मंगलवार, 16 जून 2015

छोटू घडी नहीं उतारता..... समय को मुठ्ठी में रखना चाहता है !!


मध्यप्रदेश से गर्मी की छुट्टियों में धर्मेन्द्र अपने भाई के पास यहाँ आया हुआ है. मिस्त्री का काम करता है उसका भाई . सात भाई बहनो में सबसे छोटा धर्मेंद्र नवीं कक्षा में पढता है. गर्मी की छुट्टियों का उपयोग परिवार की अतिरिक्त आमदनी में मदद करता है. उसका भाई पास में ही दूसरी साइट पर काम कर रहा है .
छोटू (धर्मेन्द्र) का साथी बताता है कि ये उसके साथ काम नहीं करता . वहाँ भारी समान उठाते रहना पड़ता है इसलिये हम अपने साथ रख लिये.
प्रतिदिन 1100 में से 700 स्वयं रखता है और 400 छोटू को. दोनों एक ही गाँव के हैं.

पुरानी दीवार पर टाइल लगाना बहुत मेहनत का कार्य है . पहले पूरी दीवार को खरोंचना पड़ता है. पूरा दिन मेहनत करके भी कुछ काम दिखता नहीं . मालिक पूछ लेता है कि आज दिन भर क्या किये तो क्या बतायें.
मैं सोचती हूँ कि अब उसको क्या बतायें कि सब गृह कार्य अपने हाथों से दिन रात करने वाली गृहिणी से भी लोग कई बार पूछ लेते हैं कि सारा दिन क्या करती हैं.... कैसे टाइमपास होता है सारा दिन घर में....

अब तक कितने कमा लिये!!
 उसके साथ काम कर रहा कारीगर बताता है 4000 रूपये.
क्या करेगा इन पैसों का?
टूशन रखूँगा...
सोचती हूँ कि ट्यूशन मतलब स्कूल फ़ीस देना होता होगा. श्रमिक वर्ग की शिक्षा के प्रति यह रूचि सुखद लगती है.
श्रम और बुद्धि का मेल अति हितकारी है व्यक्ति के स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये , राष्ट्र के लिये भी .
अच्छा... माँ के लिये क्या लेकर जायेगा...साडी?
क्या ले जायें... सकुचाते हुए कहता है . साडी वहीं खूब मिल जाती है.

मगर जयपुर जैसी नहीं मिलेगी न!

जयपुर में महँगी मिलेगी उसका साथी बोला
.
मैं उसकी बात मान लेती हूँ.  जयपुर महँगा शहर है . 28 वर्ष पहले जब जयपुर की धरती पर कदम रखा था तब भी मान लिया था. सबसे पहला सामना औटो रिक्शा से ही हुआ. हैदराबाद के मुकाबले दुगुना किराया ही नहीं  सेंडिल से लेकर खाना पीना तक भी  महँगा ही लगा था. तब से अब तक कहाँ -कहाँ घूम आये मगर धारणा वही सही साबित होती है आज भी.,
धर्मेन्द्र (छोटू ) से उसकी पढाई के बारे में बात करता देख उसके साथी कारीगर के चेहरे पर बेचारगी के भाव साफ़ पढे जा सकते थे. अपने स्थान पर खडा ही इधर उधर होता रहा बेचैनी में जैसे कि कश्मकश में हो कि यदि उससे पूछा जायेगा तो वह क्या जवाब देगा.
पूछ लिया उससे भी कि तुम कितना पढे हो.

हम नहीं पढे हैं!

ऐसे कैसे हो सकता है. यह सब नाप जोख करना , हिसाब लगाना , हिसाब से सेट करना कैसे करते हो!

ओही आठ तक पढे हैं खाली. हमारे पिताजी तभी खतम हो गये थे. कोई घर सम्भालने वाला नहीं था.उसीसे हमको पढाई छोड़ कर काम करना पडा. हम पंद्रह साल मद्रास मे काम किया. अब कुछ साल से यहाँ जयपुर में. मद्रास बहुत दूर पड़ता है. यहाँ से गाँव पास है. महीने में एक बार गाँव चल जाते हैं.
एक साँस में अपनी पूरी बात कहने के बाद  उसकी बेचैनी कम होती सी दिखी. जैसे उसने भी कोई परीक्षा उत्तीर्ण कर ही ली.

तभी बाहर दरवाजे पर कर्कश स्वर उभरा. बाहर जाकर देखा तो कान, नाक , गले , पैर में आभूषण पहने टेर लगाने वाली स्त्री को दो तीन बच्चे घेरे खडे थे . सोचती हूँ इनकी भी कूछ मजबूरी होती होगी. अपनी ही लिखी हुई कविता याद आ गई -
पेट की आग से
क्या बडी होती है
इनके तन की आग!
उसी समय मन की आंखों के आगे अखबार में छपी उस लड़की की तस्वीर आ जाती है जो बीमार पिता और भाई की तीमारदारी के बीच कई घरों में काम करते हुए भी मेरिट में स्थान लाती है.
पीछे खडे मजदूर, सामने खडी वह स्त्री और दिमाग में वह लडकी तीनों मिलकर जैसे किसी प्रोजेक्ट का विवरण सा खींच रहा हो कागज में. एक साथ मस्तिष्क कितने आयाम में विचरता है.

छोटू को देखती हूँ मुड़ कर . वह कभी अपने हाथ की घडी नहीं उतारता. पता नहीं किसी ने उसे उपहार दिया था अथवा अपने मेहनत की कमाई से खरीद लाया मगर उसका मोह देखते बनता है. काम समाप्त कर हाथ मुँह धोते या सीमेन्ट बजरी मिलाकर मसाला तैयार करते या कि सर पर रख कर परात उठाते समय हर समय घडी उसके हाथ में होती है . पूछा भी मैने क्या घडी खराब नहीं होती इस तरह...
इंकार में सर हिलाते हौले से हाथ फेरता है . चेहरे पर किंचित नाराजगी सी दिख पडी . जैसेकहीं उसकी घडी को नजर न लग जाये. जिन चीजों से हम प्रेम करते हैं हम कितनी बार उनके प्रति निर्मम हो जाते हैं .
मन से ही गूंजा - चीजों नहीं, इन्सानों से भी . व्यामोह की यह कौन सी दशा है... कैसी विवशता है!! भावनाओं के कितने रहस्य अबूझ होते है.  रिश्तों के उलझे धागे!!

करनी, फीता, धागा, हथोडा जल्दी जल्दी थैले में डालते छोटू की हड़बडी पढती हूँ. दिन भर के श्रमके बाद हाथ में आये हरे नोट की चमक उसकी मासूम आंखों में लहराती है हरियाली सी. 
छोटू घडी नहीं उतारता. समय को मुठ्ठी में रखना चाहता ही नहीं, प्रयास भी करता है . श्रम भी करता है. ईश्वर इन छोटूओं का स्वयं पर विश्वास डिगने न दे. सफल ता हासिल हो इसी ईमानदारी और श्रम की पीठ पर सवार होकर.
एक नि:शब्द दुआ निकलती है दिल से!!





रविवार, 7 जून 2015

इन्हें क्षमा नहीं करना कर्नल!!

मणिपुर में इतने सैनिक मरे.
कश्मीर में उग्रवादियों ने पर सेना के काफिले पर हमला किया.
छत्तीसगढ में कैम्प पर धावा बोला .
 बारुदी सुरंग में उडा दी गई जीप मे इतने शहीद हुए. अपने शरीर के अँगो को खो बैठने वालों की तो सूचना भी नहीं मिलती.
इक्का दुक्का रोज मरने वालों की तो ऐसे भी कोई गिनती नहीं....उन्हें अखबार के एक नामालूम कोने में जगह मिलती है हालाँकि सैनिकों के कठिन जीवन की जानकारी का फिल्मांकन करते हुइ उनकी कार्यप्रणाली की सूचना लीक करने में कोई कोताही नहीं होती. तारीख बदली,खबर बदल जाती है.
बडे घोटालों, सामाजिक असमानता, सांप्रदायिकता , नारी शोषण की खबरों , उन पर प्रतिक्रिया , धरने , मोमबत्ती मार्च करने वालों की सलेक्टिव संवेदनशीलता ऐसे मौके पर जाने किस पाताल लोक में समाई होती है.
हो भी क्यों न!
नेता,अभिनेता,व्यवसायी, लोकसेवकों , समाजसेवकों की संतानें जो यह पेशा /पैशन नहीं अपनाती.  कठोर अनुशासन से बँधे सैनिक न पटरिया रोक कर आंदोलन कर सकते हैं और न ही भीषण दर्द सहकर कमजोर पड़ते हुए अपने साथियों के लिये नियम के विरुद्ध जा सकते हैं.  एक प्रकार से उचित ही है कि ऐसे डरपोक, संवेदना हीन, स्वार्थी , सुविधाभोगियों लोगों के साये से सेना बची ही रहे. मगर क्या वे हमारे कुछ आँसुओं के हकदार भी नहीं. सोचा कई बार होगा मगर गौतम राजऋषि के स्टेटस ????ने जैसे सूखे घाव की परत हटाई.

यह सिर्फ एक मेजर अथवा कर्नल  की पीडा नहीं प्रत्येक सैनिक और उससे जुडे , उसके परिवार , मित्रों की भी है. प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति की पीडा है.
कोफ्त होती है बहुत . आखिर कितने कृतघ्न होते रहेंगे हम कि उनके शौर्य प्रदर्शन में सहयोगी न भी हो सकें तो कम से कम उन्हें बता सकें कि उनके दुख में हर माँ का कलेजा छलनी है, हर बहन की दुआ का धागा उनकी खुशहाली भरे जीवन के लिये अभिमन्त्रित है.
यह लिखने का तात्पर्य यह कत्तई नहीं कि हमने कोई बीडा उठाया है या फ़िर खुद ऐसा कुछ कार्य कर लिया है बस यह बताना है कि उनके दुख में हमारी भी आंखें नम रहती हैं. वे थके  मांदे भयभीत अनगिनत जीवन के प्रेरक तत्व हैं , संजीवनी हैं.
आपके  त्याग  बलिदान , शौर्य, और पहरेदारी से निरपेक्ष रह सकने वाले गुनहगार हैं.
इन्हें क्षमा मत करना!

बुधवार, 3 जून 2015

और कुछ न कर सके पर शोर तो मचाया ही .......

एक दोपहर रसोई में घुसते हुए  बाहर खुलने वाले जाली के दरवाजे से बेटी को बाहर के मेन गेट से किसी चीज का तेजी से गमलों की तरफ़ बढने की एक झलक सी दिखी. उत्सुकता लिये दरवाजा खोल कर बाहर जाने का उपक्रम किया मगर पुनः साँप साँप  चिल्लाते लौट पडी. एकबारगी मुझे यकीन नहीं हुआ कि उसे कोई भ्रम हुआ होगा. एक बार खुली गैलरी में कागज के डब्बे के पीछे गिरगिट के तेजी से  छिप जाने से गोहिरा का भ्रम हो गया था जो बडी मशक्कत के बाद दूर हुआ था.
खैर, कहाँ है कहती हुई गमलों की तरफ़ कदम बढाया तो तीन चार आकार में कुछ बडी सी चिडिया उन्हीं गमलों को घेर कर अपनी चोंच से प्रहार करती दिख पडी.
पहले तो ख्याल आया कि यह नन्ही चिड़िया साँप का क्या कर लेगी  मगर फिर उनकी चुस्ती फुर्ती ने समझा दिया। एक तो वे समूह में थी और शोर मचा रही थीं।  चिड़ियों से और कुछ न हुआ मगर शोर मचाया ही।  यह शोर  सावधान  कर ही देता हैं।  प्रकृति इंसान को सारे सबक भी स्वयं ही सिखाती है।  हर कमजोर से कमजोर व्यक्ति में कुछ न कुछ सामर्थ्य होता ही है और इसी दम पर वह अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है।


  यह चिडिया भी नई सी ही हैं हमारे इलाके में. इधर एक वर्ष में ही नजर आने लगी है. गौरैया के रंग जैसी मगर आकार में कुछ बडी  अकसर  गमलों के पौधों और बडे पेड़ों  पर उधम मचाते कीट पतंगो को अपनी चोंच में दबाये या पानी भर कर रखे पात्र में स्नान ध्यान करती सी दिख जाती हैं. ये कभी भी एक अकेली नहीं आती बल्कि तीन चार के समूह में होती हैं।  कई बार इनकी घुन्नी सी लाल आंखों और चोंच में अटके कीट पतंगों को देख कर बच्चे इसे शिकारी चिडिया कहने लगे हैं.
जब गमलों की ओर थोडा झुक कर देखा तो निरीह अवस्था में सिकुडा सा साँप  नजर आ गया. थोडी देर उन गमलो को पार कर अपनी चोंच से भेद देने की असफल कोशिश करती रहीं मगर साँप उसी तरह कोने में सिकुडा पडा रहा. जब थक हार कर वे उड़ गईं तब जाकर उसने अपना आकार फैलाना शुरू किया जैसे भरपूर अंगडाई ले रहा हो और तभी हमें होश आया कि साँप कुतुहल का विषय नहीं विषैला भी  हो सकता है.
घबराहट के मारे कुछ सूझा नहीं. पेड़ पौधों की आड़ में जाने कहाँ छिप जाये, इस लिये उस पर नजर रखते हुए पडोसी परिवार  को आवाज लगाई कि उनकी ओर वाली दीवार पर पाइप से पानी डालें और इधर हम बाल्टी भर पानी ले बैठे. दोनों तरफ़ से पानी की बौछार से परेशान गुस्से और खीझ में बिलबिलाता हुआ दरवाजे को पार कर उससे सटी छोटी सी बगिया में घुस कर अनार के  पेड़ पर चढ कर निश्चिंत बैठ गया जैसे वहाँ बैठ कर हमारी बेचैनी के मजे ले रहा हो.
पेडो के झुरमुट में साँप का बैठे रहना चिंता का विषय होना ही था.
इस बीच वन विभाग में कार्यरत भाई को फोन कर पूछा कि अब क्या किया जाये . भाई ने एक NGO का नंबर देकर उनसे सम्पर्क करने को कहा. फोन मिला कर उनसे कहा कि साँप पकडने के लिये जल्दी आयें।  तब उधर से एक व्यक्ति आश्चर्य मिश्रित हकलाहट में पूछ रहा था कि पहले आप यह बताओ कि आपको यह नंबर किसने दिया.  हमने कहा कि  दिया तो हमारे भाई ने ही है जो इसमें क्या हो गया।
इस पर वह भाई की पूछताछ करने लगा कि वह कौन हैं , क्या करते हैं।
जब हम पूछे कि आप यह पूछताछ क्यों कर रहे तब  उधर से जवाब आया कि यह Women Empowerment NGO का नंबर  है.
उस समय दिमाग में चिंता साँप की थी मगर जब बाद में इस संयोग पर सोचा तो हँसी के दौरे पड़ गये. अगला व्यक्ति क्यों बौखलाया यह भी  समझ आ गया।
भाई को दुबारा फोन किया और उसे सारा माजरा बताया।  भाई ने बताया कि दोनों नंबर साथ ही लिखे थे तो शायद गलती से दूसरा नंबर दे दिया।  इस गलती में कितनी बड़ी गफलत हो जानी थी।  कहीं  उस NGO  ने साँप पकड़ने को व्यंग्य में ले लिया होता तो क्या होता।  बाद में यही सोच कर खूब मुस्कुराये हम।
दुबारा सही नंबर लेकर फिर फोन मिलाया।   वहां फोन करने पर मौजूद व्यक्ति ने साँप  का रंग , लम्बाई आदि पूछ कर सूचना दी कि हालांकि यह साँप विषैला नहीं है मगर आप उससे दूर रहे और निगरानी रखें। साथ ही यह जानकारी भी कि यह स्वयंसेवी संस्था स्वयं साँप  पकड़ने का कार्य नहीं करती बल्कि साँप पकड़ने वालों से संपर्क कर उन्हें भेजती है।  इसके लिए उन्हें धन भी देना पड़ेगा।  जब साँप सर पर हो तो धन की कौन सोचता है।  हमने कहा आप भेजो तो , हम पैसे दे देंगे।  थोड़ी देर बाद उनका दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी तीस से चालीस मिनट में आयेगा तब तक आप साँप  पर निगरानी रखें।  पेड़ पर चढ़े साँप की इतनी देर निगरानी कोई आसान कार्य है।  जाने कब उतरकर किधर चल दे मगर साहस बंधा हुआ था कि हमलोग पांच छह जने थे जो बारी बारी उसका ध्यान रख सकते थे।
तब तक यहाँ से गुजर रहे दो व्यक्ति माजरा जानने आ गये।  उन्होंने कहा कि हम अपने तरीके से पकड़ लेंगे इसे।  फिर जैसे तैसे उसे पकड़ा गया  और उन लोगों को पैसे देकर विदा किया गया।
सब कार्यक्रम संपन्न हो चुकने के बाद NGO  से दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी बीस मिनट में आप तक पहुँच जाएगा।  हमने भी कह दिया कि अब उनको आने की जरुरत नहीं , काम हो चुका  है।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

टोटा.... लघु कथा

‪#‎लघु‬ कथा

ये ले सुगनी! कल से काम पर मत आना. उसके हाथ में रुपये ठूँसती मालकिन बोली!
पूर्व सूचना के बिना छुट्टी कर दिये जाने से सहसा हतप्रभ हुई सुगनी मगर जल्दी ही समझ गयी.

अच्छा! माँ जी आने वाली हैं!

मालकिन भी कम विस्मित न हुई. मन ही मन सोचा इसे पता कैसे चला .फोन तो कल रात ही आया था.

अरे नहीं! कुछ समय से साहब का हाथ तंग है. खर्चा नहीं निकलता.

कुछ बोली नहीं सुगना मगर जानती थी कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. 
गाँव में बडे अफसर की पत्नी बडी मालकिन को सब सुख सुविधाएं प्राप्त थीं. अवकाशप्राप्ति के बाद आराम से रहने के लिये शहर में मकान बना लिया था जहाँ रह कर बेटा पढा लिखा और अब विवाह के बाद पत्नी के साथ रह रहा था. 
जानती थी सुगनी कि बडी मालकिन यह असुविधा नहीं झेल पायेंगी . फिर उनके कहने पर उसे बुलाया जायेगा और घर खर्च चलाने , बहू की बहन की शादी में होने खर्चों के साथ उसकी एक दो महीने की तंख्वाह भी वही देंगी . तब तक बहू का हाथ तंग ही रहने वाला है!

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

राजस्थान में अक्षय तृतीया ....धर्म और परंपरा

आज अक्षय तृतीया है. पुराणों और शास्त्रों के मतानुसार इस दिन का धार्मिक महत्व यह है कि इस दिन से सतयुग का अत आरम्भ एवं द्वापर का अंत अर्थात त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ था . भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही इस धरती पर अवतरित हुए . हिन्दुओं के महातीर्थ स्थल माने जाने वाले  बद्रीनारायण धाम के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं।
इसके अतिरिक्त वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन भी केवल अक्षय तृतीया को होते हैं।

अक्षय तृतीया (अखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं। इस दिन किया जाने वाला कार्य अनन्त फल देता अक्षय तृतीया (अखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं।
इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इस दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। समस्त शुभ कार्यों के अलावा प्रमुख रूप से शादी, स्वर्ण खरीदने, नया सामान, गृह प्रवेश, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, भूमि पूजन तथा नया व्यापार प्रारंभ कर सकते हैं। इस दिन किया जाने वाला दान भी अक्षय माना जाता है . लोग जल से भरे मटके , पंखे , खरबूजा , ककड़ी , आम  आदि फलों का का दान करते हैं. इसी दिन नए अनाज के बीजों का भी रोपण किया किया जाता है .
धर्म के कारण माने अथवा परम्परा में , इस प्रकार किये गए दान का लाभ जनता को मिलता ही .  भीषण ताप में विभिन्न स्थानों पर दान किये गए जल के पात्र और फल आदि राहगीरों/कृषकों /जरुरतमंदों  की भूख प्यास का इतंजाम हो ही जाता  था .
कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इसलिए राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इस दिन बहुत छोटे बच्चों का बड़ी संख्या में विवाह कर दिया जाता था . इतनी अधिक संख्या में ये विवाह संपन्न होते थे कि आखा तीज को बाल विवाह के दिन के रूप में ही जाना जाता था
.धर्म और परंपरा का दैनिक जीवन में इस तरह घुलना मिलना रहा है कि कई बार यह तय करना मुश्किल होता है कि धर्म से परंपरा चली या परम्परा ही धर्म की प्रेरक रही .  यह समय गेहूं , जौ, चना और सरसों की फसल काटने का होता है . भारत कृषिप्रधान देश रहा और यहाँ की बड़ी आबादी की जीविका का साधन भी कृषि ही रहा . कृषकों के कार्यकलाप और सुख दुःख  फसलों के बोने और काटने के समय पर निर्भर होते रहे . इस समय उनके पास अर्थ की व्यवस्था होती और फुर्सत भी इसलिए ग्रामीणों में आखा तीज शुभ मुहूर्त के साथ ही सुविधा का समय भी होता रहा .
इस दिन का आकर्षण हुआ करता था ट्रैक्टर ट्रौली में रंग बिरंगे चमकदार वस्त्र और बन्धेजी अथवा सादे साफे पहने ग्रामीण, चटख लाल पीली चुनरी और पीले में सजी औरतें गीत गाती  दिन भर मेले की तरह गुजरते देखना . हम भाई बहन कभी छत पर तो कभी बाउन्ड्री वाल पर टिके मासूमियत से ये नजारे देखते . हैरान होते रहते कि इतने छोटे बच्चों का विवाह हो रहा है! कई तो बिल्कुल दूधमुँहे से भी माँ की गोद से चिपके होते. हमारा कुतुहल समाप्त ही न होता था कि आखिर इनका विवाह अभी ही क्यों कर रहे!!
अच्छा है कि अब कानून के भय से ही सही , इस प्रकार के विवाह बड़ी संख्या में नहीं होते . मगर चोरी छिपे अभी भी ग्रामीण इलाकों में छोटे बच्चों के विवाह इस प्रकार संपन्न होने की इक्का दुक्का ख़बरें आती रहती हैं
गुड़राब और गेहूँ का खीच/ खिचडा


 ‪#‎अक्षय‬तृतीया जिसे ‪#‎राजस्थान‬ में ‪#‎आखा‬ तीज भी कहते हैं  को विशेष  प्रसादी के भोजन में  बाजरे या  गेहूं का खिचड़ा गुड़राब(आटे को गुड के पानी में पकने तक उबालकर ) और आखी (साबुत ) मंगोड़ी की सब्जी , आखी ही गंवार फली धूणी दी हुई. गंवार फली को उबालकर उसके रेशे निकालकर बर्तन में जलता कोयला रख उसपर घी डाल कर (जिस भी मसाले की खुशबू उसमें डालनी हो वह भी साथ ही डाल देते हैं , मैं अजवाइन डालती हूँ ) ढक्कन से ढक देते हैं . कोयले के धुंए की भीनी भींनी खुशबू उसमें रच बस जाती है . ( जिन्होंने मास्टर शेफ देखा , वे भी सब्जियों को इस प्रकार सुगन्धित करना जान गए होंगे ).
परंपरा में अन्य खाद्य पदार्थों के अलावा  पांच बाटियां बनाकर रसोई में ऊपर आले में रख देने का भी रिवाज रहा जो वर्षपर्यन्त वहीँ रखी होती थी .  इसके पीछे भी रसोई/घर में अन्न के अक्षय भंडारण की कामना रही होती होगी .इन सभी परम्पराओं के पीछे नए अनाज का स्वागत  और नई फसल की तैयारी और शुभेच्छा भी रही है .
(एक और रोचक बात भी पता चली कि इस दिन छिपकली का दिखना शुभ होता है. इसका कोई आधार ज्ञात नहीं  ).
बीकानेर में यह दिन पतंग उत्सव का भी  होता है . जहाँ अन्य शहरों में संक्रांति के दिन छतें पतंगों के शोर से गुलजार होती हैं , इस दिन बीकानेर का भी वही आलम होता है .

धन धान्य , सुख शांति की अक्षय कामनाओं के साथ आप सबको भी अक्षय तृतीया की बहुत शुभकामनाएँ !

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

गाँव की छाँव में .....

एक घर के बाहर गाय भैंस बँधी देख कर बिलोनी की ताजा छाछ की खुशबू सी नथूनो से टकराई. वहीं मिट्टी में बर्तन साफ़ कर रही स्त्री से पूछा तो उसने ना में सर हिला दिया. साथ ही पास की कंटीली झाड़ियों  से घिरी बाड़ की ओर इशारा किया. मैं उधर बढ ही रही थी कि पास की दूसरी कोठरी से बच्चे को कांख में दबाये एक और स्त्री तेजी से पास आई.
 कुण न पूछो छ... (किसको खोज रहे हो )
किसी को नहीं. गाय भैंसे बँधी दिखी तो सोचा छाछ की पूछ लूँ.
अजी! आज तो म्हांक छाछ न लाध कोड़ई. संवारा बेगा आता तो फेर मिल जाती . मेलो भर लो नाप्ता म तो सब घरां म राबड़ी , पूआ , पकौड़ी  बण छ (आज तो हमारे यहाँ किसी भी घर में छाछ नहीं मिलेगी .सुबह जल्दी आते तो फिर भी मिल जाती . आज नापता में मेला भरेगा तो छाछ राबड़ी , पुआ पकौड़ी बना कर वहां ले जायेंगे.
अच्छा! फिर क्या करते हो .
मेला म खिना दया छ . भोग लाग लो उन्ड भैरुँजी क . खूब बढिया मेलो भर छ . थे भी देख र आजो घनो जोर को मेलो भर काईं चीज असी न मिल उन्ड. झूला भी (मेले में भेजेंगे . वहां भैरूं जी के भोग लगेगा . बहुत बढ़िया और बड़ा मेला होता है , ऐसी कोई चीज नहीं जो वहां नहीं मिले. झूला भी )
यह भोलापन ही तो ग्रामीणों का विशेष गुण  है . हालाँकि शहर की हवा का प्रभाव अब तक ग्राम और ग्रामीणों पर भी नजर आने लगा है मगर कुछ तो कहीं अब भी बचा ....
अच्छा और क्या होता है वहा अर थे क्युँ न गया...
उनकी जैसी ही मारवाड़ी बोलने की कोशिश करती हूँ
अब जान्व्ला. 4 बजे सिक जद मेलो जुड़ लो (हम चार बजे तक जायेंगे , जब मेला जुड़ेगा यानि भरेगा /लगेगा )
अंड स चार कोस ई छ . थे जार देख याओ .
ओह! मगर तब तक तो हमको लौट जाना होगा  हम तो अभी दो घंटे में वापस लौट जायेंगे , और मेला चार बजे भरेगा .
देख र जाजो . काल तो सन्वारा स ई जोर को भर लो(आप जरुर देखना . आज नहीं तो कल देख लेना , कल तो सुबह जल्दी ही भर जाएगा )
अब उसे  हमारे  लिए  थोड़ा दुःख  होने लगा कि हम मेला नही देख पायेंगे .

खैर!  घर की बिलोई हुई ताजा छाछ पीने की इच्छा मन में ही दबाये लौटने लगे थे कि एक और मकान के आगे गाय भैंसे बंधी हुई नजर आ गई . गाड़ी में पैर  धरते एक बार और आजमा लेने की सोच ही ली .
यहाँ खुले बड़े से मकान के अहाते में एक स्त्री तसले में राबड़ी ही खा रही थी .
छाछ मिल जायेगी क्या !
उसने अन्दर किसी अन्य स्त्री की ओर मुंह कर पूछा ... छाछ छ काईं (छाछ बची हुई है क्या उसका मतलब यह था ).
भीतर से स्वीकृति मिलने पर बेटी को दौड़ाया . गाड़ी में रखी पानी की एक बोतल खाली कर ले आई . छाछ का इन्तजार करते अपनी भी नजर दौड़ा ली चारों ओर. पक्के दो मंजिला मकान , मोटर साईकिलें ,, ट्रैक्टर , मार्शल गाड़ियाँ , कोटरियों में भरा अनाज , चारा समृद्धि की दास्ताँ स्वयम बयान कर रहा था . मगर रहन सहन वही खालिस देसी . ऊपर खिड़की से एक स्त्री मोटर साईकिल स्टार्ट कर रहे युवक को कुछ निर्देश दे रही थी कि पेट्रोल कितने का भरवाना है ... थोड़ी देर में उसी खिड़की पर दूसरी बुजुर्ग स्त्री का चेहरा नजर आया .
कुण ने पूछो छो!  (किसके लिए पूछ रहे हो मतलब कि क्या चाहिए  !! मैंने सोचा )
कांईं न ...(कुछ नहीं . भला हो इतने वर्षों में थोड़ी बहुत जयपुरी मारवाड़ी (ढूँढाढी) बोलना सीख गई हूँ .)
मैं आऊँ काईं (मैं आऊँ क्या )

मैं एकबारगी सोच में पड़ गई कि कहीं हमारा इस तरह वहां खड़े होकर चारों ओर देखना कहीं उसे बुरा लग रहा हो . फिर भी मैंने कह ही दिया कि आ जाओ .
वो फटाफट चलती हुई आईं .
फिर मैंने उन्हें विस्तार से बताया कि हम यहाँ पास के कॉलेज में आये थे . काम होने में अभी कुछ समय लगेगा इसलिये पास के गाँव में घूम रहे हैं . बड़ी प्रसन्न हो गईं . बेटी के सर पर हाथ फेरते उसकी पढाई के बारे में पूछने लगीं .
तब तक बोतल भर छाछ आ गई थीं . मगर उनकी बातें ख़त्म नहीं हो रहीं थीं .
अजी थान जिम्याँ बिना कोणी जाबा देता पण आज तो म्हांक पुआ पकौड़ी कोणी बनाया . म्हारा जेठुता की तबियत भौत ख़राब छ . स जना जैपर डागखाना लेर गया छ .
(हम आपको खाना खाए बिना नहीं जाने देते मगर आज हमारे यहाँ पुआ पकौड़ी नहीं बनी . क्योंकि मेरे जेठुते की तबियत ठीक नहीं है . उसे जयपुर दवाखाना लेकर गए हैं .)
डागखाना को मैंने डाकघर समझा मगर उलझन थी कि वहां क्यों . फिर सोचा शायद कोई हॉस्पिटल पोस्ट ऑफिस के पास होगा . मगर जब पतिदेव को बताया तो उन्होंने समझाया कि ये डागखाना दवाखाना को कह रही हैं .
मैं मोबाइल से एक दो फोटो खिंच रही थी तो देख कर बड़ी खुश हो गई .

फोटो लेओला काईं . (फोटो खिंचोंगे क्या )
 बड़ी ख़ुशी से खाट पर जा बैठीं . पास ही उनकी दोनों बहुएं भी खड़ी थीं जो हमारी बातचीत में शामिल हो गईं थी . तीनों ने बड़े उत्साह से फोटो खिंचवाई . एक बहु तो फोटो के लिए स्वेटर उतार कर आईं .


खटिया पर बैठी वे एक किस्सा भी सुना रही थी. कुछ समय पहले जयपुर से कुछ जने यहाँ जमीन खरीदने आये थे . अपने पैसों का बैग यहीं भूल गए . उनके जाने के बाद हमने देखा तो जीप को दौड़ाया उनके पीछे . पुलिया पर जाकर उनको पकड़ा . वे लोग वापस लौट कर आयी और हमारे लिए तालियाँ बजा कर ख़ुशी प्रकट की .
काफी देर हो चुकी थी . चतुराई , मक्कारी, स्वार्थपन शहर से गाँव की ओर बढ़ तो रहे हैं मगर फिर भी अभी कहीं कुछ भोलापन , आत्मीयता बची रहने की आश्वस्ति के साथ हम लौट पड़े .
 मन में विचार भी चल रहा था कि आस पास के गाँव तेजी से शहर की जद में आ रहे हैं . जाने अगली बार आना हो तो इस गाँव की सूरत क्या हो ....

(अहा ! ग्राम्य जीवन )

सोमवार, 9 मार्च 2015

यह नंबर अस्तित्व में क्यों नहीं है ....


रोज सुबह की तरह ही मोबाइल का अलार्म बजा और श्रीमान जी ने झट से दबा दिया बटन कि  अभी बस बजता ही जाएगा .अलसाया मन अलार्म की एक क्लिक पर कहाँ उठता है , कुछ मिनट के अंतर पर कई बार मधुर ध्वनि सुन लेने के बाद ही सुप्रभात संभव है . मगर आज अलार्म बंद करते ही अचानक  चौंकते हुए उठे , जिसको अलार्म समझ कर बंद किया , वह मोबाइल की रिंग टोन थी . किसका फोन आ रहा था , इतनी सुबह . घडी में समय देखा तो सुबह के तीन बजकर अठावन मिनिट हुए थे . 

इतनी सुबह फ़ोन और वह भी किसी के लैंड लाईन नंबर से . चिंता स्वाभाविक थी , आखिर इस समय कोई फ़ोन क्यों करेगा , किसी मदद की जरूरत थी  या कोई जरुरी सूचना थी , क्या सोचता होगा वह इंसान कि मैंने मदद के समय फोन काट दिया. जाने क्या -क्या विचार मन में डोलते रहे . थोड़ी देर इन्तजार होता रहा कि देखें , कहीं अगला दुबारा ही फ़ोन मिला ले . मगर लगभग दस पंद्रह मिनिट तक फ़ोन नहीं आने पर एक विचार मन में बना कि क्यों ना इसी नम्बर पर फोन कर पूछ लिया जाए . अब तो मोबाइल क्या लैंड लाईन फ़ोन पर भी इनकमिंग नंबर  दर्ज होने से मिस कॉल की सारी डिटेल मिल जाने की सुविधा रहती है . कही किसी ने गलती से ना मिला दिया हो., थोडा झिझकते हुए पुनः उसी नम्बर पर फोन किया तो उधर से आवाज़ आयी- यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है!   
अब तो होश फाख्ता होने ही थे . एक तो अनजान नंबर लैंड लाईन का और वह  भी इतनी सुबह और वह नम्बर अस्तित्व में ही नहीं है . कुछ वर्षों पूर्व ऐसी घटना की बहुत चर्चा रही थी कि कुछ ख़ास नंबर से फ़ोन पर किसी महिला के रोने , सिसकने की आवाज़ आती थी  मगर उसी नम्बर पर फ़ोन करने पर सुनाई देता था कि  यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है . भय और रोमांच मिश्रित एक सिहरन सी हुई . रहस्यमय कथाएं या फ़िल्में इसी प्रकार तो देखी - सुनी जाती हैं . भटकती आत्मा से दूरभाष पर साक्षात्कार का एक अविस्मरणीय पल घटे बिना  रह गया .
अनजाने ही सही क्या जरुरत थी बिना सुने ही कॉल ऑफ करने की .बार -बार यही अफ़सोस सताता रहा .
ओह ! हम भी किसी ऐसी रहस्यमय घटना के साक्षी होते रह गए क्या ..हालाँकि यह जानकारी तो थी कि कुछ वी आई पी नम्बर भी सिर्फ सुने जा सकते हैं. उन पर कॉल बैक नहीं किया जा सकता है. फिर भी रहस्य तो था ही कि आखिर यह फ़ोन हमारे पास क्यों आया . 

कैसे पता करें! किसका फोन नम्बर है! पड़ताल करते श्रीमान जी  बी एस एन एल की  वेबसाइट पर पहुंचे . यह भी अच्छा हुआ कि लैंड लाईन नंबर था वर्ना मोबाइल नम्बर की तो डाइरेक्टरी भी उपलब्ध नहीं होती . सर्च करने पर पता चला कि उक्त नम्बर उनके दफ्तर के सामने स्थित किसी सरकारी भवन का है। अब चिंता का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा था. जरुर किसी ने मदद के लिए फोन घुमाया होगा. मगर यदि ऐसा है तो नम्बर अस्तित्व में नहीं है क्यों सुन पड़ रहा है . छुट्टी का दिन था वरना ऑफिस जाकर ही माजरा जान आते . अब सोमवार का इन्तजार करने के सिवा चारा नहीं था . मगर दिन भर दिमाग में  यही उधेड़बुन चलती रही  , इतनी सुबह किसका फोन था , नम्बर क्यों नहीं लग रहा आदि -आदि . कई बार बच्चों से भी इस पर चर्चा हुई . अचानक शाम को चार बजे मोबाइल की आवाज़ पर बेटी ने उछलते हुए कहा - पापा , यह तो फिर से वही नंबर  है . सुबह से इतनी पड़ताल हो चुकी थी कि फोन नम्बर रट ही गया था . हम सबकी उत्सुकता भरी निगाहों से जानना चाह रहे थी कि आखिर यह रहस्यम कॉल किसकी है , किसकी हो सकती है। श्रीमान जी ने कॉल सुनते ही स्पीकर ऑन कर दिया . " यदि आपको जुखाम के साथ तेज बुखार ,सर में दर्द है तो स्वाईन फ्लू की जांच अवश्य करवा ले "  कम्प्युटराईज्ड ध्वनि में  स्वास्थ्य विभाग की जनहित चेतावनी जारी हो रही थी .  इस नंबर के अस्तित्व में नहीं होने की वज़ह समझ आ गयी .
धत्त तेरे की ...सारे रहस्य की ऐसी -तैसी हो गई . 
अब हमारी सरकार की मुस्तैदी का जवाब क्या है! भोर के चार बजे फोन से नागरिकों को स्वाईंन  फ्लू के खिलाफ चेता  रही है. सही भी है बीमारियाँ भोर अथवा शाम का समय देख कर थोड़े आती है . राहत भी हुई कि जनता को जागरूक करने के  सरकारी काम भी इतनी चुस्ती -फुर्ती से होते हैं . 
 पुरानी रहस्यमय घटनाओं के सन्दर्भ और स्रोत भी समझ आ गए कि  उक्त रहस्यमय घटनाओं  के पीछे किसी स्त्री की दारुण व्यथा नहीं , बल्कि उनके लिए ऐसे किसी नम्बर का प्रयोग कर शरारत ही रही होगी .
रहस्यमय संसार अचानक ही सामान्य सा लगने लग गया. ये भी कोई बात है भला !!