकर उस स्त्री ने फेंक दिया , पता नहीं किस बात पर गुस्से में भरी हुई थी। इस दौरान उनके चिड़चिड़ेपन पर मुझे गुस्सा नहीं आता , डिहाईड्रेशन के कारण उनके चिड़चिड़ेपन को समझा जा सकता है।  हालाँकि इस व्रत को सिर्फ स्त्रियां नहीं करती , पुरुष भी तड़के ठण्ड में ठिठुरते गीले कपड़ों में नारियल आदि लिए सूर्यदेव का इन्तजार करते नजर आते हैं , वहीं कुछ लोग पत्नी या माँ के सहयोग के लिए भी उपस्थित रहते हैं।  इन व्रत त्योहारों के धार्मिक कारण कुछ भी हों , परन्तु ये आयोजन परिवार और समाज के बीच एक सेतु बनाने का कार्य अवश्य करते हैं। 


जयपुर के गलता घाट पर छठ की पुरानी तस्वीरें 

मिलजुल कर पर्व की तैयारियां करना ,एक दूसरे की सहायता करना , गीतों के बोलों के साथ  हंसी- ठिठोली , एक ही छत के नीचे सबका इकट्ठा होना परिवार और समाज को एकजुट रखने में महती भूमिका निभाता है।  समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अपने परिवार में बच्चों को आपस में मिलजुल कर तथा पास पड़ोस को भी उल्लास में सम्मिलित करने को प्रेरित करना उचित है , बात उल्लास और आनंद के संचार की हो  ना कि गहने , कपडे , घरेलू उपकरणों ,विलास की सामग्रियों के थोथे प्रदर्शन का प्रतीक बन कर ना रह जाए ये उत्सव , त्यौहार !  

परिवारों , समाजों में  उल्लास बना रहे , मन का उत्सव भी रगीन खुशनुमा हो , छठ पर्व की अनगिनत शुभकामनाएँ !