मंगलवार, 5 जनवरी 2010

वह एक नदी थी


वह एक नदी थी ....
जब
तुमसे मिली थी
बहती
थी अपनी रौ में
कल- कल करती.... कूदती- फांदती
प्यार
की फुहारों से भिगोती
इठलाती थी.... इतराती थी
चंचल शोख बिजली- सी बल खाती थी
पर ....
तब
तुम्हे कहाँ भाती थी ......!!

राह में उसके कंकड़- पत्थर भी थे
कुछ
सूखे हुए फूल
कुछ गली हुई शाखाएं भी
कुछ अस्थि कलश जो डाले थे किसी ने
किसी अपने को मोक्ष प्रदान करने के लिए
कुछ टोने टोटके बंधे धागे जो बांधे थे किसी ने
अपने पाप किसी और के सर मढने के लिए
गठरी
बंधी थी कामनाओं की ...वासनाओं की
जो
बांधी थी कुछ अपनों ने कुछ बेगानों ने
और
भी ना जाने क्या क्या था उसके अंतस में
था
जो भी ....उसके अंतस में
ऊपर
तो थी बस
कल
-कल करती मधुर ध्वनि

पर ....
तुम्हारी
नजरे तो टिकी थी
बस
अंतस की गांठों को तलाशने में
उस तलाश में तुमने नहीं देखा
उसकी
पावन चंचलता को
क्या
- क्या नाम दिए तुमने
उसकी
चपलता को
तुम
ढूंढते ही रहे कि ...कोई सिरा मिल जाये
कि
रोक पाओ उसे ....बांध पाओ उसे
और
कुछ हद तक बांधा भी तुमने उसे

पर ... क्या तुम्हे पता नहीं था ....!!
धाराएँ
जब आती हैं उफान पर
सारे तटबंधों को तोड़ जाती हैं
कोई दीवार नहीं बाँध पाती है
और
अगर दीवारों में बंध जाती है
तो नदी कहाँ कहलाती है ....
नदी
का पानी जब ठहर जाता है
कीचड हो जाता है ...
क्या
तुम्हे पता नहीं था ...!!

पर ...जरा ठहरो ....
अपनी
दीवारों पर इतना मत मुस्कुराओ
उम्मीद की एक किरण अभी भी बाकी है
कीचड
में फूल खिलाने का हुनर
नदी जानती है
कभी हार कहाँ मानती है
नदी
हमेशा मुस्कुराती है .......!!


तस्वीर गूगल से साभार
(डेली न्यूज़ के खुशबू परिशिष्ट में प्रकाशित )