सोमवार, 16 जुलाई 2018

फेसबूक की दुनिया से...



(चित्र गूगल से साभार)

क्या आपको याद है कि अपने बचपन में विवाह, सगाई, बच्चे के जन्म, जड़ूला आदि पर होने वाले जीमन में नीचे बैठकर पंक्ति में खाना होता था .अभी भी कई स्थानों पर, अवसरों पर ऐसा जीमन होता है . खाना भी वही एक - सा . पूड़ी- सब्जी , रायता, बूँदिया , नमकीन.... थोड़ा ज्यादा अच्छा जीमन हो तो काजू कतली, दाल की चक्की, गुलाबजामुन,जलेबी और बालूशाही में से कोई एक या दो मिठाई.... पेट भरेगा या भूखा ही उठना पड़ेगा, परोसने वालों की इच्छा और मंशा पर ही निर्भर करता था. आप बैठे रहो खाली पत्तल लिए ,परोसने वाले का सामान बस आपकी पत्तल तक पहुँचने से पहले खत्म हो जाये तब हाल देखने लायक.  अगला पलटकर कब आये कोई ठिकाना नहीं. कोई अधिक ही सहृदय पास बैठा हो तो चार -पाँच अँगुलियों में समाने जितनी बुंदिया /नमकीन आपकी पत्तल में सरका दे. चुगतते रहो बैठे चुपचाप जब तक परोसने की दूसरी पारी आये. हमारे जैसे शर्मीले (मतलब बचपन में 😜) तो कई बार जीमन से भूखे या आधेभूखे लौटते क्योंकि परोसना वाला पूछता-  पूड़ी, बुंदिया, बालूशाही रखूँ ?
गले को गीला करते जवाब और मुंडी हाँ में हिलने से पहले ही हमारी उदासीनता समझ आगे बढ़ जाता. पड़ोस में बैठी कोई स्त्री (भाभी, मामी, चाची आदि ) कहती भी - अरे. पत्तल खाली पड़ी है, कुछ खाती ही नहीं यह लड़की ..

 मन मसोस कर रह जाते मगर कहते यही- नहीं नहीं , इतना ही चाहिए था मुझे. आज के बफे सिस्टम की तरह थोड़ी कि मनपसंद मिठाई दो चार चक्कर लगाकर भी सारी भोग लगाई जाये.

जीमने वाली कोई कोई दबंग पड़ोसनें होती तो परोसने वाले को रोककर खुद की पत्तल के साथ आसपास वाले अपने पराये छौनों को भी परोसवा लेती.

 रख इकी पत्तल म भी.
दो चार गुलाबजामुन रख दे एक साथ,
फेर दो चार चक्कर कटेंगे.
और आता पूड़ी और चक्की  को धामो भी ले आयो.  आदि आदि.
तो ऐसी पड़ोसन के बगल में होते तो सबकुछ परोस जाता था पत्तल में वरना भूखे ही आना होता था.

कुछ स्त्रियाँ / पुरूष जो खाते वक्त बोलती/बोलते नहीं थी/थे, मौनव्रत रखते थे , सिर्फ हाथों और आँखों के इशारे से समझातीं मुँह चलाते हुए- सब्जी जरा हिलाकर देना, पूड़ी अच्छी नरम देना तब उनकी भावभंगिमा देखना मनोरंजन भी देता था....

आजकल फेसबूक भ्रमण करते समय मुझे ऐसा जीमन बहुत याद आता है.... जाने क्यों !! 😁😜

#फेसबूकलाइककमेंट

!! 😁😜

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जगदीशचन्द्र माथुर और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-07-2018) को "समय के आगोश में" (चर्चा अंक-3036) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  3. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 18 जुलाई 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. हा हा ...
    मस्त पोस्ट ... बिलकुल ऐसा ही है फ़ेसबुक ... आँखों से जीमते हैं ... पर असल खाने का सुख आजकल नहीं मिलता जिसका वर्णन किया है आपने ...

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