शनिवार, 18 सितंबर 2010

भागवत में कृष्ण ....

अभी पिछले दिनों एक परिचित का घर आना हुआ ...सेवानिवृति के बाद उनका ज्यादा समय धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन , तीर्थस्थान भ्रमण , भागवत -रामायण सुनते पढ़ते ही बीतता है ...भागवत श्रवण में कई रोचक जानकारियों और प्रेरक प्रसंगों से प्रभावित होकर उन्होंने इन्हें कलमबद्ध किया है ...मेरे पढने के शौक को देखते हुए एक प्रति मुझे भी थमा गए .....हालाँकि यह सबकुछ विद्वान् लेखकों की पुस्तकों में पढने को मिल सकता है , मगर मुझे सरल सहज शब्दावली के कारण कई अबूझे से प्रसंगों का ज्ञान इस पुस्तिका से प्राप्त हुआ ... अभी उनसे अनुमति नहीं ले पायी हूँ इसलिए उनका नाम नहीं लिख रही हूँ ...

उनका कहना है ....." मेरा इन प्रसंगों को लिखने का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि भागवत की कथाओं का सार तथा उनके ज्ञान का प्रसार प्रचार घर बैठे काम समय में हो सके ....

कृष्ण के मथुरा जाने के बाद पुनः राधा से उनका मिलना कब हुआ ...विभिन्न पुस्तकों में कोई जानकारी नहीं मिल सकी थी या फिर उनकी गूढ़ भाषा में उलझ कर रह गयी ...इस छोटी से पुस्तिका में उन्होंने इसका वर्णन इस प्रकार किया है ....

भागवत वेद रूपी वृक्ष का पका फल है तो तोते की ज्ञान रूपी चोंच से मीठा है ....जगत का आधार कृष्ण है और कृष्ण का आधार राधा है परन्तु भागवत में राधा का नाम भी नहीं आया है .....इसके चार कारण बताये गए हैं ...
1. शुकदेव की गुरु राधा थी "
. राधा गुरु मंत्र है
3.राधा कृष्ण का आधार है
4. कृष्ण ही राधा है राधा ही कृष्ण है अर्थात राधा एक महाशक्ति है

इनका जन्म नहीं हुआ है । राधा अयोनिज है । वह कमल से पैदा हुई । इसी प्रकार सीता पृथ्वी से तथा रुक्मिणी कमल के पत्तों से । कृष्ण की एक ज्योति को भी राधा माना गया है । कृष्ण 11वर्ष की उम्र तक ही वृन्दावन में रहे इसी कारण इस लीला को वात्सल्य लीला कहते हैं ...
कृष्ण का राधा के प्रति प्रेम देख कर कहा गया है कि ---
राधा तुम बड़भागिनी , कौन तपस्या कीं
तीन लोक तारण तरन , इसमें मेक मीन

वृन्दावन सो वन नहीं , नन्द गाँव सो गाँव
राधा जैसी भक्ति नहीं , मित्र सुदामा जान ॥

11वर्ष की बाल्यावस्था में राधा व कृष्ण बिछड़ते हैं , कृष्ण ने राधा को केवल बांसुरी दी थी जिसे उसने जीवन पर्यंत यादगार के रूप में अपने पास रखी । वापिस कब मिलना होगा , ऐसा पूछने पर कृष्ण भी बता नहीं पाए ...इसलिए कहा है :-
" बंशी दिए जात हूँ , राधा मेरे समान
अबके बिछड़े कब मिले , कह सके भगवान्

राधा -कृष्ण का बचपन का अमर वात्सल्य प्रेम था । राधा व कृष्ण का विवाह नहीं हुआ था ... आचार्य चतुर सेन शास्त्री के अनुसार राधा व कृष्ण दोनों ही 11वर्ष की अवस्था में बिछड़ते हैं और जीवन के लम्बे थपेड़े खाते हुए 80 वर्ष की अवस्था में जब प्रेम रूपिणी वियोगिनी राधा वृद्धा ,अंधी और जर्जर हो जाती है तथा कृष्ण शोक , दग्ध , भग्न और अभिशप्त हैं तो दोनों का मिलन महा -शमशान में होता है । दोनों अपने पुत्र - पुत्रों को ढूँढने कुरुक्षेत्र में आये थे । प्रेम के प्रभाव से जीवन कहाँ कैसा बीता , वे जानते नहीं थे । वास्तव में उनका मिलन कारण रूप है , कार्य रूप नही ....

राम 12 कला के अवतार थे तो कृष्ण 16 कला के अवतार थे । कृष्ण ने सान्दीपन गुरु से उजैन में शिक्षा ली तथा गुरु के मारे हुए पुत्र को पुनः जीवित किया । कृष्ण ने सिर्फ 64 दिन तक की शिक्षा प्राप्त कर 64 विद्याएँ सीखी । कृष्ण योगीराज थे , मोर भी योगी होता है । उसके आंसुओं को पीकर ही मोरनी गर्भवती होती है । इसी कारण योगी मोर की पंखुड़ी योगिराज कृष्ण धारण करते थे । कृष्ण 4वर्ष गोकुल में व 11 वर्ष 55 दिन वृन्दावन में रहे ।
कृष्ण ने वृन्दावन में चार वस्तुओं का त्याग किया था ...
1 कृष्ण ने कभी मुंडन नहीं कराया
2. चरण पादुकाएं नहीं पहनी अर्थात नंगे पाँव घूमे
3. कभी शास्त्र नहीं लिया
4. कभी सिले वस्त्र नहीं पहने

कृष्ण के वृन्दावन में पैदल घूमने के कारण ही आज उस धाम की मिट्टी को सर पर लगाते हैं , पवित्र मानते हैं । वृन्दावन की सेवा कुंज में आज भी सूर्यास्त के बाद नर , वानर , पशु व पक्षी नहीं जाते हैं ...इस सेवा कुंज की विशेषता है कि इसमें न तो फल लगते हैं , न ही फूल ...इसमें पतझड़ का असर भी नहीं होता ...

भागवत में सतयुग में विष्णु का ध्यान , त्रेता में यज्ञ का , द्वापर में कृष्ण- सेवा का तथा कलयुग में नाम- जप का महत्व बताया गया है । कलयुग में मानसिक पुण्य का फल मिलता है तथा मानसिक पाप का फल नहीं मिलता । राजा परीक्षित को सर्प डसने का शाप जब श्रृंग ऋषि के पुत्र ने दिया तो श्रृंग ऋषि ने नाराज होकर अपने पुत्र को श्राप दिया कि कलयुग में ब्राह्मण का श्राप नहीं लगेगा । कृष्ण स्वयं भी शापित थे ....


भागवत के कुछ चुने हुए प्रसंग अगली कड़ी में ...


अभी मेरी पसंद से सुनिए वाणी जयराम की आवाज़ में मीरा का एक गीत ....



शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

समय बदल तो गया है ....

कल सुबह डोरबेल बजी तो गेट पर जाकर देखा ....एक बहुत प्यारी सी साफ़ सुथरी बच्ची अपने हाथों में कगज पेन लिए नजर आई ...
मुझे देखते ही बोली ..." 40रुपीज़ , प्लीज़ " ....

एकबारगी मुझे आश्चर्य हुआ ...किस बात के दे दूं इसे चालीस रूपये ....चंदा मांगने वालों की भी हद है ...बोलकर बताएँगे कि इतने रूपये तो दो ही दो ...

आस पास के विद्यालायों से बच्चे अक्सर आ जाते हैं इस तरह की राशि वसूलने ...हर बच्चे को रसीद बुक थमा दी जाती है कि इतना रुपया तो तुम्हे वसूलना ही है ,किसी भी तरह लाओ , चाहे अपने चेहरे की मासूमियत का फायदा उठाओ , मीठे वचन बोलो , गिडगिडाओ या मनुहार करो ....(देश के भावी कर्णधारों को इसतरह ट्रेंड किया जाता है , भविष्य में कभी मांगने- टांगने में शर्म नहीं आये , चलो ये फिर भी ठीक ही है , कम से कम लाठी बल्लम से जबरन वसूल करना तो सिखाया नहीं जा रहा )
ये आजकल के बच्चे ...ये भी बहुत स्मार्ट हैं ...कौन अपने मम्मी पापा की जेब खाली करवाते हैं ...वो तो अपने जेब खर्च के लिए सेफ रखते हैं ...रसीद बुक भरवाने का काम तो पड़ोसियों से भी किया जा सकता है ...अब आप बताये , कौन माना कर सकता है , अगर ४ घर छोड़ कर आपके पडोसी का बच्चा अपनी मासूम सी शक्ल लिए आपके दरवाजे पर खड़ा मिल जाए
" आंटी जी , हमारे स्कूल में चिकित्सा शिविर लग रहा है , गरीबों को निःशुल्क हेपीटाईटीस का टीका लगाया जाएगा " तो कौन आंटी जी या अंकल जी मना कर पायेंगे , मन ही मन लाख बुदबुदाते रहें कि
" अपने माँ- बाप से क्यों नहीं मांग लेता बे " , मगर शिष्टाचार के नाते जेब खाली ही करनी पड़ती है ...

खैर , उस बच्ची को देखकर मैंने पूछा " आज किस बात का चंदा इकठ्ठा कर रही हो "
वह अचकचा कर मुंह देखने लगी ..." मम्मी ने कहा है सबसे लेने को , वो पीछे रही हैं "
हद हो गयी , अब मम्मियां भी चंदा वसूली में बच्चों का साथ देने लगी ....थोडा आगे बढ़ कर देखा तो ...हमारे मोहल्ले की सफाई कर्मी पड़ोसी के गेट के बाहर सफाई अभियान में जुटी हुई थी ...मुझे देखते ही मुस्कुरा दी ...
" बच्चों की छुट्टियाँ चल रही है , इसलिए अपने साथ ले आई "
अब सुखद आश्चर्य में घिरने की बारी मेरी थी ...मैं पूजा से बात करने लगी ...
पूजा ...यानि सफाईकर्मी माया की बेटी ...शहर के एक अच्छे डे बोर्डिंग (अंग्रेजी माध्यम )स्कूल में पढ़ती है ...और छूट्टियों में माँ की मदद भी करती है ...
मैंने माया से कहा " ये तो बहुत अच्छी बात है , तुम अपनी बेटी को इतनी अच्छी स्कूल में पढ़ा रही हो "
पल्लू से पसीना पोंछते हुए कहने लगी माया ." हाँ , दोनों बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं , अब हम दोनों तो दिन भर काम में लगे रहते हैं , घर जाकर बच्चों को पढाना , उन पर ध्यान देना संभव नहीं हो पाता , इसलिए डे बोर्डिंग में दाखिला करवा दिया है , "
शाबास माया , ये तुमने बहुत अच्छा किया ...पता नहीं क्यूँ , मुझे इतनी ख़ुशी हो रही थी ...
माया बहुत हंसमुख है और अपने काम की पक्की ...सफाई ढंग से नहीं की जाने की शिकायत करो तो झट बोल देती है ," भाभीजी , अभी कल तो इतनी बढ़िया सफाई की थी " आम सफाईकर्मियों से अलग है उसका रहनसहन , बोलचाल ...कई बार अपने घर परिवार की बातें सुनाने लग जाती है ...
अभी थोड़े दिनों पहले बड़ी ख़ुशी ख़ुशी बोली , " आप लोगो के आशीर्वाद से एक प्लाट लिया है , वहां काम चल रहा है , इसलिए ज्यादा समय वहीँ देना पड़ता है "
तीज त्यौहार पर कह देगी ." भाभी जी , लाओ कौन सी साड़ी ला रहे हो "
" हाँ , तू मेरी बहन बेटी है जो हर त्यौहार पर तुझे साडी दूं ,".. मैं चुटकी लेती हूँ ,
" कौन सी नयी मांग रही हूँ " ...मैं उसे नयी साडी भी देती हूँ कई बार , मगर मुझे जरा भी अफसोस नहीं होता ...वह व्यवहारकुशल है , अपनी शिकायत को भी सकारत्मक लेती है , और अब अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा की बात कर तो उसने मेरा दिल ही जीत लिया ...

एक जमाना था जब ये लोंग सिर्फ डांटफटकार के अभ्यस्त होते थे ...अल्प आयवर्ग के लोगों में अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति इतनी जागरूकता देखकर अच्छा लगता है ...क्या कभी पहले इन लोगों के लिए ऐसा सोचा भी जा सकता था ..?
अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों का मुख्य धारा में आना एक सुखद बदलाव है ...सचमुच समय बदल तो रहा है ..

समय तो हमारे हिंदी ब्लॉगजगत का भी बदल रहा है ...पिछले एक साल में कितना परिवर्तन हुआ है ...जब ब्लॉगिंग शुरू ही की थी , बहुत अच्छा माहौल था , ब्लॉगर्स का आपसी सद्भाव देखने योग्य था ...सब एक परिवार की तरह ही लगते थे ....अभी कुछ दिनों पहले ताऊ रामपुरिया जी ने और हरकीरत हीर ने अपनी पोस्ट में यहाँ का माहौल बदलने का जिक्र कर जैसे मेरे ही मन की बात कह दी ...

लगभग रोज या दिन में २-३ पोस्ट लिखने वाले अन्तराल पर लिखने लगे हैं , आलसी नियमित हो गए हैं ..धीमे चलने वाले सुपरफास्ट हो गए हैं , संतुलित टिप्पणियों से मोह लेने वाले हंगामेदार पोस्ट लिखने लगे हैं ...कवितायेँ ,आलेख लिखने वाले ऊँचे पहाड़ों की गोद में जा बैठे है , वही निर्मम सत्य कहने वाले प्रेम के अनुसंधान में लगे हैं , गीत ग़ज़लकार क्रांति की बात करने लगे हैं , नारी का सम्मान करने वाले फिकरे कसने लगे हैं , नारियों के असम्मान के लिए कुख्यात उनके सम्मान और अधिकार की बात करने लगे हैं ...सचुमच माहौल बदला तो है ...पारिवारिक भावना तो पूरी तरह गायब हो चुकी है ...कोई किसी को ललकार रहा है , कोई धमका रहा है , कोई चुटकियाँ ले रहा है , तो कोई आग लगा कर तमाशा देख रहा है ...
कोई जातिवाद पर तो कोई साम्प्रदायिकता पर अड़ा है ...कमोबोश जो स्थिति पूरे देश की है , वही यहाँ भी नजर आने लगी है ....शिक्षा का प्रभाव मानूं या दुष्प्रभाव ....
उच्च शिक्षितों की बढती संख्या इस देश का सौभाग्य है या दुर्भाग्य....
मेरे दिल और दिमाग की रस्साकसी जारी है ...!

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

गोवर्धन परिक्रमा

"दूर हटो..जाने दो... "

गोवर्धन यात्रा के परिक्रमा पथ अपने परिजनों से दूर निकल चुकी वृंदा जैसे- तैसे धकियाते हुए पीछे मुडकर अपनी ननद और जिठानी से जा मिली
उसने देखा कि श्रीकृष्ण का जयघोष करते हुए बच्चे और उनका पीछा करते हुए उनके पिता काफी आगे निकल चुके थे । यह तीनो महिलाएं इधर -उधर की बातें करते हुए कभी तेज तो कभी मंथर गति से अपना परिक्रमा पथ पूरा कर रही थी।

वर्ष का आखिरी दिन था । वृंदा के पति हर्ष ने इस बार अपने भाई और बहन के परिवार के साथ २१ किलोमीटर की गोवेर्धन परिक्रमा पैदल करते हुए पुराने वर्ष की विदाई और नववर्ष का स्वागत इस अनूठे अंदाज़ में करने का मन बनाया था । हर्ष के बड़े भाई अंश , उनकी पत्नी रजनी और दोनों बेटे जय और विजय , बहन राखी अपने पति रोशन और दोनों पुत्र शुभ और लाभ के साथ थे , वही हर्ष अपने पत्नी वृंदा और दोनों बेटियों कृति और यामिनी के साथ थे।

उनका पहला दिन तो श्रीकृष्ण के जन्मस्थल और वृन्दावन की गलियों में विभिन्न मंदिरों में दर्शन करते बिता । एक खुली जगह में गाड़ी पार्क करने के बाद छोटी तंग गलिओं में पैदल चलते हुए मंदिरों की मनोरम झांकियां उन्हें रोमांचित कर रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो अभी यही कहीं गलियों में कृष्ण अपने बाल गोपाल मित्रों के साथ माखन चुराते रँगे हाथ पकड़े जायेंगे या कहीं यमुना तट पर अपनी बांसुरी की मधुर धुन से राधा और गोपियों को मंत्रमुग्ध करते बस नजर आने ही वाले हैं। आज प्रातः अँधेरा रहते ही यमुना का दर्शन लाभ कर उन्होंने अपनी गोवर्धन यात्रा प्रारम्भ की थी।

बच्चों के हुजूम ने जब बहुत देर तक अपनी माँओं को साथ नही देखा तो एक स्थान पर रुक कर उनका इंतज़ार करने लगे।
कृति तेज क़दमों से लपकते हुए वृंदा के पास आते हुए बोली .."मां..परिक्रमा पूरी भी करनी है ..थोड़ा तेज चलिए। "
"अभी चलते हैं बेटा ..थोड़ा रुक कर चाय या जूस ले लें " जब वृंदा ने यह कहते हुए बेटी को पास खिंचा तो वह छिटक कर दूर जा खड़ी हुई।
"मां..मैं सब जानती हूँ आपकी चालबाजियां ..मैं बैठने वाली नही हूँ ."

दरअसल घर से रवाना होते हुए उनके परिचित ने , जो गाड़ी चला रहे थे , कृति के दुबलेपन पर हँसते
हुए
कह दिया था .."यह पार्टी तो फ़ेल होने वाली है ...इसके लिए तो रिक्शा करना होगा। "
बस फिर क्या था ..जिद पर अड़ गयी कृति .

"दुबले होने से क्या होता है ..देखना मैं कहीं बैठे बिना ही अपनी परिक्रमा पूरी करूंगी।"

बहुत जोर दिए जाने पर जब वे लोग चाय या जूस पीने के लिए रुके भी तो बस दिवार का सहारा लेकर खड़ी ही रही। पूरे परिक्रमा पथ पर वृद्धों और बच्चों की सुविधा के लिए रिक्शा का इंतजाम भी है । अक्सर घर के बुजुर्ग छोटे बच्चों के साथ रिक्शे में सवार हो कर अपनी परिक्रमा पूरी करते हैं ,जबकि बाकि सदस्य उनके पीछे पैदल ही चलते है। सड़क के दोनों किनारे बनी सैकडों दुकानें और उनसे गूंजती भजनों की आवाजों से सुर मिलते दौड़ते -भागते से पदयात्रियों के साथ उसी भीड़ का हिस्सा बनना भावविभोर कर देता है।

कुछ दूर ही चले थे कि...
" बुआ ..कुछ दे जा...भगवान् तेरे कान्हा सा भतीजा देगा,"

कहते हुए कुछ मांगने वाली महिलाओं ने इस बार राखी को घेर लिया। गज़ब होता है इनका मनोविज्ञान भी । अच्छी तरह जानती है कि क्या कहने पर ज्यादा बख्शीश मिल सकती है।

"अब इसने ऐसी बात कह दी है कि कुछ तो देना ही पड़ेगा।" राखी अपने पर्स में से खुले पैसे टटोलते हुए बोली।
"अरे! छोडिये राखीजी ...आप किस किस को देंगी..यहाँ तो हर दो कदम पर यही हाल है। और फिर बेटा चाहिए किसको ..मैं तो अपनी दो बेटियों से संतुष्ट हूँ। "

दो बेटियाँ ही होने के कारण कई बार वृंदा को ऐसी व्यर्थ और जबरदस्ती की सहानुभूति का सामना करना पड़ जाता है,हालाँकि परिवार छोटा रखने का फैसला उसने और हर्ष ने आपसी सहमति पर ही तय किया था मगर अपने मध्यमवर्गीय परिवेश में जब -तब उन्हें इस तरह की दया और करुणा को झेलना ही पड़ता है।यहाँ तक कि उनके द्वारा किये गए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को एक पुत्र हो जाने के मन्नत से से जोड़ कर देखा जाता है ।

"कोई बात नही ...आपको बेटा नहीं चाहिए तो ..दो भाभियाँ और भी तो है।"
पर्स से निकली रेजगारी उन महिलाओं में बांटती हुए उन महिलाओं से राखी बोली ..." अब तो अच्छा सा आशीर्वाद दे दे..."

हाँ.. जरुर बेटा ही देंगे रामजी...कहती हुई वे दूसरे शिकार की ओर लपक पड़ीं।

वृंदा को ख्याल आया, उसकी दोनों देवरानी गर्भवती थी और इसीलिए परिक्रमा पर उनके साथ नही आ पाई थी। बड़ी देवरानी के एक लड़का है और छोटी देवरानी के एक लड़की है और दो बार लिंग परिक्षण कर गर्भपात करवाने के बाद फिर उम्मीद से है।

सोचती है वृंदा कई बार... सामाजिक सुधार पर लंबे चौडे भाषण देना व दूसरो को समझाना जितना आसान है उतना ही मुश्किल है परिवारजनों पर दबाव डाल कर रोक पाना। नवरात्री में कन्यों की पूरे विधिविधान से पूजा करने वाले लोगों की आत्मा कन्या भ्रूणों की हत्या करने की गवाही कैसे देती है ? कभी कभार दबी जबान में वह अपना विरोध व्यक्त करती भी है ..." एक ओर तो हम नवरात्र में कन्यों का पूजन करते हैं और एक ओर उन्हें जन्म से पहले मारने का पाप "... जब एक बार किसी नजदीक की रिश्तेदार ने दो बेटियों की मां होने के कारण उसपर कटाक्ष करते हुए कह दिया " अंगूर खट्टे हैं ।" तब से ऐसे मुद्दों पर कम से कम परिवारजनों के बीच वह मुंह बंद ही रखती है।


वृंदा तो चुप रही मगर कृति बोले बिना नही रह सकी ...
" पढ़े लिखे लोगों को भी पता नही यह बात कब समझ आएगी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अन्तर नहीं है । सही देखभाल और अवसर मिलने पर लड़कियां भी वो सब कुछ कर सकती हैं जो लड़के कर सकते हैं । अब तो लड़कियां अन्तरिक्ष तक भी जा पहुँची हैं। "

बेटी का मूड ख़राब होते देख वृंदा ने समझाया ..."अपने घर में तो ऐसा माहौल नहीं है ना... और फिर इतना बुरा लगता है तो ख़ुद को ऐसा बनाओ कि सभी कहें कि लड़कियां किसी मायने में लड़कों से कम नहीं है। "

यह सब बातचीत चल ही रही थी कि तब तक वृंदा के पति हर्ष भी वहां पहुँच गए और बेटी से थोड़ा रुक कर आराम करने के लिए कहने लगे।
" इस अपनी बेटी को संभालिये मैं तो कह कर थक चुकी। " गर्व होता है वृंदा को अपने पति हर्ष पर। हर्ष ने ना सिर्फ़ हर कदम पर उसका साथ निभाया है वरन एक बहुत अच्छे पिता होने का फ़र्ज़ भी निभाया है। एक पुत्र होने की स्वाभाविक चाह और सामाजिक दबाव को दरकिनार रखते हुए उसने अपनी बेटियों को हमेशा अच्छी परवरिश दी है। उसके मार्गदर्शन और संरक्षणने बच्चों को अच्छे संस्कार और मजबूत आधार प्रदान किया है.

" क्यों बच्चे ...क्या हुआ..??
हर्ष ने कृति का हाथ पकड़कर साथ चलते हुएउसके उदास होते चेहरे को देखते हुए पूछा ।

"कुछ नही पापा...यह देखिये ना..लोग कैसे प्रसाद का अनादर करते हुए चल रहे हैं..."
बात
बदलते हुए कृति बोली।
रास्ते में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए प्रसाद के दोने बिखरे पड़े थे। तीर्थ विशेष में ही दान किये जाने का पुण्य लाभ अर्जित करने वाले कई स्थानों पर प्रसाद वितरण कर रहे थे . पदयात्रियों से हाथ जोड़कर प्रसाद लेने का निवेदन करते , कभी- कभी तो जबरदस्ती हाथ में ही थमा देते ...उसने देखा वही आगे जाकर भिखारियों को दोने पकड़ा रहे थे मगर पेट भरा होने के कारण भीख में प्रसाद की बजाय रूपये पैसे मांगते भिखारी उन दोनों को यहाँ वहां सड़क के किनारे फेंक रहे थे ...कई स्थानों पर बंदरों के लिए केले बांटते श्रद्धालु भी नजर आये ...बिखरा हुआ प्रसाद , फलों के छिलके पूरे वातावरण को दूषित कर रहे थे ...अब इस तरह कौन सा पुण्य बटोर जा रहा था , ये उसे कभी समझ नहीं आया ।

तभी फिर से कुछ महिलाओं ने आकर घेर लिया। राखी को दान करते देख अब यह महिलाएं और बच्चे और पैसे मिलने की चाह में उसके इर्द गिर्द ही मंडराते रहे थे। इस बार हर्ष को साथ देख बोली ...
" बाई...तेरा जुग़ जुग़ जिए भाई ....कुछ तो हमें भी दे दे..."

अपने पीछे पड़े इस काफिले को देख कर अब तक राखी बहुत झुंझला चुकी थी। इस भीड़भाड़ से निकलने की उसकी कवायद को देखते हुए कृति मुस्कुरा पड़ी ...
" हाँ हाँ ...बुआ ...थोड़ा कुछ दान पुण्य और कर लो ...अजन्मे भतीजे के लिए तो इतना दान कर दिया ...सामने खड़े भाई के लिए कुछ नही करोगी."
मां
के चुप रहने का इशारा करने को अनदेखा करते हुए भी कृति बोल पड़ी। अब झेंपने की बारी राखी की थी।

जय श्री राधे के जयघोष के साथ तेज क़दमों से सभी चल पड़े अपनी परिक्रमा पूरी करने।
जय श्री राधे ...!! जय श्री कृष्ण ...!!