गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

मथुरा , वृन्दावन धाम की यात्रा ....

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर सभी नहा धोकर तैयार हुए , मंदिर पहुंचे तब तक मंगला आरती तो हो चुकी थी ...मंगला झांकी के दर्शन कर के ही संतुष्ट होना पड़ा ...फिर चल पड़े हम मथुरा की ओर ...

मार्ग में अधिकांश मकान नीले और हरे रंग से पुते हुए थे ...
चरण मंदिर से शहर का विहंगम दृश्य
मथुरा में द्वारकाधीश जी के नजदीक पहुंचे ही थी कि एक गाईड पीछे पड़ गया ...गाडी के साथ चलते मंदिर और पार्किंग के बारे में बताने लगा ...जैसे तैसे उससे पीछा छुड़ा कर हम भागे मंदिर की ओर , वहां दर्शन में सिर्फ 5 मिनट बचे थे . ...मंदिर के विशाल प्रांगन में भीड़ -भाड़ होने के बावजूद दर्शन आराम से हो गए...प्रसाद लेकर बाहर निकाले तो ड्राईवर गाडी सहित फरार मिला ...वही गाईड फिर नजर आ गया ..." चलिए , आपकी गाडी उधर घाट के पास पार्क कर दी है " साथ -साथ चलते जयपुर में किस स्थान पर रहते हैं , क्या गोत्र है ...आदि आदि पूछने लगे ...हमने समझाया कि हम यहाँ पहली बार नहीं आये हैं , हमें सब पता है " मगर फिर भी वो साथ साथ ही चलता रहा ...विश्राम घाट पर सूर्योदय की छटा निराली थी ...पिछली बार के मुकाबले यहाँ सफाई भी थी ...
विश्राम घाट पर सूर्योदय

अब हमने रुख किया कृष्ण जन्मभूमि की ओर ....गाईड अभी भी साथ था ..आखिर कुछ रूपये देकर उन्हें हाथ जोड़ लिया ...इस तरह जबरन पीछे पड़ने के कारण गुस्सा तो बहुत आ रहा था मगर फिर ये भी लगा कि ये भी उनके रोजगार का ही एक हिस्सा है ....
कृष्ण जन्मस्थान पर भरी सेक्युरिटी का इंतजाम था ...चप्पे- चप्पे पर कमांडो अपनी गन संभाले हुए सतर्क ...कितनी अजीब बात है जिन प्रभु के चरणों में हम सुरक्षित होने जाते हैं , वे खुद भी इन गार्ड की निगरानी में हैं ...देश में हालात को देखते हुए ये जरुरी भी है मगर कचोटता बहुत है ...जन्मभूमि से बिलकुल सटी ही मस्जिद का हरा गुम्बद नजर आ रहा था ...कंस की कैद में वसुदेव और देवकी के पुत्र कृष्ण ने जेल में ही जन्म लिया था ... वह स्थान अब पूज्यनीय है ....महान लोंग अपने कर्मों से किसी भी स्थल को पूज्यनीय बना देते हैं , वरना कोई जेल में भी जाता है प्रभु के दर्शन करने ...:)कडकडाती सर्दी में भी सुबह इतनी जल्दी मंदिर में अच्छी खासी चहलपहल थी ....कश्मीरी युवकों का एक दल भी नजर आया , वहीँ एक विदेशी भक्त महिला भगवान् के सामने जोर -जोर से अपनी तकलीफ /शिकायत बयान कर रही थी " तुमने गीता में यह उपदेश क्यों दिया , मैं कल से अपना कर्म ही कर रही हूँ , सब मुझपर हँस रहे हैं " पता नहीं , पुजारियों और उस महिला के बीच क्या रार हो गयी थी ...
मंदिर से बाहर आते हुए वहां बनी दुकानों से हमारे साथ की अम्माजी ने काफी अपने पोते-पोतियों , बहू -बेटियों के लिए अंगूठियाँ , चेन आदि खरीदी ....मुझे भी याद आया , दादी की तीर्थयात्रा से लौटने पर उनसे मिलने वाली छोटी -छोटी भेंट के लिए हम कितने उत्साहित रहते थे ...कुछ समय बाद ही चाहे वे किसी काम की ना रहे ...लिखते हुए ही याद आया की माँ भी अभी मुंबई और सिर्धि साई बाबा की यात्रा पर हैं ...लगी होंगी बच्चों के लिए खरीददारी में ...

पागल बाबा के मंदिर की सातमंजिला संगमरमरी ईमारत लुभाती हैं मगर यहाँ सफाई व्यवस्था इतनी दुरुस्त नहीं है ...यहीं इलेक्ट्रोनिक झांकियां भी अपनी अव्यवस्था के बावजूद अच्छी लगी ...

पागल बाबा का मंदिर

बाँके बिहारी जी श्री कृष्ण ....हँसते हैं सब उनके खड़े होने के अंदाज़ पर ...की स्वाभाव का ही इतना बांका है की सीधे खड़ा ही नहीं हुआ जाता ...ये हमारे धर्म की विशेषता है की हम अपने ईश्वर के साथ मजाक कर सकते हैं , चिढ़ा सकते हैं और तो और गोद में भी खिला सकते हैं...

हमारा अगला पड़ाव था वृन्दावन का इस्कॉन टेम्पल ...मंदिर का निर्माण करने वाले स्वामीजी की समाधि पर फूल बने हुए है जिन पर चलते हुए " हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे . हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे " कहना होता है ...बहार निकलते ही वे सज्जन मिल गए जिन्होंने राम -कृष्ण लिखे कार्ड हमें दिए थे जो हमें उन्हें वापस लौटाने थे ...मेरे आगे कड़ी बेटियों से उनकी शिक्षा के बारे में पूछा तो उन्हें ढेरों आशीर्वाद देते हुए वाही कार्ड उन्हें वापस देते हुए अपनी किताबों के बीच रखने का निर्देश दिया ...बच्चे महाखुश ...अब मुझसे मुखातिब होकर उन्होंने कहा ..." आप इनकी मम्मी हैं " मेरे हाँ कहने पर आशीर्वाद देते हुए बोले, "लक्की मॉम "...ख़ुशी के मारे मेरे पैर कहाँ रहते जमीन पर ....वरना ज्यादा समय यही सुनना पड़ता है " लान का एक छोरो हो जातो "(बेचारी के एक बेटा हो जाता )...:)
श्रीरंगनाथ मंदिर


वृन्दावन में ही भगवान् रंगनाथ एवं गोदाजी का मंदिर है ...यह वृन्दावन का सबसे बड़ा मंदिर है ...संयोग की ही बात है की धनुर्मास के पहले ही दिन इनका दर्शन लाभ प्राप्त हुआ ... मायके में श्रीवैष्णव धर्म का पालन किये जाने के कारण इस मास को उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है ...ससुराल में यह सब छूट गया है इसलिए ऐसे प्रयोजनों पर अचानक घर या मंदिर पहुँच जाना बहुत सुख देता ...इस पवित्र मास में प्रत्येक सुबह विशेष प्रकार की खिचड़ी या खिरान्न का प्रसाद तो हमारी कमजोरी रहा है ....
यूँ तो मथुरा -वृन्दावन में हर गली में मंदिर हैं ...जितना दर्शन लाभ करो , कम है ...मगर हमने अपनी यात्रा यही रोकी और जयपुर के लिए रवाना हो गए ......

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

गोवर्धन परिक्रमा .........



बहुत समय से गोवर्धन परिक्रमा का कार्यक्रम टल रहा था ...कभी मौसम के कारण तो कभी परिक्रमा मार्ग पर चल रहे निर्माण कार्य से होने वाली असुविधा के कारण ..मगर पिछले दिनों कमर कस ही ली कि कुछ भी हो परिक्रमा तो करनी ही है ...इधर घुटनों में कुछ तकलीफ के कारण घबराहट थी कि इतना पैदल चलना हो भी पायेगा या नहीं ...कहाँ तो शहर में एक किलोमीटर भी पैदल नहीं चला जाता ,और कहाँ परिक्रमा मार्ग पर २१ किलोमीटर की पैदल यात्रा नंगे पैर ...एक तसल्ली थी कि रिक्शे में बैठ कर भी परिक्रमा दी जा सकती है ...यही सोचा कि अगर चला नहीं जायेगा तो फिर इसे ही आजमाएंगे ....साथ में एक बुजुर्ग महिला थी ...उनके जोशोखरोश को देखकर हमने भी हिम्मत कर ली ...पूजा पाठ बहुत ज्यादा नहीं करती हूँ मैं और ना ही अन्धविश्वासी हूँ मगर फिर भी खुद का इस कदर पैदल चल लेना मुझे स्वयं को आश्चर्यचकित कर देता है ....


जयपुर से गोवर्धन के मार्ग पर ज्यादा स्थान राजस्थान की सीमा में आता है , बीच में लगभग किलोमीटर का मार्ग उत्तर प्रदेश की सीमा में है , फिर से राजस्थान ....सड़क की बदहाली शुरू होते ही ड्राइवर ने बताया कि अब हम उत्तर प्रदेश की सीमा में हैं तो सबकी एक साथ हंसी छूट गयी ...जब बिहार की सदियों पुरानी खस्ता हाल सड़के सुधारी जा सकती हैं तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं हो सकता ....किससे पूछा जाए ये सवाल ... इस पूरे मार्ग पर सरसों के लहलहाते खेतों ने मन प्रसन्न कर दिया ...अच्छी सर्दी और इससे पूर्व होने वाली बरसात ने खेतों पर दूर दूर तक जैसे पीली चादर ही बिछा रखी है ...


राहत की बात ये हैं कि गोवर्धन पर्वत के चौडाई में होने वाले विस्तार को रोकने के लिए जालियां लगाकर पर्वत को सुरक्षित किया गया है ...यहाँ वन विभाग का कार्य संतोषजनक है ... कुछ स्थानों पर नील गाय भी नजर गयी ...

खैर ...गिरिराज धरण का नाम लेकर शुरू कर दी पैदल यात्रा ...परिक्रमा के पहले पड़ाव में गिरिराज मंदिर में गोवर्धन पर्वत के मुखारविंद पर दुग्ध अर्पण कर प्रारंभ की गयी यात्रा लगभग 11किलोमीटर की है , जबकि दूसरी परिक्रमा " राधा कुंड परिक्रमा " लगभग 10 किलोमीटर की ....पूरी परिक्रमा 8 के आकार में की जाती है .....एक पूरी परिक्रमा के बाद फिर से दूसरी जगह से प्रारंभ कर दूसरी परिक्रमा ...इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ दुग्ध अर्पण सिर्फ दोपहर तक किया जा सकता है...श्रृंगार के बाद यकीन करना ही मुशिकल हो जाता है कि यह वही स्थल है जहाँ सुबह दुग्ध अर्पण किया गया था ... परिक्रमा पथ पर यात्रियों की सुविधा के लिए काफी कार्य किया जा रहा है हालाँकि अभी बहुत अधिक सुधार की दरकार है ...
मुखारविंद स्थल को लेकर भी भिन्न मत हैं ...कुछ लोंग परिक्रमा के पथ पर आने वाले दूसरे स्थान को ही वास्तविक पूजा स्थल मानते हैं ...



परिक्रमा मार्ग पर दोनों ओर बनी चाय , नाश्ते उपलब्ध कराती सैकड़ों दुकाने यात्रियों के विश्राम स्थल का कार्य भी करती हैं ...

उनके साथ ही लगभग हर दुकान पर बजती कृष्ण राधा की धुन , मीरा के भजन, सहयात्रियों के जय श्री राधे का जयघोष वातावरण में एक अलग सी चेतना भर देते हैं ... साथ चल रही बुजुर्ग महिला का उत्साह और आत्मविश्वास देखने योग्य था....रास्ते में पड़ने वाले चरण मंदिर में जहाँ सीढिया नहीं है , उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच ही चढ़ना पड़ता है , हम टालना चाह रहे थे , वे बड़े उत्साह के साथ चढ़ गयी....कई बार बैठना पड़ा उन्हें और सांस फूलती रही , मगर उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी ....ऐसे प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों का साथ हम सबमे ऊर्जा का संचार कर रहा था ...परिक्रमा पूर्ण होते रात गहरा गयी थी ....बिजली की व्यवस्था भी बहुत डगमगाई हुई थी ...ये गनीमत है कि शुक्ल पक्ष की एकादशी का चन्द्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ मार्गदर्शन कर रहा था ....परिक्रमा पूर्ण होते रात के लगभग बज गए थे ...पूजन के उपरांत विश्रामस्थल पर जाकर सबकी हालात ऐसी थी कि बस जहा जगह मिले वहीँ पसर जाए ....आरामदायक स्थान मिल गया फिर भी और सभी बिना खाए पिए लुढ़क लिए ...सुबह जल्दी उठकर मंगला आरती के दर्शन जो करने थे ...



क्रमशः

रविवार, 5 दिसंबर 2010

मेंम साहब की कुतिया ......






में साहब की पामेरियन


कुत्तों के लगातार भौंकने की आवाज़ और गाड़ी के होर्न , कारिंदों की चहल -पहल से अनुमान लगाया कांता ने कि नगरनिगम की गाडी आ गयी है ...आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए ...

बोरी उठाये गली के कुत्तों के पीछे दौड़ते कर्मचारी और उनसे बच निकलने की कोशिश कुत्तों की ...बिल्ली चूहे या चोर पुलिस के खेल सा दृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है ...आजादी की कीमत तो ये कुत्ते भी खूब समझते हैं .... गली के कोने पर कूं - कूं करता पड़ा हुआ टौमी कराह रहा था ..पूरे दो दिन से वही एक जगह पड़ा हुआ ....कुछ दिन पहले उसकी पीठ पर घाव का निशान देखा था कांता ने ...दूसरी गली के कुत्तों के साथ जंग में घायल हो गया था बेचारा ...उसके होते किसकी मजाल थी कि किसी दूसरी गली का कुत्ता आये और भौंक कर चला जाए ...मगर इस बार घाव गहरा था ....अब तो बिलकुल ही हिलना डुलना मुश्किल था ...

पिछले कई महीनों से देख रही थी कांता इसे ...आस पास के घरों से रोटी मिल जाती थी और गली के कोने में ऐसे अलसाया पड़ा रहता , मगर जैसे ही कोई अजनबी नजर आता कान खड़े हो जाते उसके , दौड़ा भगा चलता आता ...भोंक भोंक कर नाक में दम कर देता ...कई बार कांता जब सब्जी लेने या किसी काम से घर से निकालती तो वह भी साथ हो लेता ...बाकायदा गली के आखिरी छोर तक उसके साथ चलता ....बच्चे हँसते थे उसपर ...बौडीगार्ड है आपका ....मोहल्ले वाले उसकी वफ़ादारी से बहुत प्रसन्न थे यहाँ तक कि कांता की कर्कशा पड़ोसन भी जो जब तब हर किसी से भिड जाती थी ...माली , सब्जी वाला , पेड -पौधों वाला , मोची ... ..मजाल है जो आजतक किसी को उसने वाजिब कीमत दी हो ..काम पूरा करवाने के बाद थोड़े बहुत पैसे बहुत एहसान के साथ पकड़ा देती इन लोगों को और यदि किसी ने साहस कर लिया पूरी कीमत मांग लेने का तो फिर उसकी खैर नहीं ....ऐसी महिला यदि किसी कुत्ते से खुश है , टिके रहने देती है गली में तो उसमे कुछ न कुछ ख़ास तो पक्का ही है ...

मगर घाव खाया टौमी ( नाम कांता ने ही दिया था ) जब से बीमार पड़ा है , उसके घाव में कीड़े पड़ गए हैं , वही महिला हाय तौबा मचाये रखती है ....जब भी कांता नजर आ जाती है उसे तो तीखा बोले बिना नहीं रहती ..." रोटी दे दे र हिला लियो ...कत्तो बास मार है ...लोगां ना कियां क्यां काम सूझ ...आपक घर में क्यूँ ना राख लेव " (रोटी खिला कर मुंह लगा लिया इसे ...कितनी बदबू मार रहा है ...लोगों को भी क्या क्या काम सूझते हैं , अपने घर में क्यूँ नहीं रख लेते )....

टौमी


आखिर कांता ने नगरनिगम के पशु विभाग में फ़ोन कर बीमार कुत्ते की इत्तला कर दी ...और वही गाडी आ पहुंची थी उसे लेने ....इस हालत में टौमी भाग नहीं सकता था इस लिए आसानी से गिरफ्त में आ गया ....उसे ले जाते देख कांता को थोडा दुःख तो हुआ मगर उसे संतोष था कि पशु चिकित्सालय में उसका ठीक से इलाज़ हो सकेगा ...कम से कम उम्मीद तो यही थी ...

सुनो , रामलीला मैदान में सहकार मेला लगा है , तिब्बती मार्केट भी लगा हुआ है ...आज फ्री हूँ ...जो लाना है चल कर ले आओ ...फिर मुझे समय नही होगा तो जान खाओगी ...गाड़ी की धुलाई करते हुए कांता के पति ने पत्नी और बच्चों को कहा ...
दोनों बच्चे बड़े खुश हो गए ...हाँ हाँ, पापा चलिए , मुझे नयी डिजाईन की जैकेट लानी है ...शायद तिब्बती मार्केट में मिल जाए ...
व्यस्ततम बाजार में गाडी पार्क करते एक बड़ी सी गाडी पर कांता की नजर ठहर गयी ...उसकी खिड़की से एक सफ़ेद झक पामेरियन कुतिया झाँक रही थी ..."बेबी , मुंह अन्दर करो , डोंट क्राई"...उसकी मोटी -सी मालकिन गोदी में लेकर लाड़ दुलार कर रही थी ....बेबी के लिए एक अच्छा सा ब्लैंकेट देखना है , बहुत ठण्ड हो गयी है ..अपने पास बैठे व्यक्ति से कहा उसने ....
कांता को एकदम से टौमी याद आ गया ....देशी कुत्तों को कहाँ यह सब नसीब है ...बेचारे गली -गली भटकते रहते हैं , अक्सर दुत्कारे जाते हैं ...कोई तरस खाकर कुछ खिला दे तो ठीक वरना ....

तभी देखा उसने एक गन्दा सा लड़का , मिट्टी में सना कपड़े से उस महिला की गाडी साफ़ करता रिरिया रहा था.....दो रूपये दे दीजिये ...अपने पप्पी के मुंह में महंगे बिस्किट ठूंसती महिला ने मुंह फेर कर अपने ड्राईवर से कहा ," अरे , हटाओ इसे ...गाड़ी साफ़ कर रहा है या और गन्दी कर देगा ...हटाओ इसे यहाँ से "

कांता की उदासी बढती गयी ....नर्म बिस्तर , ममतामयी गोद , गरम कपड़े ,महंगा खाना .... देशी कुत्ते ही क्यों , बिना घर बार वाले अनाथ बच्चों , या घर -बार होकर भी मांगने को विवश बच्चों से भी अच्छे हैं ...विदेशी कुत्तों के नसीब.......एक गहरी सांस लेकर खुद को सामान्य रखने की कोशिश करती मेले की ओर बढ़ चले कांता के कदम ...






चित्र गूगल से साभार ....

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

यू आर माय स्वीटी पाई....


बच्चे जब छोटे होते हैं तो तोतली आवाज़ में उन्हें जाने कितने से बुलाते हैं कि उनका वास्तविक नाम ही भूलने सा लगता है ...देखिये बच्चों को कितने खूबसूरत नाम दिए जा सकते हैं , खुद बच्चों की मीठी आवाज़ में ही ...




You're my hunny bunch,
Sugar plum,
Pumpy-umpy-umpkin,
You're my sweetie pie,
You're my cuppy cake,
Gum drops,
Snoogums boogums you're,
The apple of my eye,
And I love you so
and I want you to know,
That I'll always be right here,
And I love to sing,
sweet songs to you,
Because you are so dear......










चित्र गूगल से साभार ...

बुधवार, 24 नवंबर 2010

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ....

कल दिन भर बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर रही ....ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल को सही ठहराते हुए एक बार नितीश फिर से बिहार के सिरमौर बन गए हैं ....

मैं एक आम गृहिणी हूँ ....राजनीति से मेरा दूर दराज का भी कोई सम्बन्ध नहीं है ...पिता की कर्मभूमि होने के कारण बचपन और किशोरावस्था की बहुत सी यादें इसी प्रान्त से जुडी हैं ......फिर एक आम भारतीय की तरह भी देश की राजनीति में क्या हो रहा है , क्यूँ हो रहा है , जानने की रूचि रहती ही है ...

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ...बिहार की जनता ने साबित कर दिया है कि अब धर्म, जाति , प्रान्त , भाषा की राजनीति के दिन बस लद ही गए हैं ....पटना के गाँधी मैदान से दीपकजी का कार्यक्रम भी देखा ..आम जनता उत्साहित है ....मीडिया हाउस के लिए भीड़ जुटाना अपने कार्यक्रमों की पब्लिसिटी का एक अंग हो सकता है , मगर इसमें कोई शक नहीं कि बीते पांच वर्षों में बिहार में शासन की मंशा देश और विश्व स्तर पर राज्य की प्रतिष्ठा कायम करने की रही है ....और इसका प्रभाव भी नजर आ ही रहा है ...

पिता के देहावसान के बाद कभी बिहार जाना नहीं हुआ मगर बिहार से लौटने वाले लोंग जब वहां की साफ़ चमकदार गड्ढों रहित सड़कों की बात करते हैं, तो एकबारगी यकीन नहीं होता ...वरना वहां हाई वे तक का बुरा हाल देखा है ...कई बार अपने कस्बे से पटना या मुजफ्फरपुर जाने में अनुमानित समय से कहीं अधिक समय लग जाने के कारण ट्रेन छूटते रह गयी ....याद आ रहा है ...एक बार कार से पटना से कस्बे तक के सफ़र को तय करते हुए धचके खाता छोटा भाई सारे रास्ते झुंझलाता रहा ....पिता, जिनका ज्यादा समय सफ़र में ही गुजरता था , चुटकी लेते हुए बोले..." अगर ऐसी जगह पर तुम्हे नौकरी करनी पड़ती , तो क्या हाल होता तुम्हारा "
" मैं तो नौकरी ही छोड़ देता " मेरे भाई का जवाब था ..." बेटा , मैंने भी यही सोचा होता तो तुम लोगों का क्या हाल होता " ...पिता मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले ....खैर , रास्ते में आम और लीची के खेतों से गुजरते भाई का संताप कुछ कम हुआ ...
जब भी बिहार की सड़कों की बात होती है , मुझे ये सफ़र बहुत याद आता है ...अच्छा लगता है सुनकर कि बड़े शहरों से लेकर छोटे ग्रामीण इलाकों तक की सड़कों में काफी सुधार हुआ है ....कहा ही जाता है कि किसी भी देश/प्रदेश के विकास का रास्ता वहां की सड़कें तय करती हैं ...

बिजली व्यवस्था का हाल अभी भी इतना दुरुस्त नहीं है ....अधिसंख्य लोंग बिजली के लिए सरकारी व्यवस्था से ज्यादा जेनरेटर पर निर्भर करते हैं और उसकी भी अपनी सीमा होती है ....उम्मीद है सड़कों की तरह इसमें भी सुधार होगा ही ...

पंचायतों और शहरी निकायों जैसे आम जनता से सीधे जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत सुरक्षित स्थान महिलाओं को प्रदेश के सरोकारों से सीधे सीधे जोड़ता है और माने या ना माने , इसका यथोचित शुभ प्रभाव नजर आता ही ... सुरक्षा और कानून व्यवस्था में सुधार के कारण डकैती, अपहरण जैसी आम घटनाएँ अब इतनी आम नहीं रही है ...अपनी फ्रेंड के पडोसी , पिता के जूनियर ऑफिसर , फॅमिली डॉक्टर के अपहरण की घटना तो आँखों देखी रही हैं ....और गोलियों और चीख पुकार की आवाज़ों के बीच दूर कहीं डकैती का अनुमान लगाते कालोनी के सभी परिवारों को इकठ्ठा भगवान् को याद करते हुए कुछ यादें भी ज़ेहन में रही हैं ...

जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नितीश की सरकार ने दिखा दिया है सरकारों की इच्छा शक्ति से प्रदेशों में मनचाहे बदलाव लाये जा सकते हैं ....वही बिहार की जनता ने भी साबित कर दिया है कि वे अब सिर्फ विकास की राजनीति में विश्वास करते हैं .... यही शुभेच्छा प्रत्येक प्रान्त की जनता और राजनैतिक दल की हो जाए , तो इस देश को अपने खोये गौरव को प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता ....

(प्रदेश की खुशहाली की कहानी मेरी सुनी हुई ही है या फिर अख़बारों में पढ़ा , टी वी पर देखा हुआ ...मेरी जानकारी में कुछ कमी हो तो अल्पज्ञता समझ कर क्षमा कीजिये )


बिहार की जनता की जीत के नाम ... हमारे शहर में (जयपुर) के गलता तीर्थ पर बिहार के लोक पर्व छठ के कुछ चित्र .....देर से लगा रही हूँ , मगर समय दुरुस्त है ....






मंगलवार, 23 नवंबर 2010

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!

(इनकी सफाई ऐसी होती है)
( सफाई का महत्व तो ये छुटकू भी जानते हैं )


एक सफाई पसंद महिला अपनी सहेली के घर उससे मिलने गयी । जब उसने देखा कि उसकी सहेली का पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था , नाक भौं सिकोड़ती देर तक बस उससे यही शिकायत करती रही कि लोंग घर कितना गन्दा रखते हैं !!
दरअसल उसके घर वार्षिक सफाई का कार्य चल रहा था . सफाई करते समय एक बार पूरा घर गन्दा होता ही है . उस महिला को बुरा लगा , मगर अपने घर की व्यवस्था देखकर चुप लगा गयी .
कुछ समय बाद जब उसका घर फिर से साफ़ सुथरा चमकदार हो गया , उसने अपनी सहेली को खाने पर बुलाया .  खाना खाने के बाद सहेली के चमचमाते घर को देखकर बहुत प्रभावित हुई .

" तुम आजकल घर बहुत साफ़ रखने वाली हो , कोई नयी कामवाली रख ली है क्या "

  नहीं ..मेरे घर की साफ़- सफाई के लिए मैं दूसरों पर निर्भर नहीं करती ...उस दिन जब तुम आई थी , वार्षिक सफाई का काम चल रहा था इसलिए सब बिखरा हुआ था  . उस महिला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया

" तो तुमने उस दिन कुछ कहा क्यों नहीं , तुमने बताया भी नहीं और मैं यूँ ही बक- बक करती रही "

 उस दिन मैं चुप रही क्यूंकि तुम उस दिन सही थी ...उस दिन का सच वही था!

दोनों ने एक साथ अच्छा समय व्यतीत किया . घर लौट कर उस महिला ने अपने घर का मुआइना किया . उस महिला की तुलना में उसे अपना घर बहुत गन्दा लग रहा था । घर के कई कोने , सिंक के नीचे , फर्नीचर के पीछे कई जगह कचरा छिपा पड़ा था . . इससे पहले उसने कभी गौर ही नहीं किया था .

उस दिन से उसने प्रण लिया कि अगली बार दूसरों की त्रुटियों पर टोकने से पहले स्वयं पर अंकुश रखेगी , कम से कम उस उस कमी पर तो अवश्य ही, जो स्वयं उसमे भी है!

होता है ना कई बार ऐसा ....!

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!



चित्र गूगल से साभार !

सोमवार, 15 नवंबर 2010

प्रशांत का आत्मविश्वास ....ज्योति का संतोष ...क्या सही था !


कौन बनेगा करोडपति में अत्यधिक आत्मविश्वास में प्रशांत बातर एक करोड़ कमाकर गँवा बैठे ...बहुत बेहतरीन ढंग से खेलते और अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए प्रशांत एक लाईफ लाइन के होते हुए भी एक करोड़ कमाने के बाद 5 करोड़ कमाने के लालच (आत्मविश्वास !)के जैकपोट प्रश्न पर अटक गए 3.20लाख पर ही उन्हें संतोष प्राप्त करना पड़ा ...

इसी गेम के एक एपिसोड में जयपुर की ज्योति चौहान ने 50 लाख के 10वें प्रश्न पर पर कोई लाइफ लाईन ना होने के कारण कोई रिस्क ना लेते हुए क्विट कर गयी ...ज्योति की दर्द भरी कहानी से शो के एंकर अमिताभ बच्चन जी इतने दुखी हुए कि उसके परिवारजन से प्रार्थना कर बैठे ...ज्योति जो कि एक कामकाजी महिला है , पुलिस सर्विस में कॉन्स्टेबल के पद पर कार्यरत हैं , से उनकी लव-मैरिज के कारण उनके परिवारजन बहुत नाराज हैं ....के बी सी के मार्फ़त ज्योति ने अपने परिवारजन से मार्मिक अपील की कि वे उससे कोई सम्बन्ध ना रखना चाहे , घर ना बुलाये मगर कम से कम फोन पर तो बात कर लें ...कर्ज के बोझ से दबी ज्योति अपनी बेटी के कान के छेद के ऑपरेशन के लिए भी परेशान हैं ...बहुत दुःख हुआ देखकर ...हमारे देश और समाज की ये भी एक तस्वीर है ....अपने पैरों पर खड़ी महिला के लिए भी प्रेम विवाह की राह इतनी कठिन है ....खैर , दुआ ही की जा सकती है कि कार्यक्रम में जीती रकम से उसकी आर्थिक , पारिवारिक और सामाजिक परेशानियाँ दूर हो सकें ...क्या महानायक अमिताभ बच्चन जी की अपील का भी उसके परिवार पर कोई असर नहीं होगा ....

प्रशांत और ज्योति दोनों ने गेम के जरिये धन(एक प्रकार से मुफ्त) .....प्रशांत को एक करोड़ मिल जाते यदि संतोष धन उनके पास होता ...मगर ५ करोड़ के लालच ने उन्हें ३ लाख २० हजार पर ही संतोष करने के लिए बाध्य किया ...ज्योति को मुफ्त में कमाए हुए धन की भी कीमत पता थी , क्यूंकि जिस परिस्थिति से वे गुजर रही है , एक एक पैसा उनके लिए कीमती था ....वही प्रशांत को एक करोड़ पर भी संतोष नहीं था ...

मन और मस्तिष्क लड़ रहे हैं इस बात पर कि प्रशांत ने क्या गलत किया ...क्या उनके आत्मविश्वास को लालच का नाम दिया जाना चाहिए था ...क्या जीवन में इस तरह के रिस्क नहीं लिए जाने चाहिए ...क्या होता यदि प्रशांत ५ करोड़ जीत जाते ... सभी उनके आत्मविश्वास और रिस्क लेने की क्षमता पर मुग्ध होते ...
सही मुहावरा क्या होगा .......
" गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में " ....या
" लालच बुरी बला है ".... !






तस्वीर गूगल से साभार ....

बुधवार, 10 नवंबर 2010

ऐसी रही दिवाली ...कुछ तस्वीरें रावण मंडी की भी


त्यौहारी मौसम चल रहा है ...हालाँकि कुछ के लिए बीत चुका ...मगर बिहार, यू पी में छठ करने वालों और राजस्थान में कार्तिक स्नान करने वालों के लिए उत्सव कार्तिक पूर्णिमा तक चलेगा ...गोपाष्टमी , आंवला नवमी , देवउठनी एकादशी , पंचतीर्थ स्नान , कार्तिक पूर्णिमा ...आदि आदि ..।

जयपुर में इस बार दिवाली पर खरीददारी और रौशनी की बड़ी धूम रही ...बरसों बाद अच्छा मानसून , समय पर सरकारी कर्मचारियों को मिले भत्ते ने बाजार की रौनक बढ़ा दी ...हमारा तो कोई विशेष घूमना नहीं हुआ पुराने शहर के बाजार में ...मगर आस-पास के मार्केट में रौशनी का नजारा शानदार था ...जानकारों का कहना है कि जयपुर में इस बार जैसी रौशनी और सजावट पहले कभी नहीं हुई ...

हम तो दिवाली के एक दिन पहले तक साफ़ -सफाई में ही अटके पड़े थे ...मकान के पिछले खुले गलियारे को लोहे की ग्रिल द्वारा बंद करने का कार्य और उसके लिए बुलाये गए कारीगरों की बदौलत ...छोटे से कार्य के लिए 5 दिन तक घर कबाडखाना बना रहा ...और उसपर कारीगरों के नखरे ...समाजसेवा प्रेमी पतिदेव जाने कितने नीड़ों के निर्माण में नक्शा बनाने से लेकर मटेरिअल से लेकर कारीगर, मजदूर तक उपलब्ध कराने में अपनी श्रेष्टता साबित कर चुके हैं , मगर इस बार अपने घर के छोटे से काम में बुरे उलझे ...जो कारीगर/मजदूर दंपत्ति इस कार्य के लिए आये थे , पति बेचारा (और ऑप्शन भी क्या होता है इन लोगों के पास !!) शांत , जितना पूछो उसका जवाब दे दे औरचुपचाप अपना काम कर ले ...मगरउसकी पत्नी ... !
कितनी बार टोक कर उसको चुप रहने के लिए कहना पड़ा ..... पता नहीं उसके पति ने क्या कहा सिर्फ अंदाजा ही लगा सकती हूँ , क्यूंकि उसके पति की तो आवाज़ मुझे सुनायी ही नहीं दी, जो सुनायी दिया वो थी उस महिला कामगार की गालियों की बौछार ...और उसका पति सर झुकाकर चुपचाप सुनता रहा ...सचुमच कुछ अलग -सा अनुभव था । गालियाँ देते पति और चुपचाप सुनती पत्नियाँ तो खूब देखी हैं , मगर ऐसा दृश्य पहली बार ही देखा ....जहा पति चुपचाप अपने काम में लगा रहता , वहां उसकी पत्नी ज्यादा समय उसे निर्देशित करने , गप्पे हांकने या आराम करने में बीतता ...हद तो तब हुई जब उसके निर्देशन का दायरा बढाकर मुझतक और पतिदेव तक पहुँचने लगा ...

दिन में तीन चार बार मजदूरों के लिए चाय बनाने का पति देव का निर्देश मुझे अखरता नहीं है क्यूंकि चाय पीना मुझे भी बहुत पसंद है और वो भी अदरक , कालीमिर्च आदि मसालों के साथ ... मगर ...
उधर से फरमाईश आई , " म्हारी चाय म काली मिर्च मत डाल्जो और चीनी थोड़ी बत्थी " (मेरी चाय में काली मिर्च मत डालना और चीनी थोड़ी ज्यादा )...फरमाईश की ये तो शुरुआत भर थी... दिवाली करीब आती जा रही थी और घर बिखरा पड़ा था ...दो दिन का कार्य 5 दिन में जाकर ख़त्म हुआ और रोज चख चख करते ...खैर जैसे तैसे उसको विदा किया और वार्षिक सफाई की शुरूआत हुई ...

पांच दिन में पूरे घर को साफ़ सुथरा बनाना हमारे जैसे आलसियों के लिए जंग लड़ने जैसा ही तो है ...जैसे तैसे निपटी साफ़ सफाई और मन गयी दिवाली भी ... रूप चतुर्दशी को खुद के रूप की बजाय रसोई का रूप सुधारा जा रहा था, कई नए पकवान बनाने का अरमान धरा रह गया ...बात सिमटकर बेसन की चक्की , नारियल मूंगफली की बर्फी पर ही अटक गयी ...थकान के मारे हाल बुरा अलग था ...
मगर जब पडोसी आंटी जी और अंकलजी से अपने वार्डरोब कलेक्शन की बडाई ,बच्चों और मेहमानों से मिठाई की , भाई दूज के दिन भाई- भाभीओं से खाने की तारीफ़ , और सबसे ऊपर कुछ महिलाओं का ये कहना ," अब आप अच्छे लगने लगे हो "...सुनी तो सब थकान उड़न छू हो गयी ...अब मारवाड़ियों का अच्छा लगना मतलब तो समझ ही गए होंगे ...बरसों से सेहतमंद लोगों के ताने सुनते रहे हैं कि हम तो खाते पीते घर के हैं , आपको खाना नहीं मिलता क्या ... अब हम भी खाते- पीते की श्रेणी में शामिल होने लगे हैं ... ये बात और है कि पतिदेव रोज योगा करने की सलाह देने लगे हैं . गृहिणियों की खुशियाँ कितनी छोटी -छोटी सी ही तो होती हैं ...तो कभी कभार उनके खाने की , घर सँभालने के गुणों की तारीफ़ कर देने में क्या जाता है ...नहीं क्या ...!!!!

दो दिन आलस मिटाने के बाद देखा कि बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था ब्लॉग पर , दिमाग सुन्न हो जाता है कभी -कभी...यूँ तो खाली ही है, बस थोथे चने की तरह कभी -कभी बज जाता है ...सोचा आज तो कुछ लिखना ही है ...जो लिख दिया है ...झेलिये !

दशहरे पर देवर की बेटी रहने आई दो दिन के लिए तो अपने बड़े पापा से रावण देखने की जिद करती रही ...वो भी एक दो नहीं , 10,50...पड़ोस में ही है एशिया की सबसे बड़ी रावण मंडी .....दिखा लाये पतिदेव भी ...



शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

" क्या करूँ ...छोड़ना चाहते हैं , छूटता नहीं है "

" क्या करूँ ...छोड़ना चाहते हैं , छूटता नहीं है "
बस स्टॉप पर बच्चों की इस खुसर पुसर से कान खड़े हो गए मेरे ...देखा तो छोटी बच्चियां घेरा बनाकर अपनी सिनिअर दीदी से कुछ बात कर रही थी ...टहलते -टहलते मैं भी सरक ली उनके पास....
"क्या गुपचुप बातें हो रही है " ...मुझे देखकर एक दम से चुप हो गयी लड़कियां ...
उनकी सबसे बड़ी दीदी मंद -मंद मुस्कराते हुए चुप खड़ी थी ...जोर देकर पूछने पर उसे बताना ही पड़ा ...
" ये अपनी क्लास की किसी लड़की की बात बता रही थी ...उसका कोई बॉय फ्रेंड है ...जिसने अपने हाथ पर ब्लेड से उसका नाम लिख लिया है ...."
मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था क्यूंकि जिन बच्चों की बात हो रही थी...वे बहुत छोटी बच्चियां हैं ...
मैंने मुड़ते हुए उस बच्ची से पूछा ," बेटा , आपकी उम्र क्या है "
" बारह साल "
"
तुम लोंग इस तरह की बातें किया करती हो"
" आंटी , वो मुझ पर भरोसा करती है इसलिए अपनी सब बात बता देती है "
" उससे कहना कि अगली बार ये बात अपनी दीदी को या मम्मी को बता दे " मैंने उसे हल्का -सा डांट दिया ...

गुड्डे- गुडिया , परियों, राजा -रानी की कहानियों , खेलने कूदने वाली उम्र में बच्चों की ये बातचीत ....कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ ...कुछ समझ नहीं आ रहा ...
बच्चों की मासूमियत , भोलापन कहाँ हवा हो गया है ....
छोटे बच्चे ही नहीं , किशोर उम्र के बच्चों के बीच भी अपने सब्जेक्ट से ज्यादा बातचीत बॉय फ्रेंड , गर्ल फ्रेंड से संबधित ही होती है ...जो वास्तव में ये भी नहीं जानते कि दोस्ती (फ्रेंड ) होती क्या है ...वैसे तो बड़े ही कौन दोस्ती का सही मतलब समझते हैं ...फिर भी ...

मोहल्ले की बेटी अपनी बेटी जैसे माहौल में पले बढे लोंग ऐसे समय में क्या करें ...मैं बहुत दुविधा में पड़ जाती हूँ ...उनके अभिभावकों को कहा जाए या बस चुप रह लें ....असमंजस -सी स्थिति हो जाती है कि कहीं कोई गलत ना समझ ले .... कही न कहीं यह खयाल भी रहता है कि आदर्शवादी बनने के चक्कर में किसी के साथ अन्याय ना हो जाये ...किशोर उम्र की सच्ची चाहत वाले बच्चे अलग हो जाएँ और फिर अपने पचासवें में कोई प्रेम कथा लिखते हुए पाए जाएँ ...
आप भी गुजरते होंगे ना ऐसे दुविधाओं से ...क्या करना चाहिए ऐसे में ...बच्चों को प्यार से समझा कर छोड़ देना चाहिए या उनके अभिभावकों को सचेत कर देना चाहिए ....????

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

मॉल और मोबाइल संस्कृति और मध्यम वर्ग ....




हर शहर में गगनचुम्बी इमारतों में जगमगाते शौपिंग मॉल देश के विकासशील होने की पुष्टि करते नजर आते हैं . कुछ वर्षों पहले तक इन मॉल में खरीददारी करना आम इंसान के वश की बात नहीं थी मगर उदारीकरण की प्रक्रिया ने हमारे देश में एक नव धनाढ्य मध्यमवर्ग को जन्म दिया है . विदेशी कम्पनियों द्वारा मिलने वाले अच्छी तनख्वाह ने अनायास ही अमीर हुए इस वर्ग की संख्या में भारी इजाफा किया है . पढ़ी -लिखी यह पीढ़ी आधुनिक जीवन शैली को अपनाते हुए आज ही जी लेने में विश्वास करती है . अपने जीवन को मौज- मस्ती से गुजारने के लिए इनके हाथ अच्छी कमाई के कारण खुले हुए हैं जो बाजार के ललचाई आँखों का निशाना भी बने है . मॉल-संस्कृति इन्ही नव धनाढ्यों को लुभाने और भुनाने का जरिया है . चमचमाते गगनचुम्बी इमारतों में बने ये मॉल ग्राहकों को विशिष्ट होने का अहसास करते हुए उनके अहम् को संतुष्ट करते हैं . आम मध्यमवर्ग की खरीद क्षमता में वृद्धि होने के कारण आधुनिक जीवनशैली अपनाते यह वर्ग घर और ऑफिस में एयरकंडीशन की हवा खाते हुए पल बढ़ रहा है इसलिए मौज -मस्ती के पलों में भी यह ऐसा ही वातावरण चाहता है जो मॉल संस्कृति उन्हें उपलब्ध करने में सफल होती है . एक ही स्थान पर सभी जरुरत /शौक पूरे करने अवसर उपलब्ध होना , ब्रांडेड माल के प्रति बढती आसक्ति ,प्रकृति से दूर जीवन बिता रहे इस वर्ग को बहुत लुभा रही है बिना इस बात कि परवाह किये कि आम दुकानों के मुकाबले मॉल में एयर कंडीशन ,एक्सेलेटर , लिफ्ट, सुरक्षा व्यवस्था ,बिजली , सफाई आदि का अतिरिक्त खर्चा उनकी जेब से ही वसूला जा रहा है । छोटे दुकानदारों के लिए रोजगार की कमी होने के अलावा मॉल संस्कृति का सबसे बड़ा खतरा कुछ कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में अर्थव्यवस्था के केंद्रीकृत होने का भी है।
मगर फिर भी ...
मॉल संस्कृति के इस पक्ष को जानते हुए भी कुछ तो है जो सुखद लग रहा है । मध्यमवर्ग जहाँ पहले सिर्फ टीवी या फिल्मों में ही मॉल्स देखकर संतुष्ट हो लेते थे, अब आसानी से बेधड़क इनमे प्रवेश कर खरीददारी और इनकी सेवाओं का लुत्फ़ उठा सकता है ...मॉल्स में तफरी करते इन साधारण लोगों के चेहरे पर उच्च वर्ग के साथ खुद को खड़ा देखने की एक तरह की आत्मसंतुष्टि मुग्ध भी करती है ...
इसी तरह जहाँ मोबाइल भी कुछ वर्षों पहले तक लक्जरी ही माना जाता था ,वहीँ आज महरियों , छोटे कामगारों , बागवानों , मजदूरों तक के हाथ में ये खिलौना -सा नजर आने लगा है ...सायकिल पर अपने गंतव्य या कार्यस्थल की ओर जाते इन निम्न वर्ग के लोगों को मोबाइल पर बतियाते या गीत सुनते देखकर कभी -कभी मुझे ख़ुशी भी होती है ...वहीँ अगले ही क्षण ये एहसास भी कचोटता है कि इन बढे हुए खर्चों की पूर्ति वे किस तरह करते होंगे ...जहाँ दो वक़्त के भोजन के लिए उनके जीवन में इतनी मशक्कतें है , क्या उन्हें इन अतिरिक्त खर्चों को वहन कर खुश हो जाना चाहिए ....चलती रहती है दिल और दिमाग की रस्साकशी ...दिल कहता है कि वे थोडा खुश हो लेते हैं तो इस बढे हुए खर्च से क्या फर्क पड़ता है , वही दिमाग टोकता भी है कि ये आवश्यकताएं हैं या सिर्फ दिखावा, क्या इन पर खर्च कर गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाने में सहयोग किया जाना चाहिए ... आप क्या कहते हैं ...??




गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

गरीबनवाज श्री रघुनाथ ...रामचरितमानस से कुछ चौपाईँयां ...

रामचरित मानस की ये चौपाईँआं अर्थ सहित लिखने का कोई प्रवचन देने जैसा उद्देश्य नहीं है ....बदलते समय और समाज के विकास के साथ हमारे जीवन और सामाजिक गतिविधियों , आचार -विचार, नैतिक मूल्यों में भी परिवर्तन होता है ...परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है , और कुछ हद तक इसका पालन भी होना चाहिए ...मगर जब जीवन से जुड़े हर क्षेत्र (राजनीति , खेल , मनोरंजन )में बुरा और ज्यादा बुरा में से चुनने लगे हैं ...तो धर्म को भी इसी बदली दृष्टि के साथ स्वीकार करना चाहिए ...जिस कार्य से जीवन में सहजता हो , वही किया जाए ...आँख मूंदकर लकीर पीटने जैसा ना संभव है , ना स्वीकार्य होना ही चाहिए ...

कुछ और मोती
...



उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करई सप्रीति ...

दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन , शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित सुनकर जलते हैं यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह दास प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है ....

बंदउं संत असज्जन चरना दुखप्रद उभय बीच कछु करना
बिछुरत एक प्राण हरि लेही मिलत एक दारुण दुःख देहि

अब मैं संत और असंद दोनों के ही चरणों की वंदना करता हूँ , दोनों ही दुःख देने वाले हैं परन्तु उनमे कुछ अंतर कहा गया है ..वह अंतर यह है कि एक (संत ) से बिछड़ते समय प्राण हर लेते हैं , वही दूसरे (असंत ) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं ...अर्थात संतों का बिछड़ना मृत्यु के समान दुखदाई है तो असंतों का मिलना भी इतना ही दुःख देने वाला है ....

उपजहिं एक संग जग माहिं जलज जोंक जीमि गुन बिलगाहिं
सुधा सुर सम साधू असाधु जनक एक जग जलधि अगाधू

संत और असंत दोनों ही जगत में एक साथ पैदा होते हैं पर कमल और जोंक की तरह उनके गुण भी अलग- अलग होते हैं। कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है , किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही खून चूसने लगती है साधु अमृत के समान (मृत्युरूपी संसार से उबारने वाला ) और असाधु मदिरा (मोह , प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला ) के समान है दोनों को उत्पन्न करने वाला जगात्रुपी अगाध समुद्र एक ही है ...(शास्त्रों में समुद्रमंथन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बताई गयी है )

भल अनभल निज निज करतूति लहत सुजस अपलोक बिभूति
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू
गुन अवगुन जानत सब कोई जो जेहिं भाव नीक तेहि सोई

भले और बुरे अपनी -अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश संपत्ति पाते हैं अमृत , चन्द्रमा , गंगाजी , साधु , विष और अग्नि कलियुग के पापों की नदी अर्थात कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याघ्र , इनके गुण-अवगुण सब जानते हैं , किन्तु जिसे जो भाता है , उसे वही अच्छा लगता है

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा उभय अपार उदधि अवगाहा
तेहिं ते कुछ गुन दोष बखाने संग्रह त्याग ना बिनु पहिचाने

दुष्टों के पापों और अवगुणों और साधुओं के गुणों की कथाएं, दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं इसी से कुछ गुणों और दोषों का वर्णन किया गया है क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण अथवा त्याग नहीं हो सकता है

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए गनि गुन दोष बेद बिलगाए
कहहिं बेद इतिहास पुराना बिधि प्रपंचु गुन अवगुण साना

भले - बुरे सभी ब्रह्मा के ही पैदा किये हुए हैं , पर गुण और दोषों का विचार कर वेदों ने उनको अलग - अलग कर दिया है वेद, इतिहास , और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण - अवगुणों से भरी सनी हुई है

अस बिबेक जब देई बिधाता तब तजि दोष गुनहिं मनु राता
का सुभाऊ करम बरिआई भलेउ प्रकृति बस चुकई भलाई

विधाता जब इस प्रकार का विवेक (हँस का सा ) देते हैं तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है काल -स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु ) भी माया के वश में होकर कभी -कभी भलाई से चूक जाते हैं ...

जो सुधरी हरिजन जिमि लेहिं लि दुःख दोष बिमल जासु देहिं
खलकरहिं भाल पाई सुसंगूमिटहिं मलिन सुभाउ अभंगू

भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख दोषों को मिटाकर निरमल यश देते हैं , वैसे ही दुष्ट भी कभी -कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं , परन्तु कभी भंग होने वाला उनका मलिन स्वभाव नहीं मिटता है ...

लखि सुबेष जग बंचक जेऊबेष प्रताप पूजिअहिं ते
उघरहिं अंत होई निबाहूकालनेमि जिमि रावण रहू

जो ठग हैं , उन्हें भी अच्छा वेश बनाये देखकर बेष के प्रताप से जग पूजता है , परन्तु एक --एक दिन उनके अवगुण चौड़े (दोष जाहिर होना ) ही जाते हैं , अंत तक उनका कपट नहीं निभता जैसे, कालनेमि , रावण और राहू का हाल हुआ

कियेहूँ कुबेष साधु सनमानूजिमी जग जामवंत हनुमानू
हानि कुसंग कुसंगति लाहूलोकहूँ बेद बिदित सब काहू

बुरा वेश बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है , जैसे जगत में जाम्बवान और हनुमानजी का हुआ बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है , यह बात लोक और वेद में हैं और सब जानते हैं ...


कुछ विशेष ...
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥

भावार्थ:-वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, गरीब नवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्री हरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देने वाली बनाते हैं

इस चौपाई में श्री रघुनाथ के लिए गरीबनवाज और सूफी हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह (अजमेर ) का गरीबनवाज के नाम से प्रसिद्द होना ...सुखद ही तो है .... !


प्रयत्न तो बहुत किया है कि सही शब्द ही लिखूं , फिर भी जो त्रुटियाँ रह गयी हैं , उनके लिए अल्पज्ञ मान कर क्षमा करें ...

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

रामचरितमानस से चुन लिए कुछ मोती...

नोट ...यह प्रविष्टि कोई प्रवचन या उपदेश नहीं है . रामचरितमानस को अर्थ सहित समझने का प्रयास मात्र है ...

रामायण और रामचरितमानस हिन्दू संस्कृति के प्रमुख ग्रन्थ हैं ...हर घर में इनका होना अनिवार्य है ...श्रीराम के जीवनवृत पर आधारित श्रद्धा से जुडी होने के कारण अतुलनीय पूज्यनीय तो है ही मगर ....सिर्फ धर्म की दृष्टि से ही नहीं , कविता या महाकाव्य के रूप में भी यह विलक्षण है ...अलंकारों का ऐसा सुन्दर उपयोग और किसी भी महाकाव्य या ग्रन्थ में नहीं है ....इसे पढ़ते हुए व्यकित चकित , चमत्कृत रह जाता है ...इतनी असाधारण प्रतिभा दैवीय ही हो सकती है ....

वाल्मीकि को संसार का आदि कवि माना जाता रहा है क्यूंकि उनके सम्मुख कोई ऐसी रचना नहीं थी जो उनका पथ प्रदर्शन कर सके ...इसलिए रामायण महाकाव्य उनकी मौलिक कृति है और इसलिए ही इस महाकाव्य को आदिकाव्य भी कहा जाता है ...
वाल्मीकि रामायण संस्कृत का महाकाव्य है जिसमे वाल्मीकि ने राम को असाधारण गुणों के होते हुए भी उन्हें एक मानव के रूप में ही चित्रित किया है ...जबकि रामचरितमानस में तुलसीदास ने राम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में ...

चुन लाई हूँ कुछ मोती ...आप भी आनंदित हो लें ...

तुलसीदास की राम के विवरण और वर्णन में अपनी असमर्थता को प्रकट करती विनम्रता देखते ही बनती है...परन्तु कुटिल खल कामियों को हंसी- हंसी में विनम्रता के आवरण में कब तंज़ कर जाते हैं , पता ही नहीं चलता ....

मति अति नीच ऊँची रूचि आछी चहिअमि जग सुर छाछी ।।
छमिहहिं सज्जन मोरी ढिठाई सुनिहहिं बालबचन मन भाई ।।

मेरी बुद्धि तो अत्यंत नीची है , और चाह बड़ी ऊँची है चाह तो अमृत पाने की है पर जगत में जुडती छाछ भी नहीं है सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर सुनेंगे

जों बालक कह तोतरी बाता सुनहिं मुदित मन पित अरु माता
हंसीहंही पर कुटिल सुबिचारी जे पर दूषण भूषनधारी

जैसे बालक तोतला बोलता है , तो उसके माता- पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते हैं किन्तु कुटिल और बुरे विचार वाले लोंग जो दूसरों के दोषों को ही भूषण रूप से धारण किये रहते हैं , हँसेंगे ही ...

निज कवित्त कही लाग नीका सरस होई अथवा अति फीका
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं ते बर पुरुष बहुत जग नाहिं

रसीली हो या फीकी अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं , ऐसे उत्तम पुरुष (व्यक्ति ) जगत में बहुत नहीं हैं ...

जग बहू नर सर सरि सम भाई जे निज बाढहिं बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई देखी पुर बिधु बाढ़ई जोई

जगत में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक है जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं . समुद्र - सा तो कि एक बिरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देख कर उमड़ पड़ता है ...


महाकाव्य लिखने में तुलसी की विनम्रता देखते ही बनती है ...जहाँ आप -हम कुछेक कवितायेँ लिख कर अपने आपको कवि मान प्रफ्फुलित हो बैठते हैं और त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाते ही भृकुटी तान लेते हैं , वहीँ ऐसा अद्भुत महाकाव्य रचने के बाद भी तुलसीदास खुद को निरा अनपढ़ ही बताते हैं ...

कबित्त विवेक एक नहीं मोरे . सत्य कहूँ लिखी कागद कोरे ...

काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझे नहीं है , यह मैं शपथ पूर्वक सत्य कहता हूँ ...
मगर श्री राम का नाम जुड़ा होने के कारण ही यह महाकाव्य सुन्दर बन पड़ा है ..

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी . अहि गिरी गज सर सोह तैसी
नृप किरीट तरुनी तनु पाई . लहहीं सकल संग सोभा अधिकाई ...

मणि, मानिक और मोती जैसी सुन्दर छवि है मगर सांप , पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी सोभा नहीं पाते हैं ...राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर पर ही ये अधिक शोभा प्राप्त करते हैं ..

अति अपार जे सरित बर जून नृप सेतु कराहीं .
चढ़ी पिपिलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं..

जो अत्यंत श्रेष्ठ नदियाँ हैं , यदि राजा उनपर पुल बंधा देता है तो अत्यंत छोटी चीटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना परिश्रम के पार चली जाती हैं ...

सरल कबित्त कीरति सोई आदरहिं सुजान ...

अर्थात चतुर पुरुष (व्यक्ति ) उसी कविता का आदर करते हैं , जो सरल हो , जिसमे निर्मल चरित्र का वर्णन हो ...

जलु पे सरिस बिकाई देखउं प्रीति की रीती भली
बिलग होई रसु जाई कपट खटाई परत पुनि ..

प्रीति की सुन्दर रीती देखिये कि जल भी दूध के साथ मिलाकर दूध के समान बिकता है , परन्तु कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है ) स्वाद (प्रेम )जाता रहता है ...

दुष्टों की वंदना और उनकी विशेषताओं का वर्णन बहुत ही सुन्दर तरीके से किया है ...
संगति का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ...इसको भी बहुत अच्छी तरह समझाया है ..-

गगन चढ़इ राज पवन प्रसंगाकीचहिं मिलइ नीच जल संगा
साधु असाधु सदन सुक सारिणसुमिरहिं राम देहि गनि गारीं

पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले ) जल के संग में कीचड़ में मिल जाती है ...साधु के घर में तोता मैना राम -राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता मैना गिन गिन कर गलियां बकते हैं ...

धूम कुसंगति कारिख होई लिखिअ पुरान मंजू मसि सोई
सोई जल अनल अनिल संघाता होई जलद जग जीवन दाता

कुसंग के कारण धुंआ कालिख कहलाता है , वही धुंआ सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखने के काम आता है और वही धुंआ जल , अग्नि और पवन के संग मिलकर बादल होकर जगत में जीवन देने वाला बन जाता है ...

नजर और नजरिये के फर्क को भी क्या खूब समझाया है ...
सम प्रकाश तम पाख दूँहूँ नाम भेद बिधि किन्ह।
ससी सोषक पोषक समुझी जग जस अपजस दिन्ह॥

महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान रहता है , परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है . एक को चन्द्रमा को बढाने वाला और दूसरे को घटाने वाला समझकर जगत ने एक को यश और दूसरे को अपयश दिया ...



क्रमशः