भ्रम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भ्रम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 26 जुलाई 2021

जीवन-माया

 जब माँ थीं तब छोटी छोटी पुरानी चीजें सहेज लेने की उनकी आदत पर सब बहुत खीझा करते थे. अनुपयोगी वस्तुओं का अंबार हो जैसे... दादी तो खैर उनसे भी अधिक सहेज लेने वाली थीं.

पापा का खरीदा पहला बड़ा रेडियो, शटर वाली पुरानी टीवी, पुराने ड्रम ,बारिश के पानी में भीग कर फूली हुई चौकी, जंग खाये लोहे के बक्से , घिसा पिटा कूलर जाने क्या क्या.. 

माँ की ढ़ेरों साड़ियाँ एक छोटा सा ढ़ेर जैसा इधर उधर बिखरी रहती थीं. रसोई में बरतन, कड़ाही आदि भी ज्यादातर पुराने घिसे, जले कटे ही रहते थे. 

अचानक मेहमान के आने पर पुरानी मोच खाई गिलासें, अलग अलग साइज की कटोरियाँ , चिकनाई लगी ट्रे,  छोटे चाय के कप ही काम में आते क्योंकि ऐन वक्त पर उनकी उस आलमारी या कमरे की चाबियाँ गुम रहती थीं. सूटकेस, पेटियों और दरवाजे के ताले तोड़े जाने के उदाहरण सैकड़ों में रहे होंगे, ऐसा लगता है मुझे.  

मगर जब उनके आखिरी समय के बाद उनकी अस्थियों के साथ उनके कमरे की चाबी आई तो उनके कमरे का दरवाजा खोलती मैं दंग थी-  कमरे में एक भी चीज बेतरतीब नहीं थी. सफर पर रवाना होने के समय बदलने वाली एक साड़ी के अतिरिक्त कुछ भी बिखरा हुआ नहीं था... सभी साड़ियाँ/वस्त्र आदि बहुत करीने से जमाये हुए आलमारी में थे.

माँ पर उनके बिखरे से साम्राज्य के लिए उन पर झुँझलाती रहने वाली मैं कितनी स्तब्ध हुई!  

कितना अजीब खाली-खाली लगा मुझे , बता नहीं सकती शब्दों में... 

मन करता रहा कि कहूँ माँ से कि यह बेतरतीबी ही तुम्हारा जीवन थी. समेट लेने को हम बेकार ही कहते रहे. 

जिनके लिए थे उनके दुख, उनकी चिंताएं, उनका श्रम - उनका जीवन उनके बिना भी चल रहा और बहुत बेहतरीन चल रहा... 

जैसे सब कुछ माया-सा था. जाने वाला अपने साथ सब समेट ले गया.... अपना जीवन, अपना दुख, अपनी चिंताएं!!

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

जात ना पूछो साधू की ......, छाया का भ्रम ...दो संकलित प्रेरक प्रसंग

रेल में यात्रा कर रहे एक तिलकधारी सेठ ने जब अपने भोजन का डिब्बा खोलना चाहा तो पास ही बैठ खद्दरधारी नेता को देखकर उसे कुछ शंका हुई।
सेठ ने कहा ...." अजी नेताजी ! आप किस जाति के हैं? क्षमा करना । जरा ख़ास काम है । इसलिए पूछने की हिम्मत हुई ।"

इस पर खद्दरधारी व्यक्ति ने सेठ से पूछा ..." जात न पूछिये साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान .....वाली कहावत नहीं सुनी क्या आपने सेठ जी ..."

पर आप तो गेरुए वस्त्र पहने साधू नहीं हो। आजकल ब्राह्मण , बनिए सभी अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए पहन लेते हैं। हो सकता आप भी इसी कारण पहने हो। अपनी जाति बनाने में क्या हर्ज़ है ...?

सेठजी का आग्रह सुनकर नेताजी कुछ सोचकर बोले ..." किसी एक जाति का हो तो बताऊँ । प्रातः काल जब घर आँगन और शौचालय की सफाई करता हूं तो सफाई कर्मी हो जाता हूँ। दाढ़ी बनाते समय नाई , कपडे धोते समय धोबी , हिसाब- किताब करते समय बनिया और विद्यार्थियों को पढ़ाते समय ब्राह्मन ...इस तरह मेरे कर्म के आधार पर आप खुद ही निर्णय ले ।

उत्तर सुनकर ट्रेन के सभी यात्री खुश हुए । तभी स्टेशन आ गया । स्टेशन पर उतरते ही नेताजी को मालाएं पहनाते अभिवादन करते देख सेठ जी ने पुछा ..." ये नेताजी कौन है ....."
तो उन्हें बताया गया..." आचार्य जे. बी.कृपलानी ..."

सुनते ही सेठ जी क्षमा याचना करने लगे ।

तब कृपलानी जी बोले ..." व्यर्थ जाति की श्रेष्ठता का ढोल पीटना छोडो , यही क्षमा है ..."

.....................................................................................................................................................

छाया का भ्रम

भोर हुई तो लोमड़ी आँखे मलती हुई उठीउसके पूछ उगते हुए सूरज की ओर थीछाया सामने पड़ रही थीउसकी लम्बाई और चौडाई देखकर लोमड़ी को अपने असली स्वरुप का आभास मानो पहली बार हुआसोचने लगी कि वह बहुत बड़ी हैऔर इस लिए कोई बड़ा शिकार करना पड़ेगाअपने इसी भ्रम को लेकर वह जंगल में गहरी घुसती चली गयीभूख जोरों से लग रही थी मगर छोटी खुराक से तो पेट नहीं भरेगा , इसी भ्रम में उसे हाथी का शिकार करने की धुन लग गयी थी

भूखी लोमड़ी दौड़- दौड़ कर थक कर चूर हो गयीतब तक दोपहर हो गयी थीसुस्ताने के लिए जब जमीन पर बैठी तो सारा नजारा ही बदल चुका थाछाया सिमट कर पेड के नीचे जा छुपी थी
अब लोमड़ी के चिंतन की नयी दिशा प्रारंभ हो चुकी थीवह सोचने लगी - मेरे इतने छोटे आकार के लिए तो मेंढक का शिकार ही काफी थामैं बेकार छाया के भ्रम में इतनी देर भटकी

मनुष्य भी इसी तरह अपनी इच्छाओं को देखकर अपनी आवश्यकताएं आसमान के बराबर मानने लगता हैविवेक के आधार पर जब सत्य का आभास होता है , तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है



********************************************************************************