शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

चाह्ते कैसी- कैसी !

अलसुबह जो गीत सुन लो , बरबस ही लब पर चढ़ जाता है और दिन भर उसी गीत की धुन लगी रहती है ...अभी एक दिन सुबह पहले अली जी की पोस्ट " तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में ,मेरे सिवा भी कोई और हो , खुदा ना करे " पढ़ ली , बस फिर क्या था दिन भर यही गीत जबां पर अटका रहा ....जब भी गुनगुन होती इस गीत कि खुद को टोक देती " क्या खतरनाक चाहते हैं " , मगर फिर थोड़ी देर में वही ...गीत का मूड बदलने के लिए ठुमरी , ग़ज़ल , भजन , रॉक संगीत सब सुन लिया , मगर वही ढ़ाक के तीन पात ....जब भी गुनगुनाओ , बस यही गीत फूट पड़ता ....
तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...

ये बात कैसे गवारा करेगा दिल मेरा
तुम्हारा ज़िक्र किसी और की ज़ुबान पे हो
तुम्हारे हुस्न की तारीफ़ आईना भी करे
तो मैं तुम्हारी क़सम है के तोड़ दूँ उसको
तुम्हारे प्यार तुम्हारी अदा का दीवाना
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...
हे भगवान , कितनी खतरनाक चाह्ते हैं ....ये क्या बात है कि तुम्हारी तारीफ कोई और दूसरा करे ही नहीं , ये प्यार कहाँ , जूनून है , जलन है , ईर्ष्या है ...

यह गीत तो अपनी चाल चल ही रहा था कि इंदु जी अपनी टिप्पणी कर गयी ," कोई कुछ भी कहे , तुम्हारा कृष्ण तो राधे रानी के बिना अधूरा है "....पता नहीं क्यों, कुछ बूँदें आंसुओं की लुढ़क गयी ....

जीवन का गणित इतना कैलकुलेटिव कहाँ होता है ...सिर्फ गणित में ही होता है , दो दूनी चार , आठ दूनी सोलह हमेशा , जिंदगी में नहीं ...उसका तो अपना ही गणित , अपनी ही परिभाषा , हर एक के लिए अलग ...किस बात पर हंसी आये , किस बात पर रोना ....
दिन भर से कितनी खबरे पढ़ी , देखी ... लूटमार , हत्या , धोखाधड़ी ,रोना- पीटना , आँखें गीली नहीं हुई ... कितने सुखद , दुखद पल याद किये मगर पलकें फिर भी नम नहीं हुई , और ये जरा -सी बात कृष्ण की हुई तो आंसू छलक गये ...
जी किया कि झगड़ पडूं इंदुजी से ... छलिया कृष्ण , खुद अधूरा कब रहा , वह तो अपने आप में सम्पूर्ण ही था ... उसने हर उस व्यक्ति को अधूरा किया , जिसने उससे प्रेम किया ...माँ यशोदा, राधा , रुक्मिणी , सत्यभामा ,गोपियाँ , मीरा .... सब तो उसके बिना अधूरे ही रहे !
ओ तेरी ! कृष्ण सबको चाहे तो भी चितेरा ही , सबका दुलारा ही !
कैलाश जी भी पूछ रहे थे ," कान्हा, राधा से क्यों रूठे "
मिल जाए कहीं कान खींच कर कह दूं ..."कान्हा , अब ना चलने की है रे तेरी चतुराई!"

समझाया मन को .... फर्क है कृष्ण में , आम इंसान में ...बहुत फर्क है !


ब्लॉग दुनिया में लौटे फिर से ...देखा तो गिरिजेश जी अपलाप कर रहे हैं ....
"मृत्यु के बारे में सोचना पलायन है। अतार्किक भय की तार्किक परिणति।"
"यह कहना सीमित दृष्टि का परिचायक है। तुमने यह मान लिया कि मृत्यु के बारे में सोचने वाला जीवन संघर्षों से घबराता है और यह भी कि वह भयभीत होता है।"

उधर आनद द्विवेदी जी कह रहे थे ...
"इस जगत में प्रेम से बड़ी कोई सृजनात्मक शक्ति नही है ! इसलिए प्रेम मृत्यु को स्वीकार कर ही नही सकता; वह घटती ही नही | अगर तुम प्रेम करते हो किसी को तो वह मरेगा नही; मर नही सकता | प्रेमी कभी नही मरता | प्रेमी मृत्यु को जानता ही नही | प्रेम अमृत है - ओशो"

मृत्यु, प्रेम भी सबके लिए एक जैसा कहाँ ... किसी को मृत्यु में भय है , किसी को प्रेम ...
कितने रूप है प्रेम के , चाहतों के ....
चाहतें कैसी -कैसी ....

ज्यादा पढना भी कई बार कन्फ्यूज कर देता है !

बुधवार, 29 जून 2011

" ताकि बचा रहे लोकतंत्र " ......एक दृष्टि

पिछले दिनों रविन्द्र प्रभात जी का उपन्यास " ताकि बचा रहे लोकतंत्र " पढ़ा . हिंद -युग्म से प्रकाशित इस उपन्यास के सम्बन्ध में प्रकाशक का मानना है कि दलित साहित्य को लेकर अक्सर यह बहस होती है कि गैर दलित साहित्यकारों द्वारा दलितों के संघर्ष और पीड़ा को लेकर किया गया लेखन सतही ही रहा है क्योंकि वह स्वयं की अनुभूति के रूप में नहीं , बल्कि सहानुभूति पूर्वक लिखा जाता रहा है ।

रवीन्द्रजी जी का यह उपन्यास इस धारणा को खंडित करता है . इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उस दर्द को महसूस करता है जो सदियों से हाशिये पर रहे लोगों/समाज ने जिया है . नैतिकता और आदर्शवाद को आधार बना कर दलित संघर्ष की अनुशंसा करता यह उपन्यास जातिवाद , छुआछूत की समस्या और समाधान के प्रति गंभीर चिंतन है. उपन्यास में लोक रंग की मुग्धकारी छटा कथ्य को बोझिल होने से बचाती है .उपन्यास के तीनों मुख्य पात्र झिंगना , सुरसतिया और ताहिरा दृढ और सुलझे विचारों से युक्त नैतिक मानदंडों पर खरे उतरते हैं और समाज में आदर्शवाद की परिकल्पना में अपनी अहम भूमिका निभाने में सफल होते है .

उत्तर बिहार के भवदेपुर गाँव का झिंगना नामक दलित युवक इस उपन्यास का मुख्य पात्र है . झिंगना की माँ जनकिया उसे बहुत पढाना चाहती थी . मैट्रिक तक पढने के बाद झिंगना एक स्कूल में सरकारी नौकरी करता है मगर एक दिन काम में चूक होने पर हेडमास्टर का ताना कि तुम कोटे वाले हो , सुनकर नौकरी को छोड़ आता है और उस दिन से ही सामाजिक न्याय के लिए उसकी लडाई आरम्भ हो जाती है . वह मैला ढ़ोने का काम भी कर लेता है मगर उसकी सुसंस्कृत स्वाभिमानी पत्नी सुरसतिया उसे इस काम के लिए मना करती है और उसकी बात मान वह एक मुर्दाघर में काम करने का अपना परंपरागत पेशा अपना लेता है । छूआ छूत , अस्पृश्यता इन दोनों को ही बहुत क्षुब्ध करती है . गाँव के बड़े नेता धरिछन पाण्डेय से उसकी अनबन हो जाती है .
चमनलाल की नाटक मंडली के कलाकार की असामयिक मृत्यु झिंगना के जीवन में बड़ा परिवर्तन लाती है . चमनलाल झिंगना को दिवंगत कलाकार का रोंल अदा करने के लिए कहता है . सीतामढ़ी के जानकी मंदिर में होने वाले कार्यक्रम में खेले जाने वाले नाटक में झिंगना महाकवि मुंहफट साहब का रोंल निभाता है . सभी उसके अभिनय से प्रभावित होते हैं , मगर झिंगना का दुर्भाग्य कि उसके दूसरे भाग के मंचन से पहले ही पंडाल में जोरदार धमाका होता है . कई लोंग मारे जाते हैं , चीख- पुकार , भागमभाग के बीच दिलावर के पास रोते सकपकाए झिंगना को धमाके और दिलावर की हत्या का आरोपी मानती पुलिस पकड़ कर ले जाती है । वास्तव में यह झिंगना को सबक सिखाने के लिए धरिछन पाण्डेय द्वारा रचा गया षड़यंत्र है . जेल में हैरान, परेशान झिंगना हिन्दू - मुस्लिम दंगों की असलियत जानते हुए कुछ ना कर पाने की विवशता से छटपटाता है। सुरसतिया जेल में खाने के साथ नेताजी का पैगाम लेकर झिंगना से मिलती है । नेताजी का कहना हैं कि यदि झिंगना इस विपदा से उबरना चाहता है तो उसे गाँव छोड़ कर जाना होगा , क्योंकि वे झिंगना के सपने और सामाजिक सरोकार की प्रतिबद्धता से आतंकित है . झिंगना पलायन को कमजोरी मानकर आनाकानी करता है और गाँव में रहकर अपने संघर्ष को जारी रखना चाहता है मगर सुरसतिया पेट में पल रहे अपने बच्चे का वास्ता देकर उसे गाँव छोड़ने के लिए राजी कर लेती है .
ट्रेन की बेटिकट यात्रा उसके भावी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ट्विस्ट बन जाती है . टी टी द्वारा टिकट मांगने पर झिंगना टिकट नहीं होने की बात करता है ,उसी अरक्षित डब्बे में अपने पिता सिकंदर के साथ सफर कर रही मशहूर शायरा और शास्त्रीय गायिका ताहिरा उसकी मदद करती है . ट्रेन में बैठा झिंगना अपनी लोकधुन में गीत गुनगुनाता है . उसकी मधुर तान से मुग्ध ताहिरा अपने साथ लखनऊ ले जाती है.
ताहिरा का परिवार गंगा -जमुनी संस्कृति की पहचान है . ताहिरा के पिता सिकंदर मुस्लिम है तो माँ बनारस के हिन्दू ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती हैं . हिन्दू माँ के संस्कार और पिता के आदर्श एक साथ ताहिरा में मिल कर उसे एक शानदार व्यक्तित्व बना देते हैं . ताहिरा उर्दू , फारसी , हिंदी और संस्कृत की जानकार है .
" अनुप्रास हुआ मन मंदिर
मन हुआ कबीर तन
औचक बिंदास हुआ " गीत गाते हुए ताहिरा और झिंगना की साझा संगीत यात्रा प्रारंभ होती है और झिंगना के जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ हो जाता है .
झिंगना के साथ काम करते हुए उसकी मासूमियत और सरल स्वभाव ताहिरा को बहुत प्रभावित करता है और वह मन ही मन उससे प्रेम करने लगती है । झिंगना और ताहिरा की काव्य नाटिका " बेटिकट सफ़र " ना सिर्फ आकशवाणी और दूरदर्शन पर धूम मचाती है , बल्कि कई शहरों में इनका सफल मंचीय आयोजन भी किया जाता है और झिंगना एक राष्ट्रीय कलाकार के रूप में प्रसिद्ध हो जाता है । झिंगना अपने कार्यक्रमों और नाटकों में कई प्रयोग करता है । उर्दू और फारसी शब्दों से सजी अनूठी रामलीला उसकी मौलिक प्रतिभा की परिचायक बन जाती है । कामयाबी उसके कदम चूम रही है । लोकगायन के साथ नाट्य निर्देशक के रूप में उसके नाम की देश भर में धूम मच जाती है । नाट्य के प्रति अपने समर्पण के कारण झिंगना फिल्मों में काम करने के प्रस्ताव को भी ठुकरा देता है । ताहिरा के साथ मिल कर वह " अन्तरंग " नाट्य मंच की स्थापना करता है जो प्रतिभाशाली नाट्य कलाकारों को तलाशने के साथ उन्हें निखारने का कार्य भी करता है . ताहिरा उसके लिए नाटक लिखती है, वही खलील , रईस , अंगद , कमोलिका आदि कलाकार कार्यक्रमों के सुचारू रूप से सञ्चालन में उनकी मदद करते हैं . झिंगना इस बात को लेकर प्रतिबद्ध है कि उसके नाटकों में कही भी साम्प्रदायिकता की झलक ना आये .
लखनऊ महोत्सव में दूरदर्शन पर होने वाले कार्यक्रम में वर्ष के सर्वश्रेष्ठ रंगकर्मी के रूप में राष्ट्रपति के हाथों सम्मान ग्रहण करते देख उसके ग्राम वासियों के साथ सुरसतिया भी भावविभोर हो जाती है .पूरे दो वर्षों के बाद वह अपने पति का दूरदर्शन पर ही दर्शन करती है . झिंगना भी अपनी पत्नी सुरसतिया और बच्चे की कमी को महसूस करता है .
राज्यपाल द्वारा सम्मानित किये जाने के कार्यक्रम में झिंगना "उत्थान संकल्प मठ " नमक ट्रस्ट की स्थापना तथा उसमे अपनी कमाई का 50 प्रतिशत ट्रस्ट में देने की घोषणा करता है.
ताहिरा का झिंगना के प्रति प्रेम बढ़ता ही जाता है , मगर वह इसका इज़हार नहीं करती ,अपनी डायरी में अपनी भावनाओं को व्यक्त करती है . अचानक एक दिन झिंगना की नजर ताहिरा की डायरी पर पड़ जाती है , वह ताहिरा की स्वयं के प्रति आसक्ति देख परेशान हो जाता है और अपने गाँव लौटने का फैसला करता है .
झिंगना धर्मग्रंथों से जाति वाले पन्ने निकाल देने और तथाकथित मनुवादियों के पाखंड के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करता है . उधर गाँव में धरिछन पाण्डेय झिगना के लौट कर आने की खबर से परेशान है क्योंकि अब झिंगना पहले जैसा कमजोर नहीं रहा .अब वह कुर्बान पर सुरसतिया के सूअर को मार कर गाँव में झिंगना और उसके परिवार को सांप्रदायिक दंगे भड़काने का कुसूरवार ठहराने का षड़यंत्र रचता है . कुर्बान जब यह बात अपनी पत्नी रुकयिया को बताता है तो वह सुरसतिया को इस षड़यंत्र के प्रति आगाह कर देती है .धरिछन पांडे के गुंडे जब सुरसतिया के सूअर को मारने की कोशिश करते हैं तो वह उन्हें ललकारती है . गुंडे उसकी झोपड़ी को आग लगा कर भागते हैं जिसके भीतर सुरसतिया का बेटा मुन्ना सो रहा है . अपनी जान की परवाह किये बिना ही सुरसतिया आग की लपटों में कूद पड़ती है और गंभीर रूप से घायल हो जाती है .
दिल्ली में अनुसूचित जाति /जनजाति आयोग के अध्यक्ष का पद सँभालते झिंगना को गाँव में अपनी पत्नी के गंभीर रूप से जल जाने की सूचना मिलती है और वह मीटिंग अधूरी छोड़ कर गाँव आ जाता है . भरसक प्रयासों के बावजूद सुरसतिया बच नहीं पाती . कुर्बान और उसकी पत्नी सरकारी गवाह बन जाते हैं . धरिछन पाण्डेय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी होता है .सारे समाचार सुन कर ताहिरा भी गाँव आकर झिंगना को ढाढस बंधाती है और मुन्ना को एक बेहतर भविष्य का देने का वादा करते हुए उसे साथ लेकर लखनऊ लौट जाती है .
झिंगना गाँव में अपने संघर्ष को अंतिम सांस तक जारी रखने का प्रण करता है . वह माओवादियों से भी हिंसात्मक संघर्ष छोड़ कर अहिंसा की राह पर चलने का आह्वान करते हुए सामाजिक विकृतियों से लड़ने की अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता की ओर कदम बढ़ाता है....

शनिवार, 18 जून 2011

थैंक्स , राम !......... (अंतिम किश्त)

थैंक्स, राम! भाग एक , भाग दो , भाग तीन , भाग चार , भाग पांच से आगे ...



कहाँ खो गयी , लीना ने झिंझोड़ा तो अंजना चौंक पड़ी ...हो गयी तेरी पूजा ...

अंजना ने मोती के कुछ आभूषण ख़रीदे,कुछ मैचिंग दुपट्टे भी ...अंजना के हैदराबाद जाने की खबर सुन उसकी ननद ने ख़ास फरमाईश की थी ...खरीददारी करते हुए सामने लकड़ी की सीढियाँ वाले छोटे से रेस्तरां को देख लीना को चाय की तलब हो आई ...लीना भी अजीब है , कब क्या मन कर जाए ...ऐसे ही एक दिन घर लौटते ईरानी चाय की होटल देख उसके मना करते भी खींच ले गयी थी ....बहुत कहा अंजना ने घर पास में ही है , वहीं पी लेंगे ...स्टील की छोटी गिलासों में छोटी प्लेट के साथ सर्व की गयी मलाई युक्त नमक डली ईरानी चाय ...पहले सिप में ही उबकाई आते-आते रह गयी अंजना को ...दूध या मिल्कशेक में से भी छान कर मलाई निकाल देने वाली अंजना चाय में मलाई कब पसंद करती ...मुंह का स्वाद ख़राब कर दिया , अब कुछ चटपटा खाना पड़ेगा ...बहुत बिगड़ी थी अंजना ...पसंद तो लीना को भी नहीं आई थी और दोनों चाय वैसी ही छोड़ कर बाहर निकल आई थी ...

दोनों दोपहर तक घर पहुंची ...माँ और काकियाँ निकासी की सामग्री जुटा रही थी ...दूल्हा चेहरे पर मास्क लगाये अपने दोस्तों से घिरा था ...आजकल लड़कों को भी कम तैयारी नहीं करनी पड़ती ...अम्मा (दादी) हँस रही थी उसकी हालत देख ...
माँ ने छोटी काकी को आवाज़ लगाई थी ," चने की दाल समय से भिगो दी थी या नहीं, बताशे कागज़ की थैलियों में पैक करवा लेती हूँ , यही ले आ "
वहीं काका निकासी के समय बहू बेटियों को देने वाले नेग के लिफाफे तैयार कर रहे थे ...दूल्हा जब घोड़ी पर बैठ कर घर से निकलने की तैयारी में होता है ,तब घोड़ी पर बैठे दूल्हे की घर की सभी महिलाएं आरती करती हैं , यही एक रस्म है जहाँ माँ और भाभी को दूध पिलाने और काजल लगाने के विशेष नेग के साथ ही परिवार की सभी बहू और बेटियों को भी नेग दिया जाता है...
बैंड बाजे के साथ नाचते गाते पहुचे वधू के द्वार तो रात गहरा गयी थी ...विवाह की मस्ती में रिश्तेदारों और दूल्हे के दोस्तों को नृत्य करने से रोकना और आगे बढ़ते रहने को कहना भी एक दुष्कर कार्य ही होता है , काका के जल्दी चलो कहते भी बहुत समय लग गया उन्हें विवाह स्थल तक पहुँचने में ...द्वार पर अगवानी में दोनों पक्षों में मीठी नोंक- झोंक होती रही, फिर भी वधू की भाभी दूल्हे की नाक पकड़ने में कामयाब हो ही गयी ...कुछ रस्मों और खाने के बाद लीना , अंजना और काकी की दोनों भांजियों को अपने कजिन्स के साथ वहीं रुकने का निर्देश दे कर घर की महिलाओं के साथ अधिकांश बाराती लौट चुके थे ....सप्तपदी की रस्म में ससुरापक्ष की ओर भेंट किये जाने वाले वस्त्र और आभूषण अंजना और लीना को ही देने थे ...वे पास ही पड़ी कुर्सियों पर बैठ सप्तपदी की रस्में होती देखती रही ...इन रस्मों के समय हर विवाहित अपनी शादी के समय को जरुर याद करता होगा , दोनों सहेलियां बतियाने लगी ....

लीना के विवाह में दुल्हन की खास सहेली होने के कारण पूरे सप्तपदी के दौरान अंजना वही बैठी रही थी , लीना ने बार- बार उसे अपने साथ ही रहने की जिद जो की थी ....सुबह सुहागिन महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाते ,उबटन लगाते हुए उसने अचानक अंजना से पूछा ," तूने राम के हाथ में पट्टी बंधी हुई देखी "
पता नहीं , मैंने ध्यान नहीं दिया , मेरे पास फालतू समय नहीं होता इधर -उधर निहारने के लिए...अनजान चिढ गयी थी !
तुझे देखना चाहिए था ...लीना गंभीर हो गयी ,तू किस दुनिया में रहती है , तुझे आस- पास की कुछ खबर नहीं रहती ...
क्या हुआ ...
कलाई पर कुछ लिखने की कोशिश में ब्लेड से हाथ कटवा बैठा ...
क्या घटिया हरकत है ...
तुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता !!..
.काश कोई हमारे लिए ऐसा करता !!...एक गहरी सांस लेते लीना ने अभिनय किया तो उसके चेहरे पर फिर वही बांकपन था ...अंजना को तसल्ली हुई ...

ऐसी घटिया हरकतों से वही लोंग खुश होते हैं ,जिनका ऊपरी माला खाली होता है ...
बात एक ही है जान , हमारा ऊपरी खाली है , तेरा भीतर का खाली है , तेरा तो दिल ही नहीं है....
ज्यादा हिंदी फ़िल्में देख कर तेरा दिमाग खराब हो गया है , ऐसा कोई प्यार नहीं होता है , किसी को एक बार देखा , ना जान ,ना पहचान ...तू विदा हो ले एक , फिर खबर लेती हूँ इसके पूरे परिवार की ...
अंजना ने घूर कर देखा तो लीना चुप हो गयी ....

"अशुभ है" दिमाग में फिर कहीं बजने- सा लगा ... लीनाके विवाह के भात की रस्म में काका के साथ पूरा परिवार भी शामिल था ...अंजना का दिल जोरों से धड़का ...दर्द की एक तेज लहर उठी उसने पर्स से पेन किलर की गोली निकाली और गटक गयी ...आज दर्द सहन करने के लिए समय कहाँ था ...

तू अपनी मर्जी से दवा मत ले , एक बार डॉक्टर को दिखा लेते हैं ...
हां , चल पहले यही काम कर लेते हैं , शादी तो होती रहेगी ...दोनों जोर से हंसी तो सभी चौंक कर उनकी ओर देखने लगे थे ...

दिन भर विभिन्न रस्मों के बाद दुल्हन के साज श्रृंगार के लिए जब लीना ब्यूटी पार्लर गयी तो भी उसने अंजना को एक पल के लिए नहीं छोड़ा ...उनके साथ गाडी में पूर्णिमा और रामदास भी था ...बहाने से हाथ की पट्टी को सरकाते हुए उसके खरगोशी कुतूहल को अंजना ने देख कर भी अनदेखा कर दिया ...

तूने खाना खाया या नहीं ....लीना राम से मुखातिब थी ...सुना अंजना ने भी मगर असमय इस बेतुके सवाल पर खीझते हुए बोली ...कुछ घंटों में विवाह है तेरा , चकर- चकर लगा रखी है ,थोडा कम बोल लेने में कोई नुकसान नहीं है ...
मेरी बकबक को कोई नहीं रोक सकता , कोई भी नहीं ...

फेरे शुरू होने वाले थे ..मंत्रोच्चार के बीच लीना ने अंजना का हाथ दबाया जोरो से ...

क्या हुआ ...
कुछ देर बाद मैं विदा होकर चली जाउंगी , बस मेरी एक बात मान ले ...राम को खाना खाने को कह दे ...
हद है ...बहुत गुस्सा आया आया लीना को , क्या लड़की है , अपनी शादी के फेरे शुरू होने वाले हैं , फिक्र किसी और की है अभी इस वक़्त भी ...
लीना , तुझमे बिलकुल समझ नहीं है , ये समय ऐसी बातों का है ?? फुसफुसाते हुए लीना और अंजना की बातें हो रही थी ...
बस एक बार , मेरी एक आखिरी बात रख ले ...
मूर्ख लड़की , ठीक है , मैं कह दूँगी , तू अभी इधर- उधर दिमाग मत लगा ...
अपनी झुंझलाहट को दबाते हुए उसे उठना ही पड़ा ...
क्या नौटंकी है , खाना क्यों नहीं खाया है तुमने ...अंजना बरस ही पड़ी थी राम पर ...
कुछ नहीं , अभी खा लूँगा ...
लीना से नजरे मिलाईं अंजना ने ,वह निर्निमेष उनकी ओर ही देख रही थी ...उसके व्यग्र चेहरे पर मुस्कान देख मन हल्का हुआ ...
इसको तो मैं बाद में देख ही लूंगी ...मन ही मन भुनभुनाते ,ऊपर से मुस्कुराते अंजना उसके पास लौट आई ...
सुबह देर तक होने वाले विवाह की रस्मों के बाद लीना विदा हो गयी थी ...ज्यादा दूर नहीं थी उसकी ससुराल मगर विवाह के बाद दूरियां ज्यादा कम होने से भी बहुत कुछ बदल जाता है , बेटी पर अपना अधिकार कम होने या समाप्त होने की भावना लड़की और उसके परिवार , मित्र मंडली सबको एक साथ भावुक कर देती है ...

लीना के पगफेरे की रस्म पर नहीं जा सकी थी वह .....लगातार सिर में दर्द और कमजोरी और कभी- कभी कुछ भी समझ नहीं पाने की उसकी हालत को थकान समझ कर अनदेखा नहीं किया जा सकता था ...एक दिन माँ ले ही गयी उसे चिकित्सक के पास ... टेस्ट की रिपोर्ट से चिंतित माँ ने पिता को बुला लिया था कागजनगर से ...अंजना के टेस्ट की रिपोर्ट्स मस्तिष्क के एक हिस्से में सूजन का होना दिखा रही थी ...कुछ महीने पहले हुए मियादी बुखार ने उसके दिमाग के एक हिस्से पर हमला किया था ...
सब कुछ छूट रहा था अंजना के हाथ से ...पढ़ाई और किताबों से होने वाला उसका पहला प्रेम भी ...डॉक्टर की आराम की सख्त हिदायतों के के बीच उसके पिता ने कुछ महीनों की छुट्टी लेकर कसौली ले जाना तय किया था .....लीना एक दिन मिलने भी आ गयी थी निखिल के साथ , वैसे भी उसे अपने घर खाने पर निमंत्रित करना था उन्हें ...सामान्य बने रहे अंजना के माता -पिता ने किसी को भी उसकी बीमारी के बारे में बताया नहीं ,लीना को भी नहीं ....

कसौली रवाना होने से पहले काकी के साथ लीना से मिलने गयी थी अंजना एक दिन ...राम के घर खाने पर बुलाया गया था उन लोगों को , दूसरे दिन ही निखिल अपने काम पर लौट जाने वाले थे ...

अंजना ने सोच लिया था आज उसे बात करनी ही होगी आंटी से , ड्राइंग रूम में भरसक शांत बने रहने की कोशिश में अंजना ने दीवारों पर रगड़ कर हटाये गए कुछ निशाँ देखे , अचानक सोफे के हत्थे के पास कुछ छिपा सा उभरा हुआ उसका नाम ...उसकी नज़रों का पीछा करते हुए आंटी की उदासी ने बहुत कुछ कहा अंजना से और वह चुप रह गयी ...क्या सचमुच वह अशुभ साबित होने वाली है अपने परिवार के लिए , सबके लिए ...एकदम से इस ख्याल ने अंजना को वहां ज्यादा देर रुकने नहीं दिया , लीना से विदा लेकर वह घर लौट आयी ...

शांत प्राकृतिक वातावरण में सबसे दूर माता पिता की स्नेहिल छाँव की और दवा ने असर किया था या अंजना की इस इच्छा शक्ति ने की ...नहीं , वह किसी के दुःख का कारण नहीं बनेगी , कौन जाने ....
पूर्ण स्वस्थ होकर वापस हैदराबाद लौटने से पहले ही राजस्थान के बीकानेर से बुआ की बेटी स्वाति के विवाह का न्योता आ पहुंचा उनके पास..... स्वाति के विवाह के दौरान ही अंजना के माता पिता का मिलना हुआ आर्णव और उसके परिवार से ... सुयोग्य आर्णव और अंजना का जीवन भर का रिश्ता जुड़ना तय हो गया ...तुरंत फुरंत सगाई और गोद भराई और तीन महीने बाद ही विवाह की तिथि तय होना , कुछ समय ही नहीं मिला किसी को कुछ सोचने का ...
सुलझे विचारों के समझदार आर्णव के साथ ने अंजना के जीवन को एक ठहराव और निश्चिंतता दी थी ...जब पहली बार मिला था आर्णव तभी पूछ लिया था उसें ," आप आगे पढना चाहेंगी " और सास की बड़बड़ाहट को अनदेखा कर भी उसने उसकी शिक्षा को पूर्ण होने में मदद की ...गृहस्थी की जिम्मेदारियों में कभी नौकरी के बारे में सोचा नहीं उसने ...अभी पिछले साल ही जब ट्रांसफर होकर वे लोग अपने शहर से दूर आये तो बचे हुए खाली समय का उपयोग और अपनी शिक्षा से दूसरों का भी भला करने के उद्देश्य से एक एन जी ओ द्वारा संचालित विद्यालय में विभिन्न गंभीर बीमारियों से जूझते बच्चों के विद्यालय में अपनी सेवा दे रही है ...

सप्तपदी की सारी रस्में हो चुकी थी ... दुल्हन के लिए ससुराल से लाये गए वस्त्र , आभूषण और लाख की लाल- हरी चूड़ियों वाला विशेष चूड़ा पहनाया जाना था .....काका ने अंजना को पुकारा तो लीना और अंजना का ध्यान भंग हुआ ...

विवाह कार्यक्रम उल्लास और धूमधाम से संपन्न हो गया था ...अब अंजना को लौट जाना था वापस ...लड़कियां जीवन भर इसी कशमकश में जीती हैं ,कौन सा घर है उनका अपना ...जिसकी छाँव और गोद में बचपन के सुनहरे पल बिताये , जिसने किशोरावस्था की चुहलबाजियाँ छोड़ युवावस्था की और बढ़ते देखा या फिर वह एक जो वर्षों से अनजाना रहा मगर एक ही पल में सबसे बढ़ कर अपना हो गया ...बहुत मुश्किल होता है उस घर से बिछड़ना जो उनके होने का कारण होते हैं तो वहीँ अपनी गृहस्थी की ललक और फिक्र खिंच ले जाती है कदम, जहाँ उनका होना ही घर होता है , जहाँ वे मकान को घर बना देती हैं ....फिर जल्दी ही लौटकर आने का वादा लेते परिवारजन स्टेशन तक छोड़ने आ पहुंचे थे ...
नामपल्ली स्टेशन से रवाना होते आंसू भरी आँखें अपनों के धुंधले होते जाते चेहरों पर टिकी रही देर तक ... ट्रेन से बाहर झाँक कर देखा अंजना ने ...रात गहराने लगी थी ...रात में झिलमिलाती रोशनियाँ शहर के सौंदर्य को और बढ़ा देती है ...

अंजना का मोबाइल घनघना उठा .."रवाना हो गयी , सीट नंबर क्या है , रास्ते में अपना ख्याल रखना , वैसे मैं बार- बार फोन करता रहूँगा "...आर्णव फिक्रमंद था उसके लिए ...

नहीं , अंजना अशुभ नहीं थी , वह प्यार और फिक्र किये जाने योग्य थी , है ...

अंजना लीना के साथ अपनी यादों के दौर को याद कर रही थी ...चाहे -अनचाहे राम को भी शामिल होना ही था उनमे ....समय के साथ घटनाओं के सन्दर्भ और व्याख्याएँ भी बदल जाती है ...आज सोच रही थी अंजना .... निराशा , उदासी और तनाव के उन दिनों में जो उसने सोचा नहीं था ... अकारण किसी का चाहे जाना भी अपने वजूद के होने का एहसास देता है , आत्मविश्वास बनाये रखता है , लडखडाती जिंदगी को मजबूती देता है ...
नहीं , वह अशुभ नहीं थी , अवांछित भी नहीं ... ट्रेन तेज घडघडाहट की आवाज़ के साथ पटरियां बदल रही थी ...उसी में सुर मिलाते धीरे से कहा अंजना ने अपने- आपसे ...." थैंक्स , राम !"



..............................................................................