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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

ये तेरा घर ये मेरा घर...



देखो. इतने समय बाद चल रही हो. कुछ कहें तो चुप रहना.

उसने घूर कर पति की ओर देखा-  यह बात उन्हें क्यों नहीं कहते. तुम जानते तो हो. एक दो बार में तो मैं किसी को कुछ कहती ही नहीं.

कोई बात नहीं तीन-चार बार भी सुन लेना.

यह नहीं होगा. पाँचवीं बार तो मैं बोल ही पड़ूँगी. कहो तो चलूँ या रहने दूँ.

उनको कैसे कह सकता हूँ...

सच है, सुनने के लिए तो हमें ब्याह लाये थे.पर एक बात बताओ मैं क्यों सुनूँ.  क्या तुम मुझसे परिवार की सहमति के बिना प्रेम विवाह कर ले आये थे.

कैसी बात करती हो. पहले मम्मी, पापा और दीदी ने ही पसंद किया था तुम्हें.

अच्छा यह बताओ क्या मैं किसी गरीब परिवार से आई हूँ. दहेज के नाम पर कुछ नहीं लाई.

क्या तुक है इस बात की. मैंने खुद आगे बढ़कर कहा था कि तिलक में कुछ कैश नहीं लेना/देना है .

वह तो सही है. तभी तो हम साथ हैं. 

प्यारी सी मुस्कुराहट फैल गई अनुभा के चेहरे पर. पर फिर से सतर्क होते हुए अगला सवाल दाग दिया-

क्या मैं घर को साफ सुथरा नहीं  रखती. खाना अच्छा नहीं बनाती. वैसे तुम्हें बता  दूँ कि तीस वर्षों की गृहस्थी में 26 वर्ष तक घर का हर काम मैंने बिना मेड  की सहायता से किया है. बच्चों को बिना ट्यूटर पढ़ाया है .

क्या कह रही हो . मैंने कब कहा ऐसा. तुमने मैंने मिल कर ही किया है सब. वह प्यार से बाहों में भरने को हुआ पर अनुभा छिटक कर दूर हो गई.

क्या मेहमानों की आवभगत या लेनदेन में मैं मायका/ ससुराल में भेद करती हूँ!

ऐसा कब किसने कहा. मेरे भतीजे तो अकसर कहते थे कि तुम उनकी मम्मी से भी ज्यादा उनका खयाल रखती हो. 

हाँ. कई बार अस्पताल में भीें खाना/चाय आदि पैक कर ले गई हूँ. शादी ब्याह में भी अपना पराया समझे बिना सब काम किया है. यह ठीक है कि उन लोगों ने  भी हमारी जरूरत में हमारा साथ दिया. पर एक बात बताओ क्या मैं अनपढ़ गँवार हूँ.  क्या मैं नहीं जानती कब किससे कैसे बात करनी है. क्या मुझे बात करने की तमीज नहीं है!

ऐसा नहीं है पर तुम्हें गुस्सा आ जाता है.

अच्छा! क्या मुझे तुमसे और उनसे भी ज्यादा गुस्सा आता है और वह भी बिना कारण?

नाक खुजाते हुए इधर उधर ताकने के बाद हेलमेट उठाते हुए वह  बोला - अच्छा मेरी अम्मा. अब चल लो . तुम्हें मुझे जो सुनाना हो, सुना लेना पर वहाँ चुप रहना.

और मैं इतनी देर से क्या कर रही थी. .. दबे होठों में मुस्कुरा दी अनुभा.

क्या कहा.. 

कुछ नहीं.चलो जल्दी.आज मेरा किसी को कुछ और सुनाने का मूड नहीं. इससे पहले की मेरा मूड बदल जाये, चल आते हैं .


रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया , मगर अपनी सोच का क्या किया ……

घर क्या होता है 
तुम क्या जानो 
तुम जानते हो जमीन के छोटे बड़े टुकड़े 
कमरा इतने फीट बाई इतने फीट 
कैसे बताऊँ - इसे घर नहीं कहते !
घर एक एहसास है 
जहाँ किसी एक का ज़ख्म 
दूसरे की तकलीफ बन जाता है 
घर वह नहीं
जहाँ रोटी की कीमत आंकी जाती है
घर -
ज़रूरी नहीं कि आलीशान हो !
छोटा हो
पर प्यार से भरा हो
जहाँ बचपन, सपने, खिलौने
सब एक साथ रजाई में दुबककर सोते हों
सुबह होते शोर हो
'आज कौन चाय बनाएगा'?
और फिर एक ख़ामोशी पसर जाए
थोड़ी देर बाद माँ की आवाज आए
'मैं ही बना लेती हूँ'
और फिर धम धम कोई रसोई तक जाये बड़बड़ाते हुए
'इमोशनली ब्लैक मेल करती हो !'
और पूरा घर खिलखिलाने लगे ....
घर ऐसा होता है !
(रश्मि जी की वॉल से चुराया हुआ)
-
 Rashmi Prabha

कुछ दिनों पहले  रश्मिप्रभा जी ने फेसबुक पर घर को घर बनाने वाली स्नेह पगी मीठी सी कविता पोस्ट की। उनके स्नेह और वात्सल्य से अभिभूत हम धड़ल्ले से चोरी /डाका डालने में अपराध नहीं समझते सो बाकायदा अपने फेसबुक वॉल पर भी चिपका दिया । गुदगुदाया मन फिर भी आशंकित हुआ कि घर के भीतर इमोशनली ब्लैकमेल माताएं अथवा पुत्रियां ही अधिक होती है। इसी सोच के आलोक में कुछ परिवार आँखों के सामने आये , जिनसे कुछ समय पहले या अक्सर मिलना -जुलना होता रहता है। 

पतिदेव का अपना ही शहर है ,  एक ही विद्यालय/मोहल्ले /ऑफिस  में साथ रहे /पढ़े लोगों का विस्तृत दायरा है मगर व्यस्त शहरी दिनचर्या में रिश्तदारों , परिचितों , मित्रो आदि से मिलना जुलना किसी ख़ास पारिवारिक कार्यक्रम अथवा कोई कार्य होने पर ही हो पाता है।  एक ही शहर में होने के बावजूद कई वर्ष गुजर जाते हैं हालाँकि फोन/मोबाइल /इंटरनेट  की सुविधा के कारण बातचीत होती रहती है। कुछ सप्ताह पहले वीकेंड पर परिचितों से मेल-  मिलाप का कार्यक्रम बना। 

मित्र केंद्रीय सेवा में हैं तो उनकी पत्नी बैंक में अधिकारी है। एक ही पुत्र है जो अपनी उच्च शिक्षा /करियर के लिए दूसरे शहर में रहता है , बस छुट्टियों में ही  आना  हो पाता है।  अच्छी लोकेशन में पार्क के सामने  मकान है उनका , बालकनी में खड़े उनकी पत्नी से कहा मैंने कि अच्छी जगह है , सामने पार्क है।  
पार्क है तो क्या , कभी सामने देखने का समय ही नहीं मिलता।  सुबह उठते ही रसोई नजर आती है , चाय -नाश्ता -खाना बनाया और भागे बैंक।  वीकेंड में देर से उठना , साप्ताहिक कार्य निपटाने में ही समय गुजर जाता है।  
नारी -शक्ति जाग उठती ही भीतर कभी  , तो  हम भी उसी भाव में ज्ञान देते हुए बोल पड़े ,  क्यों , इतने वर्षों में भाई साहब को नाश्ता बनाना नहीं सिखाया क्या। पत्नी सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी। 
भाई साहब  तीखी नजरों से घूरते पतिदेव से मुखातिब हुए , ये क्या सिखा रही है मेरी बीबी को, हमारा झगड़ा करवाएंगी क्या। और दोनों मित्र खुल कर  हंस लिए। 
मैंने कहा उनकी पत्नी से , जागो नारी शक्ति और हम भी हँस  ही लिए !
 भाई साहब बड़े गर्व से बता रहे थे अभी ये नई गाडी खरीदी तो पुरानी पत्नी को दे दी। मैं समझती हूँ कि उनकी पत्नी की तन्खवाह उनसे कही अधिक ही रही होगी। 
पूरे समय मैं देखती रही , पानी लाने से लेकर जरुरी कागज़ , चश्मा , चाय पकड़ाते उनकी पत्नी ही चकरघिन्नी बनी रही। वर्षों से जानती हूँ इस परिवार को।  दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य रहा है , कही कोई मनमुटाव या तानाकशी नजर नहीं आई।  यूँ तो भारतीय परिवारों में आम रहा है यह सब , मगर आजकल थोडा अखरता है।
   
एक और रिश्तेदार के घर जाना हुआ। संयुक्त परिवार था , सास -ससुर , बेटा बहू , पोता।  दो बेटे ही हैं उनके , इस परिवार में भी चाय पानी नाश्ता लिए श्रीमती जी ही चकरघन्नी बनी रही। अक्सर रश्क करते हुए कहती हैं , आपका अच्छा है , चाय -नाश्ता बेटियां सम्भाल लेती हैं. हैरानी अधिक इसलिए होती है कि  ये वह  महिला है जिन्होंने अपने घर में पिता और भाइयों को हमेशा माँ का हाथ बंटाते देखा है। 

एक और परिवार है , दो बेटे हैं उनके भी।  वे स्वयं  एकलौती पुत्री रही है , मगर मानसिकता वही , बेटियां सब कर लेती हैं , हमें तो स्वयं ही  करना पड़ता है।
 
एक और रिश्तेदार हैं।  दो पुत्रियों और एक पुत्र की माँ  अपने परिवार की एकलौती पुत्री रही हैं और उनकी संपत्ति की   इकलौती वारिस भी मगर जब अपना पुश्तैनी कार्य सम्भालने की बारी आई तो बड़ी बेटी के कार्य सँभालने की सम्भावना को सिरे  से  नकार दिया , यह कहते हुए कि व्यावहारिकता  का तकाजा यही है कि बेटा ही सम्भाले। 

एक और परिचित दो पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं।  उनका भरा -पूरा परिवार रहा छह बहनों और एक भाई का।  घर के काम में पति के हाथ न बंटाने  की शिकायत करती ये माताजी भी यही मानती है कि बेटियों को ही घर का काम सीखना है , बेटों का क्या है !!
 
ये सारे उदाहरण अच्छे- खासे पढ़े- लिखे परिवारों के हैं। माताएं भी पढ़ी- लिखी है , कोई सरकारी सेवा में हैं तो किसी का अपना व्यवसाय है। ये स्त्रियां पुत्र एवं पुत्रियों को रोजगार के लिए समान शिक्षा की वकालत तो करती हैं मगर घर के भीतर उनका अपना  दृष्टिकोण भिन्न है। 
  
कभी -कभी मुझे  लगने  लगता है कि पढ़ने- लिखने से आखिर होता क्या है !! अपने बच्चों को वकील , डॉक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , सीए आदि बना ले तो क्या , अपनी सोच का क्या करे। 
 
स्वयं पर भी संशय होने लगता है कि कही मैं भी पुत्रियों की माता होने के कारण ही तो निष्पक्षता की मंशा/भावना  नहीं रखती हूँ ! मानसिक स्थिति का उचित प्रकटन तो उन परिवारों में ही सम्भव है जो पुत्र और  पुत्री दोनों के माता -पिता है और उनके व्यवहार में अपनी संतान के लिए कोई भेद न हो , ना घर में , ना बाहर। 

क्या सच में पुत्र और पुत्री के जीवन को दिशा /शिक्षा देने के सम्बन्ध  में एक ही दृष्टिकोण सम्भव नहीं है !!! 

मंगलवार, 7 मई 2013

चुन चुन करती आई चिड़िया ....


खाने पीने का इंतजाम देखा तो घर ही बसा लिया

ग्रीष्म की हर नयी सुबह उगता सूरज नया -सा दिखता है . नव आशा ,नव उमंग , नव उत्साह .  शीतल मंद बयार के साथ सब कुछ धुला साफ़ सुथरा शांत स्निग्ध . ऐसे में हर सुबह की मीठी नींद पक्षियों के कलरव से टूटे तो आस पास एक दिव्य  खुशनुमा सकारात्मक परिवेश से  गदगद मन प्रकृति के समक्ष नतमस्तक हो उठता है . 

गौरैया दिवस पर अर्चनाजी ने पेशकश की गौरैया की  तस्वीर साझा करने की .  ढेर सारी तस्वीरें खींच डाली गौरैया की .फुर्तीली चिड़िया गैलरी के क्लीनिंग एरिया में पीछे जालियों के बीच से भी  बड़े आराम से भीतर चली आती हैं . उस दिन फोटो खींचते ध्यान ही नहीं रहा कि पुराने  स्टोव और मटकी की आड़ में घास फूस इकठ्ठा कर अपनी कुशल इन्जिनीरिंग का नमूना दिखाती चिड़िया अपने  नीड़ के निर्माण में  लगी हुई हैं .

अभी यही कोई एक सप्ताह पहले खिड़की से चिड़िया की मधुर चहचहाहट तीखी कर्कश सी लगने  लगी तो जाकर देखा कि आखिर माजरा क्या है . कई बार बिल्ली मौसी की लुक छिपी वाली पदचाप या अन्य पशु पक्षियों को आसपास भांप कर ये इसी प्रकार  चीखती रहती है . हालाँकि जाली और शीट से कवर होने के कारण बड़े पक्षियों का भीतर आना तो संभव  नहीं  मगर एकाध बार पास पड़ोस में सांप , गोइरा  ,नेवला होने की खबर चौकन्ना रखती है . देर तक इधर उधर कुछ नजर नहीं आया मगर चिड़िया और चिड़ा  जाली से चिपके लगातार चीं चीं मचाये हुए थे . अचानक फर्श  पर नजर आ गयी एक छोटी सी चिड़िया ..
तो यह बात है .  माँ चिड़िया अपने बच्चे को शायद उड़ना सिखा  रही थी  मगर पंख पूरे खुले नहीं होने के कारण उड़ नहीं पाया और  नीचे फर्श पर उतर आया या कौन जाने अपने परों पर ही उठा लाई हो उसे सैर कराने . जब तक इनके बच्चे उड़ना ना सीख  जाए  कभी - कभी इन्हें भी जरुरत होती है चारदीवारी से घिरे बसेरे की . हर थोड़ी देर में चिड़िया अपनी चोंच में खाना भर लाती और उस छोटे से बच्चे के मुख में खिलाती . चिड़ा तो बस निगरानी ही करता रहता  जैसे ही कोई दूसरी चिड़िया उनके पास आने की कोशिश करती दोनों चोंच मार कर उसे भागने पर मजबूर कर देते . और हम जाली के पास खड़े बैठे इस नज़ारे को देखते रहे . आखिर खड़े कब तक रहते . इनकी चहलपहल हमें सारे काम छोड़ कर यही टिकने को मजबूर जो कर रही थी . खैर , हमने भी एक प्लेट में पानी और कुछ खाने का इतंजाम कर दिया ताकि चिड़िया को ज्यादा भागदौड़ ना करनी पड़े . दूसरे दिन सुबह आँख खुलते ही छोटी चिड़िया के दर्शन को भागे तो आज उनके साथ एक और छोटी चिड़िया थी . हद तो तब हुई जब तीसरे दिन एक और तीसरी चिड़िया भी उनके कुनबे में शामिल हो गयी . अब घर का काम काज कौन करता . 
हम माँ बेटियां बस सारे दिन चिन्नी , मिन्नी और गिन्नी (हमने तो इनके नाम भी रख दिए  ) की तीमारदारी , अवलोकन  और तस्वीरें खींचने में व्यस्त . कपड़ों का ढेर इकठ्ठा हो गया क्योंकि वाशिंग मशीन चलाने  पर इनको परेशानी हो सकती थी . करते भी क्या . पूरी गैलरी पर इनके परिवार का कब्ज़ा जो हो गया था . 
माँ चिड़िया का बार बार उड़ना , हर थोड़ी देर में चोंच में खाना  भर खिलाना और यह भी याद रखना कि  अब किस बच्चे को खिलाने की बारी है . पिता चिड़े  का तार से लटके,  जाली से चिपके इनकी निगरानी और सुरक्षा के प्रति चौकस सवधान रहना .  कभी कभी हरी या सूखी दूब चुन लाना और मादा चिड़िया का उस पर चीखना ...
बेटी बोली - माँ शायद ये गुस्सा कर रही है चिड़े  पर . क्या मेरे बच्चे इस सूखी  ख़ास पर रहेंगे  :) . कितना भी खाना -पानी सामने रखा हो , उसमे से खा ले मगर थोडा बहुत अपनी  मेहनत का लाये बिना भी। इनको  चैन नहीं .
.
अक्सर  नारियों की सोशल कंडिशनिंग पर बात होती है मगर इन पक्षियों की जीवन प्रक्रिया के अवलोकन से यही खयाल आता रहा कि अपने बच्चों या परिवार के लिए खाने पीने का इंतजाम करना , ममता से भर कर खिलाना  यह सिर्फ सोशल कंडिशनिंग नहीं है . भला  कौन सिखाता है मादा चिड़िया  को  अपने बच्चों का इस तरह ध्यान रखना . पिता चिड़े  को उनकी सुरक्षा के प्रति सावधान और सतर्क  रहना .  मनुष्यों में भी यह प्रकृति प्रदत्त ही अधिक है जैसे पक्षियों में हैं .

अपने घर के भीतर उनके लिए एक छोटा सा घर बन जाने और उनके लिए खाने पीने का इंतजाम कर मन कितना संतुष्ट और  प्रफुल्लित हुआ. शब्दों में समझाना संभव नहीं और इस आत्मसंतुष्टि की मात्रा को नापने का कोई यन्त्र भी नहीं  ! 

अब तक एक चिड़िया उड़ चुकी है . एक नहीं रही और एक छोटी सी चिड़िया अभी भी आँगन में इधर उधर फुदक रही है , शायद कल तक वह भी उड़ जायेगी . 

कितना प्रेम से ही पालते हैं ये भी अपनी संतानों को मगर बिना शर्त . कोई अपेक्षा नहीं . जैसे ही उड़ना सीख जायेंगे इन्हें छोड़ जायेंगे , जानते हुए भी !  
हम मनुष्यों ने इनसे उड़ना तो सीखा , मगर बिना शर्त प्रेम क्यों नहीं  !! 

इनकी अठखेलियों के बीच मन में अनगिनत विचार आते रहे .सोचती रही हमसे इस छोटी सी चिड़िया का बसेरा ही नहीं उजाड़ा गया बल्कि उनके रहने खाने पीने की सुरक्षित व्यवस्था में मन लगा रहा . 
आखिर कैसे लोग मनुष्यों के बसेरे उजाड़ कर सुकून की नींद ले पाते हैं  ? उन्हें नींद कैसे आ पाती है , वे खुश कैसे रह सकते हैं , रह पाते हैं ...कैसे!!!

मन में विचार आया कि क्यों ना सम्पूर्ण मानव जाति के लिए कुछ समय मनुष्यों के लिए पशु पक्षियों की सेवा और अवलोकन अनिवार्य कर दिया ( है न पागलपंथी )  , शायद कुछ मन बदले उनका ... 

शायद !!!!       



मंगलवार, 23 नवंबर 2010

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!

(इनकी सफाई ऐसी होती है)
( सफाई का महत्व तो ये छुटकू भी जानते हैं )


एक सफाई पसंद महिला अपनी सहेली के घर उससे मिलने गयी । जब उसने देखा कि उसकी सहेली का पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था , नाक भौं सिकोड़ती देर तक बस उससे यही शिकायत करती रही कि लोंग घर कितना गन्दा रखते हैं !!
दरअसल उसके घर वार्षिक सफाई का कार्य चल रहा था . सफाई करते समय एक बार पूरा घर गन्दा होता ही है . उस महिला को बुरा लगा , मगर अपने घर की व्यवस्था देखकर चुप लगा गयी .
कुछ समय बाद जब उसका घर फिर से साफ़ सुथरा चमकदार हो गया , उसने अपनी सहेली को खाने पर बुलाया .  खाना खाने के बाद सहेली के चमचमाते घर को देखकर बहुत प्रभावित हुई .

" तुम आजकल घर बहुत साफ़ रखने वाली हो , कोई नयी कामवाली रख ली है क्या "

  नहीं ..मेरे घर की साफ़- सफाई के लिए मैं दूसरों पर निर्भर नहीं करती ...उस दिन जब तुम आई थी , वार्षिक सफाई का काम चल रहा था इसलिए सब बिखरा हुआ था  . उस महिला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया

" तो तुमने उस दिन कुछ कहा क्यों नहीं , तुमने बताया भी नहीं और मैं यूँ ही बक- बक करती रही "

 उस दिन मैं चुप रही क्यूंकि तुम उस दिन सही थी ...उस दिन का सच वही था!

दोनों ने एक साथ अच्छा समय व्यतीत किया . घर लौट कर उस महिला ने अपने घर का मुआइना किया . उस महिला की तुलना में उसे अपना घर बहुत गन्दा लग रहा था । घर के कई कोने , सिंक के नीचे , फर्नीचर के पीछे कई जगह कचरा छिपा पड़ा था . . इससे पहले उसने कभी गौर ही नहीं किया था .

उस दिन से उसने प्रण लिया कि अगली बार दूसरों की त्रुटियों पर टोकने से पहले स्वयं पर अंकुश रखेगी , कम से कम उस उस कमी पर तो अवश्य ही, जो स्वयं उसमे भी है!

होता है ना कई बार ऐसा ....!

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!



चित्र गूगल से साभार !