शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

रोशनी है कि धुआँ … (5 )

सामान्य मध्यमवर्ग परिवार की तेजस्वी ने अवरोधों के बावजूद पत्रकारिता में रूचि बरकरार  रखते हुए मिडिया हाउस में अपना कार्य जारी रखा। शुरूआती गलतफहमी और संशय से  कार्य में व्यवधान भी कम नहीं रहे   ,  इन सबसे उबर कर तेजस्वी अब आगे बढ़ रही है  …… 

तेजस्वी के जादुई पिटारे नुमा बैग से कई चीजें निकलती जा रही थी , साडी , कुरता- पायजामा , कड़े , पर्स , सैंडिल , पत्रिकाएं।  साइड की पॉकेट से निकले प्लास्टिक के पाउच में मूंगफली के साथ  नमक , मिर्च, अमचूर , काला नमक का मिला जुला चूर्ण , एक और थैली में कुछ पेड़े भी थे , दूध को अच्छी तरह औंटा  कर बनाये , कुछ भूरे लाल से पेड़े भी।  

तुम्हे याद है  माँ ! उस गाँव के छोटे बस स्टैंड पर तुम जरुर ख़रीदा करती थी। 
हाँ , कैसे भूलूंगी।  रानी को भी बहुत पसंद थे , हॉस्टल जाते या लौटते अक्सर खरीद लेते थे।  आस पास की अन्य दुकानों से अलग बड़ी साफ़ सुथरी सी छोटी दूकान पर मूंगफली बेचता वह छोटा सा लड़का  जिसने कहा था , बहुत अच्छा पेड़ा है , तनी चख कर तो देखीं दीदी लोग , कही और से किनबे नहीं करेंगे। एक बार उसके कहने से लिए  हुए पेड़े हर बार की जरुरत हो गये थे और मूंगफली का साथ तो बस के सफ़र भर चलता रहता।

माँ की यह आदत शिक्षा पूरी होने से  , विवाह और उसके बाद बच्चों के बड़े होने तक भी बनी रही थी. उस बस स्टैंड से गुजरते तेजस्वी को याद आया था ।  वह जानती है माँ के भीतर बसी बैठी उस  लड़की को जिसे प्रसन्न करने के लिए बड़े महंगे तोहफों की जरुरत नहीं होती , और उसने शहर से खरीदी साडी , बैग , पुस्तकों के साथ इस गाँव  से पेड़े और मूंगफली भी खरीदी , खास नमक मिर्च के चूर्ण के साथ !

लगभग एक वर्ष बाद लौटी थी तेजस्वी अपने शहर। वायब्रेंट मीडिया  हॉउस अपना काम आगे बढ़ाते हुए विस्तारण प्रक्रिया में कुछ अन्य शहरों  में ऑफिस खोलना चाह्ती थी।  आलिया को जोनल हेड बना कर  भेजा जाना था।  आलिया को तेजस्वी की मनःस्थिति का आभास था इसलिए उसने उसे साथ काम करने का प्रस्ताव दिया।  माँ को  समझाना इतना आसान नहीं होता यदि वह स्वय उनका जन्मस्थान  नहीं  होता।  शहर से सटे हुए गाँव में ही उनका अपना घर था , माँ का घर , भाई -बहनों का घर , खेत खलिहान। शिक्षा के लिए गाँव से शहर पढ़ने आये भाई अब वहीँ सैटल हो गए थे। माँ को तसल्ली थी , मामा , मौसी , नानी का साथ रहेगा।
बीते एक वर्ष में वे भी उसके पास जाकर रह आयी थी , दो कमरों के उसके फ़्लैट में सब सामान जुटा कर।  भाई भाभी ने ऐतराज भी जताया कि क्या हमारे साथ नहीं रह सकती , इसका वजन हो जाएगा।  मगर व्यवहारकुशल माँ रिश्तों की बारीकियों से अनजान नहीं थी।  आखिर हार कर भाई ने अपने घर के पास ही एक फ़्लैट का एक हिस्से में उसके रहने का इतंजाम कर दिया।  माँ निश्चित थी , परिवार पास भी था और उनपर बोझ भी नहीं !
आलिया  के साथ तेजस्वी नए माहौल में कार्य करते हुए पुराने बुरे अनुभवों को भूल चुकी थी। शहर की विभिन्न समस्याओं और सामाजिक सरोकारों से जुड़े उसके कार्य और लेख उसकी पहचान बन गए थे। सरकारी हॉस्टलों में कामकाजी महिलाओं की परेशानियों ,  चाइल्ड शेल्टर में शोषण के शिकार नासमझ बच्चों  , सरकारी विद्यालयों में  शिक्षकों की अनुपस्थिति ,  मिड डे मील में घोटाले के साथ ही अपनी तनख्वाह का कुछ हिस्सा किसी और को देकर अपने स्थान पर पढ़ाने   भेजने जैसी कई सनसनीखेज रिपोर्ट पेश कर उसने अपने नाम और पेशे दोनों का ही एक रुतबा हासिल कर लिया था।   घटनाओं और समस्याओं की तह तक जाकर उनका विश्लेषण और निष्पक्ष निर्भीक विचारों की गूँज उसके अपने शहर तक भी कम नहीं थी। नाम और सम्मान  ओज की वृद्धि करते ही हैं , आत्मविश्वास भी बढ़ जाता है , अब तेजस्वी पूर्णतः आत्मनिर्भर आत्मविश्वासी हो चली थी। उसके अपने शहर में उसकी  जरुरत को महसूस करते हुए प्रमोशन के साथ उसकी नियुक्ति हेड ऑफिस में कर दी गयी और अपने पुराने ऑफिस में कार्य सँभालने हेतु ही पुनः लौटी थी अपने ही शहर में। 

फ्लैट की सीढियाँ चढ़ते उतरते  एक बार फिर मिसेज  वालिया से टकराई।  बहुत प्यार से गले ही लगा लिया उन्होंने , कैसी हो , बहुत नाम कमा लिया है तुमने तो और सर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वादों की झड़ी लगा दी।  थोड़ी हैरानी हुई तेजस्वी को क्योंकि अब उनकी आवाज़ में तंज़ नहीं था , चेहरे पर पहली सी चमक भी नहीं थी।  घर आना कहते हुए जल्दी ही विदा भी हो ली।

तेजस्वी ने उनके इस असामान्य व्यवहार की चर्चा माँ से की तो माँ भी कुछ उदास हो गयी ," परेशान  है पिछले कुछ समय से।  सीमा पीछले 6  महीने से मायके में ही है , शायद उसके ससुराल में कोई समस्या है।  खुल कर बताया नहीं उन्होंने और ज्यादा पूछना जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा लगता है , यही सोचकर ज्यादा जोर देकर पूछा भी नहीं। तुम चली जाना सीमा से मिलने , किसी से ज्यादा मिलती -जुलती नहीं।  हंसती खिलखिलाती लड़की बिलकुल मुरझा गयी है।  शायद तुम्हे कुछ बताये , तुमसे मिलकर अच्छा लगेगा उसे !

ओह ! हाँ , जरुर मिलूंगी सीमा से !
और जल्दी ही तेजस्वी को मौका भी मिल ही गया सीमा से मिलने का।  बिल्डिंग में गाडी पार्क करते सीमा नजर आ ही गई। बहुत थकी हुई लग  रही थी।
कैसी हो सीमा , तेजस्वी ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो चौंकते हुए उसका चेहरा पीला पड़ गया। 
अच्छी हूँ , तुम कैसी हो।  माँ ने बताया कि तुम वापस यही आ गयी हो , अच्छा लगा ! 
दोनों साथ सीढियाँ चढ़ते हुए बाते करती जाती थी।  
उसके फ्लैट की बालकनी में मिसेज वालिया ने भी देखा दोनों को।  तेजी से दरवाजे के पास आते तेजस्वी को भी भीतर बुलाने लगी ,"  आओ  बेटा ,  चाय पीकर जाना। थकी मांदी लौटी हो दोनों साथ। 
सीमा की समस्या भी जान लेने की मंशा से उसने कहा , ठीक है आंटी , आप बनाये चाय।  मैं माँ को बताकर आती हूँ !
वापस लौटने तक चाय तैयार थी। सीमा उसे अपने कमरे में  ले आई।  एक अजीब सी उदासी ,सन्नाटा पसरा था दोनों के बीच।  सीमा के तन पर कोई सुहाग चिन्ह भी नहीं था , बस चुप सी बैठी रही दोनों। 
ख़ामोशी तोड़ते हुए तेजस्वी ने ही बात प्रारम्भ की ,   क्या कर रही हो आजकल , कुछ कमजोर भी हो गयी हो। 
कुछ ख़ास नहीं , प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी  में लगी हूँ। अभी कोचिंग से ही आ रही थी। 
और कैसे है सब ससुराल में , हमारे जीजाजी , तुम्हारी  सास ? थोडा झिझकते हुए उसने पूछा। 

अच्छे ही होंगे ! एक गहरी स्वांस लेती हुई सीमा की आवाज जैसे गहरे कुएं से आई !
मैं पिछले छह महीने से यही हूँ !

क्यों ? सब ठीक तो है ,  ससुराल में पढ़ाई नहीं  हो पाती होगी।
कह तो दिया उसने , मगर साथ ही उसे स्मरण हुआ कि विवाह से पहले गदगद होते मिसेज वालिया ने बताया था कि   उसकी सास ने  कहा है कि बेटी जैसे मायके में पढ़ती है ,वैसी ही यहाँ भी रहेगी।  बेटे का साथ इसका भी टिफिन बना दिया करुँगी!

सीमा ने कुछ कहा नहीं।  एक फीकी - सी मुस्कान उसके चेहरे पर आकर तेजी से विलुप्त हो गयी।
कई बार मन की उथलपुथल को व्यक्त करने में शब्दों की आवश्यकता  नहीं होती।  बस किसी के साथ  यूँ ही खामोश गुजारे दो लम्हे  भी दुख को आधा बाँट लेते हैं। बल्कि कई बार दुःख की तीव्रता से घबराये लोग भाग निकलना चाहते हैं अपनों से , अपनों की आँखों में उठने वाले सवालों से और अपनों से बचते-बचाते अपने गमो का पिटारा किसी अजनबी के सामने खोल आते हैं।

तेजस्वी समझ सकती थी सीमा की मनःस्थिति को  , विश्वास की धरती के पैरों के नीचे  से खिसकने की पीड़ा को।  चोट खाया विस्मित मन छटपटाता है मन ही मन , हमसे गलती हुई कैसे किसी को समझने में।  उसने  सीमा का हाथ अपने हाथ में ले लिया  था। सीमा के सख्त  होते चेहरे पर कुछ बूँदें लुढक गयी आंसुओं की , जैसे चट्टान की ओट में  रुका हुआ कोई सोता फूट पड़ने को तैयार हो।


क्रमशः ... 

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया , मगर अपनी सोच का क्या किया ……

घर क्या होता है 
तुम क्या जानो 
तुम जानते हो जमीन के छोटे बड़े टुकड़े 
कमरा इतने फीट बाई इतने फीट 
कैसे बताऊँ - इसे घर नहीं कहते !
घर एक एहसास है 
जहाँ किसी एक का ज़ख्म 
दूसरे की तकलीफ बन जाता है 
घर वह नहीं
जहाँ रोटी की कीमत आंकी जाती है
घर -
ज़रूरी नहीं कि आलीशान हो !
छोटा हो
पर प्यार से भरा हो
जहाँ बचपन, सपने, खिलौने
सब एक साथ रजाई में दुबककर सोते हों
सुबह होते शोर हो
'आज कौन चाय बनाएगा'?
और फिर एक ख़ामोशी पसर जाए
थोड़ी देर बाद माँ की आवाज आए
'मैं ही बना लेती हूँ'
और फिर धम धम कोई रसोई तक जाये बड़बड़ाते हुए
'इमोशनली ब्लैक मेल करती हो !'
और पूरा घर खिलखिलाने लगे ....
घर ऐसा होता है !
(रश्मि जी की वॉल से चुराया हुआ)
-
 Rashmi Prabha

कुछ दिनों पहले  रश्मिप्रभा जी ने फेसबुक पर घर को घर बनाने वाली स्नेह पगी मीठी सी कविता पोस्ट की। उनके स्नेह और वात्सल्य से अभिभूत हम धड़ल्ले से चोरी /डाका डालने में अपराध नहीं समझते सो बाकायदा अपने फेसबुक वॉल पर भी चिपका दिया । गुदगुदाया मन फिर भी आशंकित हुआ कि घर के भीतर इमोशनली ब्लैकमेल माताएं अथवा पुत्रियां ही अधिक होती है। इसी सोच के आलोक में कुछ परिवार आँखों के सामने आये , जिनसे कुछ समय पहले या अक्सर मिलना -जुलना होता रहता है। 

पतिदेव का अपना ही शहर है ,  एक ही विद्यालय/मोहल्ले /ऑफिस  में साथ रहे /पढ़े लोगों का विस्तृत दायरा है मगर व्यस्त शहरी दिनचर्या में रिश्तदारों , परिचितों , मित्रो आदि से मिलना जुलना किसी ख़ास पारिवारिक कार्यक्रम अथवा कोई कार्य होने पर ही हो पाता है।  एक ही शहर में होने के बावजूद कई वर्ष गुजर जाते हैं हालाँकि फोन/मोबाइल /इंटरनेट  की सुविधा के कारण बातचीत होती रहती है। कुछ सप्ताह पहले वीकेंड पर परिचितों से मेल-  मिलाप का कार्यक्रम बना। 

मित्र केंद्रीय सेवा में हैं तो उनकी पत्नी बैंक में अधिकारी है। एक ही पुत्र है जो अपनी उच्च शिक्षा /करियर के लिए दूसरे शहर में रहता है , बस छुट्टियों में ही  आना  हो पाता है।  अच्छी लोकेशन में पार्क के सामने  मकान है उनका , बालकनी में खड़े उनकी पत्नी से कहा मैंने कि अच्छी जगह है , सामने पार्क है।  
पार्क है तो क्या , कभी सामने देखने का समय ही नहीं मिलता।  सुबह उठते ही रसोई नजर आती है , चाय -नाश्ता -खाना बनाया और भागे बैंक।  वीकेंड में देर से उठना , साप्ताहिक कार्य निपटाने में ही समय गुजर जाता है।  
नारी -शक्ति जाग उठती ही भीतर कभी  , तो  हम भी उसी भाव में ज्ञान देते हुए बोल पड़े ,  क्यों , इतने वर्षों में भाई साहब को नाश्ता बनाना नहीं सिखाया क्या। पत्नी सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी। 
भाई साहब  तीखी नजरों से घूरते पतिदेव से मुखातिब हुए , ये क्या सिखा रही है मेरी बीबी को, हमारा झगड़ा करवाएंगी क्या। और दोनों मित्र खुल कर  हंस लिए। 
मैंने कहा उनकी पत्नी से , जागो नारी शक्ति और हम भी हँस  ही लिए !
 भाई साहब बड़े गर्व से बता रहे थे अभी ये नई गाडी खरीदी तो पुरानी पत्नी को दे दी। मैं समझती हूँ कि उनकी पत्नी की तन्खवाह उनसे कही अधिक ही रही होगी। 
पूरे समय मैं देखती रही , पानी लाने से लेकर जरुरी कागज़ , चश्मा , चाय पकड़ाते उनकी पत्नी ही चकरघिन्नी बनी रही। वर्षों से जानती हूँ इस परिवार को।  दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य रहा है , कही कोई मनमुटाव या तानाकशी नजर नहीं आई।  यूँ तो भारतीय परिवारों में आम रहा है यह सब , मगर आजकल थोडा अखरता है।
   
एक और रिश्तेदार के घर जाना हुआ। संयुक्त परिवार था , सास -ससुर , बेटा बहू , पोता।  दो बेटे ही हैं उनके , इस परिवार में भी चाय पानी नाश्ता लिए श्रीमती जी ही चकरघन्नी बनी रही। अक्सर रश्क करते हुए कहती हैं , आपका अच्छा है , चाय -नाश्ता बेटियां सम्भाल लेती हैं. हैरानी अधिक इसलिए होती है कि  ये वह  महिला है जिन्होंने अपने घर में पिता और भाइयों को हमेशा माँ का हाथ बंटाते देखा है। 

एक और परिवार है , दो बेटे हैं उनके भी।  वे स्वयं  एकलौती पुत्री रही है , मगर मानसिकता वही , बेटियां सब कर लेती हैं , हमें तो स्वयं ही  करना पड़ता है।
 
एक और रिश्तेदार हैं।  दो पुत्रियों और एक पुत्र की माँ  अपने परिवार की एकलौती पुत्री रही हैं और उनकी संपत्ति की   इकलौती वारिस भी मगर जब अपना पुश्तैनी कार्य सम्भालने की बारी आई तो बड़ी बेटी के कार्य सँभालने की सम्भावना को सिरे  से  नकार दिया , यह कहते हुए कि व्यावहारिकता  का तकाजा यही है कि बेटा ही सम्भाले। 

एक और परिचित दो पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं।  उनका भरा -पूरा परिवार रहा छह बहनों और एक भाई का।  घर के काम में पति के हाथ न बंटाने  की शिकायत करती ये माताजी भी यही मानती है कि बेटियों को ही घर का काम सीखना है , बेटों का क्या है !!
 
ये सारे उदाहरण अच्छे- खासे पढ़े- लिखे परिवारों के हैं। माताएं भी पढ़ी- लिखी है , कोई सरकारी सेवा में हैं तो किसी का अपना व्यवसाय है। ये स्त्रियां पुत्र एवं पुत्रियों को रोजगार के लिए समान शिक्षा की वकालत तो करती हैं मगर घर के भीतर उनका अपना  दृष्टिकोण भिन्न है। 
  
कभी -कभी मुझे  लगने  लगता है कि पढ़ने- लिखने से आखिर होता क्या है !! अपने बच्चों को वकील , डॉक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , सीए आदि बना ले तो क्या , अपनी सोच का क्या करे। 
 
स्वयं पर भी संशय होने लगता है कि कही मैं भी पुत्रियों की माता होने के कारण ही तो निष्पक्षता की मंशा/भावना  नहीं रखती हूँ ! मानसिक स्थिति का उचित प्रकटन तो उन परिवारों में ही सम्भव है जो पुत्र और  पुत्री दोनों के माता -पिता है और उनके व्यवहार में अपनी संतान के लिए कोई भेद न हो , ना घर में , ना बाहर। 

क्या सच में पुत्र और पुत्री के जीवन को दिशा /शिक्षा देने के सम्बन्ध  में एक ही दृष्टिकोण सम्भव नहीं है !!! 

सोमवार, 6 जनवरी 2014

रोशनी है कि धुआँ .... (4 )

(तेजस्वी की कहानी को कम में समेटना चाहती थी , मगर नए किरदार जुड़ते जा रहे हैं , कैसे लिखोगी कम में , हमें अनसुना कर !
यह कहानी उपन्यासिका में ही परिवर्तित होती  प्रतीत हो रही है) . 

वायब्रेंट मीडिया हाउस में कार्यरत तेजस्वी के उत्साह पर सामान्यतः ऑफिस में होने वाली राजनीति ने उदासी के छींटे डाले।  घर से बाहर की विचित्र दुनिया से रुबरु  होते हुए तेजस्वी का सफ़र जारी है.

अब आगे --- 

माँ ने पहले से ही उसके सलवार कमीज हैंगर पर लटका रखे थे।  जल्दी तैयार हो जाओ ,हमें काफी देर हो चुकी है।  खाने के समय कार्यक्रम में पहुंचना अच्छा नहीं लगता। 

हाथ मुंह धोकर   क्रीम और पीले रंग के अनारकली सूट पहने आईने के सामने बाल संवारती तेजस्वी पर  मुग्ध दृष्टि डालते  माँ  ने थूथकारा डाला , नजर न लगे !

दोनों  कार्यक्रम में पहुंची तब तक महिला संगीत समाप्त ही होने को ही था।  लाया डाक बाबू लाया रे संदेसवा , मेरे पिया जी को भाये न बिदेसवा पर एक लड़की मंच पर थिरक रही थी। 
तेजस्वी और उसकी माँ  ने सीमा के पास जाकर सीमा को  बधाई  दी।
भड़कीले लाल रंग के सलवार कमीज में लकदक मिसेज वालिया चहकती हुई तपाक  से बोली ," हमने तो समय से अच्छा लड़का देखकर सगाई कर दी , अब आप भी तेजस्वी के लिए लड़का  देखना शुरू  कर दो।  बराबर- सी ही तो  हैं दोनों।
माँ ने कुछ कहा नहीं , सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी।  

 संयोगवश सीमा का जन्मदिन भी था उसी दिन।  मंच के पास ही केक काटने की तैयारी  भी थी। सीमा और उसका भावी पति सौरभ मंच के सबसे आगे एक सुन्दर झूलनुमा बेंच पर साथ बैठे थे। उस  मंच के सामने लगी बेंच पर पीछे की तरफ बैठ कर दोनों संगीत का आनंद ले रही थी। मिसेज वालिया चहकती हुई बता रही थी ,  सीमा के ससुर बहुत खुश  हैं इस रिश्ते से , केक पर सजावट उन्होंने अपने हाथों से की है।  कहने लगे कि मेरी बहू लाखों में एक है तो इसका तोहफा तो मैं ही सजाऊंगा। अभी थोड़ी देर पहले ही नृत्य के लिए बहू का हाथ पकड़कर स्टेज पर ले गए। पूरे परिवार ने साथ नृत्य किया। ख़ुशी में उनकी आँखें छलछला रही थी।

संगीत के बाद केक काटा गया ,  वर- वधू  को अंगूठी पहनाई गयी, मेवा -बताशे से गोद भरी गयी। पूरे कार्यक्रम में सीमा के स्वसुर का उत्साह देखते बनता था।  बहू का हाथ पकड़कर केक कटवाने से लेकर अंगूठी पहनाने  तक वे साये की तरह सीमा के आसपास ही मंडराते नजर आ रहे थे।  महिलाओं की खुसुर- पुसुर चालू थी , बहुत खुशकिस्मत है सीमा।

रोशनी  , संगीत , उल्लासमय वातावरण , अच्छा भोजन , घर लौटते तेजस्वी का मानसिक तनाव काफी कम हो चूका था, मगर माँ कुछ अनमनी -सी दिख रही थी।
 क्या  हुआ माँ  , तुम्हे कैसे लगे सीमा के ससुराल वाले।  
कुछ नहीं।  अच्छे हैं।  शोरशराबे से थकान हो जाती है मुझे !
निकलते समय कॉफी पी लेनी थी।  कोई नहीं , घर चल कर पी लेते हैं। 

घर आकर माँ काफी देर तक सीमा के श्वसुर  के अत्यंत उत्साही व्यहार पर सोचती रही , मगर किसी से कहा कुछ नहीं। 
गहराती रात में खिड़की के परदे सरकाकर बाहर चाँद निहारते तेजस्वी भी सोचती रही देर तक।  हर दिन एक अँधेरे में डूबता है और सवेरा फिर सूर्य की रोशनी में जगमगाता। यूँ तो अँधेरा किसे भाता है मगर  चांदनी रात में अँधेरा भी कितना सम्मोहक होता है , रोशनी भी आँखों को चौंधियाए नहीं तभी भाती है वरना  तो वेल्डिंग मशीने भी कितनी किरणे बिखेरती है , आँखों पर चश्मा न हो तो आँखे खराब। 
क्या -क्या सोचने लगी वह।
लैंप की बत्ती बुझा सूर्य के संतुलित प्रकाश की  सम्भावना लिए नींद पलकों पर भारी हो आई। 

आलिया के केबिन में अनाथाश्रम , बालश्रम ,  बालश्रमिकों के शोषण आदि  विषयों पर चर्चा करते हुए तेजस्वी की नजरे बार -बार टेबल पर रखी   लाल फ़ोल्डर वाली फाईल पर टिक जाती।  उसका हेडिंग  जाना -पहचाना सा लग रहा था।  चर्चा समाप्त होकर कमरे से बाहर निकलते आखिर उसने फाईल उठाकर पलट ही ली।  वह शक्ति सदन की विस्तारित  रिपोर्ट थी जिस पर प्रस्तुतकर्ता का नाम पढ़ा उसने - सिमरन बर्वे। तेजस्वी हतप्रभ उदास सी  कमरे से बाहर निकल आयी।  उसका प्रोजेक्ट किसी और  नाम से पूर्ण हो चूका था।
सिमरन ने भी काफी काम किया था इस पर , एक गहरी सांस लेकर तेजस्वी ने स्वयं को समझाया मगर मित्रता का यह नया रूप देखकर तेजस्वी चकित थी।  सिमरन के साथ ही उसे सुचित्रा के व्यवहार पर  भी अचम्भा हो आया था। स्वयं मन को टटोला उसने , दृढ महिला के रूप में उनकी छवि में क्या बचा रह गया था उसकी समझ से परे।  उसे समझ आने लगा था कि  घर से बाहर की दुनिया बहुत विचित्र है।  माँ -पिता  की समझाइशें इतनी व्यर्थ नहीं थी।   

वह सिमरन के साथ अपनी मित्रता के पलों को स्मरण करती रही। एक दिन उसके लिखे  आलेख  पर बहस करते  अंग्रेजी में धाराप्रवाह अपने विचार प्रस्तुत कर रहे मनीष को  सिमरन ने  उसे टोका था  , क्यों अंग्रेजी झाड़ रहे हो , उससे क्या फायदा होगा , तुम्हे पता नहीं कि तेजस्वी हिंदी मीडियम से है। 
साथियों के होठों की दबी मुस्कान के साथ  सिमरन  का विजयी भाव उसे सब समझा तो रहा था , मगर आँखों पर बंधी मित्रता की पट्टी ने उसे बतौर  मजाक अथवा  टांग खिंचाई जैसे ही लिया था। जब -तब बहनजी कह देना भी वह इग्नोर ही करती आई थी। 
पीछे छोड़ आये कुछ और पन्ने भी उलटे उसने। उसने सोचा फिर से, एक लेख पर मनीष की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पर भी सिमरन का व्यवहार अखरना चाहिए था उसे।  एक साथ ही संस्कृत , हिंदी ,अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर अपनी तीव्र पकड़  के साथ प्रखर प्रतिभाशाली मनीष अपने साथियों ही नहीं ,वायब्रेंट मीडिया हाउस से जुड़े  पाठकों , दर्शकों में भी अत्यंत लोकप्रिय था। अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति करते विद्वानों की प्रशंसा बहुत मायने रखती है , तेजस्वी फूली नहीं समा रही थी मगर सिमरन ने विशेष कुछ भी कहा नहीं था बल्कि स्वयं की अन्य उपलब्धियों के बारे में बात करते विषय ही बदल दिया था।  

यह सब कुछ अखरा क्यों नहीं उसे , तो क्या मित्रता के रिश्तों में  अब तक वह सिर्फ मूर्ख ही बनती  आई थी, सोचते स्मृतियों के तार  उलझते जाते थे. खैर तेजस्वी को अटकना नहीं था , आगे ही बढ़ना था।  नाम तेजस्वी यूँ ही तो नहीं रख गया था।  

 बाल श्रमिकों की वर्त्तमान स्थितियों पर अपनी खोज पर कई हैरतअंगेज चौंकाने वाले तथ्य  उसके सामने थे।   बाल कल्याण के लिए निर्मित की जाने  वाली सरकारी संस्थाओं के आंकड़े मानवता को शर्मसार करते नजर आते थे। बाल  कल्याण के लिए निर्मित विभिन्न आश्रय स्थलों से भागने अथवा गायब होने वाले बच्चों की संख्या उसे विस्मित कर रही थी।  दर दर भीख मांग कर गुजर करने वाले बच्चे इन सुविधाजनक आश्रय स्थलों पर टिकना क्यों नहीं चाहते , क्यों बार- बार भागने के प्रयास करते हैं , सम्मान पूर्वक मिलने वाला भोजन और आश्रय इन्हे क्यों नहीं सुहाता , घर पहुँचते , खाना खा कर विश्राम करते भी उसके दिमाग में प्रश्न अटके ही थे।  

चींचीं के मधुर कलरव से नींद खुली उसकी , नारंगी आभा के साथ सूर्यदेव प्रकट हुआ ही चाहते थे , माँ बालकनी में पक्षियों के लिए अनाज और पानी रख कर आयी थी। बहुत बचपन से माँ को  पक्षियों को दाना खिलाते देखा है उसने। दाना चुगने आती नन्ही चिड़िया , कबूतर , तोते उसे सदा लुभाते रहे थे। एक बार  पिंजरे में पक्षी पालने के लिए वह कितना मचली थी , मगर माँ ने सख्ती से मना कर दिया था। तेजस्वी को समझाया था माँ  ने कि पंछी तो उड़ते- फिरते ही लुभाते हैं , तुमने देखा नहीं उन्हें , वे यहाँ रखें पानी और दाने से ज्यादा इधर -उधर बिखरे हुए दाने  या बहते पानी की ओर ही अधिक भागते हैं। घायल पक्षी के संरक्षण के लिए बेहतर स्थान उपलब्ध करवाना उचित है , मगर आकाश में उन्मुक्त उड़ते पक्षी को पिंजरे की कैद में रखना आमनवीय है। ये पक्षी मनुष्य से अधिक स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं !

पक्षियों की चहचहाहट के बीच उसे आश्रम के बच्चों का ख्याल हो आया  और अपना  कार्य भी।  उसे बाल विकास मंत्रालय से जुड़े आश्रयस्थलों और  बाल भवन के अतिरिक्त कुछ स्वयंसेवी संस्थानों से भी जानकारी प्राप्त करनी थी। ऑफिस में मनीष व अन्य साथियों के साथ  ग्रुप डिस्कशन के बाद उन्होंने अपनी खोज की रुपरेखा तय की और उत्साही  कदम चल पड़े एक नयी मंजिल  की राह पर  । 


क्रमशः  
रुकावटें  जीवन का सहज हिस्सा है, कई बार इंसान टूट जाता है , बिखर जाता है तो कई बार दृढ बनता है ....