शनिवार, 11 जून 2011

थैंक्स, राम ......(5)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन , भाग चार से आगे


दूसरे दिन सुबह जल्दी ही हलचल शुरू हो गयी ...दिन भर मंगल गीतों के साथ कई तरह की रस्में होती रही ...हल्दी लगाना , बताशे पर घी लगा कर खिलाना , फिर चाक़ पूजन ...सभी महिलाएं पारंपरिक लहंगा -ओढ़नी में सजी धजी बैंड बाजे के साथ झूमती .नृत्य करती कुम्हार के चाक की पूजा करने गयी और लौटते समय सिर पर घड़ों की कतार...अच्छी लगती हैं ये परम्पराएँ , इस बहाने हमारे पारंपरिक हस्तकलाएँ , कुटीर उद्योंगों की पहचान लुप्त नहीं हुई है ...वरना फ्रिज के ज़माने में कुल्हड़ , मटकों की सौंधी महक को भुला ही दिया जाता ...शहर में रंग बिरंगी इंडणियों पर सजे मटकों को सिर पर उठाये इन महिलाओं को देख गाँव में पनघट पर पानी भरने जाती महिलाओं का दृश्य सजीव हो उठता है ...जिन महिलाओं ने सिर पर मटके रखे हुए थे , उनके पति ने एक- एक कर मटकों में कुछ रूपये डाले और सिर से उतार कर पूजागृह में रखने में मदद की ...अंजना को आर्णव की बहुत याद आई, इस भागमभाग में उससे बात ही नहीं हो पाई ...अंजना सोचने लगी क्या कर रहा होगा आर्णव , आज तो रविवार है ...घोड़े बेच कर सो रहा होगा , अभी खबर ले ही लेती हूँ ...काकी दूल्हे को बुला लाई थी ...जिनके पति वहां उपस्थित नहीं होते , दूल्हा ही इस रस्म को पूरी करता है ...

सो रहे थे ..
अरे नहीं , इतनी देर तक कब सोता हूँ मैं ..
अच्छा , आज सन्डे नहीं है ...
तुम नहीं हो तो संडे, मंडे सब एक जैसे ही हैं ...
क्या कर रहे थे ,
बस अभी तुम्हारे पौधों को पानी पिलाया ....

अंजना घर पर नहीं हो तो और कुछ ना करे , गमलों में पौधों को पानी देने का काम नहीं भूलता आर्णव ..जानता है कितना प्यार करती है अंजना इनसे , घर लौटते ही सबसे पहले पौधों को संभालेगी और फिर उससे नाराज होगी , मेरे पीछे से इनका ध्यान नहीं रखा ...पिछली बार पंद्रह दिन से लौटी थी असाम से तो पूरा घर धूल- मिट्टी से अटा पड़ा था , किचन तो शायद खोल कर भी नहीं देखी आर्णव ने , बिगड़ ही पड़ती अंजना मगर अपने पौधों को देखकर उसका मन खुश हो गया , आर्णव ने उनकी अच्छी देखभाल की थी...

कैसे हैं मेरे पौधे , वैसे ही हरे- भरे ना ...
बेचारे मालकिन को आस पास नहीं पाकर मुरझाने लगे थे ...आँचल की सरसराहट , हलकी मस्ती भरी गुनगुनाहट , चूड़ियों का खनकना , पायल की छन- छन सबको बहुत मिस कर रहे होंगे ...

और मालिक !!
मालिक तो थोड़ी देर बाहर तफरी कर आता है ना , मन बहल जाता है , ये बेचारे कहाँ जाएँ ...

पौधों के बहाने सब कहेगा आर्णव , ये नहीं कहेगा कि तुम मुझे याद आ रही हो , चेहरे पर ललाई दौड़ने लगी मुस्कराहट के साथ ...लीना कनखियों से देख रही थी , अंदाज लगा सकती थी किससे बात हो रही है ...
मियाजी से बातें हो रही थी ...प्रश्नवाचक निगाहों से सुर्ख हो उठा चेहरा अंजना का ...
हमारी सोचो , कितना लम्बा इतंजार करना होता है , यहाँ एक सप्ताह में में सूख कर काँटा हुए जाते हैं लोंग ...लीना मसखरी पर उतर आई ...
तो चली जा ना वही ...
जाना तो है ही , मुंबई में उनकी पोस्टिंग का इंतज़ार है ...
भात की रस्म शुरू हो गयी थी , काकी के मायके से दूल्हा- दुल्हन के साथ ही उसके माता- पिता , और सभी रिश्तदारों के लिए वस्त्र , रूपये आदि भेंट में दिए जा रहे थे ...

अच्छा है चाक़ -भात आज ही एक साथ हो गया ...कल निकासी शाम को ही होगी , दिन भर फ्री रहेगा , घूम कर आते हैं कल ...

सुबह स्नान और कुछ रस्मों से फ्री होकर दोनों सहेलियां घूमने निकल पड़ी ...काली मंदिर के पास धूप लोबान की खुशबू गुजरते लीना ने रोक लिया ...चल माँ के दर्शन कर लेते हैं ..चौड़े माथे पर बीचों बीच मोटी लाल बिंदी सा टीका लगाये पंडितों को देख अंजना पीछे सरक लेती है ...ईश्वर के प्रति पूर्ण सम्मान रखने , पूजन विधियों का पालन करते हुए भी ललाट पर तिलक लगाने के अवसर पर अंजना इधर- उधर बच निकालती है , कितनी बार अम्मा ने टोका होगा उसे ...
बचपन की कटु स्मृति बड़े होने तक पीछा नहीं छोडती ...अंजना को याद आ जाता है ...हलकी पीले रंग की सुन्दर छींटदार फ्रॉक पहने तितली सी उडती फिरती अनजान रुक गयी थी ...बैठक में में पापा के चिंतित मुद्रा में तो माँ का गुस्से से लाल चेहरा देखकर ..पापा के सामने कोई पंडित जी बैठे थे ...अपना मोटा पत्रा और लाल कागज बिखेरे वही लाल मोटा गोल टीका लगाये ..." अशुभ है " उसके कानों में आवाज़ पड़ ही गयी ..पंडितजी की सुर्ख लाल आँखों में जाने क्या देखा था मासूम अंजना ने , घबरा कर माँ के पीछे जा छिपी ...

अचानक उसे सामने देख माँ चौंकी थी ," क्या हुआ बेटा , आ तुझे नाश्ता दे दूं " ...माँ बहाने से उसे बाहर ले आई थी ....नाश्ता खिला कर बालों में थपकी देती माँ ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया ...माँ के आँचल से लिपटकर झपकी लेती अंजना को जब माँ ने बिस्तर पर लिटाया तो आँखों की कोर से कुछ बूँद लुढ़क पड़ी ...कभी संतान में अपने माँ बाप के लिए अशुभ होती है , खुद तो नशे में चूर रहता है , क्या भविष्य बताएगा किसी और का , उसकी हिम्मत कैसे हुई , आइन्दा मेरे घर में पैर नहीं रखे ...पिता बैठक से निकल कर माँ के पास आ गये थे ...
मेरी बच्ची, कैसे अशुभ कह दिया , आप भूल गये , आपकी तो इतनी अच्छी नौकरी , बंगला , नौकर- चाकर , सब सुख -सुविधाएँ इसके जन्म के बाद ही मिली हैं "
".क्यों चिंता करती हो , ऐसे ही बता दिया , हम कौन उसपर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं "...अंजना को बिस्तर पर धीमे से सुलाती माँ को पिता ने समझाया ...माँ मुड़ी तो अंजना की छोटी हथेलियों में कसा उसका आँचल खींच गया ...सीने में ज्वार सा उमड़ आया...बेतहाशा अंजना को चूमती माँ फफक पड़ी ..

बचपन का वह भय , लाल आँखें अंजना के दिमाग से निकल नहीं पाई ...आज भी सिर पर लाल मोटी बिंदी लगाये पंडित को देख सहम जाती है ..सिर में अजीब भारीपन सा महसूस किया उसने ..
क्या हुआ अंजू ...
कुछ नहीं तू पूजा कर , मैं यहाँ बैठती हूँ ...मंदिर की सीढियों पर बैठती अंजना ने जवाब दिया ...

लीना की शादी की तैयारियों की बीच भी यही भारीपन महसूस किया था उसने कई बार ... कई बार दर्द की लहर उठती थी उसके सिर में ...वह सिर पकड़कर निढाल हो जाती थी ...उन्ही दिनों एक दिन माता -पिता को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक सामने देख अंजना चौंक पड़ी थी ...फैक्ट्री के मजदूरों ने अचानक ही अफसरों पर धावा बोल दिया था ...सुरक्षा कर्मी जैसे- तैसे उन्हें वहां से निकाल पाने में कामयाब हुए थे ...जल्दी में जो थोडा बहुत समान समेट सकते थे , समेटा और पहली ही फ्लाईट से हैदराबाद रवाना हो गये ...
माता -पिता दोनों ही चुप से रहने लगे थे ...समझ नहीं आता था उन्हें मातम किस का मनाएं ... चाय बगान के मालिक ने कागजनगर में अपनी कागज की फैक्ट्री में उन्हें प्रशासनिक पद पर नौकरी दे दी थी , लेकिन अपनों की धोखेबाजी के जख्म अभी ताजा थे ...वर्षों तक जिन्हें अपना परिवार मानकर उनके सुख दुःख में शामिल होते रहे , उनके द्वारा इस तरह अचानक बेगाना कर दिए जाने की पीड़ा या फिर इतने वर्षों की गृहस्थी को ऐसे एक पल में छोड़ कर चले आना का दुःख , दर्द कौन सा गहरा था ...फिर से अच्छी नौकरी , और गृहस्थी का सामान तो जुटाया जा सकता था , लेकिन अविश्वास और धोखे की चोट को किस तरह मिटाया जा सकेगा ...क्या फिर कहीं किसी के साथ फिर से वह अपनापन और स्नेह पनपा पायेंगे , जो उन्होंने इतने वर्षों से अपनी फैक्ट्री के मजदूरों और मातहतों के साथ था ...अब किसी और पर विश्वास करना क्या इतना आसान हो पायेगा ...लीना के विवाह के लिए मासी ने उन्हें अभी वही रोक लिया था ...पिता माँ को वही छोड़ नई ड्यूटी ज्वाइन कर आये थे ...अंजना जब उनका उदास चेहरा देखती , वही सुर्ख घूरती आँखें , माथे पर गोल लाल तिलक याद आ जाता , वह हंसती खिलखिलाती अचानक चुप हो जाती , फिर भी भरसक खुद को लीना की शादी की तैयरियों में उलझाये रख मन की बेचैनी को भरसक दबाये रखने का यत्न करती ...

उस दिन लीना के ससुराल से महिलाओं को खाने पर आमंत्रित किया गया था ..लीना की गोद भरने की रस्म पर उन लोगों का आना तय था , मगर लीना को वहीं बुलाकर गोद भरने और अंगूठी पहनने की रस्म अदायगी कर दी गयी थी , तब उनका आना नहीं हो सका था .. "ब्याने जीमाने" का न्योता अधूरा नहीं रह जाए , इसलिए आज मासी ने उन लोगों को घर बुला लिया था ....सुबह से ही घर व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था ...इमली की खटाई डले तिल मूंगफली के मसालों में पके ख़ास हैदराबादी भरवाँ बैंगन , जोधपुरी गट्टा पुलाव, छोले की सब्जी , बेसन की मिर्च , जयपुरी मिर्च के टिपोरे , मूंग दाल का हलवा , इन पर तेल और घी ऊपर तक नहीं तैरे तो फिर मारवाड़ी भोजन ही कैसा ....दही -बड़े का दही और खट्टी मीठी चटनी तैयार हो चुकी थी । गुलाबजामुन और दालमोठ मासी ने ऑर्डर पर बनवा लिए थे ...सलाद , चटनी , अचार ,पापड़... मासी ने संतुष्टि भरी नजर डाली ...अचानक उन्हें याद आया , देव पूजन के लिए लापसी चावल तो बनाये ही नहीं थे ...मासी ने कहा सत्या और अंजना से " नीचे रामू के घर से कूकर ले आ , कल शाम उनके घर कुछ मेहमान आये थे खाने पर तब वे ले गये थे...सत्या अंजना को खींच ले गयी साथ ....माँ के रोकते रोकते भी कि मेहमान आने वाले होंगे , तू तैयार हो जा , इधर उधर मत डोलती फिर , लीना भी उनके साथ हो ली ...

पहली बार ही उनके घर गयी थी अंजना और उनसे मिली भी थी पहली ही बार ,मगर उनकी बड़ी आँखों में परिचित होने का भाव नजर आया अंजना को .....घर की साजसज्जा आम मध्यमवर्गीय परिवार जैसी ही सुरुचिपूर्ण थी ...
कुसो मा...
उन्होंने सोफे पर बैठने का इशारा किया और लीना के साथ अन्दर चली गयी ...लौटी तो साथ में रसगुल्ला , मूंगफली -फुटाने की नमकीन और पानी भी साथ में था ...
" नहीं आंटी , हमें जल्दी है , मासी गुस्सा होंगी "
अंजना और सत्या लगभग एक साथ उठ खड़ी हुई ...दोनों लीना पर नाराज हो रही थी ...तुझे चिंता नहीं है , तेरे ससुराल से ही आने वाले हैं मेहमान ...
चल रही हूँ ना , मेरी अम्माओं ..
बाहर निकलते गेट पर रामू खड़ा मिल गया , जैसे रास्ता रोक रखा हो ...उसने अपनी हथेली खोल कर उनके आगे कर दी ...ढेर सारी चॉकलेट ...
लीना झूठ मूठ गुसा होते हुए बोल रही थी ," क्या बात है , टॉफियां बांटी जा रही है , हमें तो कभी नहीं खिलाई तूने "
पीछे हटते हुए बोला रामू , झपट्टा मत मार , सबके लिए है ...

अंजना को चॉकलेट बहुत पसंद है , सभी जानते थे , उम्र ने बचपन की टॉफियों के लालच को कम नहीं किया था ...आज भी अंजना के पर्स में दर्जन भर टॉफियां हमेशा मिल जाती हैं , खुद खाना और बच्चों में बांटना उसे बहुत अच्छा लगता है , मगर यहाँ अंजना अनदेखा करते हुए तेजी से बाहर निकलने लगी ...
ले ना ..लीना ने उठायी कुछ चॉकलेट और उसकी मुट्ठी में ठूंस दी ...
मासी उन्हें आवाज़ लगाती सीढियों तक उतर आई थी ...
कहाँ हो लड़कियों , अरे लीना , तुझे कुछ चिंता है या नहीं , क्या होगा इस लड़की का , ससुराल में मेरी नाक कटवाएगी ...
आ गये मासी .... तीनों सीढियों की ओर लपकी !
तुम लोंग इसे तैयार कर दो जल्दी से ...
मासी ने कहा तो सत्या और अंजना विमला दी की ओर लपकी ...दी, आप ही संभालो इसे , सजाना - संवारना हमारा डिपार्टमेंट नहीं है ...
ठीक है , मगर तुम यहीं खड़े तो रहो , मैं अकेले कैसे करुँगी ...
लीना साडी पहनती उनसे बातें करती जाती थी ...
अंजू, तुझे अब तेलुगु सीख लेनी चाहिए ...
क्यों .....मुझे यहाँ रहना नहीं है परमानेंट , वरना सीख भी लेती , फिलहाल तो तू घर संभालना, साडी संभालना सीख , मुझे तो निखिल जी की चिंता हो रही है , क्या होगा बेचारे की गृहस्थी का ...
मैं मजाक नहीं कर रही ...
मैं ही कौन सा मजाक कर रही हूँ ...नोंक झोंक चल रही थी दोनों में ...विमला दी ने डांटा ...सीधे खड़ी रहो , सच्ची ,मुझे भी चिंता है इस लीना की !
नीचे गाडी रुकने और मंगल गीतों की आवाज़ आने लगी थी , मेहमान आ चुके थे ...विमला दी फुर्ती से लीना का पल्ला और पत्लियाँ सेट करने लगी ...



क्रमशः ...
शादी की व्यस्तता के बीच मानसिक दबाव से उलझती अंजना ,यादों के सफ़र से गुजरती क्यों कह रही है थैंक्स , रामू ...आखिरी किश्त में !


14 टिप्‍पणियां:

  1. क्या होगा बेचारे की गृहस्थी का ...
    --
    बहुत रोचक चल रहा है यह धारावाहिक!

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  2. बचपन का वह भय , लाल आँखें अंजना के दिमाग से निकल नहीं पाई ...आज भी सिर पर लाल मोटी बिंदी लगाये पंडित को देख सहम जाती है ..सिर में अजीब भारीपन सा महसूस किया उसने ... kahani utsukta liye chal rahi hai, is pankti per main atak gai ... aisa hota hai

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  3. विस्थापन का टीसता दर्द, भोजन की लुभावनी सुगन्ध, परम्पराओं के मोहक रूप, एक्स्टैंडेड परिवारों का निस्वार्थ अपनापन - एक ही कडी में सारे ही रंग दिख गये। धन्यवाद का इंतज़ार है। पापम रामदासुडु!

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  4. लोकजीवन के अनुष्ठानों ,घनिष्ठ सम्बन्धों के मध्य के सूक्ष्म संकेत भरे सम्वाद -अच्छी है कथा श्रृंखला !
    लगता है आपको इसे जल्दी जल्दी करके पूरा करने की हडबडी है तभी एक एक अंक इतना लंबा होता गया है ..
    तनिक पाठकों का भी ध्यान रखा करें !

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  5. राजस्थानी परिवार अपनी परम्पराएं भूलते नहीं, कहीं भी रहें परम्पराओं का निर्वहन करते हैं। चाक-भात और ईंडी इसी का प्रमाण हैं।

    बढिया चल रही है कहानी।

    आभार

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  6. पिछली कडियाँ नही पढ पाई । अब एक ही बार पूरी पढूँगी। शुभकामनायें।

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  7. अशुभ है ... और पंडित जी का अक्स मस्तिष्क पर छप जाना ...पूरी कहानी रोचकता लिए हुए है ... अब सारा रहस्य अगली कड़ी में खुलेगा ..इंतज़ार है ..

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  8. इंतजार ,इंतजार और इंतजार .....

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  9. शादी के रस्मो-रिवाज और व्यंजनों का बड़ा ही लुभावना वर्णन है
    दोनों सहेलियों की चुहल सुखद लग रही है...अगली कड़ी का इंतज़ार ..

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  10. काफी रोचक वर्णन बन पड़ा है रस्मो से और व्यंजनों से .आगे का इंतज़ार.

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  11. कितना वृहद अंश है, कितने संस्कार-कितने प्रसंग सब है इस एक कड़ी में।
    उत्सुकता और प्रतीक्षा है।

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  12. अंक लंबा था।
    इसका कतई अर्थ नहीं कि रोचकता, या प्रवाह में कोई कमी है।
    संवाद चुटीले, और शैली कसी हुई है इसलिए कहानी की गति बनी रहती है।
    कुछेक बातें बीच-बीच में मन को छूती-सहलाती रहती हैं,
    *अच्छा , आज सन्डे नहीं है ...
    तुम नहीं हो तो संडे, मंडे सब एक जैसे ही हैं ...
    **फिर से अच्छी नौकरी , और गृहस्थी का सामान तो जुटाया जा सकता था , लेकिन अविश्वास और धोखे की चोट को किस तरह मिटाया जा सकेगा
    ***उम्र ने बचपन की टॉफियों के लालच को कम नहीं किया था

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