मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

रिश्तों की पाठशाला ...(1)


आपको पता है न. उसने जीवन भर हमारे साथ कितना बुरा व्यवहार किया. कभी हमारी तो क्या बच्चों की शक्ल तक नहीं देखी. कभी होली दिवाली नमस्कार करने जैसा भी नहीं. फिर भी हम सब भुलाकर रिश्ता निभाते रहे.

हाँ. बात तो आपकी सही है. हमारे साथ भी उसका यही व्यवहार था.

पर उस दिन उसकी गलती थी. कितना भारी , सुख और दुख दोनों का ही समय था. एक दिन के लिए भी जिस बेटी को स्वयं से अलग नहीं किया, वह हमसे इतनी दूर जाने वाली थी. तब उसने पूरा माहौल खराब किया. आधी रात में सड़क पर हंगामा किया. नये बन रहे रिश्तों के सामने .

बात तो आपकी सही है. उस समय चुप रहना था उनको...

मगर फिर भी आप लोगों ने कुछ नहीं कहा उसे. हमें ही टोकते रहे.

क्या करें. इतनी मुश्किल से वर्षों बाद उसने आना  शुरू किया है. कुछ कहें तो फिर से नाराज हो जायेगा, आना जाना छोड़ देगा.

मतलब ...हम आना - जाना नहीं छोड़ते इसलिए हमें कुछ भी कहा जा सकता है!!



टेढ़ी कीलों को तो हथौड़ा भी नहीं ठोकता, सीधी पर ही चलता है दनादन...सोचते हुए मुस्कुराहट आ ही गई.
#रिश्तोंकीपाठशाला

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

पुत्री का पिता के प्रति श्रद्धा का अर्पण ही है मातामह श्राद्ध...


एक भाई था. उसकी एक बहन थी. भाई का नाम जोठो और बहन का नाम धोधां. उसने अपनी पत्नी से कहा कि मैं गया जी जा रहा हूँ श्राद्ध के लिए, मेरी बहन को पन्द्रह दिन तक अच्छी तरह जिमाना. 
भाई गयाजी चला गया. भाभी रोज ननद को बुलाती और दो रोटी देकर भेज देती. एक दिन उसके पिता का श्राद्ध था तो उस दिन भाभी ने अपनी ननद से कहा कि बाईसा, कल आप जल्दी आना, काम करना है.  बच्चों से कह देना
पेड़ हिले तो आ जाना , पत्ते हिलें तो मत आना. बहन अपने बच्चों को कहकर आई कि तुम नाले की मुंडेर पर बैठ जाना. मैं चावल की माँड़ गिराउँगी तो तुम पी लेना.  मगर जब वह माँड गिराने लगी तो उसकी भाभी ने रोक दिया . बोली आज बापूजी का श्राद्ध है सो माँड नाले में मत गिराना. शाम को बहन घर जाने लगी तो उसे चार रोटी देकर भेज दिया. जब ब न घर आई तो बहुत रोई. उसके आँसे उसके पिता के खाने में गिरे. उसी रात उसके पिता बेटी के सपने में आकर बोले कि बेटी , तू क्यों रोई. तब वह बोली कि भाभी ने आपको खीर मालपुआ खिलाया और मैं भूखी मरते सो रही हूँ.  पिता ने कहा बेटी रो मत. घर के बाहर जो कचरा पड़ा है, उसे घर में रख लो. तेरा सब सही हो जायेगा. बेटी ने ऐसा ही किया। सुबह उठ कर देखे तो नौ खंड महल, हीरे जवाहरात, मोटर कार, सुंदर वस्त्र हो गये. 
उधर भाई गयाजी में पिंडदान कर रहा था तो उसके खाने में खून की बूँदें टपक गईं.  उसने पूछा पंडित से ये कैसे हुआ तो उसने कहा कि तुम्हारे घर में कोई बहन/बेटी कलपी (व्यथित) है. 
जब भाई श्राद्ध कर वापस लौटा तो उसने पत्नी से पूछा कि क्या तुमने रोज जिमाया था बहन को. उसकी पत्नी बोली कि हाँ...खूब अच्छी तरह जिमाया और आज ही दक्षिणा देकर विदा किया है. 
उधर पिता ने पुत्री को अपना श्राद्ध करने और भाई भाभी को जीमने के लिए बुलाने को भी कहा था. बहन खूब अच्छे रेशमी कपड़ों और हीरे जवाहरात से लदी फँदी मोटर गाड़ी में बैठकर भाई के घर बुलावा देने गई . भाई बहन को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ. भाभी ननद के ठाठबाट देखकर अचंभित हो गई और उसका बहुत आदर सत्कार किया. भाई जब खाना खाने बैठा तो पहले बहन को बैठाया. ननद की इच्छा नहीं थी मगर भाई के प्रेमवश उसके साथ बैठ गई...
भाभी ने ननद को भी सब पकवान परोसे.  बहन सभी पकवान अपने कीमती वस्त्रों और गहनों के पास लाकर कहने लगी... जीमो म्हारा छल्ला बिंटी, जिमो म्हारा डोरा कंठी, जीमो म्हारा चमचम बेस ...
भाई को समझ नहीं आया. बोला - यह क्या कर रही हो बहन. 
भाई . आज ये पकवान इन सबके कारण ही मिल रहे है. वरना मेरी किस्मत में तो मात्र लूखे फुलके ही थे. 
अब भाई को तर्पण के समय खून के आँसू का मतलब समझ आया और वह खून के आँसू पीकर रह गया. बहन ने अपने घर पिता का श्राद्ध किया सबको मन भर जिमाया. 
कुछ दिन बाद भाई उदास होकर अपनी पत्नी को बोला- तुम्हारे पीहर में आग लग गई . उनका सब जल कर राख हो गया. कुछ सामान बाँध दो तो मैं पहुँचा आऊं. सुनते ही उसकी पत्नी ने घी, तेल, आटा, चीनी, दाल, चावल आदि गाड़ी भरकर तैयार कर दी. भाई ने कहा रास्ते में ब न का घर भी आयेगा. कुछ उसके लिए भी दे देना.  
भाभी बोली- हाँ. क्यों नहीं. ननद बाई के घर तो पहले भेजूँ. 
उसने ताँबे का बहुत बड़ा घड़ा लेकर उसमें साँप, बिच्छू आदि जहरीले जानवर भरकर भेज दिये और यह भी बोली कि रास्ते में इसे खोलना मत और बहन के हाथ में ही देना. भाई अपने बेटे को साथ लेकर रवाना हुआ. वह पहले अपनी बहन के घर गया और गाड़ी का सब सामान वहीं उतार दिया. अब उसने ताँबे का घड़ा सास के हाथ में दिया और कहा कि वह घड़े को अँधेरे में ही खोलकर देखे. सास ने घड़े में हाथ डाला तो साँप बिच्छू लिपट गये. उनको उसी हालत में छोड़ कर बाप बेटे लौट आये. बहू ने अपने बेटे से पूछा कि घड़ा किसको दिया तो उसने सारी बात बता दी. उसकी पत्नी ने सोचा कि अब तो मुझे बदला लेना है. वह कंबल ओढ़ कर सो गई. उसके पति ने पूछा कि क्या हुआ यो बोली की पंडितों ने बताया है कि मेरी तबियत बहुत खराब है. 
तो यह ठीक कैसे होगी?
पंडित ने कहा कि यदि तुम्हारी ननद ननदोई काले कपड़े पहन कर, सिर मुंड़वा कर हाथ में मूसल लेकर खेम कुसलजग्गी रो घर किस्यो कहते आयें तब ही मेरी तबियत ठीक होगी.
उसका पति सब चाल समझ गया. उसने कहा कि मेरी बहन तो तेरी खातिर दौड़ी आयेगी. मैं अभी बोलकर आता हूँ.
भाई पत्नी के मायके गया और बोला कि आपकी बेटी बीमार है और पंडितों ने कहा है कि अगर आप लोग काले कपड़े पहनकर सिर मुड़ा कर आयेंगे तभी उसकी तबियत ठीक होगी. सास ने कहा कि मेरी तो एक ही बेटी है. जैसा आप कहो , हम वैसा ही करेंगे.
बहू के माँ बाप सिर मुड़ाये  काले कपड़ों में हाथ में मूसल लिए खेम कुसलझग्गी रो घर किस्यो करते आये. भाभी ने सोचा कि ननद ननदोई आये हैं सो वह छत पर चढ़ गई और कहने लगी. 
इ बनी र कारण
ननदल नाचे बारण (इस बहू के कारण ननद घर के बाहर नाच रही है)
भाई ने बोला- भाग्यवान देख तो ले ठीक से. ननद नाच रही या तेरे माँ बाप.
वह यह देखकर वह बहुत जल भुन गई.
कुछ दिन बाद फिर पति से बोली- आज मेरा साँझ साँझूली का व्रत है.
पति बोला यह कौन सा व्रत है. भाभी झूठमूठ पूजने लगी - 
मैं तन पूजूँ साँझ साँझूली
मरजो म्हिरी ननद ननदूली...
भाई समझ गया कि यह औरत नहीं सुधरेगी. 
उसने दूसरे दिन अपनी पत्नी से कहा- आज मेरा ऊब घोटाले का व्रत है. 
पत्नी ने पूछा- ये ऊब घोटाले का कौन सा व्रत होता है. 
उसके पति ने कहा -जैसे साँझ साँझूली का होता है वैसे ही ऊब घोटाले का होता है. 
फिर झूठमूठ पूजने लगा-
मैं तन पूजूँ ऊब घोटाला
मरजो सुसरा दोण्यूँ साला...

पत्नी समझ गई कि भाई के आगे उसकी चाल नहीं चलने वाली. अब वह अपनी हार मानकर ननद के साथ खुशी- खुशी रहने लगी.  नगरी में मुनादी करवा दी कि श्राद्ध पक्ष में कोई भी बहन बेटी दुखी न रहे और अमावस्या के बाद बेटी भी बच्चे के जन्म के बाद  पिता का श्राद्ध करे...


फेसबूक पर चर्चा के दौरान पता चला कि अधिकांश लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि पुत्री भी माता पिता का श्राद्ध कर सकती है. इसे मातामह श्राद्ध के नाम से जाना जाता है. घर में बुजुर्गों से इससे संबंधित कहानी सुनी थी. आभासी दुनिया के परीचित मित्रों ने भी यह कहानी जानने की उत्सुकता जताई तो परिवार के बुजुर्गों से ही इसके बारे में पूछताछ कर लिख दी है. इसमें कुछ त्रुटि हो तो संशोधित करने में सहायता अवश्य करें.

 (चित्र गूगल से साभार. आपत्ति होने पर हटा लिया जायेगा)

शनिवार, 22 सितंबर 2018

देख तेरे संसार की हालत .....


कल एक शोक सभा से लौटते हरियाणा के एक कथित बाबा (जो फिलहाल जेल में हैं) की शिष्या टकरा गईं. अपनी सखी को बाय/विदा/खुदा हाफिज़/राम राम/राधे राधे की बजाये सत् और जाने क्या बुदबुदाई. इसी ने मुझे चौंकाया. मैंने पूछा अभी तुमने अभी क्या कहा . वह फिर बुदबुदाई . मुझे फिर भी समझ नहीं आया तो विस्तार से बताने लगी. हम फलाने गुरू की शिष्या हैं तो यही कहते हैं.  हमारे गुरू की बातें सुनो आप. हम किसी भी भगवान को नहीं मानते, पूजा पाठ नहीं करते. अभी वहाँ पंडित जी जब श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी का नाम स्मरण करा रहे थे तब मैं अपनी माला जप रही थी. वो अपने परीचित हैं वरना ऐसे स्थान पर हमको इजाजत ही नहीं है बैठने की. वो कह रहे थे व्रत करने को मगर शास्त्रों में गीता, बाईबिल, कुरान किसी में किसी में भी व्रत करने की, पूजा पाठ के लिए मना किया है. ये सब तो पंडितों का किया धरा है.

मैंने पूछा-  अच्छा!!! चलो हिंदुओं का तो मान लिया तुम्हारे अनुसार पंडितों ने बेड़ा गर्क किया है. मगर बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम समुदाय तक भी थी पंडितों की पहुँच??

हमारे लिए हिंदू, मुस्लिम, ईसाई कुछ नहीं. सब एक प्रभु की संतान हैं. (बस पंडित ही उस प्रभु की संतान नहीं है, मैंने सोचा ).
ब्रह्मा/विष्णु/महेश सबका जन्म हुआ है. ईश्वर थो अजन्मा होता है.

हें... उनका जन्म हुआ था. यह तो मैंने पहली बार सुना किसी से. फिर भी चलो रह बताओ कि फिर तुम्हारी पूजा विधि क्या है, कैसे स्मरण करती हो ईश्वर को.

हम बस माला फेरते हैं गुरु का नाम लेते हैं. बीच में कबीर का भी नाम लिया .
मगर कबीर ने तो जन्म लिया था न...

नहीं. वे सशरीर प्रकट हुए थे. आप अपना वाट्स नंबर दो. मैं सब भेजूँगी आपको .

देखो...मुझे यह सब जानने में रूचि नहीं है. हम लोग ऐसे किसी बाबा को नहींं मानते.

मैं भी नहींं मानती थी . मैंने सबको सुना . मुरारी बापू, आशाराम, राम रहीम मगर जब इनको सुना तो  बस इनकी बातें सच्ची लगी. ये  गुरू ही सच्चे हैं. सत् हैं. कोई बात नहीं. सब उस परमात्मा की संतान हैं.

 (कितने रहस्य की परतें खुलनी बाकी हैंअभी , मैं मन में सोच रही थी 😂. हमसे तो जो हमारा ज्ञान है वही सँभल नहीं रहा . अतिरिक्त ज्ञान का क्या करेंगे. हमें माफ करो देवी)

जब प्रश्नकर्ता के किसी प्रश्न  का जवाब तुम्हें नहीं पता तो उसे (कंफ्यूज) भ्रमित कर दो और फिर भी नहीं उलझे तो नंबर माँग लो, जबरदस्त प्रशिक्षण ( ट्रेनिंग ) हैं.

प्रकट में मैंने कहा  - तुम्हारा आध्यात्मिक ज्ञान देखकर लग रहा शायद तुम प्रवचन करने भी जाती हो.

नहीं, हम क्यों जायेंगे प्रवचन करने. हम गृहस्थ हैं. मैं मैरिड हूँ पर हमको लिपस्टिक , नेलपेंट लगाना अलाउड नहीं है.

मैंने उसके चेहरे की ओर देखा.  अच्छा! बिंदी लगाना भी नहीं होगा!

नहीं! उसकी मनाही नहीं है. अपनी मर्जी पर है.

अच्छा! क्यों मना है लिपस्टिक /नेलपेंट आदि.

छोड़िये. बहुत डिटेल में बताना पड़ेगा. आप अपना वाट्सएप नंबर दीजिए सब बता दूँगी.

वैसे सुना है उन बाबा के बारे में अभी जेल में हैं.

 वे सब आरोपों से बरी होंगे.

एक अच्छी खासी पढ़ी लिखी, अपना व्यवसाय करने वाली कन्या की यह भक्ति अचंभित से ज्यादा भयभीत कर रही थी मुझे.
सबसे ज्यादा परेशान करनी वाली बात थी किसी भी प्रश्न
पर जवाब देते समय और उसकी बातों से असहमति जताने पर उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसका उत्तेजित होना .

जाने ये तथाकथित बाबा लोग क्या विद्या जानते हैं!!!

सोमवार, 16 जुलाई 2018

फेसबूक की दुनिया से...



(चित्र गूगल से साभार)

क्या आपको याद है कि अपने बचपन में विवाह, सगाई, बच्चे के जन्म, जड़ूला आदि पर होने वाले जीमन में नीचे बैठकर पंक्ति में खाना होता था .अभी भी कई स्थानों पर, अवसरों पर ऐसा जीमन होता है . खाना भी वही एक - सा . पूड़ी- सब्जी , रायता, बूँदिया , नमकीन.... थोड़ा ज्यादा अच्छा जीमन हो तो काजू कतली, दाल की चक्की, गुलाबजामुन,जलेबी और बालूशाही में से कोई एक या दो मिठाई.... पेट भरेगा या भूखा ही उठना पड़ेगा, परोसने वालों की इच्छा और मंशा पर ही निर्भर करता था. आप बैठे रहो खाली पत्तल लिए ,परोसने वाले का सामान बस आपकी पत्तल तक पहुँचने से पहले खत्म हो जाये तब हाल देखने लायक.  अगला पलटकर कब आये कोई ठिकाना नहीं. कोई अधिक ही सहृदय पास बैठा हो तो चार -पाँच अँगुलियों में समाने जितनी बुंदिया /नमकीन आपकी पत्तल में सरका दे. चुगतते रहो बैठे चुपचाप जब तक परोसने की दूसरी पारी आये. हमारे जैसे शर्मीले (मतलब बचपन में 😜) तो कई बार जीमन से भूखे या आधेभूखे लौटते क्योंकि परोसना वाला पूछता-  पूड़ी, बुंदिया, बालूशाही रखूँ ?
गले को गीला करते जवाब और मुंडी हाँ में हिलने से पहले ही हमारी उदासीनता समझ आगे बढ़ जाता. पड़ोस में बैठी कोई स्त्री (भाभी, मामी, चाची आदि ) कहती भी - अरे. पत्तल खाली पड़ी है, कुछ खाती ही नहीं यह लड़की ..

 मन मसोस कर रह जाते मगर कहते यही- नहीं नहीं , इतना ही चाहिए था मुझे. आज के बफे सिस्टम की तरह थोड़ी कि मनपसंद मिठाई दो चार चक्कर लगाकर भी सारी भोग लगाई जाये.

जीमने वाली कोई कोई दबंग पड़ोसनें होती तो परोसने वाले को रोककर खुद की पत्तल के साथ आसपास वाले अपने पराये छौनों को भी परोसवा लेती.

 रख इकी पत्तल म भी.
दो चार गुलाबजामुन रख दे एक साथ,
फेर दो चार चक्कर कटेंगे.
और आता पूड़ी और चक्की  को धामो भी ले आयो.  आदि आदि.
तो ऐसी पड़ोसन के बगल में होते तो सबकुछ परोस जाता था पत्तल में वरना भूखे ही आना होता था.

कुछ स्त्रियाँ / पुरूष जो खाते वक्त बोलती/बोलते नहीं थी/थे, मौनव्रत रखते थे , सिर्फ हाथों और आँखों के इशारे से समझातीं मुँह चलाते हुए- सब्जी जरा हिलाकर देना, पूड़ी अच्छी नरम देना तब उनकी भावभंगिमा देखना मनोरंजन भी देता था....

आजकल फेसबूक भ्रमण करते समय मुझे ऐसा जीमन बहुत याद आता है.... जाने क्यों !! 😁😜

#फेसबूकलाइककमेंट

!! 😁😜

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

चटनी जितनी लीद.....

कुछ समय पूर्व वृंदावन से पधारे कथा वाचक से राम कथा को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . गृह कार्यों से फारिग होकर लगातार सुन पाना संभव भी नहीं इसलिए बीच के कुछ समय का लाभ लेकर ही उत्साहित अथवा कृतज्ञ समझ लिया जाए।पूर्ण समय न दे पाने का सिर्फ यही कारण है ,ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

रामचरितमानस का पाठन कई बार किया है और इनसे सम्बंधित कथा कहानियों का वाचन श्रवण एवं मंचन लाभ भी लिया है  सो मन में यह भावना भी रहती है कि  आखिर इस बार नया क्या सुनने को मिलेगा। सब तो पता है। कथा की श्रोता होते हुए भी यह विचार मन में चल रहा था मंच से स्वामी जी ने शिव शंकर पार्वती का वह प्रसंग सुना दिया जिसमें शिवजी काकभुसुंडि से राम कथा का श्रवण कर रहे मगर पार्वती सोच रही कि मुझे तो सब पता है यह क्या सुनाने वाले हैं। सीता का वेश धर  राम की परिक्षा लेने वाले इस वृतांत  में अंततः सती  को भान होता है कि सब ज्ञात होकर भी बहुत कुछ अज्ञात है।
जीवन के इस सत्य का प्रत्येक व्यक्ति को कई बार भान होता है कि ज्ञात में बहुत कुछ अज्ञात है पर अहम यह मानने नहीं देता ...एक ही जीवन में जाने कितना कुछ जानने को बाकी रह जाता है ...  खैर उनके कथा वाचन में उनकी ज्ञान पर टिप्पणी  न करते हुए बताते चलूँ कि स्वामी जी और उनके साथी रामकथा तथा अन्य भजन बहुत सुर में सुनाते हैं इसलिए आनंद रस भरपूर प्राप्त हुआ... उनके भजन  में फ़िल्मी टोन  नहीं बल्कि भरपूर शास्त्रीयता है जो हमारे जैसे श्रोता को बांधे रखती है। कथावाचक रामकथा के बीच-बीच में आज के समयानुसार कई रोचक दृष्टांत , कथाएं भी सुनाते हैं जिससे वाचन की रोचकता बनी  रहे।
ऐसी ही एक छोटी सी रोचक कथा साझा करने योग्य  है...

एक अभिमानी राजा मद में भरा हाथी पर नगर भ्रमण को निकला। तभी रास्ते से गुजर रहे एक साधू ने दानी जानकार  राजा से दान प्राप्त करने के लिए अपना वस्त्र आगे फैला दिया।    अभिमान में भरे उस चिड़चिड़े राजा ने इधर -उधर देखा  . तभी उसकी नजर हाथी द्वारा तुरंत की गई लीद पर गई।  उसने  अपने सैनिक को आदेश दिया कि वह लीद  उठा कर साधु की झोली में डाल  दे। राजा जब भ्रमण कर महल पहुंचा  और भोजन करने बैठा तो जैसे ही ग्रास उठता सुस्वादु व्यंजनों की भरी थाली में उसे लीद  ही लीद दिख पड़ी। कई ग्रास छोड़े ,कई  थालियां बदलीं मगर प्रत्येक ग्रास में वही लीद  नजर आये। भूख से बेचैन राजा की तकलीफ देख कर राज ज्योतिषी को बुलाया गया। उसने राजा द्वारा लीद का दान करने की घटना का प्रभाव बताया।
अब इसका क्या उपाय किया जाए। सोचते हुए ज्योतिषी ने सुझाया कि  राजा स्वयं ऐसे कार्य करे जिससे उसकी सर्वत्र निंदा हो ताकि राजा की जितनी अधिक निंदा होगी उसके पाप निंदा करने वाले के हिस्से में स्थानांतरित हो जाएंगे क्योंकि जो व्यक्ति किसी की निंदा करता है वह उसके पाप को स्वयं ढ़ोता  है। अपनी करनी से स्वयं अपनी निंदा कौन सुनना चाहता है मगर कोई उपाय न देख राजा ने मुनादी करवाई कि सभी नागरिक राजा की खूब  बुराई करें. प्रजा को अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। जिसको देखो जी खोलकर राजा की निंदा करता नजर आता। धीरे -धीरे राजा की थाली से लीद कम होती जाती थी मगर फिर भी भोजन में चटनी जितनी लीद थाली में बनी ही रहती। राजा ने फिर बुलाया ज्योतिषी को...ज्योतिषी ने  बताया कि राजन आपके राज्य में सिर्फ एक व्यक्ति है जो किसी  की निंदा नहीं करता और आपकी थाली में बची हुई लीद  का कारण भी वही है। राजा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी कि  वह व्यक्ति उसकी बुराई करें मगर निंदा करना उसका स्वाभाव ही नहीं था। थक हार कर राजा ने सामान्य नागरिक का वेश बनाया और उस व्यक्ति के पास पहुँच कर अपनी खूब बुराई करता रहा मगर उस व्यक्ति के मुंह से एक भी शब्द निंदा का नहीं कहलवा पाया। राजा के लगातार प्रयास को देख वह व्यक्ति हँस पड़ा  क्योंकि वह राजा को पहचान गया था  . उसने कहा कि राजन आप कितनी भी प्रयत्न करें मगर मेरी जुबान से आपकी निंदा नहीं निकलेगी  . चटनी भर ही सही लीद तो आपको खानी  ही पड़ेगी। अब राजा की समझ में आ गया था कि वचन और कर्म में सावधानी  प्रारम्भ से ही अपेक्षित है.  जब हम किसी की निंदा कर रहे होते हैं तब उसके पाप का भाग अपने ऊपर लाद  रहे होते हैं और जब निंदा झूठी हो तब तो उसके भार का कहना ही क्या  ....

कहते हैं न भाव सिर्फ कहानी सुनने तक ही जगते हैं फिर से वही वास्तविकता...मगर सुनने में आनंद मिला तो लिख कर बाँटना अच्छा लगा. हम न सही, किसी एक का भी जीवन बदल जाये तो लाभ ही होगा और नुकसान तो कुछ भी नहीं.