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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

"आख़िर लाचार कौन था ...??"

 महिलाओं की दान प्रवृति और अपाहिजों तथा गरीब ,लाचारों की मदद कर अपना यह लोक और परलोक एक साथ सुधारने की मानसिक संतुष्टि धार्मिक स्थलों पर अपाहिजों , लाचारों और भिखारियों के संख्या में दिनोदिन बढोतरीकरने का एक मुख्य कारक है, हालाँकि इन्ही महिलाओं को अक्सर पसीने से भीगे हांफते   रिक्शाचालकों व मेहनत से रोजी -रोटी कमाने वाले सब्जी के ठेले वालों से एक -दो रुपये के लिए सर फुट्टवल करते देख वह आश्चर्य में पड़ जाती है ।

वृंदा भी बहुत पसीजती थी और घर के दरवाजे पर अपने भूखे बच्चों के लिए खाना मांगने वाली की आर्त्र पुकार को अनसुना नही कर पाती। उसकी करुणा देखकर खाने की गुहार वस्त्रों और चप्पलों तक जा पहुँचती।

"देख बाई ..बच्चा कैसे सियां मरे है ..कोई टाबरों का फटा पुराना गरम कपड़ा ही दे दे।"

वृंदा की आँखों के सामने बच्चों की पुराने कपडों की पोटली घूम जाती और उसे रुकने का इशारा कर अन्दर भागी चली जाती ,तब तक उस मांगने वाली को पुरानी चादर और चप्पलों की जरुरत महसूस हो जाती। उसकी इस आदत पर पति और बच्चे बहुत हँसते ..
"देखना किसी दिन हमारे नए कपड़े भी यूँ ही गायब मत कर देना "

इधर एक मांगने वाली हर दो या तीन दिन बाद आ धमकती। वृंदा भी उसे कभी खाली हाथ नही लौटाती और अपने परिवार के फलने फूलने की आशीष लेती फूली ना समाती । खाने से होते हुए चादर, चप्पलें , पुरानी साड़ी , खाली डब्बे कब उसकी भेंट चढ़ जाते , ख़ुद वृंदा को भी पता नही चलता...

मगर जब अगले ही दिन बच्चों को बिना चप्पल देख वृंदा इस बाबत कोई प्रश्न करती तो जवाब मिलता ...

 बाई ... इसका भाई सियां मरे था ..इसको तो गोद में भी टांग लूंगी " और वृंदा घर में और पुराने चप्पल जुटे  ढूँढने में लग जाती।  मगर जब एक दिन कस्बे में मंगलवार को लगने वाले विशेष हाट बाजार में उसी औरत को बोली लगाकर मांगे हुए वस्त्र आदि बेचते हुए देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया । अब किसी मांगने वाली को कुछ भी नहीं देने का फैसला कर बैठी पर  जब अगले ही दिन वह महिला अपने  भूखे नंगे बच्चे के साथ उसकी चौखट पर आ खड़ी हुई तो उसका फैसला धरा का धरा रह गया ।
वह सोचने लगी आखिरकार भूख और लाचारी ही तो उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करती है।

 कुछ अनमने मन से लॉन में बिखरी हुए सूखे पत्तों की ओर इशारा करते हुए उसने कहा.

मैं अभी खाना लेकर आती हूँ , तब तक तू यह कचरा समेट ले "

जब खाना लेकर वृंदा बाहर आयी तो वह मांगने वाली जस की तस वहीं खड़ी मिली। अब तो वृंदा भी अड़ गयी ।

तुझे खाना तभी मिलेगा , जब कुछ काम करेगी।"
इतने में तो उसका बडबडाना शुरू हो गया ...

 बाई ...मेरे से तो ना होवे सफाई ...रोटियों पर इतना गुमान ... और घणी मिल जावेगी "

और पडोसन के दरवाजे की घंटी बजाकर अलापना शुरू कर दिया । जब पडोसन खाना लेकर आयी तो उसे ढेरों आशीष देती हुए वृंदा को मुंह चिढाती -सी सर्र से निकल गयी। वृंदा खड़ी मुंह ताकती रही .

"आख़िर लाचार कौन था ...??"







बुधवार, 22 मई 2013

लरजती उम्मीद ...फौलादी विश्वास



"जल्दी उठो ...रामपतिया आई नहीं अभी तक , मसाला भी पिसा नहीं , आटा भी नहीं गूंधा हुआ ...अब खाना कैसे बनेगा ...मुझे देर हो रही है ...तुम जाकर देख आओक्यों नहीं  रही है।"

तेजी से घर में घुसते हुए नीरा के कदम रुक गए ।

मतलब महारानी अभी भी सो ही रही है ...

पड़ोस में ही रहने वाली अपनी सहेली सीमा से मिलने आई नीरा ने जा कर उसे झिंझोड़ दिया .


तुम्हे कोई शर्म है या नहीं ...इतने दिनों बाद लम्बी छुट्टियों में आई हो और पसरी रहती हो इतनी देर तक , ये नहीं कि आंटी की थोड़ी हेल्प ही कर दो ।

कभी -कभी ही तो आती हूँ...तो आराम से नींद तो पूरी कर लूं ...अपना वॉल्यूम कम करो तो ....कुशन से अपने कान ढकती सीमा महटियाने लगी .


अब तुम ही संभालो इसे , मैं तो भाग रही हूँ ...पहले ही लेट हो गयी हूँ .

आप जाईये आंटी ...इसको तो मैं देखती हूँ ...

नीरा रसोई में घुस गयी.

महारानी , उठो अब ...चाय पी लो ...आंटी स्कूल गयीं ...दुबारा कोई चाय नहीं बनाने वाला है . 


थैंक यू ,
दोस्त हो तो ऐसी ....चाय का गरमागरम कप हाथ में लेते सीमा उठ गयी .

"इस रामपतिया को क्या हो गया , आ नहीं रही ४ दिन से ...सब काम मुझे ही देखना पड़ रहा है "

कही गाँव चली गयी हो .

अरे नहीं , अभी तो ज्यादा समय नहीं हुआ उसे गाँव से आये ...उसका बेटा आने वाला था ...शहर में कोई अच्छी नौकरी मिली है उसे .

दोनों सहेलियां चाय सुड़कते बाहर बरामदे में आ बैठी।

बरामदे से सटे बगीचे में गुडाई करते किशन को सीमा ने आवाज़ लगाई ...


" किसना ...तनी रामपतिया का खबर लेके आओ तो ...काहे नईखी आवत ...4 दिन भईल ...जा दौड़ के देख तो ..."
चाय पीकर दोनों बतियाते हुए 
बरामदे से सटे  बगीचे में टहलती रही .

दीदी जी , दीदी जी ...किशन की आवाज सुनकर दोनों दौड़कर बरामदे में आई तो सामने बदहवास हांफता किशन नजर आया .

का भईल रे ...

उ दीदी जी ...उहाँ ढेर लोंग रहे ....का जाने का बात बा ...पुलिसवा भी रहे ... हम तो भागे आईनी .

चल , देख कर आते हैं ...क्या बात है !

किसी अनहोनी की आशंका में दोनों सहेलियाँ साथ लपक ली ।

रामपतिया के घर का नजारा देख दोनों स्तब्ध रह गयी ...पुलिस वाले बता रहे थे ...बुखार था इसे दो -तीन दिन से ....पेट में कुछ अन्न नहीं गया ...पहले से हड्डियों का ढांचा भूख बर्दाश्त नहीं कर पाया ..कल से बेहोश पडी थी .
ओह! धम से बैठ गयी नीरा वहीँ ...

३-४ घरों में काम करके कमाने वाली रामपतिया ने अपनी मेहनत की कमाई से बेटे को पढने लिखने शहर भेजा ...इतनी स्वाभिमानी कि काम करके लौटते गृहस्वमिनियाँ खाना खाने को कहती तो साफ़ मना कर देती ...
" ना ...बहुरिया ...भात पका के आईल बानी "

रात दिन कुछ न कुछ मांग कर ले जाने वाली अन्य सेविकाओं के मुकाबले उसे देखना सीमा और नीरा को सुखद आश्चर्य में डालता था । भीड़ को हटा और पुलिस वाले को विदा कर दोनों उसे रिक्शे में लेकर डॉक्टर के पास भागी  ग्लूकोज़ की दो बोतलों ने शरीर में कुछ हरकत की 

नीरा बिगड़ने लगी थी उस पर ...
का जी ...बीमार थी तो कहलवा नहीं सकती थी ... जो प्राण निकल जाता तो पाप किसके मत्थे आता ...उ जो बेटा लौटने वाला है शहर से ...सोचा है ...का होता उसका ।

बबी ...गुस्सा मत कीजिये .... कहाँ बुझे थे कि ऐसन हो जाएगा ...हमसे उठा ही नहीं गया कि कुछ बना कर खा लेते ...और प्राण कैसे निकलता ...बिटवा जो आये वाला है ।

उन लरजती पलकों में हलकी सी नमी के बीच ढेर सारी उम्मीद लहलहा रही थी। सीमा और नीरा उसके जज्बे के आगे नतमस्तक थी । हड्डियों का वह ढांचा अचानक उन्हें फौलादी लगने लगा था ।




वटवृक्ष
 से प्रकाशित .....



बुधवार, 9 दिसंबर 2009

क्या आपको भी मथते हैं ये सवाल ....!!

कल सुबह घर के बाहर बने छोटे से बागीचे में पानी डाल रही थी की दो छोटी लड़कियां आ पहुँची ...पिछले एक महीन से कई बार आ जाती है ...वही घर घर खाना मांगने वाली ....क्या भिखारन कहूँ उन्हें ...मन नही मानता ...ये छोटी बच्चियां भिखारन कैसे हो सकती हैं ...जो ये भी नही जानती ... बिना काम किए घर घर खाने की गुहार करना भीख मांगना ही कहलाता है ...
ज्यादा खाना बना लेना ...बहुत बुरी आदत है मेरी जिसे छोड़ना चाहती हूँ मगर बुरी लत की तरह छूटती ही नही ...कुल चार प्राणी है घर में ...आए दिन इतना खाना बन ही जाता है कि दो अतिरिक्त लो भोजन कर सके ...बहुत हाथ रोक कर बनाने पर भी ज्यादा बन ही जाता है ...अब बासी भोजन को फेंकने की बजाय जरुरतमंदों को देने में कोई बुराई तो नही है ....इसलिए इन बच्चों को दे तो देती हूँ ...मगर साथ ही उनसे बातचीत कर समझाती भी रहती हूँ कि भीख मांगना उचित नही है....तुम्हे स्कूल जाना चाहिए , पढ़ना भी चाहिए ....आदि आदि ...
उनके चेहरे से टपकती बेपरवाही और व्यंग्य भरी मुस्कान और एक दुसरे को देख कर मुस्कुराने को नजरंदाज करते हुए भी मैं अपना अनर्गल (?) प्रलाप जारी रखती हूँ ...कभी कोई बात उनके दिल में उतर जाए ...एक उम्मीद सी रखते हुए ...
मगर आज उनको देखकर अजीब सी वितृष्णा से मन भर गया ...काले कुचैले हाथ पैर ...मैल की मनों परते चढ़े हुए ...मानों सालो से नहाये धोये नही .. गालों और होठों पर ब्लशर का लाल रंग पुता हुआ ...हरे रंग से बिंदी लगाई हुई ...मैं खाना देते देते रुक गयी ...क्या इन्ही गंदे हाथों से ये लोग खाना खा भी लेते हैं ...अपने बच्चों के हाथ में स्याही का निशान ही बर्दाश्त नही कर पाती हूँ मैं ...गंदे हाथ पैरों के लिए डांटते हुए मैं पानी डालकर धुलाती उनसे सवाल करती रही ....
कितनी गन्दी हो रही हो दोनों ....ये लाल हरा क्या पोत रखा है .....
छाले हो गए हैं जो माँ ने लगा दिया ....
छाले ...गाल पर ...माथे पर ...मैं उलझने लगती हूँ ... इतनी गन्दी क्यों रहती हो ...हाथ मुंह नही धुलते तुमसे
पानी नही है ...
पानी नही है ....तुम लोग पानी पीते नही हो ....तुम लोग कहाँ रहते हो ...?
यही पास में ...धरम कांटे पर
वहां पानी नही है ...पानी कहाँ से लाते हो .....?
बोरिंग है बहुत दूर ...वही से
जब पानी ला सकते हो तो हाथ पैर धोना नहाना नही हो सकता...?
दोनों शर्माने लगती हैं ....
पहले अच्छी तरह हाथ मुंह साफ़ करो ...तभी खाना मिलेगा ....
दोनों बड़ी फुर्ती से हाथ मुंह धोने लगती है ...बीच बीच में मेरा नागवार प्रवचन भी झेल लेती हैं ...खाना मिलने के लालच में ...
बस मम्मा , क्या सब एक दिन में ही सिखा दोगे ...बेटी पीछे आ खड़ी होती है ...अपने मोबाइल कैमरे को ऑन करती हुई ...उनकी हालत से बेजार परेशान ....मेरा साक्षात्कार समाप्त नही हुआ अभी ...
तुम कितने भाई बहन हो ...?
दो भाई और तीन बहन
तुम सुबह सुबह खाना मांगे निकल जाती हो ...तुम्हारी माँ खाना नही बनाती ...?
नही...बस सुबह चाय पिलाई थी
और खाना ...सब लोग कहाँ खाते हैं ....?
पिताजी और भाई काम पर जाते हैं ...वही ठेकेदार खिलाता है ...
और तुम्हारी माँ ......?
वो भी मांग कर लाती है ...
मैं सोचने पर विवश हूँ ...क्या अब भी मुझे उन्हेंपढने , स्कूल जाने के लिए समझाना उचित होगा ...??
मैं बताना चाहती थी ...कई सरकारी विद्यालयों में मुफ्त खाना मिलता है ...तुम्हे पढने के साथ खाना भी मिलेगा ...पता नही क्या सोच कर चुप रह गयी...कोई बात नही ...अगली बार समझाउंगी ...

वे दोनों बच्चियां तो खाना लेकर चली गयी ....बेटी अपनी किताबों का बोझ उठाये अन्दर चली गयी ..पौधों में पानी डालते मेरा ख़ुद से विमर्श चलता रहा ...

क्या भविष्य है इन बच्चियों का ...इनके लिए जिंदगी के क्या मायने हैं ....

क्या इनका जन्म भी इनके माता पिता के लिए गर्व अनुभव करने का क्षण होता होगा ....

क्या इन्हे पहली बार गोद में लेकर इनकी माँ ने भी वही आह्लादकारी पल महसूस किया होगा ...

बच्चों को भीख मांगने के गुर सिखाते हुए उनका कलेजा नही काँपता होगा ....ख़ुद तकलीफ में रहकर बच्चों को सब सुविधा उपलब्ध कराने जैसे कोई भाव नही उठते होंगे इनके माता पिता के मन में ....

कीचड़ मिटटी में सने हाथ मुंह प्यार से धुला कर रूखे बालों को करीने से सँवारने की इच्छा नही होती होगी इनकी माँ की ....

आत्मसम्मान , स्वाभिमान ....ये लोग कुछ भी नही समझते होंगे .....!!

भावनाए भूख और बेकारी के आगे दम तोडती होंगी या फिर इनके दिल और दिमाग इस मिटटी से बनते ही नही जो इन्हे सोचने पर विवश कर सके ......

क्या धर्म , राजनीति , आध्यात्म इनका जीवन प्रभावित कर पाते होंगे ...

क्या हमें वाकई अपने शहर के चमचमाते शौपिंग काम्प्लेक्स , अत्याधुनिक मल्टी प्लेक्सों आदि पर ही गर्व करना चाहिए ....इन बच्चों के मटियामेट बचपन को नजरअंदाज करते हुए .....

कितने सवाल....
क्या मिलेंगे कभी मुझे जवाब ...

क्या आप लोगों को भी मथते हैं ये सवाल ..............................!!



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* अपनी पिछली पोस्ट पर हरकीरत जी की इस टिपण्णी ने मुझे सोचने पर विवश किया है.....
हरकीरत ' हीर' ने आपकी पोस्ट " मेरी बात ...खालिस गृहिणी वाली " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
पहचानने की कोशिश करती हूँ ......बड़ी सी बिंदी .....कभी कभी किसी और नाम से भी .....है न ...? मैंने भी देखा है अगर वही है तो .....

मैं स्पष्ट कर दूँ....मेरा सिर्फ़ एक ही ब्लॉग है और मैं वाणी गीत के नाम से ही अपनी पोस्ट और कमेन्ट पोस्ट करती हूँ ....जो मेरा वास्तविक नही आभासी नाम है लेखन के लिए .....इसके अलावा मैं http://kabirakhadabazarmein।blogspot.com/ पर आमंत्रित सदस्य हूँ ...एक दो पोस्ट नारी ब्लॉग पर भी लिखी है ....बस इसके अलावा मैं किसी और नाम से ब्लॉग पर मौजूद नही हूँ....


यह सब इसलिए लिखा है...कि कहीं ऐसा ना हो ....रात भर जाग कर गीत कविता लिखूं मैं ....सुबह जल्दी उठकर पोस्ट करू मैं ...और सारी क्रेडिट कोई और ले जाए ..... :) .........!!