चुचाप बैठे देखना ...सामने पार्क में बच्चों का कलरव ...उनकी उछल कूद ...हँसना- खिलखिलाना ...रंगबिरंगे वस्त्रों में अपनी मम्मियों की अंगुलियाँ थामे निश्चिंत ....हर चिंता फिक्र से दूर ... मैं गिनती करने लगती हूँ ...कितने बच्चे है ....
4 वर्ष पूर्व जब नए आशियाने की तलाश में 6 महीने तक शहर का कोना -कोना तलाशते यहाँ आये तो पहली नजर में ही जो पसंद आया ...वह था ... ठीक सामने पार्क का होना ...हालाँकि तब उजड़े चमन जैसा ही लग रहा था ...पूरी गली में गिने चुने मकान ...बाकी खाली प्लाट ...देखते ही देखते चमन गुलजार हो गया ...खाली जमीने भर गयी ...शाम को छत पर बैठे चाय की चुस्कियां लेते जब पति कह देते हैं कि " ये स्थान तुमने ठीक ही पसंद किया " तो अव्यक्त सी ख़ुशी होती है ...घर के मामले में महिलाओं की राय ही मान लेनी चाहिए " मैं मुस्कुरा देती हूँ ....मानसिक यंत्रणा के वे ६ महीने याद आ जाते हैं ...अचानक बातो -बातों में ही उस मकान को बेच देना ...जिसे कितने वर्षों खून- पसीने से सींचा ... और ठीक उसके बाद जमीन की कीमतों के बेतहाशा वृद्धि...धीरे धीरे अँधेरा छटा आसमान आधी जमीन भी मिलनी मुश्किल ....बढ़ते बच्चों की संगति के अनुरूप माहौल की फिक्र और अपना बजट ...शहर का कौन सा छोर नहीं नाप आये...गहरी अनिश्चितता ...क्या होगा ...मन में जिद ठानी हुई थी कि फ्लैट नहीं लेना है ...छोटा ही हो मगर स्वतंत्र और नया बना हो ....रोज घर से आस लेकर निकलते कि शायद आज तो अपने बजट में अपनी पसंद का आशियाना मिल ही जायेगा ....कोई मकान पसंद आता जाएगा ...और पास का वातारवरण नहीं ...सब पसंद आ जाता तो बजट नहीं ....कई बार पति नाराज हो जाते ...तुम्हे कुछ भी पसंद नहीं आता ...क्या कमी है इस जगह में ....जब कही कोई राह नहीं बचती नजर आई तो मन मारकर एक फ्लैट ही पसंद किया ...दूसरी मंजिल पर ...रकम लेकर वापस लौटे तब तक किसी और की नजर चढ़ चुका ....फिर से वही सिलसिला ...इस बार एक पुराना बना मकान पसंद करना पड़ा ... एडवांस भी दे दिया ....मगर यहाँ भी ...मकान मालिक खेद सहित पैसे लौटा गया ....किसी प्रोपर्टी डीलर की भेंट चढ़ चुका मकान ...फिर से वही तलाश ....
पहली नजर में जो पसंद आया वह यही मकान था ....जो अब तो घर बन चुका है ....
हाँ तो बात पार्क में खेलते बच्चों की हो रही थी ... अँधेरा होते होते घर लौटते ये बच्चे ...सुन रही हूँ एक मां कह रही है ..." चलो बेटा अब , पापा आते ही होंगे "...मुझे अचानक जंगल में १००० लोगो के बीच घिरे १०० लोग याद आ जाते हैं ...कोई किसी घर में उनका इसी तरह इन्तजार करता होगा ...शाम ढले ...उन १००० का भी और १०० का भी ...उनकी शाम तो कहाँ ढल पाती होगी ...इन्तजार भी कहाँ पूरा हुआ होगा ...उनमे से बहुतों का ...
तभी पार्क के सामने वाले घर से मेरी पड़ोसन हाथ हिलती नजर आती है ...छोटी बेटी चिल्ला कर कहती है ..." मां ,वो रही आपकी बेस्ट फ्रेंड " ...हम आपस में इशारों से बात करने लगते हैं ...कल चौथ का व्रत है ...सुबह १० बजे के बाद पूजा करेंगे ...आ जाना "
बेटियां मुंह दबा कर हँस रही है ...आप लोग कैसे समझ जाते हो बिना बोले एक दूसरे की बात इतनी दूर से ...मैं मुस्कुरा देती हूँ ...पूरे विश्व में गृहस्थ महिलाओं की भाषा एक जैसी ही होती होगी शायद ...
बिलकुल पास वाले घर में आंटीजी पानी डाल रही हैं पौधों में ...बहुत शौक है उन्हें भी ...पत्तेदार पौधों का तो था ...फूलों का मैंने जगा दिया ...उछलती पानी की बूंदों से चिड़ियाएँ खुश हो जाती हैं .....पड़ोस के तीसरे मकान के बाहर ठाठ से गाडी धो रहे इंसान को क्या कहूँ ...कई बार टोक चुकी हूँ ...मगर कोई फायदा नहीं ...पानी की भारी किल्लत के बीच उनका इस तरह पाईप से गाड़ी धोना किसी को सुहाता नहीं मगर किया क्या जाए ...वहां से बहकर आ रहे पानी का पोखर सा बन जाता है हमारे घर के बाहर ...चिड़िया तेजी से भागती है वही ...आनंदित होकर डूबकियां लगा रही है ...थोडा सा खुश हो लेती हूँ ...इस बहते पानी से पक्षी खुश हो रहे हैं ...यही सही ...ये बेजुबान भी बहते पानी और रुके पानी का फर्क बखूबी समझते हैं ...तसले में पहले से भर कर रखे पानी की ओर झांकती भी नहीं जब ताज़ा पानी नजर आ रहा हो ....
अचानक क्षितिज में एक तारा नजर आ रहा है ....धीरे- धीरे अँधेरा बढ़ता जा रहा है ...आसमान किसी विवाहिता की चुनरी सा लग रहा है ...छोटे छोटे सितारे टांक दिए हों किसी ने ...इस ब्रह्माण्ड में कितने तारे हैं ...सब अपने -अपने स्थान पर ...निश्चित दूरी पर ...कोई किसी से टकराता नहीं ...विचरते हैं ...घूर्णन भी करते हैं ...टकराते नहीं ...कौन बाँध कर रखता है इन्हें ...कौन बताता है इन्हें इनका पथ ....कौन तय करता है ....अबूझ सवालों से घिरने लगती हूँ मैं ...दीया -बाती का समय हो चला है ... डायरी में दर्ज़ शाम का भी ....
फिर किसी और दिन और किसी शाम का ...
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चित्र गूगल से साभार

