शनिवार, 15 अगस्त 2026

आधी सदी का किस्सा (अनुराग शर्मा)



 आधी सदी का किस्सा

लेखक - अनुराग शर्मा

अंतर्जाल का माध्यम सर्वजन के लिए सुलभ होने के बाद पूरे विश्व में ही क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं. कहना न होगा कि हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिसने वैश्विक स्तर पर  सबसे अधिक परिवर्तन देखे हैं वह चाहे आर्थिक, सामरिक, स्वास्थ्य, शिक्षा दृष्टि से हों.

अभी इस समय में हम 2026 से गुजर रहे हैं. कई बार विचार होता ही होगा न कि अगले बीस फिर उससे आगे के वर्षों में दुनिया कैसी होगी. 

"आधी सदी का किस्सा " ऐसा ही एक उपन्यास है जो वर्ष 2068  के बाद की संभावित वैश्विक गतिविधियों पर आधारित है.  

प्रोफेसर गुणाकर एक तीव्र बुद्धिमान वैज्ञानिक हैं जो अपनी संकल्पना "बिग क्लाउड" को मूर्त रूप देकर सम्मानित हुए हैं. धरती और उस पर बसने वाले प्रत्येक जीव, पर्यावरण  आदि की सुरक्षा और उनके लिए जीवन आसान बनाने की कल्पना और कार्य भी इस उपन्यास में दर्शाये गये हैं. अत्यधिक बुद्धिमत्ता  कई बार इंसान को बहुत अकेला कर देती है. ऐसा ही कुछ प्रोफेसर गुणाकर के साथ हुआ. सार्वजनिक तौर पर विख्यात यह विद्वान अपने अकेलेपन में अपनी पुस्तकों के साथ प्रसन्न हैं जबकि उनका आविष्कार ही वह प्रमुख कारण रहा होगा जिसने पुस्तकों की महत्ता को समाप्त किया.  

जैसे कि जीवन चक्र घूमता रहता है. सुख या दुख भी अदला बदली करते रहते हैं. अजेय समझी जाने वाली "बिग क्लाउड" में भी समस्या उत्पन्न होने लगती हैं. 

"बिग क्लाउड "की एक तकनीकी समस्या जो पूरे विश्व के लिए बड़ा संकट बनने वाली है के निराकरण के लिए  एक काबिल व्यक्ति रायन को नियुक्त किया जाता है. रायन समझता है कि इस समस्या का हल प्रोफेसर गुणाकर के पास ही संभव है क्योंकि इसके प्रणेता वही हैं. उनके पास इसकी कोई वैकल्पिक व्यवस्था अवश्य रही होगी. 

 रायन निर्वासित सा जीवन जी रहे प्रोफेसर तक कैसे पहुँचता है या नहीं पहुँच पाता है.   बिग क्लाउड की समस्या का क्या हल निकलता है!  पाठक की उत्सुकता बनी रहती है. 

साइंस फिक्शन की यह कहानी पूजा ने अपनी सुमधुर स्पष्ट आवाज में भी रिकॉर्ड की है जिसे नीचे दिये गये लिंक पर सुना जा सकता है.

https://www.audible.com/author/Anurag-Sharma/B07W96N534?fbclid=IwVERDUATuDL5wZG9mBWV4dG4DYWVtAjEwAHNydGMGYXBwX2lkDDM1MDY4NTUzMTcyOAABHsOLepg4o7e5sQzLI8BbNlRC_VKE4RAZAfrZ0vox93-jAucPqkBY6Wx__L1L_aem_TeYiR6smli-NNncGcthmyA

फिलहाल यह पुस्तक प्रिंट रूप में उपलब्ध नहीं है.  किंडल एप  की सदस्यता लेकर पढ़ी भी जा सकती है.

https://www.amazon.com/stores/Anurag-Sharma/author/B07W96N534?fbclid=IwVERDUATuC45wZG9mBWV4dG4DYWVtAjEwAHNydGMGYXBwX2lkDDM1MDY4NTUzMTcyOAABHoi_bR_oYAZne49m4MRKuJEcK0NrYmnkao3svwFuu1uNfOuNlZHMVGvQlXdh_aem_IQxcof6ZLdOdxV5KMamwBQ

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

आओ री गौरैया!



पागलपंथी जैसा कुछ लिखा होगा. आज लगता है कि क्या सच ही वह समय पागलपंथी का था या अब!



कुछ पोस्ट पर  पढ़ने में आया कि आज( या कल?) गौरैया दिवस था. स्मरण हुआ कि कुछ वर्षों पूर्व घर इनसे गुलजार रहा करता था. एक दो ब्लॉग पोस्ट भी लिखी थी इन पर. 

पर इधर के दो चार वर्षों में गौरैया कहीं नजर न आ रही. पेड़ पौधे दाना पानी सब कुछ वैसा है पर गौरैया नहीं. आजकल मैना मी कम दिखती है. बस कबूतरों की भरमार है. जिनके आतंक से बचने के लिए ज्यादातर लोगों ने कबूतर जाली लगवा ली है और दाना पानी रखना भी बंद कर दिया है.

 जाली लगने से छोटी चिड़िया भी नहीं आ पायेगी . सिर्फ इसी सोच ने अब तक बालकनी को खुला रखा है. पर सब तरफ बंद दरवाजे कबूतरों को हमारे दर पर धक्का देते हैं जैसे. शायद जल्दी ही अपनी बालकनी को भी कबूतर जाली से ढ़कना पड़े.  फिर कहीं आस रहती है कि यदि गौरैया आई तो बाहर से ही लौट जायेगी!

पिछले चार वर्षों में तो दिखी नहीं पर इंतजार है!


https://vanigyan.blogspot.com/2013/05/blog-post.html?m=1

 https://vanigyan.blogspot.com/2019/04/blog-post.html?m=1

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

नाचेगा इंडिया तब ही तो बढ़ेगा इंडिया!

 


पुराने समय  (मतलब बहुत ज्यादा नहीं 😛)  समय से शादी /विवाह में  संगीत के नाम से कार्यक्रम होता रहा है  जिसमें स्टेज पर परिवार/मित्र आदि अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करते दिख जाते. सब साथ मिल बैठ कर नृत्य गान का आनंद हँसी मजाक और स्वादिष्ट भोजन के साथ करते रहे.  धीरे -धीरे दूल्हा /दुल्हन भी स्टेज पर आने लगे.
फिर शुरू हुआ दूल्हे के स्वागत में स्वयं दुल्हन का नृत्य के साथ पधारना. फिर दुल्हन की माँ का जमाई के स्वागत में, दूल्हे की माँ का बेटे की घुड़चढ़ी पर , दुल्हन के स्वागत में सास ननद का, मायरा भात में भाई के स्वागत में दूल्हा दुल्हन की माताजी का... अभी हाल में देखा विवाह की पहली मेहमान बुआ का भी नृत्य से स्वागत...
इन सब अवसरों पर हमने हमारी बुजुर्ग स्त्रियों को लोकगीत गाते हुए सुना देखा है। लोकगीत की धुन पर नृत्य करते भी.

फिल्मी सितारों के साथ ही यह ट्रेंड धार्मिक कथा प्रवचकों तक भी पहुंच गया. कथा प्रवचन सुनने जाओ तो अभी कथा प्रारंभ ही न हुई उससे पहले भजन पर नृत्य. एक कथा में तो यह भी सुना कि जो यहाँ नहीं नाचोगे तो दुनिया में नाचना पड़ेगा .

झट से दिमाग में गुलाम अली जी घूम गये. हम भी वहीं मौजूद थे हम से भी सब पूछा किये।

हम हँस दिये हम चुप रहे कि तर्ज पर हम अपना सा मुँह लेकर रह गये क्योंकि बस हमारे साथ एक या दो जने ही थे जो चुपचाप बैठे रहे.

अब यह सब पढ़ कर यह न सोचने/ कहने लग जाना कि हमें नृत्य पसंद नहीं। 

नहीं. भई!  बहुत पसंद है. महिला संगीत कार्यक्रमों में शायद हम ही वह होंगे जो बड़े ध्यान से कार्यक्रम को देखते हैं क्योंकि बाकि सारे अपने नृत्य में लीन होते हैं. कभी कभार हुड़दंग में हम भी शामिल हो लेते हैं बिना नृत्य आये भी.

बिना संदेह नृत्य एक आनंददायक कला है पर  आजकल जिस तरह से हर  समय  हर रस्म में नृत्य ही नृत्य हो रहा लगता है जैसे सब मिल कर कह रहे नाचेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया!