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बुधवार, 23 मई 2012

आपका नाम क्या है!.......थैंक्स ,राम !(2)

थैंक्स, राम ! से आगे ....


दूसरी ओर फोन पर आर्णव हमेशा की तरह अस्तव्यस्त ..."मेरी चौकलेटी शर्ट नहीं मिल रही , और वो पीली फाईल भी "
अब 2000 किलोमीटर की दूरी से भी मैं तुम्हे ये बताऊँ कि तुम्हारी कौन सी चीज कहाँ रखी है ?
अंजना को खीझ होनी चाहिए थी , मगर वह मुस्कुरा रही थी ...वह आर्णव की उस पर निर्भरता के इन पलों को बहुत इंजॉय करती है .

कहता है आर्णव ..."तुम लड़कियां बहुत चतुर होती हो ...अपनी जड़ें छूटने का पूरा बदला हम बेचारे मासूम लड़कों से लेते हुए हमारी हर एक चीज , हर एक आदत पर अपना अधिकार जमाते हुए अपनी मर्जी से बनाती , बिगाड़ देती हो ... तुमने भी मेरी सारी आदतें बिगाड़ दी है , मैं अपनी सब चीजें व्यवस्थित रखता था , अब मुझे अपने हर काम के लिए तुम पर निर्भर होना पड़ता है "
अंजना में नहले पर दहला मारने से नहीं चूकती ," पता है मुझे ,तुम्हारा व्यवस्थित रहना कैसा होता था ...एक सूटकेस में कुछ जोड़ी कपड़े , फालतू के कागज़ , ज्यादा हुआ तो एक परफ्यूम की बॉटल ...अलमारी , ताकों पर बेकार के कागजों का ढेर , जिन पर मनों धूल जमी होती थी ... शुक्र मानो , तुम्हे घर में रहना हम लड़कियां ही सिखाती हैं, वरना तुम्हारे लिए घर और जंगल में क्या अंतर होता है..."

खुद के प्रति लापरवाह आर्णव... ताजा खाना फ्रिज में ठूंस कर आई थी ,उसके अलावा मठरियां , लड्डू भी ...जानती है , हर काम इत्मीनान से करने वाले आर्णव को बस खाना ठीक से खाने की फुर्सत नहीं होती ...रोज ऑफिस के लिए घर से निकलने से पहले खाने की थाली लिए उसके पीछे चक्कर काटना पड़ता है ...कई बार झुंझलाती है अंजना , खाना तो ढंग से बैठ कर खा लो मगर हमेशा की तरह आर्णव का वही गीत..." आज फिर देर हो गयी है "...

जब स्कूल में उसकी मोर्निंग शिफ्ट शुरू हो जाती है तो स्टाफ रूम से फोन पर आर्णव को खाना ठीक से खा लेने को कहते हुए वह एक नजर उसकी साथी शिक्षिकाओं को कोहनियों से एक दूसरे को टोहका मारते देख आँखें तरेर देती है ...नारी  जागृति  मंच से जुडी मिशेल कई बार ताना मारती है " तुम्हारी जैसी नारियां तो मेरे नारी सशक्तिकरण मंच की हवा ही निकाल कर रख देंगी , तुम्हारा पति कोइ बच्चा है ??"
" अरे बाबा , जिससे प्यार करते हैं , उसकी चिंता तो रहती ही है, ये नारी ,पुरुष की बात नहीं है ना ..." अंजना मुस्कुराने  लगती  थी ...

"तुमने नाश्ता किया या नहीं"
"नहीं , ऑफिस में ले लूँगा"
"इतना कुछ बना कर आई हूँ .थोडा तो खा लेते , कितनी तेज गर्मी है , भूखे पेट घर से मत निकलो "
"तुम कब लौट रही हो अपने घर"
"काकी से कह देती हूँ , एक दिन में ही सारी रस्में निपटा दे" चिढ़ा रही थी अंजना ... "अच्छा सुनो , राशिका जी के परिचित का सामान पहुंचा दिया"
"वही देने तो आई हूँ , यही पास में ही लीना का घर भी है , उसे लेते हुए घर लौटना है"
"अच्छी तरह चल रही है शादी की तैयारियां??"
"हाँ , बस तुम्हरी कमी लग रही है , सब पूछ रहे थे कंवर साहब क्यों नहीं आये ,"
"तुम जानती तो हो , औडिट का काम चल रहा है , मैं नहीं सकता था ...शादी के माहौल को एन्जॉय करो और जल्दी लौटो "....
"बाय.. टेक केअर"
आर्णव की कलिग राशिका जी का ससुराल भी यहीं था  ...लम्बी दूरी पर रहने वाले परिचित जैसे सामान पहुँचाने वालों की ताक में ही रहते हैं , जैसे ही पता चलता है कि कोई उनके शहर जाने वाला है , लाने और ले जाने वाले सामान या उसकी लिस्ट के साथ हाज़िर हो जाते हैं ...आरामदायक यात्रा के लिए कम से कम सामान ढ़ोने का आपका सपना साकार होने से पहले ही ढह जाता है ...दूरियों के मारे स्नेह से भीगते लोगों को इनकार भी तो नहीं किया जा सकता ...खुद काकी ने कई बार परिचितों के माध्यम से उसके लिए ख़ास हैदराबादी नान खटाई , टमाटर और इमली की खट्टी चटनी के साथ कई प्रकार के लहसुनिया अचार भेजे हैं उसके लिए !
राशिका जी का सामान पहुंचा कर अंजना फटाफट लीना के घर पहुंची ...लीना यूँ तो उसकी रिश्तेदार है , मगर साथ ही अच्छी सहेली भी है...अंजना के हैदराबाद पहुँचते ही धमकी भरा फ़ोन खुड़का दिया ,
" तुम रही हो या मैं जाऊं , चूल्हे पर चढ़ी दाल और आटे में डला पानी यूँ ही छोड़ कर "
भरोसा नहीं है लीना का , उसी हाल में घर छोड़ कर भागी आये ...
" तुम्हारे पड़ोस में ही काम है मुझे , मैं ही आती हूँ , मगर जरा फ्रेश तो हो लूं , तुम तैयार रहना , साथ ही लौटेंगे संगीत में ...
काकी को सामान अर्जेंट पहुंचा कर जल्दी लौटने का वास्ता देकर बड़ी मुश्किल से मनाया ...
"एक तो ऐन टाइम पर पहुंची हो , अब घूमने चल दी ....बहू के घर आज मेहंदी की रस्म है , वहां भेजे जाने वाले गहने ,कपड़े तो देख ले ...सब तो तैयारी हो गयी है , बस बहू की छोटी बहन के लिए कुछ लाना रह गया था '...

"आपकी तैयारी है तो सब कुछ परफेक्ट ही होगा , फिर भी जो रह गया है मैं लीना के साथ मार्केट से ले आउंगी ...क्या लाना है , साडी या सलवार कमीज" ...
"तू देख ले , जो तुझे पसंद हो ,ले आना , मगर समय से लौटना , फिर हमें यहाँ से मैरिज हौल भी जाना है , तू कुछ रिहर्सल भी कर लेती महिला संगीत के लिए"

हंसी आती है अंजना को , मेहंदी लगाते महिलाओं की हंसी -ठिठोली के बीच गाये जाने वाले विवाह गीतों का स्थान एक- एक कर स्टेज पर फ़िल्मी गीतों पर नृत्य कला के प्रदर्शन ने ले लिया है ..
उसे याद आया ...महिला संगीत में बहनों की ओर से क्या बांटा जाएगा ...सीमा से पूछा उसने ," जीजी, मैं ले आई हूँ , आप निश्चिन्त रहें "
ठीक है , कितने रूपये देने हैं , मुझसे ले लेना ...अभी तो मैं भागती हूँ , फिर जल्दी लौटना भी है ...और वह रिक्शे में बैठ कर चली आये लीना से मिलने ...

"कहाँ है तेरी जली हुई दाल ,फ़ोन पर तो यूँ दिखा रही थी कि बेचारी गृहस्थी के बोझ से दबी जा रही है , देख रही हूँ कि तेरा खुद का बोझ कितना बढ़ गया है " लीना से गले मिलते उसके बढ़ते मोटापे की ओर इशारा किया अंजना ने ...

"ओये नजर मत लगा , खाते -पीते घर के हैं हम" ... गले मिलते लीना ने धौल जमा दिया उसकी पीठ पर
"हाँ , मासी तो तुझे कुछ खिलाती- पिलाती नहीं थी "....लीना की माँ को अंजना मौसी ही कहती थी .
दोनों सहेलियां चाय की चुस्कियों के बीच एक दूसरे के परिवारों के हालचाल पूछती बतियाने लगी ...

चल अब तू जल्दी कर . थोड़ी शॉपिंग करते हुए लौटना है घर ...सभी इंतज़ार कर रहे हैं वहां ...अंजना ने बाजार से ख़रीदे जाने वाले सामान की लिस्ट निकाली...
"यह सब तो यही पास में मिल जाएगा , तुझे याद है, वो किराये का मकान जिसमे हम रहा करते थे ...उस पूरे बाड़े को गिराकर एक नया शॉपिंग काम्प्लेक्स बना दिया गया है , वही कर लेते हैं सारी शॉपिंग "लीना ने लिस्ट पर नजर डालते हुए कहा ...

बाड़ा , एक बड़ी सी धर्मशाला रही होगी कभी ...किसी पुराने मारवाड़ी सेठ की बनवाई हुई ...शादियों में बारात को रुकवाने या शहर घूमने आये अतिथियों के सस्ते और आरामदायक निवास के लिए शहर में कई स्थानों पर धन्ना सेठों द्वारा धर्मशालाएं बनाई गयी थी , मगर समय के साथ इन धर्मशालाओं को नौकरी पेशा लोगों के रहने के लिए किराये पर दिया जाने लगा ...उसी बाड़े के एक हिस्से में लीना रहती थी अपनी माँ के साथ ...लीना के जन्म के कुछ समय बाद ही कम उम्र में विधवा हुई उसकी माँ ने बड़ी मुश्किलों के बीच उसका पालन पोषण किया ...पति के जाने के बाद ससुराल से ठुकराई छोटी दुधमुंही बच्ची को गोद में लिए मायके आ तो गयी थी मासी , मगर भाई -भाभियों पर बोझ बन जाना उसे मंजूर नहीं था ...बहुत जिद करने पर उसके भाई ने ही अपनी परिचित द्वारा उस बाड़े में मामूली से किराये पर आजीवन रहने का बंदोबस्त कर दिया था , मासी ने दूसरों के कपडे सिलते , खाना बनाते , पापड़ मंगोड़ी बना कर बेचते हुए भी लीना के लिए हर प्रकार की सुविधाएँ जुटाने में कोई कसर नहीं रखी थी ...मगर पिता के साये से महरूम लीना को पढने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी , उसकी दुनिया सजना संवरना , फ़िल्में देखना और बस पूरे बाड़े में उछल कूद मचाये रखना ...

मित्रता मित्र के गुण -अवगुण से परे होती है , एक सामान विचारों अथवा स्वभाव का होना वांछनीय नहीं है ...कई बार लगता है उसे, बाकी रिश्तों की तरह मित्रता भी ईश्वर ही तय करता है वर्ना कहाँ अंजना जैसी धीर, गंभीर,  ज़हीन  और सादगी पसंद लड़की , किताबें जिसके हाथ से छूटती नहीं और कहाँ किताबों के नाम से ही दूर भागने वाली फैशन परस्त लीना ...कोई जोड़ नहीं था दोनों का , मगर फिर भी उनके बीच अच्छी मित्रता थी.
कुछ ही देर में दोनों सखियाँ शॉपिंग काम्प्लेक्स में दाखिल हो रही थी ...उसकी आधुनिक साजसज्जा देख कर यकीन ही नहीं कर सकता कोई कि यहाँ कोई पुरानी धर्मशाला रही होगी, जिसकी सीढियों पर दर्जन भर परिवारों की आवाजाही रहती होगी , नीचे एक कोने में दूध की डेयरी जहाँ कुछ भैंसे भी बंधी होती थी ...

" कुछ याद आया " लीना छेड़ रही थी उसे ...देख यहाँ कही दीवारों पर तेरा नाम तो नहीं ...
तू सुधरने वाली नहीं है ...
एस्केलेटर से सीढियाँ उतरते उसकी धीमी खटर पटर में सुना अंजना ने ..." आपका नाम क्या है "
चौंक कर देखा इधर -उधर ... कोई नहीं था ...लीना की शैतान मुस्कराहट अंजना को भी संक्रमित कर रही थी ...वह भी धीमे से मुस्कुराने लगी ।
मगर तब वह इस तरह मुस्कुराई नहीं थी ...
गुस्से से लाल- भभूका हो गया था उसका चेहरा , जब राह चलते एक किशोर ने रोक कर उससे पूछ लिया....
" आपका नाम क्या है " अंजना के बिगड़े मूड को देख कर लीना ने उसकी हथेलियाँ अपने हाथ में कसकर दबा ली थी ...



क्यों गुस्सा हो गयी थी अंजना इस कदर , नाम क्यों पूछा उससे किसी अनजान शख्स ने ...
क्रमशः

थैंक्स राम .......(4)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन से आगे ....



महिला संगीत का आयोजन एक बड़े हॉल में था ...पहली बार मिली अंजना होने वाली भाभी से ...ट्रेडिशनल लहंगा ओढ़नी में प्यारी हंसमुख गुडिया- सी लगी ...लीना और अंजना बांह पकड़कर खींच लाई भाई को और होने वाली भाभी को भी  ...कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मां ने अंजना को टोका ..." आंजलि नहीं भरनी है ? "
भूल गयी थी अंजना ,हालाँकि घर लौटते समय मिठाई , पान और माला खरीद ली थी , आखिर माँ ने ही सलाह दी ...कोई बात नहीं , अभी जब वारना करेंगे तब भर देना ...

बीच चौक में कुर्सी पर बैठाया भाई को और उसकी गोद में सूखे मेवे , बतासे , मिठाई और पैसे रख पान का बीड़ा पकड़ा दिया ...घर में उपस्थित सभी महिलाएं दो ग्रुप बना कर दोनों ओर खड़ी हो गयी और फिर उनके बीच शुरू हो गयी दोहों की प्रतियोगिता ..आधुनिक अंदाज़ में महिला संगीत में फ़िल्मी गानों पर नृत्य की धूम के बाद पारंपरिक अन्ताक्षरी का सा लुत्फ़ , गर्व हुआ उसे ...आधुनिकता ने पारंपरिक उत्साह को लजाया नहीं था ...

" एडी म्हारी उजली जी ,कोई फाबो सूंतवा सूंठ
ऐसी चालूं ठुमकती जी कोई रंडुआ छाती कूट "

के जवाब में दूसरी ओर से आया सनसनाता तीर ...

" चार कूंट को नातनो जी कोई बांध्या मूंग मरोड़
पाड़ोसिया को डावड़ो जी कोई रह गयो मूंछ मरोड़ "

अंजना अपने ग्रुप का उत्साह बढ़ाते हुए दोहे याद दिला रही थी ..."

छह छल्ला छह मूँदडी जी कोई छल्ला भरी परात
एक छल्ला का कारण से कोई छोड्या माँ अर बाप !

गीत गाते आँखें भर आई माँ की , अंजना माँ के पास खिसक आई ..पलकों में रुका बाँध आंसुओं की राह निकल पड़ा ...बड़ी काकी भी अंजना के सिर पर हाथ फेरती सिसक पड़ी, ब्याह की रौनक तो छोरियां सा ही है ..वल्लभ का ब्याह में कोणी आई ...
याद आया अंजना को ...वल्लभ की शादी के बाद लौटते पापा कुछ देर के लिए उसके शहर आये थे ...जितनी देर  रुके   , टैक्सी बाहर खड़ी रही , उन्हें तुरंत लौटना था ..कल ज़रूरी मीटिंग है दिल्ली में , बस तुझे देखने की इच्छा हुई तो चला आया ,शादी में सब तुझे बहुत याद कर रहे थे , तेरी काकी की भी आँखें भर आई थी ..."छोरिय कोणी आई "

...अंजना को सहसा यकीन नहीं हुआ था ..दो बेटों की गर्विता माँ पुत्रवती होने के गर्व से तनी रहती थी " छोरियां हो जाव तो नाक कट जाव "..माँ को कितनी बार ताना दिया होगा उन्होंने ...माँ कुछ कहती नहीं थी , अंजना के बिफर पड़ने से पहले बस उसे अपने अंक में समेट लेती थी ...एक दिन पता चलेगा इन्हें कि बेटी की माँ होने का मतलब क्या होता है , उन काकी के बारे में यह सुनकर उसने अनुमान लगाया , आज माँ का गर्वीली मुस्कान से चेहरा खिल उठा होगा ...

पापा के जाने के बाद परिवार में पहला शुभ कार्य हो रहा था ...उन्हें याद कर सबकी आँखें एक साथ भर आयी ..
मारवाड़ म छोरियां स सीख जावा , आज कसी रोळ मचा राखी है , बड़ी बुआ माँ से कह रही थी , सुना अंजना ने ...लीना ने उनके मुंह की बात लपक ली ..." और क्या बुआ ...हमारी वियोगिनी मीरा का सलोनी राधा में कायांतर हो चुका है ...मेरी शादी में कितनी मुश्किल से मनाया था इसे "..

लीना की शादी अचानक ही तय हुई थी ...अंजना को अपने माता पिता के पास असाम लौट जाना था ...उसके पिता वहां एक चाय बगान में प्रशासनिक पद पर कार्यरत थे ... उत्तर पूर्वी राज्यों में स्थानीय निवासियों में प्रवासियों को विशेषकर मारवाड़ियों को लेकर बहुत आक्रोश था , आये दिन होने वाले उपद्रव के बीच चिंतित माता- पिता ने उसे अभी कुछ और दिन हैदराबाद ही रुकने की सलाह दी थी ...राजमंद्री से मौसी का फोन था ...बस हमेशा अपने ददिहाल के परिवार से मिल कर ही चले जाना है तुझे , हम तो जैसे कुछ लगते ही नहीं तेरे , इस बार कुछ नहीं सुनूंगी तेरी , विकास को भेज रही हूँ लिवाने ...दूसरे दिन ही आ गया था विकास , उसे जाना पड़ा ...अपने हमउम्र भाई-बहनों के बीच खूब मन लगा उसका , दो सप्ताह कैसे बीत गाये , पता ही नहीं चला ...विदा करते मौसी भावुक हो गयी थी ," आती -जाती रहा करो"...

हैदराबाद लौटने पर पता चला कि इस बीच लीना का रिश्ता तय हो गया था ...किसी समारोह में देखा था उसे निखिल के परिवारवालों ने और नेवी में कार्यरत अपने बेटे के लिए हाथ मांग लिया था लीना का ...मासी इनकार करती भी तो कैसे , अच्छा परिवार , अच्छी नौकरी ...वह हैरान थी क्या लीना भी राजी है इस रिश्ते के लिए ...काकी ने उसे झिड़क- सा दिया ," और क्या चाहिए था , इतना अच्छा रिश्ता है , लड़का भी देखने में ठीक- ठाक है "
दूसरे दिन सुबह सवेरे ही जा पहुंची थी लीना के घर ...पूरा घर अस्तव्यस्त ,सामान से अटा पड़ा था ...सही मौके पर आयी , मासी ने उसे बाँहों में भर लिया...अच्छा परिवार मिल गया , मैंने सोचा की इस रिश्ते को चूकना ठीक नहीं ...
मगर मासी इतनी जल्दी में ...
हाँ , अच्छा खासा लड़का है , लीना भी मिल चुकी है ..जल्दी क्या बेटा , बेटियों को तो एक दिन पराया होना ही है , लड़का नेवी में हैं , वहां जाने से पहले उसके पेरेंट्स शादी कर देना चाहते हैं ..परसों सगाई है और पंद्रह दिन बाद शादी ...
लीना , तू खुश तो है ...
हां रे , ऐसे क्यों पूछ रही है ...
नहीं , वो ...उस दिन ...वो लड़का ...अंजना अटक रही थी ...
क्या वो लड़का ,छोड़ उसे ...

कुछ कही तड़क गया , छोड़ना इतना आसान !! वही उसे तसल्ली भी थी कि लीना खुश है ...
अगले पंद्रह दिन पलक झपकते ही गुजरने थे ...लीना की चंडाल चौकड़ी(सत्या , पूर्णिमा , ख़ुशी , गीतांजलि ,विनय , ) रात -दिन मुस्तैद रहती थी वहीँ ,रामदास और राजू भी उनके साथ लगे रहते ...मासी को घबराते देख उन्होंने पूरा जिम्मा खुद पर ले लिया था ...कैटरिंग , हलवाई , टेंट के साथ ही दहेज़ में दिए जाने वाले सारे सामान की खरीददारी , पैकिंग ...लीना ने काकी से मिन्नत कर कुछ दिन उसे अपने पास ही रोक लिया था ...दिन भर खरीददारी , फिर शाम को पैकिंग करना , ऐनवक्त पर अफरातफरी से बचने के लिए  सामान   को क्रमवार जमाना और फिर मिलकर सबके लिए खाना पकाना ...उन लोगों ने मासी को परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी ...मासी की कई बार आँखें भर आती ...तुम लोग नहीं होते तो मैं कैसे कर पाती यह सब कुछ ...

एक दिन शाम को सामान की लिस्ट चेक करती , दिन भर के खर्चों का ब्यौरा लिखती मासी के पास बैठी थी अंजना , बाकि लड़कियां खाना बनाते चुहलबाजी में लगी थी ...मासी ने तकिये का सहारा लेते हुए पैर सीधे कर लिए ...थक गयी थी ...तभी रामदास आकर मासी के पास बैठ गया ... मासी , आपके पैर दबा दूं कहता हुआ सचुमच ही उनके पैर दबाने लगा ...
तू दबा ले पैर , मगर इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है ..
मौसी उसे आँखें दिखा रही थी , एक चोर मुस्कान उसने सभी के चेहरे पर देखी , उसे माजरा समझ नहीं आया ...

गेलो पग दाबता कठई गलो भी दबा देव , मासी ध्यान राखजो ...(पागल कहीं पैर दबाते हुए गला दबा दे, ध्यान रखना )सबके सामने व्यक्तिगत बात करते समय मासी से मारवाड़ी में बात करती थी अंजना और लीना ..

क्या बोला मासी , मुझे समझ नहीं आया !
जब ये सब लोग तेलगु में बात करते हैं तो मैं पूछती हूँ कभी कि क्या बोला , समझा दो मासी ...

उनकी अप्रत्यक्ष नोंक झोंक चलती रहती थी ...नाम पूछने वाले हादसे के बाद रामू की कभी हिम्मत नहीं हुई उससे सीधे बात करने की ...पता नहीं तेलगु में क्या गिटर- पिटर करता रहता मीना से , वह कई बार लीना से उलझ जाती " मैनर्स नहीं हैं तुम लोगों में , जानते हो, मुझे तेलगु नहीं आती , फिर भी उसी भाषा में बात करते हो ,"
रामू ने ऐसे हीएक दिन एक कागज -पेन लाकर लीना को देते हुए कुछ कहा ...लीना ने कागज सरका दिया उसके आगे ," देखना , जरा ये प्रॉब्लम सोल्व कर दे , मैंने तो मैथ्स पढ़ी नहीं है "
उसने देखा  ट्रिग्नोमैट्री   का कोई सवाल था , उसका मनपसंद विषय ...उत्साह से ले लिया कागज.
तू इसे सोल्व कर मैं आती हूँ अभी ...लीना रामू के साथ बाहर चली गयी .

ये क्या हो गया है मुझे , सब कुछ ब्लैंक , ये आसान- सा सवाल मुझसे हल नहीं हो रहा ...दिमाग में अजीब -सी बेचैनी महसूस की उसने ...सर को हाथों से पकड़ कर दीवार के सहारे सरक गयी ...क्या हो रहा है ... बेबसी में कुछ बूँदें आंसुओं की ढलक पड़ी , कागज भी गीला होने लगा !

अंजना को इस हाल में देख लीना घबरा गयी ...

क्या हुआ अंजू , तू ठीक तो है ...छोड़ ये सब ...उसके हाथ से छीनते हुए उसने कागज- पेन फेंक दिया !

कुछ नहीं , सिर में बहुत अजीब -सा लग रहा है , जैसे मैं सब पढ़ा- लिखा भूल गयी हूँ !
हो जाता है कभी -कभी , तू आराम कर ले थोड़ी देर , इधर बहुत भाग दौड़ हो गयी ...बहुत परेशान कर रही हूँ ना मैं तुम सबको .

अंजना तकिये का सहारा लेकर लेट गयी , पता नहीं कब उसे नींद आ गयी ..उठी तो शाम का धुंधलका हो चुका था ...
मुझे उठाया नहीं , कितनी देर तक सोती रही मैं ..सबको अपने काम में लगे देख एक अपराध बोध महसूस किया उसने .

कोई गल्ल नहीं है जी ,अब बाकी का काम आप ही कर लेना ...सत्या ने कहा .आज से विनायक के गीत शुरू होंगे शाम को , नाच, गाना , मस्ती सब तुझे ही करने होंगे ...

चुप कर , ये नाच ,गाना, मस्ती तुझे ही मुबारक ...मैं तो दर्शक ही रहूंगी .

और सचमुच उस रात खूब धमाल हुआ ...पधारों म्हारा घरां विनायक के साथ काल्यो कूद पड्यो , टूटी बाजूबंद री लूम जैसे मारवाड़ी गीत तो गुजराती गरबा , पंजाबी गिद्धा , भांगड़ा सब एक साथ ..अंजना चुपचाप बैठी देखती रही , उसे इनमे कोई रूचि नहीं थी ..
दूसरे दिन सगाई का कार्यक्रम था ...लीना के ससुराल जाना था शगुन लेकर और अंगूठी पहनने की रस्म भी वही अदा होनी थी ...यूँ तो दुल्हन का शादी से पहले जाने का रिवाज़ नहीं था , मगर लीना के ससुराल वालों ने नई पहल करते हुए लीना को भी वहीँ बुलवा लिया था ...उस दिन काकी ने सौगंध दी अंजना को ...समाज का काम है , सौ लोंग इकट्ठे होंगे ...आज मैं तेरी नहीं सुनूंगी , बिंदी लगाएगी और बालों में फूल भी , साड़ी नहीं पहने तो कोइ बात नहीं , मगर मेरी इतनी बात तो तुझे माननी ही पड़ेगी ...
ओह! एक निःश्वास छोड़ी थी अंजना ने ...ये क्या रिवाज़ है यहाँ का , लड़कियों को बिंदी लगाना जरूरी है ...हल्के रंग के सादा चूड़ीदार कमीज के साथ बिना बिंदी के देख कई बार टोका था ...एक बार तो ट्रेन में गोरे चिट्टे भाई और बिंदी और फूलों से सजी सांवली भाभी के साथ अंजना को देख एक दक्षिण भारतीय परिवार ने भाभी को टोक दिया था ,"आपकी लव मैरिज है ...शादी मुस्लिम परिवार में हुई है क्या , ये दोनों भाई -बहन एक जैसे दिखते हैं , आप अलग हो "..भाभी ने बाद में बताया था और इस पर वे तीनों देर तक हँसते रहे थे ...

अंजना ने काकी की बात मान ली , दिन भर सिर पर भारी बोझ महसूस होता रहा था मगर काकी खुश थी , आज तूने मेरा मान रख लिया !

अंजना और लीना खोयी थी उन दिनों की याद में कि वल्लभ उनका हाथ पकड़कर तेज धुन पर झूमते भाई बहनों के बीच खींच लाया .....काका झूठ मूठ गुस्सा दिखाते हर कह रहे थे ..." दिन भर नाच गाना , मन नहीं भरा तुम लोगों का अभी " मगर सभी बच्चों ने उन्हें भी खींच लिया तो वे खुद को भी थिरकने से रोक नहीं पाए!

क्रमशः ...

शनिवार, 18 जून 2011

थैंक्स , राम !......... (अंतिम किश्त)

थैंक्स, राम! भाग एक , भाग दो , भाग तीन , भाग चार , भाग पांच से आगे ...



कहाँ खो गयी , लीना ने झिंझोड़ा तो अंजना चौंक पड़ी ...हो गयी तेरी पूजा ...

अंजना ने मोती के कुछ आभूषण ख़रीदे,कुछ मैचिंग दुपट्टे भी ...अंजना के हैदराबाद जाने की खबर सुन उसकी ननद ने ख़ास फरमाईश की थी ...खरीददारी करते हुए सामने लकड़ी की सीढियाँ वाले छोटे से रेस्तरां को देख लीना को चाय की तलब हो आई ...लीना भी अजीब है , कब क्या मन कर जाए ...ऐसे ही एक दिन घर लौटते ईरानी चाय की होटल देख उसके मना करते भी खींच ले गयी थी ....बहुत कहा अंजना ने घर पास में ही है , वहीं पी लेंगे ...स्टील की छोटी गिलासों में छोटी प्लेट के साथ सर्व की गयी मलाई युक्त नमक डली ईरानी चाय ...पहले सिप में ही उबकाई आते-आते रह गयी अंजना को ...दूध या मिल्कशेक में से भी छान कर मलाई निकाल देने वाली अंजना चाय में मलाई कब पसंद करती ...मुंह का स्वाद ख़राब कर दिया , अब कुछ चटपटा खाना पड़ेगा ...बहुत बिगड़ी थी अंजना ...पसंद तो लीना को भी नहीं आई थी और दोनों चाय वैसी ही छोड़ कर बाहर निकल आई थी ...

दोनों दोपहर तक घर पहुंची ...माँ और काकियाँ निकासी की सामग्री जुटा रही थी ...दूल्हा चेहरे पर मास्क लगाये अपने दोस्तों से घिरा था ...आजकल लड़कों को भी कम तैयारी नहीं करनी पड़ती ...अम्मा (दादी) हँस रही थी उसकी हालत देख ...
माँ ने छोटी काकी को आवाज़ लगाई थी ," चने की दाल समय से भिगो दी थी या नहीं, बताशे कागज़ की थैलियों में पैक करवा लेती हूँ , यही ले आ "
वहीं काका निकासी के समय बहू बेटियों को देने वाले नेग के लिफाफे तैयार कर रहे थे ...दूल्हा जब घोड़ी पर बैठ कर घर से निकलने की तैयारी में होता है ,तब घोड़ी पर बैठे दूल्हे की घर की सभी महिलाएं आरती करती हैं , यही एक रस्म है जहाँ माँ और भाभी को दूध पिलाने और काजल लगाने के विशेष नेग के साथ ही परिवार की सभी बहू और बेटियों को भी नेग दिया जाता है...
बैंड बाजे के साथ नाचते गाते पहुचे वधू के द्वार तो रात गहरा गयी थी ...विवाह की मस्ती में रिश्तेदारों और दूल्हे के दोस्तों को नृत्य करने से रोकना और आगे बढ़ते रहने को कहना भी एक दुष्कर कार्य ही होता है , काका के जल्दी चलो कहते भी बहुत समय लग गया उन्हें विवाह स्थल तक पहुँचने में ...द्वार पर अगवानी में दोनों पक्षों में मीठी नोंक- झोंक होती रही, फिर भी वधू की भाभी दूल्हे की नाक पकड़ने में कामयाब हो ही गयी ...कुछ रस्मों और खाने के बाद लीना , अंजना और काकी की दोनों भांजियों को अपने कजिन्स के साथ वहीं रुकने का निर्देश दे कर घर की महिलाओं के साथ अधिकांश बाराती लौट चुके थे ....सप्तपदी की रस्म में ससुरापक्ष की ओर भेंट किये जाने वाले वस्त्र और आभूषण अंजना और लीना को ही देने थे ...वे पास ही पड़ी कुर्सियों पर बैठ सप्तपदी की रस्में होती देखती रही ...इन रस्मों के समय हर विवाहित अपनी शादी के समय को जरुर याद करता होगा , दोनों सहेलियां बतियाने लगी ....

लीना के विवाह में दुल्हन की खास सहेली होने के कारण पूरे सप्तपदी के दौरान अंजना वही बैठी रही थी , लीना ने बार- बार उसे अपने साथ ही रहने की जिद जो की थी ....सुबह सुहागिन महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाते ,उबटन लगाते हुए उसने अचानक अंजना से पूछा ," तूने राम के हाथ में पट्टी बंधी हुई देखी "
पता नहीं , मैंने ध्यान नहीं दिया , मेरे पास फालतू समय नहीं होता इधर -उधर निहारने के लिए...अनजान चिढ गयी थी !
तुझे देखना चाहिए था ...लीना गंभीर हो गयी ,तू किस दुनिया में रहती है , तुझे आस- पास की कुछ खबर नहीं रहती ...
क्या हुआ ...
कलाई पर कुछ लिखने की कोशिश में ब्लेड से हाथ कटवा बैठा ...
क्या घटिया हरकत है ...
तुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता !!..
.काश कोई हमारे लिए ऐसा करता !!...एक गहरी सांस लेते लीना ने अभिनय किया तो उसके चेहरे पर फिर वही बांकपन था ...अंजना को तसल्ली हुई ...

ऐसी घटिया हरकतों से वही लोंग खुश होते हैं ,जिनका ऊपरी माला खाली होता है ...
बात एक ही है जान , हमारा ऊपरी खाली है , तेरा भीतर का खाली है , तेरा तो दिल ही नहीं है....
ज्यादा हिंदी फ़िल्में देख कर तेरा दिमाग खराब हो गया है , ऐसा कोई प्यार नहीं होता है , किसी को एक बार देखा , ना जान ,ना पहचान ...तू विदा हो ले एक , फिर खबर लेती हूँ इसके पूरे परिवार की ...
अंजना ने घूर कर देखा तो लीना चुप हो गयी ....

"अशुभ है" दिमाग में फिर कहीं बजने- सा लगा ... लीनाके विवाह के भात की रस्म में काका के साथ पूरा परिवार भी शामिल था ...अंजना का दिल जोरों से धड़का ...दर्द की एक तेज लहर उठी उसने पर्स से पेन किलर की गोली निकाली और गटक गयी ...आज दर्द सहन करने के लिए समय कहाँ था ...

तू अपनी मर्जी से दवा मत ले , एक बार डॉक्टर को दिखा लेते हैं ...
हां , चल पहले यही काम कर लेते हैं , शादी तो होती रहेगी ...दोनों जोर से हंसी तो सभी चौंक कर उनकी ओर देखने लगे थे ...

दिन भर विभिन्न रस्मों के बाद दुल्हन के साज श्रृंगार के लिए जब लीना ब्यूटी पार्लर गयी तो भी उसने अंजना को एक पल के लिए नहीं छोड़ा ...उनके साथ गाडी में पूर्णिमा और रामदास भी था ...बहाने से हाथ की पट्टी को सरकाते हुए उसके खरगोशी कुतूहल को अंजना ने देख कर भी अनदेखा कर दिया ...

तूने खाना खाया या नहीं ....लीना राम से मुखातिब थी ...सुना अंजना ने भी मगर असमय इस बेतुके सवाल पर खीझते हुए बोली ...कुछ घंटों में विवाह है तेरा , चकर- चकर लगा रखी है ,थोडा कम बोल लेने में कोई नुकसान नहीं है ...
मेरी बकबक को कोई नहीं रोक सकता , कोई भी नहीं ...

फेरे शुरू होने वाले थे ..मंत्रोच्चार के बीच लीना ने अंजना का हाथ दबाया जोरो से ...

क्या हुआ ...
कुछ देर बाद मैं विदा होकर चली जाउंगी , बस मेरी एक बात मान ले ...राम को खाना खाने को कह दे ...
हद है ...बहुत गुस्सा आया आया लीना को , क्या लड़की है , अपनी शादी के फेरे शुरू होने वाले हैं , फिक्र किसी और की है अभी इस वक़्त भी ...
लीना , तुझमे बिलकुल समझ नहीं है , ये समय ऐसी बातों का है ?? फुसफुसाते हुए लीना और अंजना की बातें हो रही थी ...
बस एक बार , मेरी एक आखिरी बात रख ले ...
मूर्ख लड़की , ठीक है , मैं कह दूँगी , तू अभी इधर- उधर दिमाग मत लगा ...
अपनी झुंझलाहट को दबाते हुए उसे उठना ही पड़ा ...
क्या नौटंकी है , खाना क्यों नहीं खाया है तुमने ...अंजना बरस ही पड़ी थी राम पर ...
कुछ नहीं , अभी खा लूँगा ...
लीना से नजरे मिलाईं अंजना ने ,वह निर्निमेष उनकी ओर ही देख रही थी ...उसके व्यग्र चेहरे पर मुस्कान देख मन हल्का हुआ ...
इसको तो मैं बाद में देख ही लूंगी ...मन ही मन भुनभुनाते ,ऊपर से मुस्कुराते अंजना उसके पास लौट आई ...
सुबह देर तक होने वाले विवाह की रस्मों के बाद लीना विदा हो गयी थी ...ज्यादा दूर नहीं थी उसकी ससुराल मगर विवाह के बाद दूरियां ज्यादा कम होने से भी बहुत कुछ बदल जाता है , बेटी पर अपना अधिकार कम होने या समाप्त होने की भावना लड़की और उसके परिवार , मित्र मंडली सबको एक साथ भावुक कर देती है ...

लीना के पगफेरे की रस्म पर नहीं जा सकी थी वह .....लगातार सिर में दर्द और कमजोरी और कभी- कभी कुछ भी समझ नहीं पाने की उसकी हालत को थकान समझ कर अनदेखा नहीं किया जा सकता था ...एक दिन माँ ले ही गयी उसे चिकित्सक के पास ... टेस्ट की रिपोर्ट से चिंतित माँ ने पिता को बुला लिया था कागजनगर से ...अंजना के टेस्ट की रिपोर्ट्स मस्तिष्क के एक हिस्से में सूजन का होना दिखा रही थी ...कुछ महीने पहले हुए मियादी बुखार ने उसके दिमाग के एक हिस्से पर हमला किया था ...
सब कुछ छूट रहा था अंजना के हाथ से ...पढ़ाई और किताबों से होने वाला उसका पहला प्रेम भी ...डॉक्टर की आराम की सख्त हिदायतों के के बीच उसके पिता ने कुछ महीनों की छुट्टी लेकर कसौली ले जाना तय किया था .....लीना एक दिन मिलने भी आ गयी थी निखिल के साथ , वैसे भी उसे अपने घर खाने पर निमंत्रित करना था उन्हें ...सामान्य बने रहे अंजना के माता -पिता ने किसी को भी उसकी बीमारी के बारे में बताया नहीं ,लीना को भी नहीं ....

कसौली रवाना होने से पहले काकी के साथ लीना से मिलने गयी थी अंजना एक दिन ...राम के घर खाने पर बुलाया गया था उन लोगों को , दूसरे दिन ही निखिल अपने काम पर लौट जाने वाले थे ...

अंजना ने सोच लिया था आज उसे बात करनी ही होगी आंटी से , ड्राइंग रूम में भरसक शांत बने रहने की कोशिश में अंजना ने दीवारों पर रगड़ कर हटाये गए कुछ निशाँ देखे , अचानक सोफे के हत्थे के पास कुछ छिपा सा उभरा हुआ उसका नाम ...उसकी नज़रों का पीछा करते हुए आंटी की उदासी ने बहुत कुछ कहा अंजना से और वह चुप रह गयी ...क्या सचमुच वह अशुभ साबित होने वाली है अपने परिवार के लिए , सबके लिए ...एकदम से इस ख्याल ने अंजना को वहां ज्यादा देर रुकने नहीं दिया , लीना से विदा लेकर वह घर लौट आयी ...

शांत प्राकृतिक वातावरण में सबसे दूर माता पिता की स्नेहिल छाँव की और दवा ने असर किया था या अंजना की इस इच्छा शक्ति ने की ...नहीं , वह किसी के दुःख का कारण नहीं बनेगी , कौन जाने ....
पूर्ण स्वस्थ होकर वापस हैदराबाद लौटने से पहले ही राजस्थान के बीकानेर से बुआ की बेटी स्वाति के विवाह का न्योता आ पहुंचा उनके पास..... स्वाति के विवाह के दौरान ही अंजना के माता पिता का मिलना हुआ आर्णव और उसके परिवार से ... सुयोग्य आर्णव और अंजना का जीवन भर का रिश्ता जुड़ना तय हो गया ...तुरंत फुरंत सगाई और गोद भराई और तीन महीने बाद ही विवाह की तिथि तय होना , कुछ समय ही नहीं मिला किसी को कुछ सोचने का ...
सुलझे विचारों के समझदार आर्णव के साथ ने अंजना के जीवन को एक ठहराव और निश्चिंतता दी थी ...जब पहली बार मिला था आर्णव तभी पूछ लिया था उसें ," आप आगे पढना चाहेंगी " और सास की बड़बड़ाहट को अनदेखा कर भी उसने उसकी शिक्षा को पूर्ण होने में मदद की ...गृहस्थी की जिम्मेदारियों में कभी नौकरी के बारे में सोचा नहीं उसने ...अभी पिछले साल ही जब ट्रांसफर होकर वे लोग अपने शहर से दूर आये तो बचे हुए खाली समय का उपयोग और अपनी शिक्षा से दूसरों का भी भला करने के उद्देश्य से एक एन जी ओ द्वारा संचालित विद्यालय में विभिन्न गंभीर बीमारियों से जूझते बच्चों के विद्यालय में अपनी सेवा दे रही है ...

सप्तपदी की सारी रस्में हो चुकी थी ... दुल्हन के लिए ससुराल से लाये गए वस्त्र , आभूषण और लाख की लाल- हरी चूड़ियों वाला विशेष चूड़ा पहनाया जाना था .....काका ने अंजना को पुकारा तो लीना और अंजना का ध्यान भंग हुआ ...

विवाह कार्यक्रम उल्लास और धूमधाम से संपन्न हो गया था ...अब अंजना को लौट जाना था वापस ...लड़कियां जीवन भर इसी कशमकश में जीती हैं ,कौन सा घर है उनका अपना ...जिसकी छाँव और गोद में बचपन के सुनहरे पल बिताये , जिसने किशोरावस्था की चुहलबाजियाँ छोड़ युवावस्था की और बढ़ते देखा या फिर वह एक जो वर्षों से अनजाना रहा मगर एक ही पल में सबसे बढ़ कर अपना हो गया ...बहुत मुश्किल होता है उस घर से बिछड़ना जो उनके होने का कारण होते हैं तो वहीँ अपनी गृहस्थी की ललक और फिक्र खिंच ले जाती है कदम, जहाँ उनका होना ही घर होता है , जहाँ वे मकान को घर बना देती हैं ....फिर जल्दी ही लौटकर आने का वादा लेते परिवारजन स्टेशन तक छोड़ने आ पहुंचे थे ...
नामपल्ली स्टेशन से रवाना होते आंसू भरी आँखें अपनों के धुंधले होते जाते चेहरों पर टिकी रही देर तक ... ट्रेन से बाहर झाँक कर देखा अंजना ने ...रात गहराने लगी थी ...रात में झिलमिलाती रोशनियाँ शहर के सौंदर्य को और बढ़ा देती है ...

अंजना का मोबाइल घनघना उठा .."रवाना हो गयी , सीट नंबर क्या है , रास्ते में अपना ख्याल रखना , वैसे मैं बार- बार फोन करता रहूँगा "...आर्णव फिक्रमंद था उसके लिए ...

नहीं , अंजना अशुभ नहीं थी , वह प्यार और फिक्र किये जाने योग्य थी , है ...

अंजना लीना के साथ अपनी यादों के दौर को याद कर रही थी ...चाहे -अनचाहे राम को भी शामिल होना ही था उनमे ....समय के साथ घटनाओं के सन्दर्भ और व्याख्याएँ भी बदल जाती है ...आज सोच रही थी अंजना .... निराशा , उदासी और तनाव के उन दिनों में जो उसने सोचा नहीं था ... अकारण किसी का चाहे जाना भी अपने वजूद के होने का एहसास देता है , आत्मविश्वास बनाये रखता है , लडखडाती जिंदगी को मजबूती देता है ...
नहीं , वह अशुभ नहीं थी , अवांछित भी नहीं ... ट्रेन तेज घडघडाहट की आवाज़ के साथ पटरियां बदल रही थी ...उसी में सुर मिलाते धीरे से कहा अंजना ने अपने- आपसे ...." थैंक्स , राम !"



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शनिवार, 11 जून 2011

थैंक्स, राम ......(5)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन , भाग चार से आगे


दूसरे दिन सुबह जल्दी ही हलचल शुरू हो गयी ...दिन भर मंगल गीतों के साथ कई तरह की रस्में होती रही ...हल्दी लगाना , बताशे पर घी लगा कर खिलाना , फिर चाक़ पूजन ...सभी महिलाएं पारंपरिक लहंगा -ओढ़नी में सजी धजी बैंड बाजे के साथ झूमती .नृत्य करती कुम्हार के चाक की पूजा करने गयी और लौटते समय सिर पर घड़ों की कतार...अच्छी लगती हैं ये परम्पराएँ , इस बहाने हमारे पारंपरिक हस्तकलाएँ , कुटीर उद्योंगों की पहचान लुप्त नहीं हुई है ...वरना फ्रिज के ज़माने में कुल्हड़ , मटकों की सौंधी महक को भुला ही दिया जाता ...शहर में रंग बिरंगी इंडणियों पर सजे मटकों को सिर पर उठाये इन महिलाओं को देख गाँव में पनघट पर पानी भरने जाती महिलाओं का दृश्य सजीव हो उठता है ...जिन महिलाओं ने सिर पर मटके रखे हुए थे , उनके पति ने एक- एक कर मटकों में कुछ रूपये डाले और सिर से उतार कर पूजागृह में रखने में मदद की ...अंजना को आर्णव की बहुत याद आई, इस भागमभाग में उससे बात ही नहीं हो पाई ...अंजना सोचने लगी क्या कर रहा होगा आर्णव , आज तो रविवार है ...घोड़े बेच कर सो रहा होगा , अभी खबर ले ही लेती हूँ ...काकी दूल्हे को बुला लाई थी ...जिनके पति वहां उपस्थित नहीं होते , दूल्हा ही इस रस्म को पूरी करता है ...

सो रहे थे ..
अरे नहीं , इतनी देर तक कब सोता हूँ मैं ..
अच्छा , आज सन्डे नहीं है ...
तुम नहीं हो तो संडे, मंडे सब एक जैसे ही हैं ...
क्या कर रहे थे ,
बस अभी तुम्हारे पौधों को पानी पिलाया ....

अंजना घर पर नहीं हो तो और कुछ ना करे , गमलों में पौधों को पानी देने का काम नहीं भूलता आर्णव ..जानता है कितना प्यार करती है अंजना इनसे , घर लौटते ही सबसे पहले पौधों को संभालेगी और फिर उससे नाराज होगी , मेरे पीछे से इनका ध्यान नहीं रखा ...पिछली बार पंद्रह दिन से लौटी थी असाम से तो पूरा घर धूल- मिट्टी से अटा पड़ा था , किचन तो शायद खोल कर भी नहीं देखी आर्णव ने , बिगड़ ही पड़ती अंजना मगर अपने पौधों को देखकर उसका मन खुश हो गया , आर्णव ने उनकी अच्छी देखभाल की थी...

कैसे हैं मेरे पौधे , वैसे ही हरे- भरे ना ...
बेचारे मालकिन को आस पास नहीं पाकर मुरझाने लगे थे ...आँचल की सरसराहट , हलकी मस्ती भरी गुनगुनाहट , चूड़ियों का खनकना , पायल की छन- छन सबको बहुत मिस कर रहे होंगे ...

और मालिक !!
मालिक तो थोड़ी देर बाहर तफरी कर आता है ना , मन बहल जाता है , ये बेचारे कहाँ जाएँ ...

पौधों के बहाने सब कहेगा आर्णव , ये नहीं कहेगा कि तुम मुझे याद आ रही हो , चेहरे पर ललाई दौड़ने लगी मुस्कराहट के साथ ...लीना कनखियों से देख रही थी , अंदाज लगा सकती थी किससे बात हो रही है ...
मियाजी से बातें हो रही थी ...प्रश्नवाचक निगाहों से सुर्ख हो उठा चेहरा अंजना का ...
हमारी सोचो , कितना लम्बा इतंजार करना होता है , यहाँ एक सप्ताह में में सूख कर काँटा हुए जाते हैं लोंग ...लीना मसखरी पर उतर आई ...
तो चली जा ना वही ...
जाना तो है ही , मुंबई में उनकी पोस्टिंग का इंतज़ार है ...
भात की रस्म शुरू हो गयी थी , काकी के मायके से दूल्हा- दुल्हन के साथ ही उसके माता- पिता , और सभी रिश्तदारों के लिए वस्त्र , रूपये आदि भेंट में दिए जा रहे थे ...

अच्छा है चाक़ -भात आज ही एक साथ हो गया ...कल निकासी शाम को ही होगी , दिन भर फ्री रहेगा , घूम कर आते हैं कल ...

सुबह स्नान और कुछ रस्मों से फ्री होकर दोनों सहेलियां घूमने निकल पड़ी ...काली मंदिर के पास धूप लोबान की खुशबू गुजरते लीना ने रोक लिया ...चल माँ के दर्शन कर लेते हैं ..चौड़े माथे पर बीचों बीच मोटी लाल बिंदी सा टीका लगाये पंडितों को देख अंजना पीछे सरक लेती है ...ईश्वर के प्रति पूर्ण सम्मान रखने , पूजन विधियों का पालन करते हुए भी ललाट पर तिलक लगाने के अवसर पर अंजना इधर- उधर बच निकालती है , कितनी बार अम्मा ने टोका होगा उसे ...
बचपन की कटु स्मृति बड़े होने तक पीछा नहीं छोडती ...अंजना को याद आ जाता है ...हलकी पीले रंग की सुन्दर छींटदार फ्रॉक पहने तितली सी उडती फिरती अनजान रुक गयी थी ...बैठक में में पापा के चिंतित मुद्रा में तो माँ का गुस्से से लाल चेहरा देखकर ..पापा के सामने कोई पंडित जी बैठे थे ...अपना मोटा पत्रा और लाल कागज बिखेरे वही लाल मोटा गोल टीका लगाये ..." अशुभ है " उसके कानों में आवाज़ पड़ ही गयी ..पंडितजी की सुर्ख लाल आँखों में जाने क्या देखा था मासूम अंजना ने , घबरा कर माँ के पीछे जा छिपी ...

अचानक उसे सामने देख माँ चौंकी थी ," क्या हुआ बेटा , आ तुझे नाश्ता दे दूं " ...माँ बहाने से उसे बाहर ले आई थी ....नाश्ता खिला कर बालों में थपकी देती माँ ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया ...माँ के आँचल से लिपटकर झपकी लेती अंजना को जब माँ ने बिस्तर पर लिटाया तो आँखों की कोर से कुछ बूँद लुढ़क पड़ी ...कभी संतान में अपने माँ बाप के लिए अशुभ होती है , खुद तो नशे में चूर रहता है , क्या भविष्य बताएगा किसी और का , उसकी हिम्मत कैसे हुई , आइन्दा मेरे घर में पैर नहीं रखे ...पिता बैठक से निकल कर माँ के पास आ गये थे ...
मेरी बच्ची, कैसे अशुभ कह दिया , आप भूल गये , आपकी तो इतनी अच्छी नौकरी , बंगला , नौकर- चाकर , सब सुख -सुविधाएँ इसके जन्म के बाद ही मिली हैं "
".क्यों चिंता करती हो , ऐसे ही बता दिया , हम कौन उसपर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं "...अंजना को बिस्तर पर धीमे से सुलाती माँ को पिता ने समझाया ...माँ मुड़ी तो अंजना की छोटी हथेलियों में कसा उसका आँचल खींच गया ...सीने में ज्वार सा उमड़ आया...बेतहाशा अंजना को चूमती माँ फफक पड़ी ..

बचपन का वह भय , लाल आँखें अंजना के दिमाग से निकल नहीं पाई ...आज भी सिर पर लाल मोटी बिंदी लगाये पंडित को देख सहम जाती है ..सिर में अजीब भारीपन सा महसूस किया उसने ..
क्या हुआ अंजू ...
कुछ नहीं तू पूजा कर , मैं यहाँ बैठती हूँ ...मंदिर की सीढियों पर बैठती अंजना ने जवाब दिया ...

लीना की शादी की तैयारियों की बीच भी यही भारीपन महसूस किया था उसने कई बार ... कई बार दर्द की लहर उठती थी उसके सिर में ...वह सिर पकड़कर निढाल हो जाती थी ...उन्ही दिनों एक दिन माता -पिता को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक सामने देख अंजना चौंक पड़ी थी ...फैक्ट्री के मजदूरों ने अचानक ही अफसरों पर धावा बोल दिया था ...सुरक्षा कर्मी जैसे- तैसे उन्हें वहां से निकाल पाने में कामयाब हुए थे ...जल्दी में जो थोडा बहुत समान समेट सकते थे , समेटा और पहली ही फ्लाईट से हैदराबाद रवाना हो गये ...
माता -पिता दोनों ही चुप से रहने लगे थे ...समझ नहीं आता था उन्हें मातम किस का मनाएं ... चाय बगान के मालिक ने कागजनगर में अपनी कागज की फैक्ट्री में उन्हें प्रशासनिक पद पर नौकरी दे दी थी , लेकिन अपनों की धोखेबाजी के जख्म अभी ताजा थे ...वर्षों तक जिन्हें अपना परिवार मानकर उनके सुख दुःख में शामिल होते रहे , उनके द्वारा इस तरह अचानक बेगाना कर दिए जाने की पीड़ा या फिर इतने वर्षों की गृहस्थी को ऐसे एक पल में छोड़ कर चले आना का दुःख , दर्द कौन सा गहरा था ...फिर से अच्छी नौकरी , और गृहस्थी का सामान तो जुटाया जा सकता था , लेकिन अविश्वास और धोखे की चोट को किस तरह मिटाया जा सकेगा ...क्या फिर कहीं किसी के साथ फिर से वह अपनापन और स्नेह पनपा पायेंगे , जो उन्होंने इतने वर्षों से अपनी फैक्ट्री के मजदूरों और मातहतों के साथ था ...अब किसी और पर विश्वास करना क्या इतना आसान हो पायेगा ...लीना के विवाह के लिए मासी ने उन्हें अभी वही रोक लिया था ...पिता माँ को वही छोड़ नई ड्यूटी ज्वाइन कर आये थे ...अंजना जब उनका उदास चेहरा देखती , वही सुर्ख घूरती आँखें , माथे पर गोल लाल तिलक याद आ जाता , वह हंसती खिलखिलाती अचानक चुप हो जाती , फिर भी भरसक खुद को लीना की शादी की तैयरियों में उलझाये रख मन की बेचैनी को भरसक दबाये रखने का यत्न करती ...

उस दिन लीना के ससुराल से महिलाओं को खाने पर आमंत्रित किया गया था ..लीना की गोद भरने की रस्म पर उन लोगों का आना तय था , मगर लीना को वहीं बुलाकर गोद भरने और अंगूठी पहनने की रस्म अदायगी कर दी गयी थी , तब उनका आना नहीं हो सका था .. "ब्याने जीमाने" का न्योता अधूरा नहीं रह जाए , इसलिए आज मासी ने उन लोगों को घर बुला लिया था ....सुबह से ही घर व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था ...इमली की खटाई डले तिल मूंगफली के मसालों में पके ख़ास हैदराबादी भरवाँ बैंगन , जोधपुरी गट्टा पुलाव, छोले की सब्जी , बेसन की मिर्च , जयपुरी मिर्च के टिपोरे , मूंग दाल का हलवा , इन पर तेल और घी ऊपर तक नहीं तैरे तो फिर मारवाड़ी भोजन ही कैसा ....दही -बड़े का दही और खट्टी मीठी चटनी तैयार हो चुकी थी । गुलाबजामुन और दालमोठ मासी ने ऑर्डर पर बनवा लिए थे ...सलाद , चटनी , अचार ,पापड़... मासी ने संतुष्टि भरी नजर डाली ...अचानक उन्हें याद आया , देव पूजन के लिए लापसी चावल तो बनाये ही नहीं थे ...मासी ने कहा सत्या और अंजना से " नीचे रामू के घर से कूकर ले आ , कल शाम उनके घर कुछ मेहमान आये थे खाने पर तब वे ले गये थे...सत्या अंजना को खींच ले गयी साथ ....माँ के रोकते रोकते भी कि मेहमान आने वाले होंगे , तू तैयार हो जा , इधर उधर मत डोलती फिर , लीना भी उनके साथ हो ली ...

पहली बार ही उनके घर गयी थी अंजना और उनसे मिली भी थी पहली ही बार ,मगर उनकी बड़ी आँखों में परिचित होने का भाव नजर आया अंजना को .....घर की साजसज्जा आम मध्यमवर्गीय परिवार जैसी ही सुरुचिपूर्ण थी ...
कुसो मा...
उन्होंने सोफे पर बैठने का इशारा किया और लीना के साथ अन्दर चली गयी ...लौटी तो साथ में रसगुल्ला , मूंगफली -फुटाने की नमकीन और पानी भी साथ में था ...
" नहीं आंटी , हमें जल्दी है , मासी गुस्सा होंगी "
अंजना और सत्या लगभग एक साथ उठ खड़ी हुई ...दोनों लीना पर नाराज हो रही थी ...तुझे चिंता नहीं है , तेरे ससुराल से ही आने वाले हैं मेहमान ...
चल रही हूँ ना , मेरी अम्माओं ..
बाहर निकलते गेट पर रामू खड़ा मिल गया , जैसे रास्ता रोक रखा हो ...उसने अपनी हथेली खोल कर उनके आगे कर दी ...ढेर सारी चॉकलेट ...
लीना झूठ मूठ गुसा होते हुए बोल रही थी ," क्या बात है , टॉफियां बांटी जा रही है , हमें तो कभी नहीं खिलाई तूने "
पीछे हटते हुए बोला रामू , झपट्टा मत मार , सबके लिए है ...

अंजना को चॉकलेट बहुत पसंद है , सभी जानते थे , उम्र ने बचपन की टॉफियों के लालच को कम नहीं किया था ...आज भी अंजना के पर्स में दर्जन भर टॉफियां हमेशा मिल जाती हैं , खुद खाना और बच्चों में बांटना उसे बहुत अच्छा लगता है , मगर यहाँ अंजना अनदेखा करते हुए तेजी से बाहर निकलने लगी ...
ले ना ..लीना ने उठायी कुछ चॉकलेट और उसकी मुट्ठी में ठूंस दी ...
मासी उन्हें आवाज़ लगाती सीढियों तक उतर आई थी ...
कहाँ हो लड़कियों , अरे लीना , तुझे कुछ चिंता है या नहीं , क्या होगा इस लड़की का , ससुराल में मेरी नाक कटवाएगी ...
आ गये मासी .... तीनों सीढियों की ओर लपकी !
तुम लोंग इसे तैयार कर दो जल्दी से ...
मासी ने कहा तो सत्या और अंजना विमला दी की ओर लपकी ...दी, आप ही संभालो इसे , सजाना - संवारना हमारा डिपार्टमेंट नहीं है ...
ठीक है , मगर तुम यहीं खड़े तो रहो , मैं अकेले कैसे करुँगी ...
लीना साडी पहनती उनसे बातें करती जाती थी ...
अंजू, तुझे अब तेलुगु सीख लेनी चाहिए ...
क्यों .....मुझे यहाँ रहना नहीं है परमानेंट , वरना सीख भी लेती , फिलहाल तो तू घर संभालना, साडी संभालना सीख , मुझे तो निखिल जी की चिंता हो रही है , क्या होगा बेचारे की गृहस्थी का ...
मैं मजाक नहीं कर रही ...
मैं ही कौन सा मजाक कर रही हूँ ...नोंक झोंक चल रही थी दोनों में ...विमला दी ने डांटा ...सीधे खड़ी रहो , सच्ची ,मुझे भी चिंता है इस लीना की !
नीचे गाडी रुकने और मंगल गीतों की आवाज़ आने लगी थी , मेहमान आ चुके थे ...विमला दी फुर्ती से लीना का पल्ला और पत्लियाँ सेट करने लगी ...



क्रमशः ...
शादी की व्यस्तता के बीच मानसिक दबाव से उलझती अंजना ,यादों के सफ़र से गुजरती क्यों कह रही है थैंक्स , रामू ...आखिरी किश्त में !