बुधवार, 23 मई 2012

एक कहानी

.........गतांक से आगे

वृंदा तो चुप रही मगर कृति बोले बिना नही रह सकी ..." पढ़े लिखे लोगों को भी पता नही यह बात कब समझ आएगी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अन्तर नहीं है । सही देखभाल और अवसर मिलने पर लड़कियां भी वो सब कुछ कर सकती हैं जो लड़के कर सकते हैं । अब तो लड़कियां अन्तरिक्ष तक भी जा पहुँची हैं। "
बेटी का मूड ख़राब होते देख वृंदा ने समझाया ..."अपने घर में तो ऐसा माहौल नहीं है ना... और फिर इतना बुरा लगता है तो ख़ुद को ऐसा बनाओ कि सभी कहें कि लड़कियां किसी मायने में लड़कों से कम नहीं है। "
यह सब बातचीत चल ही रही थी कि तब तक वृंदा के पति हर्ष भी वहां पहुँच गए और बेटी से थोड़ा रुक कर आराम करने के लिए कहने लगे।
" इस अपनी बेटी को संभालिये । मैं तो कह कर थक चुकी।  गर्व होता है वृंदा को अपने पति हर्ष पर। हर्ष ने ना सिर्फ़ हर कदम पर उसका साथ निभाया है वरन एक बहुत अच्छे पिता होने का फ़र्ज़ भी निभाया है। एक पुत्र होने की स्वाभाविक चाह और सामाजिक दबाव को दरकिनार रखते हुए उसने अपनी बेटियों को हमेशा अच्छी परवरिश दी है। उसके मार्गदर्शन और संरक्षणने बच्चों को अच्छे संस्कार और मजबूत आधार प्रदान किया है.
" क्यों बच्चे ...क्या हुआ..??
हर्ष ने कृति का हाथ पकड़कर साथ चलते हुएउसके उदास होते चेहरे को देखते हुए पुछा।
"कुछ नही पापा...यह देखिये ना..लोग कैसे प्रसाद का अनादर करते हुए चल रहे हैं" बात बदलते हुए कृति बोली।
रास्ते में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए प्रसाद के दोने बिखरे पड़े थे।
तभी फिर से कुछ महिलाओं ने आकर घेर लिया। राखी को दान करते देख अब यह महिलाएं और बच्चे और पैसे मिलने की चाह में उसके इर्द गिर्द ही मंडराते रहे थे। इस बार हर्ष को साथ देख बोली ..." बाई...तेरा जुग़ जुग़ जिए भाई ....कुछ तो हमें भी दे दे..."
अपने पीछे पड़े इस काफिले को देख कर अब तक राखी बहुत झुंझला चुकी थी। इस भीड़ भाड़ से निकलने की उसकी कवायद को देखते हुए कृति मुस्कुरा पड़ी ..." हाँ हाँ ...बुआ ...थोड़ा कुछ दान पुण्य और कर लो ...अजन्मे भतीजे के लिए तो इतना दान कर दिया ...सामने खड़े भाई के लिए कुछ नही करोगी." मां को घूरकर चुप रहने का इशारा करने को अनदेखा करते हुए भी कृति बोल पड़ी। अब झेंपने की बारी राखी की थी।
जय श्री राधे के जयघोष के साथ तेज क़दमों से सभी चल पड़े अपनी परिक्रमा पूरी करने।
जय श्री राधे ...!! जय श्री कृष्ण ...!!


.................गोवेर्धन यात्रा में बस इतना ही

जुग- जुग जिए मेरा पिया ...



आज करवा चौथ है ...इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में हड़कंप मचा हुआ है ...तरकीबें और तकनीकें बताई जा रही है ...अपनी पत्नी या बहू को इस व्रत के करने पर क्या तोहफा दिया जाए ...कैसे मदद की जाए ...
हद है ...!!

एक साधारण से व्रत का क्या बाजारीकरण किया गया है ...!!

हिंदू महिलाएं ज्यादातर व्रत अपने पति की लम्बी आयु और परिवार वालों की सुख समृद्धि  के लिए ही करती है फिर इस एक व्रत को लेकर इतना हंगामा क्यों ...जिसमे सबसे कम समय भूखा प्यासा रहना पड़ता है ...
राजस्थान में ज्यादातर महिलाएं वर्ष में चार चतुर्थियों पर व्रत रखती हैं ...
वैशाख , भाद्रप्रद , कार्तिक , माघ की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है ...सभी चौथ व्रत में पूजन विधि एक समान ही होती है ...बस उस व्रत में बनाये जाने वाले प्रसाद और व्रत कथा में अन्तर होता है ...इन चारों चतुर्थियों पर चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है .... कार्तिक चतुर्थी को अन्य चतुर्थियों के मुकाबले चाँद पृथ्वी के सबसे करीब होता है ...इसलिए चंद्र दर्शन इस दिन सबसे जल्दी होता है ...जबकि भाद्रप्रद चतुर्थी को चंद्र दर्शन बहुत देर से होता है ...वही मुश्किल से भी ...क्योंकि बरसात का मौसम होने से बादल छाए रहते हैं आकाश में ...कभी कभी तो पूरी रात चाँद के दर्शन नही होते ...महिलाएं दूसरे दिन सूर्य का दर्शन कर अपना व्रत खोलती हैं ...तो फिर इस करवा चौथ को ही इतना हो हल्ला क्यों ...!!

करवा चतुर्थी के व्रत को लेकर और भी बहुत भ्रांतियां है ...बहुधा टेलीविजन धारावाहिकों में करवा चौथ की रस्म में चलनी से चाँद देख कर पूजा करना दिखाया जाता है ...और फिर पति की आरती भी ...क्यों भाई ...कोई रणक्षेत्र में जा रहे हैं वे ...हमारी संस्कृति में तो पति की आरती बस रणक्षेत्र में जाने पर ही होती है ...शेष अवसरों पर बहने ही आरती किया करती हैं पत्निया नही ...

करवा चतुर्थी की व्रत कथा में स्पष्ट उल्लेख है " सात भाइयों की एक ही बहन थी और उसे पहली बार व्रत करते देख भाई भाभी बहुत परेशान थे ...भूख प्यास से व्याकुल बहन को बहलाने के लिए कृत्रिम रौशनी को चलनी से दिखा कर चाँद का भ्रम दिया गया ...और इस कारण ही उसका व्रत भंग हुआ ..." जब कथा में इस प्रकार व्रत भंग हुआ तो फिर इसे प्रथा के रूप में कैसे स्वीकार किया गया ...समझ से परे हैं ...हम राजस्थानी स्त्रियाँ चाँद को चलनी में नही देखती ...ना ही पति की आरती करती हैं ...जैसा राजस्थान की संस्कृति दिखाते धारावाहिकों में दिखाया जाता है ....हाँ ...पति को चरण स्पर्श जरुर करती हैं ...!!

रही बात पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलने की तो ...जहाँ बहुएं घर की बुजुर्ग महिलाओं तक से परदा करती रही हैं ...उनके सामने पति से बात तक नही करती थी ...घूँघट में रहती रही हैं ...वहां पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलने जैसी रस्म किस तरह सम्भव है ...यह भी मेरी तुच्छ बुद्धि से समझ से बाहर की बात है.... राजस्थान में करवा चतुर्थी के अवसर पर घर की बड़ी महिलाएं सास , जिठाणी , ननद आदि ही पानी पिला कर व्रत खुलवाती हैं....एकल परिवार होने के कारण कई बार आस पास की बुजुर्ग महिलाएं भी यह कार्य कर देती हैं ...हाँ ...अब धारावाहिकों और फिल्मों के चलते कई घरों में पति इस प्रकार व्रत खुलवाने लगे हैं ...

प्रथाओं में समय के साथ परिवर्तन होता है ...इसमे कोई शक नही ...मगर तकलीफ तब होती है जब इसे हमारी संस्कृति के प्रचार के तौर पर दिखाया जाता है ....पति -पत्नी के स्वाभाविक प्रेम को बाजारीकरण में बदलते संस्कृति के नाम पर कूड़ा परोसते इन धारावाहिकों और फिल्मों पर मुझे तो सख्त ऐतराज़ है .....!!

करवा चतुर्थी सबके लिए शुभ हो ...मंगलकारी हो ....!!


और ...अब पति -पत्नी के संसार ,घर- बार , प्यार पर एक बहुत ही खूबसूरत गीत ..

तेरे लिए पलकों की झालर बुनूं
कलियों सा गजरे में बांधे फिरूं
धूप लगे जहाँ तुझे छाया बनूँ
आजा साजना ...तेरे लिए पलकों की ........

महकी महकी ये रात है ,बहकी बहकी हर बात है
लाजों मरूं झूमे जिया , कैसे ये मैं कहूँ
आजा साजना ...तेरे लिए पलकों की ...

नया नया संसार है , तू ही मेरा घर बार है
जैसे रखे ख़ुशी खुशी वैसे ही मैं रहूँ ,
आजा साजना .....तेरे लिए पलकों की ...

प्यार मेरा तेरी जीत हैं , सबसे अच्छा मेरा मीत है
तेरे लिए रूप लिया , तेरे लिए ही हसूँ
आजा साजना ...तेरे लिए पलकों की ...

सुने और देखे यहाँ यू टयूब के सौजन्य से 
 http://www.youtube.com/watch?v=dOeyU0tF0Cg
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आपका नाम क्या है!.......थैंक्स ,राम !(2)

थैंक्स, राम ! से आगे ....


दूसरी ओर फोन पर आर्णव हमेशा की तरह अस्तव्यस्त ..."मेरी चौकलेटी शर्ट नहीं मिल रही , और वो पीली फाईल भी "
अब 2000 किलोमीटर की दूरी से भी मैं तुम्हे ये बताऊँ कि तुम्हारी कौन सी चीज कहाँ रखी है ?
अंजना को खीझ होनी चाहिए थी , मगर वह मुस्कुरा रही थी ...वह आर्णव की उस पर निर्भरता के इन पलों को बहुत इंजॉय करती है .

कहता है आर्णव ..."तुम लड़कियां बहुत चतुर होती हो ...अपनी जड़ें छूटने का पूरा बदला हम बेचारे मासूम लड़कों से लेते हुए हमारी हर एक चीज , हर एक आदत पर अपना अधिकार जमाते हुए अपनी मर्जी से बनाती , बिगाड़ देती हो ... तुमने भी मेरी सारी आदतें बिगाड़ दी है , मैं अपनी सब चीजें व्यवस्थित रखता था , अब मुझे अपने हर काम के लिए तुम पर निर्भर होना पड़ता है "
अंजना में नहले पर दहला मारने से नहीं चूकती ," पता है मुझे ,तुम्हारा व्यवस्थित रहना कैसा होता था ...एक सूटकेस में कुछ जोड़ी कपड़े , फालतू के कागज़ , ज्यादा हुआ तो एक परफ्यूम की बॉटल ...अलमारी , ताकों पर बेकार के कागजों का ढेर , जिन पर मनों धूल जमी होती थी ... शुक्र मानो , तुम्हे घर में रहना हम लड़कियां ही सिखाती हैं, वरना तुम्हारे लिए घर और जंगल में क्या अंतर होता है..."

खुद के प्रति लापरवाह आर्णव... ताजा खाना फ्रिज में ठूंस कर आई थी ,उसके अलावा मठरियां , लड्डू भी ...जानती है , हर काम इत्मीनान से करने वाले आर्णव को बस खाना ठीक से खाने की फुर्सत नहीं होती ...रोज ऑफिस के लिए घर से निकलने से पहले खाने की थाली लिए उसके पीछे चक्कर काटना पड़ता है ...कई बार झुंझलाती है अंजना , खाना तो ढंग से बैठ कर खा लो मगर हमेशा की तरह आर्णव का वही गीत..." आज फिर देर हो गयी है "...

जब स्कूल में उसकी मोर्निंग शिफ्ट शुरू हो जाती है तो स्टाफ रूम से फोन पर आर्णव को खाना ठीक से खा लेने को कहते हुए वह एक नजर उसकी साथी शिक्षिकाओं को कोहनियों से एक दूसरे को टोहका मारते देख आँखें तरेर देती है ...नारी  जागृति  मंच से जुडी मिशेल कई बार ताना मारती है " तुम्हारी जैसी नारियां तो मेरे नारी सशक्तिकरण मंच की हवा ही निकाल कर रख देंगी , तुम्हारा पति कोइ बच्चा है ??"
" अरे बाबा , जिससे प्यार करते हैं , उसकी चिंता तो रहती ही है, ये नारी ,पुरुष की बात नहीं है ना ..." अंजना मुस्कुराने  लगती  थी ...

"तुमने नाश्ता किया या नहीं"
"नहीं , ऑफिस में ले लूँगा"
"इतना कुछ बना कर आई हूँ .थोडा तो खा लेते , कितनी तेज गर्मी है , भूखे पेट घर से मत निकलो "
"तुम कब लौट रही हो अपने घर"
"काकी से कह देती हूँ , एक दिन में ही सारी रस्में निपटा दे" चिढ़ा रही थी अंजना ... "अच्छा सुनो , राशिका जी के परिचित का सामान पहुंचा दिया"
"वही देने तो आई हूँ , यही पास में ही लीना का घर भी है , उसे लेते हुए घर लौटना है"
"अच्छी तरह चल रही है शादी की तैयारियां??"
"हाँ , बस तुम्हरी कमी लग रही है , सब पूछ रहे थे कंवर साहब क्यों नहीं आये ,"
"तुम जानती तो हो , औडिट का काम चल रहा है , मैं नहीं सकता था ...शादी के माहौल को एन्जॉय करो और जल्दी लौटो "....
"बाय.. टेक केअर"
आर्णव की कलिग राशिका जी का ससुराल भी यहीं था  ...लम्बी दूरी पर रहने वाले परिचित जैसे सामान पहुँचाने वालों की ताक में ही रहते हैं , जैसे ही पता चलता है कि कोई उनके शहर जाने वाला है , लाने और ले जाने वाले सामान या उसकी लिस्ट के साथ हाज़िर हो जाते हैं ...आरामदायक यात्रा के लिए कम से कम सामान ढ़ोने का आपका सपना साकार होने से पहले ही ढह जाता है ...दूरियों के मारे स्नेह से भीगते लोगों को इनकार भी तो नहीं किया जा सकता ...खुद काकी ने कई बार परिचितों के माध्यम से उसके लिए ख़ास हैदराबादी नान खटाई , टमाटर और इमली की खट्टी चटनी के साथ कई प्रकार के लहसुनिया अचार भेजे हैं उसके लिए !
राशिका जी का सामान पहुंचा कर अंजना फटाफट लीना के घर पहुंची ...लीना यूँ तो उसकी रिश्तेदार है , मगर साथ ही अच्छी सहेली भी है...अंजना के हैदराबाद पहुँचते ही धमकी भरा फ़ोन खुड़का दिया ,
" तुम रही हो या मैं जाऊं , चूल्हे पर चढ़ी दाल और आटे में डला पानी यूँ ही छोड़ कर "
भरोसा नहीं है लीना का , उसी हाल में घर छोड़ कर भागी आये ...
" तुम्हारे पड़ोस में ही काम है मुझे , मैं ही आती हूँ , मगर जरा फ्रेश तो हो लूं , तुम तैयार रहना , साथ ही लौटेंगे संगीत में ...
काकी को सामान अर्जेंट पहुंचा कर जल्दी लौटने का वास्ता देकर बड़ी मुश्किल से मनाया ...
"एक तो ऐन टाइम पर पहुंची हो , अब घूमने चल दी ....बहू के घर आज मेहंदी की रस्म है , वहां भेजे जाने वाले गहने ,कपड़े तो देख ले ...सब तो तैयारी हो गयी है , बस बहू की छोटी बहन के लिए कुछ लाना रह गया था '...

"आपकी तैयारी है तो सब कुछ परफेक्ट ही होगा , फिर भी जो रह गया है मैं लीना के साथ मार्केट से ले आउंगी ...क्या लाना है , साडी या सलवार कमीज" ...
"तू देख ले , जो तुझे पसंद हो ,ले आना , मगर समय से लौटना , फिर हमें यहाँ से मैरिज हौल भी जाना है , तू कुछ रिहर्सल भी कर लेती महिला संगीत के लिए"

हंसी आती है अंजना को , मेहंदी लगाते महिलाओं की हंसी -ठिठोली के बीच गाये जाने वाले विवाह गीतों का स्थान एक- एक कर स्टेज पर फ़िल्मी गीतों पर नृत्य कला के प्रदर्शन ने ले लिया है ..
उसे याद आया ...महिला संगीत में बहनों की ओर से क्या बांटा जाएगा ...सीमा से पूछा उसने ," जीजी, मैं ले आई हूँ , आप निश्चिन्त रहें "
ठीक है , कितने रूपये देने हैं , मुझसे ले लेना ...अभी तो मैं भागती हूँ , फिर जल्दी लौटना भी है ...और वह रिक्शे में बैठ कर चली आये लीना से मिलने ...

"कहाँ है तेरी जली हुई दाल ,फ़ोन पर तो यूँ दिखा रही थी कि बेचारी गृहस्थी के बोझ से दबी जा रही है , देख रही हूँ कि तेरा खुद का बोझ कितना बढ़ गया है " लीना से गले मिलते उसके बढ़ते मोटापे की ओर इशारा किया अंजना ने ...

"ओये नजर मत लगा , खाते -पीते घर के हैं हम" ... गले मिलते लीना ने धौल जमा दिया उसकी पीठ पर
"हाँ , मासी तो तुझे कुछ खिलाती- पिलाती नहीं थी "....लीना की माँ को अंजना मौसी ही कहती थी .
दोनों सहेलियां चाय की चुस्कियों के बीच एक दूसरे के परिवारों के हालचाल पूछती बतियाने लगी ...

चल अब तू जल्दी कर . थोड़ी शॉपिंग करते हुए लौटना है घर ...सभी इंतज़ार कर रहे हैं वहां ...अंजना ने बाजार से ख़रीदे जाने वाले सामान की लिस्ट निकाली...
"यह सब तो यही पास में मिल जाएगा , तुझे याद है, वो किराये का मकान जिसमे हम रहा करते थे ...उस पूरे बाड़े को गिराकर एक नया शॉपिंग काम्प्लेक्स बना दिया गया है , वही कर लेते हैं सारी शॉपिंग "लीना ने लिस्ट पर नजर डालते हुए कहा ...

बाड़ा , एक बड़ी सी धर्मशाला रही होगी कभी ...किसी पुराने मारवाड़ी सेठ की बनवाई हुई ...शादियों में बारात को रुकवाने या शहर घूमने आये अतिथियों के सस्ते और आरामदायक निवास के लिए शहर में कई स्थानों पर धन्ना सेठों द्वारा धर्मशालाएं बनाई गयी थी , मगर समय के साथ इन धर्मशालाओं को नौकरी पेशा लोगों के रहने के लिए किराये पर दिया जाने लगा ...उसी बाड़े के एक हिस्से में लीना रहती थी अपनी माँ के साथ ...लीना के जन्म के कुछ समय बाद ही कम उम्र में विधवा हुई उसकी माँ ने बड़ी मुश्किलों के बीच उसका पालन पोषण किया ...पति के जाने के बाद ससुराल से ठुकराई छोटी दुधमुंही बच्ची को गोद में लिए मायके आ तो गयी थी मासी , मगर भाई -भाभियों पर बोझ बन जाना उसे मंजूर नहीं था ...बहुत जिद करने पर उसके भाई ने ही अपनी परिचित द्वारा उस बाड़े में मामूली से किराये पर आजीवन रहने का बंदोबस्त कर दिया था , मासी ने दूसरों के कपडे सिलते , खाना बनाते , पापड़ मंगोड़ी बना कर बेचते हुए भी लीना के लिए हर प्रकार की सुविधाएँ जुटाने में कोई कसर नहीं रखी थी ...मगर पिता के साये से महरूम लीना को पढने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी , उसकी दुनिया सजना संवरना , फ़िल्में देखना और बस पूरे बाड़े में उछल कूद मचाये रखना ...

मित्रता मित्र के गुण -अवगुण से परे होती है , एक सामान विचारों अथवा स्वभाव का होना वांछनीय नहीं है ...कई बार लगता है उसे, बाकी रिश्तों की तरह मित्रता भी ईश्वर ही तय करता है वर्ना कहाँ अंजना जैसी धीर, गंभीर,  ज़हीन  और सादगी पसंद लड़की , किताबें जिसके हाथ से छूटती नहीं और कहाँ किताबों के नाम से ही दूर भागने वाली फैशन परस्त लीना ...कोई जोड़ नहीं था दोनों का , मगर फिर भी उनके बीच अच्छी मित्रता थी.
कुछ ही देर में दोनों सखियाँ शॉपिंग काम्प्लेक्स में दाखिल हो रही थी ...उसकी आधुनिक साजसज्जा देख कर यकीन ही नहीं कर सकता कोई कि यहाँ कोई पुरानी धर्मशाला रही होगी, जिसकी सीढियों पर दर्जन भर परिवारों की आवाजाही रहती होगी , नीचे एक कोने में दूध की डेयरी जहाँ कुछ भैंसे भी बंधी होती थी ...

" कुछ याद आया " लीना छेड़ रही थी उसे ...देख यहाँ कही दीवारों पर तेरा नाम तो नहीं ...
तू सुधरने वाली नहीं है ...
एस्केलेटर से सीढियाँ उतरते उसकी धीमी खटर पटर में सुना अंजना ने ..." आपका नाम क्या है "
चौंक कर देखा इधर -उधर ... कोई नहीं था ...लीना की शैतान मुस्कराहट अंजना को भी संक्रमित कर रही थी ...वह भी धीमे से मुस्कुराने लगी ।
मगर तब वह इस तरह मुस्कुराई नहीं थी ...
गुस्से से लाल- भभूका हो गया था उसका चेहरा , जब राह चलते एक किशोर ने रोक कर उससे पूछ लिया....
" आपका नाम क्या है " अंजना के बिगड़े मूड को देख कर लीना ने उसकी हथेलियाँ अपने हाथ में कसकर दबा ली थी ...



क्यों गुस्सा हो गयी थी अंजना इस कदर , नाम क्यों पूछा उससे किसी अनजान शख्स ने ...
क्रमशः

थैंक्स राम .......(4)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन से आगे ....



महिला संगीत का आयोजन एक बड़े हॉल में था ...पहली बार मिली अंजना होने वाली भाभी से ...ट्रेडिशनल लहंगा ओढ़नी में प्यारी हंसमुख गुडिया- सी लगी ...लीना और अंजना बांह पकड़कर खींच लाई भाई को और होने वाली भाभी को भी  ...कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मां ने अंजना को टोका ..." आंजलि नहीं भरनी है ? "
भूल गयी थी अंजना ,हालाँकि घर लौटते समय मिठाई , पान और माला खरीद ली थी , आखिर माँ ने ही सलाह दी ...कोई बात नहीं , अभी जब वारना करेंगे तब भर देना ...

बीच चौक में कुर्सी पर बैठाया भाई को और उसकी गोद में सूखे मेवे , बतासे , मिठाई और पैसे रख पान का बीड़ा पकड़ा दिया ...घर में उपस्थित सभी महिलाएं दो ग्रुप बना कर दोनों ओर खड़ी हो गयी और फिर उनके बीच शुरू हो गयी दोहों की प्रतियोगिता ..आधुनिक अंदाज़ में महिला संगीत में फ़िल्मी गानों पर नृत्य की धूम के बाद पारंपरिक अन्ताक्षरी का सा लुत्फ़ , गर्व हुआ उसे ...आधुनिकता ने पारंपरिक उत्साह को लजाया नहीं था ...

" एडी म्हारी उजली जी ,कोई फाबो सूंतवा सूंठ
ऐसी चालूं ठुमकती जी कोई रंडुआ छाती कूट "

के जवाब में दूसरी ओर से आया सनसनाता तीर ...

" चार कूंट को नातनो जी कोई बांध्या मूंग मरोड़
पाड़ोसिया को डावड़ो जी कोई रह गयो मूंछ मरोड़ "

अंजना अपने ग्रुप का उत्साह बढ़ाते हुए दोहे याद दिला रही थी ..."

छह छल्ला छह मूँदडी जी कोई छल्ला भरी परात
एक छल्ला का कारण से कोई छोड्या माँ अर बाप !

गीत गाते आँखें भर आई माँ की , अंजना माँ के पास खिसक आई ..पलकों में रुका बाँध आंसुओं की राह निकल पड़ा ...बड़ी काकी भी अंजना के सिर पर हाथ फेरती सिसक पड़ी, ब्याह की रौनक तो छोरियां सा ही है ..वल्लभ का ब्याह में कोणी आई ...
याद आया अंजना को ...वल्लभ की शादी के बाद लौटते पापा कुछ देर के लिए उसके शहर आये थे ...जितनी देर  रुके   , टैक्सी बाहर खड़ी रही , उन्हें तुरंत लौटना था ..कल ज़रूरी मीटिंग है दिल्ली में , बस तुझे देखने की इच्छा हुई तो चला आया ,शादी में सब तुझे बहुत याद कर रहे थे , तेरी काकी की भी आँखें भर आई थी ..."छोरिय कोणी आई "

...अंजना को सहसा यकीन नहीं हुआ था ..दो बेटों की गर्विता माँ पुत्रवती होने के गर्व से तनी रहती थी " छोरियां हो जाव तो नाक कट जाव "..माँ को कितनी बार ताना दिया होगा उन्होंने ...माँ कुछ कहती नहीं थी , अंजना के बिफर पड़ने से पहले बस उसे अपने अंक में समेट लेती थी ...एक दिन पता चलेगा इन्हें कि बेटी की माँ होने का मतलब क्या होता है , उन काकी के बारे में यह सुनकर उसने अनुमान लगाया , आज माँ का गर्वीली मुस्कान से चेहरा खिल उठा होगा ...

पापा के जाने के बाद परिवार में पहला शुभ कार्य हो रहा था ...उन्हें याद कर सबकी आँखें एक साथ भर आयी ..
मारवाड़ म छोरियां स सीख जावा , आज कसी रोळ मचा राखी है , बड़ी बुआ माँ से कह रही थी , सुना अंजना ने ...लीना ने उनके मुंह की बात लपक ली ..." और क्या बुआ ...हमारी वियोगिनी मीरा का सलोनी राधा में कायांतर हो चुका है ...मेरी शादी में कितनी मुश्किल से मनाया था इसे "..

लीना की शादी अचानक ही तय हुई थी ...अंजना को अपने माता पिता के पास असाम लौट जाना था ...उसके पिता वहां एक चाय बगान में प्रशासनिक पद पर कार्यरत थे ... उत्तर पूर्वी राज्यों में स्थानीय निवासियों में प्रवासियों को विशेषकर मारवाड़ियों को लेकर बहुत आक्रोश था , आये दिन होने वाले उपद्रव के बीच चिंतित माता- पिता ने उसे अभी कुछ और दिन हैदराबाद ही रुकने की सलाह दी थी ...राजमंद्री से मौसी का फोन था ...बस हमेशा अपने ददिहाल के परिवार से मिल कर ही चले जाना है तुझे , हम तो जैसे कुछ लगते ही नहीं तेरे , इस बार कुछ नहीं सुनूंगी तेरी , विकास को भेज रही हूँ लिवाने ...दूसरे दिन ही आ गया था विकास , उसे जाना पड़ा ...अपने हमउम्र भाई-बहनों के बीच खूब मन लगा उसका , दो सप्ताह कैसे बीत गाये , पता ही नहीं चला ...विदा करते मौसी भावुक हो गयी थी ," आती -जाती रहा करो"...

हैदराबाद लौटने पर पता चला कि इस बीच लीना का रिश्ता तय हो गया था ...किसी समारोह में देखा था उसे निखिल के परिवारवालों ने और नेवी में कार्यरत अपने बेटे के लिए हाथ मांग लिया था लीना का ...मासी इनकार करती भी तो कैसे , अच्छा परिवार , अच्छी नौकरी ...वह हैरान थी क्या लीना भी राजी है इस रिश्ते के लिए ...काकी ने उसे झिड़क- सा दिया ," और क्या चाहिए था , इतना अच्छा रिश्ता है , लड़का भी देखने में ठीक- ठाक है "
दूसरे दिन सुबह सवेरे ही जा पहुंची थी लीना के घर ...पूरा घर अस्तव्यस्त ,सामान से अटा पड़ा था ...सही मौके पर आयी , मासी ने उसे बाँहों में भर लिया...अच्छा परिवार मिल गया , मैंने सोचा की इस रिश्ते को चूकना ठीक नहीं ...
मगर मासी इतनी जल्दी में ...
हाँ , अच्छा खासा लड़का है , लीना भी मिल चुकी है ..जल्दी क्या बेटा , बेटियों को तो एक दिन पराया होना ही है , लड़का नेवी में हैं , वहां जाने से पहले उसके पेरेंट्स शादी कर देना चाहते हैं ..परसों सगाई है और पंद्रह दिन बाद शादी ...
लीना , तू खुश तो है ...
हां रे , ऐसे क्यों पूछ रही है ...
नहीं , वो ...उस दिन ...वो लड़का ...अंजना अटक रही थी ...
क्या वो लड़का ,छोड़ उसे ...

कुछ कही तड़क गया , छोड़ना इतना आसान !! वही उसे तसल्ली भी थी कि लीना खुश है ...
अगले पंद्रह दिन पलक झपकते ही गुजरने थे ...लीना की चंडाल चौकड़ी(सत्या , पूर्णिमा , ख़ुशी , गीतांजलि ,विनय , ) रात -दिन मुस्तैद रहती थी वहीँ ,रामदास और राजू भी उनके साथ लगे रहते ...मासी को घबराते देख उन्होंने पूरा जिम्मा खुद पर ले लिया था ...कैटरिंग , हलवाई , टेंट के साथ ही दहेज़ में दिए जाने वाले सारे सामान की खरीददारी , पैकिंग ...लीना ने काकी से मिन्नत कर कुछ दिन उसे अपने पास ही रोक लिया था ...दिन भर खरीददारी , फिर शाम को पैकिंग करना , ऐनवक्त पर अफरातफरी से बचने के लिए  सामान   को क्रमवार जमाना और फिर मिलकर सबके लिए खाना पकाना ...उन लोगों ने मासी को परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी ...मासी की कई बार आँखें भर आती ...तुम लोग नहीं होते तो मैं कैसे कर पाती यह सब कुछ ...

एक दिन शाम को सामान की लिस्ट चेक करती , दिन भर के खर्चों का ब्यौरा लिखती मासी के पास बैठी थी अंजना , बाकि लड़कियां खाना बनाते चुहलबाजी में लगी थी ...मासी ने तकिये का सहारा लेते हुए पैर सीधे कर लिए ...थक गयी थी ...तभी रामदास आकर मासी के पास बैठ गया ... मासी , आपके पैर दबा दूं कहता हुआ सचुमच ही उनके पैर दबाने लगा ...
तू दबा ले पैर , मगर इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है ..
मौसी उसे आँखें दिखा रही थी , एक चोर मुस्कान उसने सभी के चेहरे पर देखी , उसे माजरा समझ नहीं आया ...

गेलो पग दाबता कठई गलो भी दबा देव , मासी ध्यान राखजो ...(पागल कहीं पैर दबाते हुए गला दबा दे, ध्यान रखना )सबके सामने व्यक्तिगत बात करते समय मासी से मारवाड़ी में बात करती थी अंजना और लीना ..

क्या बोला मासी , मुझे समझ नहीं आया !
जब ये सब लोग तेलगु में बात करते हैं तो मैं पूछती हूँ कभी कि क्या बोला , समझा दो मासी ...

उनकी अप्रत्यक्ष नोंक झोंक चलती रहती थी ...नाम पूछने वाले हादसे के बाद रामू की कभी हिम्मत नहीं हुई उससे सीधे बात करने की ...पता नहीं तेलगु में क्या गिटर- पिटर करता रहता मीना से , वह कई बार लीना से उलझ जाती " मैनर्स नहीं हैं तुम लोगों में , जानते हो, मुझे तेलगु नहीं आती , फिर भी उसी भाषा में बात करते हो ,"
रामू ने ऐसे हीएक दिन एक कागज -पेन लाकर लीना को देते हुए कुछ कहा ...लीना ने कागज सरका दिया उसके आगे ," देखना , जरा ये प्रॉब्लम सोल्व कर दे , मैंने तो मैथ्स पढ़ी नहीं है "
उसने देखा  ट्रिग्नोमैट्री   का कोई सवाल था , उसका मनपसंद विषय ...उत्साह से ले लिया कागज.
तू इसे सोल्व कर मैं आती हूँ अभी ...लीना रामू के साथ बाहर चली गयी .

ये क्या हो गया है मुझे , सब कुछ ब्लैंक , ये आसान- सा सवाल मुझसे हल नहीं हो रहा ...दिमाग में अजीब -सी बेचैनी महसूस की उसने ...सर को हाथों से पकड़ कर दीवार के सहारे सरक गयी ...क्या हो रहा है ... बेबसी में कुछ बूँदें आंसुओं की ढलक पड़ी , कागज भी गीला होने लगा !

अंजना को इस हाल में देख लीना घबरा गयी ...

क्या हुआ अंजू , तू ठीक तो है ...छोड़ ये सब ...उसके हाथ से छीनते हुए उसने कागज- पेन फेंक दिया !

कुछ नहीं , सिर में बहुत अजीब -सा लग रहा है , जैसे मैं सब पढ़ा- लिखा भूल गयी हूँ !
हो जाता है कभी -कभी , तू आराम कर ले थोड़ी देर , इधर बहुत भाग दौड़ हो गयी ...बहुत परेशान कर रही हूँ ना मैं तुम सबको .

अंजना तकिये का सहारा लेकर लेट गयी , पता नहीं कब उसे नींद आ गयी ..उठी तो शाम का धुंधलका हो चुका था ...
मुझे उठाया नहीं , कितनी देर तक सोती रही मैं ..सबको अपने काम में लगे देख एक अपराध बोध महसूस किया उसने .

कोई गल्ल नहीं है जी ,अब बाकी का काम आप ही कर लेना ...सत्या ने कहा .आज से विनायक के गीत शुरू होंगे शाम को , नाच, गाना , मस्ती सब तुझे ही करने होंगे ...

चुप कर , ये नाच ,गाना, मस्ती तुझे ही मुबारक ...मैं तो दर्शक ही रहूंगी .

और सचमुच उस रात खूब धमाल हुआ ...पधारों म्हारा घरां विनायक के साथ काल्यो कूद पड्यो , टूटी बाजूबंद री लूम जैसे मारवाड़ी गीत तो गुजराती गरबा , पंजाबी गिद्धा , भांगड़ा सब एक साथ ..अंजना चुपचाप बैठी देखती रही , उसे इनमे कोई रूचि नहीं थी ..
दूसरे दिन सगाई का कार्यक्रम था ...लीना के ससुराल जाना था शगुन लेकर और अंगूठी पहनने की रस्म भी वही अदा होनी थी ...यूँ तो दुल्हन का शादी से पहले जाने का रिवाज़ नहीं था , मगर लीना के ससुराल वालों ने नई पहल करते हुए लीना को भी वहीँ बुलवा लिया था ...उस दिन काकी ने सौगंध दी अंजना को ...समाज का काम है , सौ लोंग इकट्ठे होंगे ...आज मैं तेरी नहीं सुनूंगी , बिंदी लगाएगी और बालों में फूल भी , साड़ी नहीं पहने तो कोइ बात नहीं , मगर मेरी इतनी बात तो तुझे माननी ही पड़ेगी ...
ओह! एक निःश्वास छोड़ी थी अंजना ने ...ये क्या रिवाज़ है यहाँ का , लड़कियों को बिंदी लगाना जरूरी है ...हल्के रंग के सादा चूड़ीदार कमीज के साथ बिना बिंदी के देख कई बार टोका था ...एक बार तो ट्रेन में गोरे चिट्टे भाई और बिंदी और फूलों से सजी सांवली भाभी के साथ अंजना को देख एक दक्षिण भारतीय परिवार ने भाभी को टोक दिया था ,"आपकी लव मैरिज है ...शादी मुस्लिम परिवार में हुई है क्या , ये दोनों भाई -बहन एक जैसे दिखते हैं , आप अलग हो "..भाभी ने बाद में बताया था और इस पर वे तीनों देर तक हँसते रहे थे ...

अंजना ने काकी की बात मान ली , दिन भर सिर पर भारी बोझ महसूस होता रहा था मगर काकी खुश थी , आज तूने मेरा मान रख लिया !

अंजना और लीना खोयी थी उन दिनों की याद में कि वल्लभ उनका हाथ पकड़कर तेज धुन पर झूमते भाई बहनों के बीच खींच लाया .....काका झूठ मूठ गुस्सा दिखाते हर कह रहे थे ..." दिन भर नाच गाना , मन नहीं भरा तुम लोगों का अभी " मगर सभी बच्चों ने उन्हें भी खींच लिया तो वे खुद को भी थिरकने से रोक नहीं पाए!

क्रमशः ...

थैंक्स राम ! (1)

अन्जना कई वर्षों के बाद लौट आयी थी इस शहर मे ...गगनचुम्बी अट्टालिकाएं और उन पर लगे बड़े- बड़े होर्डिंग्स ,घुप्प अँधेरी रात में भी रौशनी से जगमगाता निजामों का शहर हैदराबाद ... प्राचीन धरोहरों को बड़े करीने से संभाले यह शहर पुरातन और आधुनिकता का अनोखा संगम है ...जहाँ गुलजार हौज़ , शमशेरगंज , बेगम बाज़ार , सहित शहर की तंग गलियों में क्रिकेट की बॉल के साथ जूझते बच्चे तो वहीं आबिद रोड की चौड़ी सड़कों पर फ़र्राट बाईक दौडाते भी ...

चारमीनार के पास से गुजरते उसके चारों ओर ट्रैफिक की रेलमपेल , भेलपुरी ,कट्लीस , डोसा , आमलेट की बंडीयां (थडीयां ), बांह भर हरी -लाल चूड़ियाँ खनकाती काले  क्रीमी   नकाब से झांकती सिर्फ़ आँखें , वहीँ चार मीनार के पास सड़कों के किनारे पर स्वादिष्ट चाट के चटकारे लेती महिलाएं , उसे याद है, शाम को घर से पैदल घूमते चारमिनार तक चक्कर काट आना ...  भेलपुरी , चाट का स्वाद , जीभ पर खट्टा -मीठा सा स्वाद तैर आया ...

लाड़ बाजार मे लाख के जडाऊ कड़ों का मोल -भाव करती दर्जन भर महिलाएं ...कुछ भी तो नहीं बदला था ...पत्थर गट्टी पर मोतियों के जगमगाते शो रुम के बीच अलग प्रभाव जमाता गार्डेन वरेली शोरुम , सड़क के दूसरे किनारे पर रेडीमेड सलवार कमीज ,मैचिंग दुपट्टे की छोटी दुकाने पीछे छोड़ता हुआ उसका रिक्शा आगे बढ़ रहा था ....उसे याद आया काकी के साथ छोटे भाईओं को उनके मिशन स्कूल से लेकर लौटते अनगिनत बार यहीं पेड़ के नीच गन्ने का जूस पिया जाता  था , गुलज़ार हौज़ से घर की और पैदल ही लौटते दुकानों के बाहर चिल्ला कर ग्राहकों को आमंत्रित करते ,
" देख लो दीदी , नयी डिजाईन के सलवार कमीज है ,या अम्मा ऐसे क्या करते , देख तो लो , नहीं जमे तो नक्को होना बोल देना "
कई बार पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता था ...
काकी ठसक कर कहती ..." क्या करते जी तुम , तुम्हारे मालिक को बोलती अभी , ऐसे राह चलते लोगों को परेशान करते , हौला समझ के रखा है क्या हमको " बेचारे खिसिया कर अपनी राह नापते .

शहर की चहल पहल से आँखे मिलाते पता ही नहीं चला , उसका रिक्शा छः लाईन पुल को कब का पीछे छोड़ चुका था ... सुल्तान बाजार चौराहे पर बहुमन्जिला इमारत के एक कोने पर तेज धूप मे चमकता आंध्रा बैंक का होर्डिंग ...
"बस यहीं रोक दो भैया" ....वर्षों बाद ऐसे रिक्शे पर बैठना हुआ था उसका ...पिता की नौकरी ने उसे मातृभूमि से अक्सर दूर ही रखा मगर जब भी हैदराबाद लौट कर आना होता तो घुटनों को पेट तक सटाए रिक्शे पर बैठे लोगों को देखकर बहुत हंसती थी ...कितने अजीब रिक्शे हैं ...और जब पूरा परिवार इन पर एक साथ लद कर निकलता तो नजारा देखने लायक होता था ...रिक्शे पर चार सवारी एडजस्ट की जाती , दो बैठे हुए और दो नीचे पैर लटका कर , अंजना भाग छूटती ," मुझसे नहीं बैठा जाता , मैं ऑटो से आउंगी " उसी अंजना को आज क्या सूझा...?

" कहाँ जाना है अम्मा " घर से निकलते ऑटो रिक्शे वालों की पुकार को अनसुना कर जानबूझ कर यह रिक्शा पसंद किया उसने ...इन बीच के वर्षों में उसकी और आर्णव की नौकरी के के चलते कई छोटे -बड़े शहरों में प्रवास करना हुआ ...
" किसी शहर को जानना हो , उसकी ख़ूबसूरती निहारनी हो तो , उसे पैदल घूमो , या फिर छोटे रिक्शा में ...तेज भागते वाहनों से भी कभी किसी शहर को जाना जा सकता है ".. अक्सर आर्णव कहता था .
और फिर ये तो उसका अपना शहर था ,उसकी भीनी खुशबू को अपने नथुनों में भर लेना चाहती थी , जाने फिर कितने वर्षों बाद उसे यह मौका मिले ...उसे याद आया ,यहाँ पहुँचते ही उसे फोन करना था , पर्स से मोबाइल निकाल कर आर्णव का नंबर मिलाने लगी .


क्रमशः  थैंक्स राम ! (2)थैंक्स राम ! (3)थैंक्स राम ! (4)), थैंक्स राम ! (5), 
थैंक्स राम !  (6) आखिरी किश्त 


बहुत दिनों से नहीं , सालों से कहानियों के पात्र दिल और दिमाग में हलचल मचाते रहे हैं , देखूं... लेखनी से क्या कुछ कहते हैं!!

बारिश से तरबतर एक सप्ताहांत ....


केंद्रीय विभागों की तर्ज पर ही राजस्थान में कर्मचारियों के लिए पांच दिन का सप्ताह किये जाने की घोषणा पिछली सरकार के समय की गयी थी, जिसके अंतर्गत पेट्रोल की खपत में कमी के एक उपाय के रूप में सरकारी विभागों में कामकाज की अवधि सोमवार से शुक्रवार तक की गयी . इसके तहत कार्यालयों में प्रतिदिन के कामकाज के समय में भी परिवर्तन किया गया . पहले के 10 से 5 कार्य करने के समय को 9.30 से 6 बजे तक कर दिया .
सरकारी दफ्तरों में कामकाज किस तरह होता है , हम सभी जानते हैं . ऐसे में पांच दिन के सप्ताह से कामकाज प्रभावित होने की सम्भावना ही ज्यादा थी . सर्दियों में दिन छोटा होने से अँधेरा जल्दी ही घिर आने के कारण भी कर्मचारियों के जल्दी दफ्तर छोड़ जाने की पूरी सम्भावना थी , मगर सरकार ने कर्मचारियों को इस समय के नियम का पालन करने को लेकर सख्ती दिखाई और धीरे -धीरे इसके सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे . कम से कम कर्मचारियों के परिवारजनों ने तो इससे राहत ही महसूस की . दफ्तर का समय सुबह 10 से घटाकर साढ़े नौ करने का ख़ास फर्क नहीं पड़ा , मगर इससे परिवार के लिए एक दिन अतिरिक्त मिलने लगा और यहाँ भी सप्ताहांत मनाने का रिवाज़ निकल पड़ा . सरकारी कर्मचारियों की पेट्रोल की खपत में कमी का तो पता नहीं , पारिवारिक सदभाव बढ़ने में जरुर सफलता मिली होगी ..

इस सप्ताहांत पर जब बहुत समय बाद घर से निकलना हुआ तो गाड़ियों की रेलमपेल के बीच दोनों छूट्टियों के दिन भी गुलजार हो रही सड़कें बता रही थी कि इस शहर को भी पांच दिन का सप्ताह रास आने लगा है .
रविवार को सूनी रहने वाली सड़कें अब गुलज़ार रहने लगी हैं . पिछले वर्षों में प्रोपर्टी मार्केट में बूम आने के बाद चौपहिया वाहनों की बढ़ी संख्या ने भी परिवार के साथ छुट्टियों मनाने वालों की संख्या में वृद्धि की है.
इस शनिवार को ट्रैफिक में फंसे हुए समीर जी की उपन्यासिका के कई अंश आँखों के सामने साकार हुए . लोंग भागे जा रहे हैं बाहर , क्या घर में बैठ कर परिवार जनों के साथ अच्छा वक़्त बिताते हुए छुट्टियाँ नहीं मनाई जा सकती या फिर पर्यटन के लिए शहर अथवा देश से बाहर जाना ही क्या आवश्यक है ...

गर्मी की छुट्टियाँ तो बच्चों की परीक्षाओं,शादियों की भेंट चढ़ी , रही सही कसर अस्वस्थता ने पूरी कर दी , नतीजन पूरी छुट्टियाँ घर में भरपूर आराम करते ही बीती . सोचा इस सप्ताहांत पर अपने ही शहर को नवीन दृष्टि से देख लिया जाए .

शनिवार का दिन झाड़खंड महादेव के दर्शन के लिए निकले . द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित यह शिव मंदिर इसे राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से अलग बनाता है . जन्मभूमि ही द्रविड़ों का प्रदेश है तो इस प्रकार की इमारतें , मंदिर, चित्रकारियां मुझे बहुत लुभाती है , इन स्थलों पर जाने पर बहुत दिन बाद बेटी का अपने मायके आने जैसा ही अहसास होता है . हम महिलाएं उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों , ससुराल की परम्पराओं ,रीति -रिवाजों को निभाते उनमे ही रच बस गयी हो , मगर मायके की एक छोटी सी झलक भी स्मृतिलोक के कितने ही परदे भेद कर बचपन तक ले आती हैं . माँ को भी कई बार गुजरते देखती हूँ इन्ही अनुभूतियों से जब हुलस कर वे अपने मायके के बारे में बताती हैं ...ये रिश्ता बेटियों का बेटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता चलता रहता है .

झारखण्ड महादेव , जयपुर
आर्मी एरिया के पास होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण लुभाता है .मंदिर प्रशासन भी पर्यावरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया . मंदिर के अहाते की छत डालते समय में पीपल या बरगद के बड़े पेड़ों को कटा नहीं गया बल्कि छत का वह हिस्सा खुला ही छोड़ दिया गया है .
मदिर के भीतर पक्षियों के चुग्गे और पानी के लिए बड़ी जगह सुरक्षित है , कबूतरों के ढेर के बीच सफ़ेद कबूतर भी नजर आये . यहाँ बड़ी संख्या में मोर भी हैं , हालाँकि मंदिर के बाहर हरे चारे के ढेरों के पास गायों और सांडों का हुजूम थोडा डराता भी है . मैं देख नहीं पाए , शायद कही आस पास ही मंदिर की अपनी डेयरी भी हो . देश में हर तरफ मंदिरों में भारी संख्या में धन मिलने की ख़बरों के बीच यह सब देखना सुखद लगा .
दूर से देखने पर मंदिर की बाहरी बाउंड्री के रंग इसे कहीं से भी मंदिर होने का आभास नहीं देते . सफ़ेद रंग की दीवार और खिडकियों और दरवाजों पर हरा रंग , बच्चों ने आश्चर्य से पूछा ," यहाँ मंदिर है ?"
भक्ति भी भला किस रंग का अवलंबन चाहती है ! हम इंसानों ने इसे अलग -अलग रंगों में बाँट दिया है .
शाम गहराने लगी तो बिरला मंदिर और मोती डूंगरी गणेशजी के दर्शन कर घर लौट आये ...

बिरला मंदिर , जयपुर बिरला मंदिर से ट्रैफिक का नजारा

दूसरे दिन आमेर किले के लिए निकले घर से , जलमहल तक आते -आते मौसम ने तेजी से करवट ली और बारिश के साथ लबालब सड़कों ने रास्ता रोक लिया . जलमहल की पाल से उमड़ते घुमड़ते बादल और बरसात ने इस पर्यटन स्थल की रौनक को चार चाँद लगा दिए थे .

बरसात में जलमहल का नजारा

बारिश में भीगते भुट्टे खाते लोंग जश्न मनाते नजर आये . पानी के निकास की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत ज्यादा बारिश नहीं होने के बावजूद सड़कों पर नहर बन जाने जैसे हालात को देखते हुए वहीं से वापस लौट आना पड़ा . रास्ते में जयपुर नगर निगम का बोर्ड और उनके शहर को विश्वस्तरीय बनाने की प्रक्रिया का दर्शन कर
लौटे ..
जयपुर विकास प्राधिकरण का आश्वासन


जरा सी बारिश में जो हुए शहर के हालात ...
इस तरह बनेगा हमारा शहर विश्वस्तरीय !
मगर इन्हें नहीं है किसी से कोई शिकायत ....

हवामहल को भी देखा भीगते हुए

झमाझम बारिश के बीच संपत की नमकीन और आलू- प्याज कचौरी का स्वाद लेते हुए लौटे घर तो हमारे इलाके में एक बूँद पानी की नहीं ...कॉलोनी में गाडी को बारिश से भीगे देखते लोग आश्चर्यचकित हुए , कहाँ हो गयी इतनी बारिश ...बच्चे अलग भुनभुनाते रहे " यहाँ इतने पेड़ पौधे लगाने की जरुरत ही क्या है , जब बारिश ना हो तो "
रोज शहर के विभिन्न इलाकों में अच्छी बारिश के समाचार मिल रहे हैं और यहाँ बस बादल गरजते बरसते पानी की कुछ बूँदें बरसाकर चले जाते हैं ...
जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल याद आ रही है ...
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने , किस राह से बचना है , किस छत को भिगोना है ...
वाकई बादल दीवाने ही हो गए हैं ...


सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग को भी अपनी झमाझम टिप्पणियों से मुक्ति दे दी जाये ...ज्यादा नहीं ,बस कुछ ही दिन रह लीजिये हमारी टीका टिप्पणी के बिना भी !


गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें !


शुभकामनायें देने में कैसी कंजूसी !

अभी कुछ दिनो पहले ही एक सहेली की दीदी से अचानक ही फोन पर बात हो गयी , बता रही थी कि वे जापान से कनाडा शिफ्ट करने वाली हैं , उनकी छोटी बहन यानि की मेरी सहेली भी दुबई से कनाडा शिफ्ट हो चुकी है . आजकल तो किसी भी देश /राज्य /शहर का नाम सुनो तो सबसे पहले वहां बसने वाले ब्लॉगर ही याद आते हैं . मई- जून की गर्मी की छुट्टियों में दूसरे राज्यों /शहरों मुंबई , बनारस , हैदराबाद , बिहार आदि से रिश्तेदारों का आना -जाना बना रहा , एक दो ब्लॉगर्स को तो मैंने सूचित भी किया कि आपके शहर से मेहमान आये हैं , कुछ भिजवा दे आपके या आपके परिवारजन के लिए ...ये हाल तो तब है जबकि आजतक किसी ब्लॉगर से प्रत्यक्ष मिलना हुआ नहीं और ना ही किसी ब्लॉगर मीट का हिस्सा बनी . गिरिजेश जी का आना हुआ था जयपुर , उसी समय बेटे का ओपरेशन और गिरिजेश जी का व्यस्त शेड्यूल , मिलना नहीं हुआ ...अविनाशजी के जयपुर आगमन पर भी हरि शर्मा जी का सन्देश था की आपका फोन नंबर नहीं था , आपको ब्लॉगर मीट का निमंत्रण देना चाह रहे थे ...मैंने बताया उन्हेंशायद मेरा आना भी नहीं होता , कुछ और व्यस्तताएं और कुछ हालात ऐसे थे , फिर कभी सही ...चाहे -अनचाहे ब्लॉग दुनिया का असर होता ही है ...

एक बड़े ब्लॉगर भी जब- तब शिकायत कर देते हैं , आप बहुत सावधानी बरतती हैं , वास्तव में बात सावधानी बरतने जैसी नहीं है , ब्लॉगिंग से सम्बंधित बातचीत तो ब्लॉग पर कमेन्ट या ईमेल/चैट के जरिये हो ही जाती है . लेखन से जुड़े कारणों से दो -तीन महिला ब्लॉगर्स (जो मैंने उन्हें महिला जानकर ही दिया है) और पब्लिकेशन हाउसेज के पास मेरे फ़ोन नंबर , पता हैं भी . अब आप इसे सावधानी , पिछड़ापन , दकियानूसी कुछ भी कहें मगर सच यह है कि बहुत आलसी हूँ मैं , घर- गृहस्थी , ब्लॉगिंग के बाद इतना समय भी नहीं बचता कि इससे इतर आभासी रिश्ते ज्यादा निभाए जा सकें . क्या फायदा है , एक हजार लोगों से मित्रता करो और एक से भी ठीक से निभें नहीं ,बात ईमेल और चैट के द्वारा हो ही जाती है ...

कल रचनाजी ने पोस्ट पर चुटकी ले ही ली सतिशजी की पोस्ट पर मेरे कमेन्ट का हवाला देते हुए ," मत डरो वाणी , तुम्हे कौन सा कमेन्ट पाने के लिए ब्लॉगर मीट में शामिल होना है "...कुछ दिनों पहले ही पहली बार उनकी प्रोफाइल नजर आयी , गूगल प्लस पर उनके इनविटेशन के साथ ...मुझे वहां बुलाकर खुद नदारद हैं , हालाँकि रचना सिंह के नाम से उनकी एक प्रोफाइल और भी नजर आ रही है वहां , जहाँ वे सक्रिय हैं ....ये ख़ास अदा है उनकी ,फिर भी मेरी मदद करती रहती हैं . अभी पिछले दिनों ब्लॉग पर कुछ परेशानी होने पर उनकी मदद ली क्योंकि उससमय वही ओनलाईन नजर आ रही थीं , और उन्हें टेक्नीकल जानकारी भी हैं , जब मैंने अपनी टेक्नीकल अनभिज्ञता के बारे में बताया तो हंसने लगी मुझ पर की मैं सबको बता दूंगी की तुम्हे टेक्नीकल नहीं आता है ...
बता दीजिये , वैसे भी सभी को पता है  , मुझे कुछ नहीं आता है... मेरी मुस्कराहट भी शामिल थी !

मुझे लगता है , आपके बारे में सबको सब पता होता है या छिपाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता तो तो बहुत सारी मुश्किलें आसान हो जाती हैं , वैसे भी मुझसे ज्यादा छिपाना होता नहीं है , माँ पर तो नाराज होती हूँ , मगर लोगों पर सहज ही विश्वास कर लेने का गुण/अवगुण या कीटाणु मुझमे भी कम नहीं और आभासी दुनिया में जब कोई माँ , दीदी कहकर पुकारे तो उस पर अविश्वास का क्या कारण बनता है, अलग से कहना क्या है , समझना क्या है , सभी सब जानते हैं यहाँ ..ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहती हूँ क्योंकि अपने रिश्तों का तमाशा बना देने या किसी की कमजोरी या विफलता का मखौल उड़ाने जैसी जैसी काबिलियत या संस्कार मुझमे नहीं है ...

ब्लॉगर्स के बीच शब्दों ,व्याकरण अथवा टायपिंग की गलती हो या किसी कविता या लेख को आधार बना कर खिल्ली उड़ाना भी खूब होता रहा , तुरन्त जवाब देना मेरी आदत नहीं , जान बूझ कर इग्नोर करती रही , और जवाब देना भी क्या था , जो गलतियाँ थी लेखन वे वे तो थी/हैं ही ....मगर वहीं कुछ ब्लॉगर्स ऐसे भी हैं जिन्होंने हर हाल में मेरा साथ दिया और प्रोत्साहित करते रहे ...जब तक लिखती रहूंगी , मैं उन्हें नहीं भूलूंगी ...नाम नहीं लिख रही हूँ उनका , क्योंकि जिन्होंने प्रोत्सहित किया, वे स्वयं जानते हैं , ईश्वर उन्हें बुरी नजरों से बचाए रखे !

और जब आपको अपना उद्देश्य साफ़ नजर आ रहा हो तो किसी बात से कोई फर्क पड़ता भी नहीं है ....ब्लॉगिंग पर आने का मेरा उद्देश्य अब मुझे बिक्ल्कुल साफ़ नजर आ रहा है , मेरा सफ़र आत्माभिव्यक्ति से लेखन की गुणवत्ता की ओर बढ़ रहा है , ऐसा आभास होता है मुझे और मैं इसी दिशा में प्रयासरत हूँ ...मुझे लेखिका ही बनना है !  अपनी लेखन सीमाओं में मैं कहानी /गीत / ग़ज़ल आदि लिखना चाहती हूँ या सिर्फ यही लिख सकती हूँ !

जानती हूँ बहुत मुश्किल है , मगर यह तय है की मुझे इसी राह पर आगे बढ़ना है ...जितनी भी मोहलत दे जिंदगी , मुझे लिखना है और मैं प्रयासरत रहूंगी !

अब इतना कुछ लिखने की जरुरत इस लिए पड़ गयी क्योंकि हाल ही में देखा डैशबोर्ड पर , दो वर्ष और दो सौ पोस्ट का सफ़र कुछ समय पहले ही पूरा हो चुका था ...

बधाई और शुभकामनायें तो देंगे ही ना आप !

अग्रिम आभार !