कई बार हम एकसार जीवन के इतने अभ्यस्त होते हैं कि क्या छूटता जा रहा है, हमें इसका अहसास ही नहीं होता. विशेष परिस्थितियों से गुजरते हुए अचानक से जीवन में बड़ा परिवर्तन होता है जो उस समय में हादसा ही दिख पड़ता है परंतु आगे जाकर नवजीवन की नींव ही बन पड़ता है.
कुछ ऐसी ही कहानी है शिखा वार्ष्णेय की। कहानी है उस उपन्यास की जिसकी मुख्य पात्र ऐला का जीवन हिचकोले खाते हुए आखिरकार उसे उस दुनिया में पहुँचा देता है जिसकी उसे इच्छा जरूर रही होगी पर उसका सपना देखना छोड़ दिया होगा.
जीवन के इस पड़ाव पर आकर ऐला इतनी अधिक संतुष्ट होती है कि वह कह उठती है "अस्मि" मैं हूँ...अभी मैं हूँ अपने पूरे अस्तित्व की स्वीकार्यता के साथ मैं हूँ.
ऐला के चरित्र से मध्य आयुवर्ग की वे स्त्रियाँ अपने आपको सम्बद्ध पायेंगी ही जो ऊपर से संपन्न व्वस्थित वैवाहिक जीवन जी रही होंगी जिसमें उन्होंने स्वयं को खो दिया होगा।
ऐला के साथ ही इसमें एक शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे लड़के रियो की कहानी भी है . उसके अभिभावकों के लिए यह कठिन परिस्थिति रही होगी जब लड़के के शरीर में लड़कियों जैसा जीवन जीने की लालसा प्रकट हो रही हो. पर जब वह या उसके आसपास का परिवेश उसको उसी रूप में स्वीकार लेता है तब शायद जीवन से संतुष्ट होकर उसने भी यही कहा हो - अस्मि मैं हूँ.
इसी उपन्यास में जापानी जीवन जीने की कला इकिगाई के बारे में भी जानकारी मिलती है . यह जानना रोचक है कि इस कला को पहाड़ों पर सामान्य शिक्षा दीक्षा वाले अति साधारण लोग भलीभांति जान रहे, जी रहे!
कुल मिलाकर उपन्यास का कथानक रोचक है जो भावी घटनाओं के प्रति उत्सुकता बनाये रखता है और आप पूरा उपन्यास एक साथ ही पढ़ लेना चाहते हो.
कहानी, घटनाओं का बदलाव, चरित्र का विकास- सब कुछ है इस उपन्यास में जो इस विधा की प्रमुख विशेषता है.
अस्मि शिखा वार्ष्णेय का पहला उपन्यास है. परंतु इससे पहले वे घुमक्कड़ी पर आधारित दो पुस्तकें भी लिख चुकी हैं.
शिखा वार्ष्णेय की अन्य पुस्तकों , पुरस्कारों आदि का विस्तृत वर्णन इस लिंक पर देखा जा सकता है.


