बुधवार, 24 नवंबर 2010

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ....

कल दिन भर बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर रही ....ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल को सही ठहराते हुए एक बार नितीश फिर से बिहार के सिरमौर बन गए हैं ....

मैं एक आम गृहिणी हूँ ....राजनीति से मेरा दूर दराज का भी कोई सम्बन्ध नहीं है ...पिता की कर्मभूमि होने के कारण बचपन और किशोरावस्था की बहुत सी यादें इसी प्रान्त से जुडी हैं ......फिर एक आम भारतीय की तरह भी देश की राजनीति में क्या हो रहा है , क्यूँ हो रहा है , जानने की रूचि रहती ही है ...

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ...बिहार की जनता ने साबित कर दिया है कि अब धर्म, जाति , प्रान्त , भाषा की राजनीति के दिन बस लद ही गए हैं ....पटना के गाँधी मैदान से दीपकजी का कार्यक्रम भी देखा ..आम जनता उत्साहित है ....मीडिया हाउस के लिए भीड़ जुटाना अपने कार्यक्रमों की पब्लिसिटी का एक अंग हो सकता है , मगर इसमें कोई शक नहीं कि बीते पांच वर्षों में बिहार में शासन की मंशा देश और विश्व स्तर पर राज्य की प्रतिष्ठा कायम करने की रही है ....और इसका प्रभाव भी नजर आ ही रहा है ...

पिता के देहावसान के बाद कभी बिहार जाना नहीं हुआ मगर बिहार से लौटने वाले लोंग जब वहां की साफ़ चमकदार गड्ढों रहित सड़कों की बात करते हैं, तो एकबारगी यकीन नहीं होता ...वरना वहां हाई वे तक का बुरा हाल देखा है ...कई बार अपने कस्बे से पटना या मुजफ्फरपुर जाने में अनुमानित समय से कहीं अधिक समय लग जाने के कारण ट्रेन छूटते रह गयी ....याद आ रहा है ...एक बार कार से पटना से कस्बे तक के सफ़र को तय करते हुए धचके खाता छोटा भाई सारे रास्ते झुंझलाता रहा ....पिता, जिनका ज्यादा समय सफ़र में ही गुजरता था , चुटकी लेते हुए बोले..." अगर ऐसी जगह पर तुम्हे नौकरी करनी पड़ती , तो क्या हाल होता तुम्हारा "
" मैं तो नौकरी ही छोड़ देता " मेरे भाई का जवाब था ..." बेटा , मैंने भी यही सोचा होता तो तुम लोगों का क्या हाल होता " ...पिता मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले ....खैर , रास्ते में आम और लीची के खेतों से गुजरते भाई का संताप कुछ कम हुआ ...
जब भी बिहार की सड़कों की बात होती है , मुझे ये सफ़र बहुत याद आता है ...अच्छा लगता है सुनकर कि बड़े शहरों से लेकर छोटे ग्रामीण इलाकों तक की सड़कों में काफी सुधार हुआ है ....कहा ही जाता है कि किसी भी देश/प्रदेश के विकास का रास्ता वहां की सड़कें तय करती हैं ...

बिजली व्यवस्था का हाल अभी भी इतना दुरुस्त नहीं है ....अधिसंख्य लोंग बिजली के लिए सरकारी व्यवस्था से ज्यादा जेनरेटर पर निर्भर करते हैं और उसकी भी अपनी सीमा होती है ....उम्मीद है सड़कों की तरह इसमें भी सुधार होगा ही ...

पंचायतों और शहरी निकायों जैसे आम जनता से सीधे जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत सुरक्षित स्थान महिलाओं को प्रदेश के सरोकारों से सीधे सीधे जोड़ता है और माने या ना माने , इसका यथोचित शुभ प्रभाव नजर आता ही ... सुरक्षा और कानून व्यवस्था में सुधार के कारण डकैती, अपहरण जैसी आम घटनाएँ अब इतनी आम नहीं रही है ...अपनी फ्रेंड के पडोसी , पिता के जूनियर ऑफिसर , फॅमिली डॉक्टर के अपहरण की घटना तो आँखों देखी रही हैं ....और गोलियों और चीख पुकार की आवाज़ों के बीच दूर कहीं डकैती का अनुमान लगाते कालोनी के सभी परिवारों को इकठ्ठा भगवान् को याद करते हुए कुछ यादें भी ज़ेहन में रही हैं ...

जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नितीश की सरकार ने दिखा दिया है सरकारों की इच्छा शक्ति से प्रदेशों में मनचाहे बदलाव लाये जा सकते हैं ....वही बिहार की जनता ने भी साबित कर दिया है कि वे अब सिर्फ विकास की राजनीति में विश्वास करते हैं .... यही शुभेच्छा प्रत्येक प्रान्त की जनता और राजनैतिक दल की हो जाए , तो इस देश को अपने खोये गौरव को प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता ....

(प्रदेश की खुशहाली की कहानी मेरी सुनी हुई ही है या फिर अख़बारों में पढ़ा , टी वी पर देखा हुआ ...मेरी जानकारी में कुछ कमी हो तो अल्पज्ञता समझ कर क्षमा कीजिये )


बिहार की जनता की जीत के नाम ... हमारे शहर में (जयपुर) के गलता तीर्थ पर बिहार के लोक पर्व छठ के कुछ चित्र .....देर से लगा रही हूँ , मगर समय दुरुस्त है ....






27 टिप्‍पणियां:

  1. कभी पढ़ा था बिहार सुलग रहा है...आज पढ़ा बिहार चमक रहा है..
    खबर बहुत अच्छी लगी...
    आभार..

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  2. बिहार के चुनाव परिणाम कल सारा दिन बिना थके मनोयोग से देखे। अब लगने लगा है कि भारतीय जनता परिवारवाद और जातिवाद से ऊपर उठ रही है। काश हमारा मीडिया भी इसमें सहयोगी बन जाए। गलता तीर्थ की चित्र लगाकर बचपन की याद ताजा करा दी। बचपन में रोज ही गलता जाते थे, अब तो जयपुर जाना होता है और गलता का केवल दरवाजा ही देखकर संतोष कर लेते हैं। उसकी चढाई अब तो बस की नहीं रही। हाँ सड़क मार्ग से जरूर जाया जा सकता है। अब 1980 में जयपुर में बाढ आयी थी तब गलता तीर्थ पूरी तरह से नष्‍ट हो गया था। इसका जीर्णोद्धार मेरे बड़े भाईसाहब ने ही कराया था। तब हम भी कई बार वहाँ गए थे।

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  3. @ गलत तीर्थ के पुनरोद्धार के बाद यहाँ की रौनक देखते ही बनती है ...छठ पर सारी रात मेला सा लगा रहता है ....
    पतिदेव भी बताया करते हैं कि वे अपनी दादी के साथ सड़क मार्ग से अक्सर गलत जी जाया करते थे ...
    सीढियाँ परेशान तो करती हैं ...क्या कहे ...अब तो हमारे घुटने भी दुखने लगे हैं !:)

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  4. आज ही समाचार पत्र में देखी ये खबर ....आपका शहर है तो बधाई आपको .....!!

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  5. जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नितीश की सरकार ने दिखा दिया है सरकारों की इच्छा शक्ति से प्रदेशों में मनचाहे बदलाव लाये जा सकते हैं
    Waqayi,ichha shakti ho to bahut kuchh ho sakta hai! Bhrashtachar jayega to nahi,lekin uske baawajood kya ho sakta hai,yahi dekhna hai!

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  6. बिहार ने एक दिशा दे दी है !

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  7. आज जनता समझदार हो गयी है और उसी का ये प्रतिफ़ल है।

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  8. परिचित बताते हैं कि बीहार की स्थिति बहुत सुधर गयी है पिछले 5 वर्षों में। उसी का परिणाम है यह, संभवतः।

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  9. कल सुनी थी यह खबर अच्छा लगा सुनकर.चलिए अखीं तो कुछ तो सुधर रहा है .

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  10. जनता ने तो दिखा दिया की वो तो धर्म जाती से ऊपर उठ कर विकास को महत्व दे रहे है पर क्या वहा के नेता इन सब से ऊपर उठ रहे है |

    जहा बिहार का जिक्र हो वहा उसकी पहले वाली बदहाल सडको का जिक्र ना हो ही नहीं सकता अभी मै भी इसी पर लिख रही थी तो मैंने भी वहा के सड़को पर मेरे अनुभव को लिखा है | :-)

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  11. टी वी की उपयोगिता जितनी कल महसूस हुई ,उतनी आजतक न हुई थी...दिन भर में एक बार भी उसके सामने से हट न पायी...

    मन भावनाओं की लहरों से भरा हुआ है.....भले वहां रहना न हो रहा हो,पर इस खबर ने जो प्रसन्नता दी है ,वह किसी भी बिहार वासी से कम नहीं..

    वैसे प्रसन्न होने के लिए बिहार से जुड़े होना या न होना ही आवश्यक नहीं...यह लोकतंत्र और पूरे देश के लिए एक राजनितिक स्वस्थ परंपरा की जीत है..जब चुनाव जाति धर्म भाषा से एकदम आगे बढ़कर प्रदेश के विकास और सुशासन के नाम पर हो और इसमें जीत सुशासन की हो तभी लोकतंत्र स्वस्थ हो सकता है और बिहार ने यह सिद्ध कर दिखाया है...

    इस परंपरा का पूरे देश में विस्तार होना चाहिए..

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  12. बिहार चुनाव वाकई सुखद हवा का झौंका है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  13. आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. मैं तो खुद पटना का रहने वाला हूँ..ये बात बिलकुल सच है की बिहार का चेहरा तो बहुत बदला है...
    पटना जो आज से दस साल पहले था , अब वो नहीं रहा...बहुत बदल चूका है..खास कर के सड़कें...
    काम बहुत किया है नितीश सरकार ने...
    उम्मीद है की ये काम आगे जारी रहेगा.
    बाकी सभी लोगों की तरह मैं भी बहुत खुश हूँ की नितीश सरकार की फिर से जोरदार वापसी हुई है.

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  15. मैंने तो कभी बिहार का बी भी नहीं देखा ?सिर्फ किताबो और मिडिया से ही जाना है किन्तु उसके वैभवशाली इतिहास को पढ़कर हमेशा मन प्रफुल्लित होता था |जब भी कभी बिहार के समाचार देखते थे तो वहां की दुर्दशा की चर्चा होती थी पर मन में कही था की वहां बहुत कुछ क्षमता है जब वहां के हाल में हुए विकास की चर्चा सुनी और कल उसकी जीत को देखा तो आत्मीय ख़ुशी महसूस की क्योकि ये विकास तो भारत का ही है न ?और हम सब भारतीय |

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  16. बहुत अछि पोस्ट और सुन्दर चित्र \जयपुर आने पर आपको तकलीफ देंगे |

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  17. मुझे तो बहुत मज़ा आया. मै जब दिल्ली आया था तब बिहारी कहा जाना बुरा नहीं लगता था, बुरा लगता था तो बिहारी कहे जाने का tone . संभल जाओ भ्रष्टाचारियो अब तुम्हारी बारी है...
    एक व्यंग्य मेरा भी इसीस सन्दर्भ में....
    http://swarnakshar.blogspot.com/

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  18. जागरूक नागरिक की यह पोस्ट अच्छी लगी ....अब जनता की सोच बदल रही है ..धर्म और जाति की राजनीति कब तक साथ देगी ?

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  19. बिलकुल सही कहा वाणी जनता अब जान चुकी है कि उसे क्या चाहिये। छठ की तस्वीरें बहुत अच्छी लगी। बधाई दोनो के लिये, चुनाव नतीजों और तस्वीरों के लिये। शुभकामनायें।

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  20. kaam karne par भी vot milte हैं ... pahli baar huva है bharat में ... achhee shuruat है ...

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  21. विकास की ही जीत होती है अंततः!
    तस्वीरें बहुत बढ़िया लगीं!

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  22. .

    People are getting aware now. They fight for their rights.

    .

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  23. मैने भी महीनो से फिंगर क्रॉस करके रखी थीं कि 'नितीश जीत जाएँ' ...और मन प्रफुल्लित हो गया......खुद भी देखा है..और लोंग भी बताते हैं..काफी बदलाव आया है...बस ऐसा ही सबकुछ चलता रहें...ह्रदय से यही प्रार्थना है.

    और ये तुम्हारा tag line हो गया है क्या.."मैं आम गृहणी हूँ...मैं साधारण गृहणी हूँ...."तो यहाँ ख़ास और असाधारण कौन है?..जरा नाम तो गिनवाओ...यहाँ सब अपने लेखन से जाने जाते हैं...गृहणी हों या कामकाजी...या कोई तुर्रम खां (या कोई मिस या मिसेज़ तुर्रम खां ... हाहा बहुत दिनों बाद ये शब्द लिखा है...) कोई फर्क नहीं पड़ता ..इसलिए गुजारिश है...ये tag line बदल लें :)

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  24. सुशासन का कोई विकल्प वाकई नहीं है वर्ना हम सब आज भी राम राज्य की खोज में क्यों लगे होते?

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  25. सब की जागरूकता ही यह चमत्‍कार है ....बधाई सुन्‍दर प्रस्‍तुति के लिए ....।

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