सोमवार, 26 जुलाई 2021

जीवन-माया

 जब माँ थीं तब छोटी छोटी पुरानी चीजें सहेज लेने की उनकी आदत पर सब बहुत खीझा करते थे. अनुपयोगी वस्तुओं का अंबार हो जैसे... दादी तो खैर उनसे भी अधिक सहेज लेने वाली थीं.

पापा का खरीदा पहला बड़ा रेडियो, शटर वाली पुरानी टीवी, पुराने ड्रम ,बारिश के पानी में भीग कर फूली हुई चौकी, जंग खाये लोहे के बक्से , घिसा पिटा कूलर जाने क्या क्या.. 

माँ की ढ़ेरों साड़ियाँ एक छोटा सा ढ़ेर जैसा इधर उधर बिखरी रहती थीं. रसोई में बरतन, कड़ाही आदि भी ज्यादातर पुराने घिसे, जले कटे ही रहते थे. 

अचानक मेहमान के आने पर पुरानी मोच खाई गिलासें, अलग अलग साइज की कटोरियाँ , चिकनाई लगी ट्रे,  छोटे चाय के कप ही काम में आते क्योंकि ऐन वक्त पर उनकी उस आलमारी या कमरे की चाबियाँ गुम रहती थीं. सूटकेस, पेटियों और दरवाजे के ताले तोड़े जाने के उदाहरण सैकड़ों में रहे होंगे, ऐसा लगता है मुझे.  

मगर जब उनके आखिरी समय के बाद उनकी अस्थियों के साथ उनके कमरे की चाबी आई तो उनके कमरे का दरवाजा खोलती मैं दंग थी-  कमरे में एक भी चीज बेतरतीब नहीं थी. सफर पर रवाना होने के समय बदलने वाली एक साड़ी के अतिरिक्त कुछ भी बिखरा हुआ नहीं था... सभी साड़ियाँ/वस्त्र आदि बहुत करीने से जमाये हुए आलमारी में थे.

माँ पर उनके बिखरे से साम्राज्य के लिए उन पर झुँझलाती रहने वाली मैं कितनी स्तब्ध हुई!  

कितना अजीब खाली-खाली लगा मुझे , बता नहीं सकती शब्दों में... 

मन करता रहा कि कहूँ माँ से कि यह बेतरतीबी ही तुम्हारा जीवन थी. समेट लेने को हम बेकार ही कहते रहे. 

जिनके लिए थे उनके दुख, उनकी चिंताएं, उनका श्रम - उनका जीवन उनके बिना भी चल रहा और बहुत बेहतरीन चल रहा... 

जैसे सब कुछ माया-सा था. जाने वाला अपने साथ सब समेट ले गया.... अपना जीवन, अपना दुख, अपनी चिंताएं!!

गुरुवार, 24 जून 2021

लक्ष्मण को आवश्यक है राम जैसा भाई...

  रामायण /रामचरितमानस में श्रीराम द्वारा स्वयंवर की शर्त पूरी करने के लिए धनुषभंग करने के वृतांत से कौन परीचित न रहा होगा.  धनुष तोड़ दिये जाने से क्रोधित ऋषि परशुराम के क्रोधित होने और राम के छोटे भ्राता लक्ष्मण का व्यंग्यपूर्वक उनका सामना करने/ढ़िठाई रखने का प्रसंग भी लोकप्रिय रहा है.  बहुत समय तक दोनों के मध्य हुए वाद विवाद का पटाक्षेप होने के बाद ऋषि स्वयं नतमस्तक हुए . अपने से छोटा जानकर भी उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की.

क्या कारण रहा होगा कि अपने कुल की बड़ों को सम्मान देने की नीति का पालन करते हुए भी ऋषि के आगे वे तने ही रहे. स्पष्ट है कि मिथ्या अभिमान में बड़ों द्वारा  अपमान/असम्मान किये जाने का प्रतिकार करने में कोई अपराध न समझा गया. यह अवश्य है कि ऋषि के क्रोध  और लघु भ्राता के मध्य एक प्राचीर अथवा सेतु कह लें, राम धैर्यपूर्वक खड़े थे.

कई बार बुजुर्ग इसी प्रकार अपने मिथ्या अभिमान में अपने से छोटों के प्रति अकारण ही रोष प्रकट कर जाते हैं. और यदि उनसे छोटे अपनी सही बात पर अड़े रहकर प्रतिकार करने पर विवश हों तब उन्हें बड़ों/बुजुर्गों के असम्मान करने का दुष्प्रचार करते पाये जाते हैं. 

देश/समाज/परिवार की वर्तमान परिस्थितियों में विभिन्न वैचारिक मतभेदों के मध्य में  राम जैसे एक बड़े भाई का होना आवश्यक लगता है जो विनम्रता पूर्वक अपने बाहुबल का बखान कर लघु भ्राता लक्ष्मण के प्रतिकार को सहज मानकर आश्रय दे सके. वहीं दूसरे पक्ष को भी जता सके कि सिर्फ बड़े होने के कारण ही वे किसी के पूज्य नहीं हो सकते. उनके अपने कर्म ही उन्हें सम्मानित बना सकते हैं.


गुरुवार, 10 जून 2021

विकट समय में स्वाभिमानी एवं स्वावलंबी के प्रति जवाबदेही किसकी....

 


लॉकडाउन शुरू होने के एक दो दिन पहले पतिदेव के पास एक अनजान व्यक्ति का फोन आया कि उसे अर्जेंट धन की आवश्यकता है. यह बहुत अप्रत्याशित था क्योंकि सामाजिक कार्यों में लिप्त होने के बावजूद कभी किसी अनजान व्यक्ति ने इस प्रकार की सहायता के लिए कभी आग्रह नहीं किया था . वह व्यक्ति बहुत ही परेशान लग रहा था. अपने बच्चे के इलाज के लिए एक अस्पताल के पास कमरा लेकर रह रहा वह व्यक्ति इस चिंता में दिन भर भटकने जैसी स्थिति में था कि घर पहुँचने पर बच्चे को क्या कहेगा कि आज उसके पास बाजार स कुछ भीे ले आने को पैसे नहीं थे. पतिदेव ने उन्हें हिम्मत बँधाई . उनका मूल पता पूछ कर सहायता करने का आश्वासन दिया. पता चला कि वह अपने गाँव में समृद्ध परिवार से रहे हैं परंतु पिछले एक वर्ष से भी लॉकडाउन/ कोरोना कर्फ्यू  की अवधि में कुछ काम धंधा नहीं कर पाये हैं. उपर से बच्चे का इलाज चल रहा है. अगले ही दिन सख्त लॉकडाउन हुआ. उनका फिर से फोन आया . गूगल पे पर मौजूद नहीं होने के कारण उन्हें सहायता कैसे पहुँचाई जाये, यह भी बड़ी समस्या थी.

पतिदेव ने अपने सामाजिक मंच पर उनके लिए फंडरेज ( ) करने का  सुझाव दिया परंतु उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया कि इससे गाँव में उनकी साख को बट्टा लग जायेगा. छल फरेब वाले इस समय में आश्चर्य और शंका होनी स्वाभाविक थी. हैरानी थी कि इस आपदकाल में भी वे साख की सोच रहे थे.  हमने आपस में विमर्श किया तब एक स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए इस प्रकार की सोच उचित नहीं तो भी संभावित ही लगी. 

खैर, जिस इलाके में वे रह रहे थे, पतिदेव ने एक दो परीचितों को फोन कर उन तक पहुँचने की अपील की. 

इसी विमर्श के दौरान यह निष्कर्ष भी निकला कि इस कठिन समय में घर,गाड़ी, मोबाइल होने से ही किसी व्यक्ति के सम्पन्न होने का अंंदाजा नहीं लगाया जा सकता. रोज माँगकर ही अपना जीवनयापन करने वालों के सामने अधिक समस्या नहीं थी परंतु छोटे मोटे व्यापारियों, मेहनत कर रोज कमाई करने वालो,सीमित स्तर पर विद्यालय मालिकों, शिक्षकों , दूकानो पर कार्य करने वाले कर्मचारियों , मंदिरों में सेवा पूजा करने वाले सेवकों जैसे अनेकानेक समूहों के सामने बड़ी विकट समस्या उत्पन्न हो गई थी. ये वे लोग थे जो अपनी मेहनत के दम पर समाज में अपनी ठीकठाक प्रतिष्ठा बनाये हुए थे. वे किसी के सामने हाथ फैला भी नहीं सकते थे.  सरकार अथवा सामाजिक संगठनों की सहायता भी अत्यंत गरीब लोगों को ही उपलब्ध होती है. स्वाभिमानी निम्न मध्यवर्गीय इस प्रकार की सहायता नहीं ले सकता.  जब सब कुछ ही बंद हो तो घर का कीमती सामान, गाड़ियाँ आदि बेचकर भी धन का इंतजाम नहीं कर सकता था. वैसे भी इस बार वाले विकट कोरोना समय में  सहायता करने के लिए सरकार अथवा सामाजिक संगठनों की भूमिकाएं गायब सी ही रहीं .  रोग के तेजी से फैलेा संक्रमण ने  भी समाज समूहों को चपेट में लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ ही रखा. 

हमारे देश/समाज में दान देने की परंपरा के बारे में हम जानते  ही हैं. पक्षियों के एक परींडे, वृक्षारोपण में एक पेड़ उगाने, एक राशन किट के वितरण, एक चेक की मदद करते दर्जनों हाथ और अखबार में बड़ी तस्वीरें छपवा लेने को तत्पर हम लोग.

उधेड़बुन रही कि  अपने सीमित संसाधनों जिसमें से पीएम रीलिफ फंड, मुख्यमंत्री सहायता कौश आदि में धन जमा करने के बाद भी ऐसे स्वाभिमानी लोगों की सहायता किस प्रकार हो कि उनको शर्मिंदा भी न होना पड़े.  सबसे पहले अपने स्तर पर ही 20 राशन किट बनवाना तय किया और अपने सामाजिक मंच पर अपील की कि जिसको भी आवश्यकता है, वह फलाने नंबर पर संपर्क करे. उनका नाम पता सार्वजनिक किये बगैर  उन तक सहायता पहुँचाई जायेगी . अन्य लोगों से भी अपील की कि वे अपने आसपास जरूरतमंदों के बारे में बतायें जो स्वयं हिचकिचा रहे हों. 

जैसा कि होता रहा है दो चार लोग मजाक उड़ाने वाले होते हैं- ऐसे कौन आयेगा माँगने, पहले इनका तो उनका तो कर लो, आदि आदि

धीरे - धीरे सहायता माँगने के लिए फोन आने लगे और सहायता करने की चाह रखने वालों के भी.  सहायता पहुँचाई जाती रही. पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि किसे सहायता की गई, उनका नाम पता नहीं बताया जायेगा, न कोई तस्वीर. बस एक शर्त थी कि जरूरतमंदों को अपने आधार कार्ड की कॉपी देनी होगी ताकि रिकार्ड रखा जा सके.  जितनी जरूरत थी, उतनी ही सहायता ली गई. 

आज के हालात में यह एक बहुत ही छोटा सा प्रयास था जबकि आवश्यकता बहुत अधिक करने की है विशेषकर स्वाभिमानी स्वावलंबी लोगों के लिए जो अचानक ही इन विकट परिस्थितियों से घिर गये हैं.

 यहाँ साझा करने का आशय इतना सा है कि कुछ साझा नहीं करने का मतलब यह भी नहीं की कुछ किया नहीं जा रहा है.

शनिवार, 5 जून 2021

खजांची बाबू का पेड़...

 


बिहार के एक छोटे से गाँव में थी हमारी आधुनिक कॉलोनी परंतु पर्यावरण के मापदंडों पर खरी उतरती.  जैसेा  सामान्य तौर पर घर होते थे - हर घर (मकान/झोंपड़ी कुछ भी हो)  के बाहर बगीचा, बारामदा जहाँ आने वाला प्रत्येक अतिथि आराम पाता था, वहीं पड़ी बेंच पर बैठे सुबह अनूप जालोटा को चिड़ियों की चहचहाहट के बीच सुनते रहे थे. और उसके बाद भीतर बड़ा/छोटा सा आँगन जहाँ भरी सर्दियों में खटिया पर पड़े गुनगुनी धूप का आनंद लेते -दिल ढ़ूंढ़ता है फिर वही रात दिन की पृष्ठभूमि बनती थी.

गाँव के बाहर की टूटी फूटी सड़कों, कच्चे रास्तों के विपरीत कॉलोनी की अच्छी डामर वाली सड़कों के दोनों ओर आम, शहतूत, फालसा और खुद के घर में इलाहाबादी लाल अमरूद आदि के घने पेड़ होते थे ज गरमियों की भरी दुपहरी में  भी हमें घर के भीतर आराम न लेने देते.  

याद है मुझे सावधान करते सायरन की आवाज से  कॉलोनी के बीच में बने मंदिर के पास इकट्ठा हुए थरथर काँपते बच्चे और चिंतातुर माताओं के  चेहरे जो कॉलोनी के एक किनारे वाली दिवार के बाहर के हिस्से से रोने चिल्लाने की आ रही आवाजों से भयभीत थे. एक दो बार गोली चलने की आवाज भी सुन पड़ी थी. पता चला कि कहीं डाका पड़ रहा था. कॉलोनी के सभी पुरूष बाउंड्री के चारों ओर अलर्ट की मुद्रा में बंदूकें ताने सिक्योरिटी गार्ड के साथ खड़े दिख रहे थे. कुछेक घरों में सुरक्षा कारणों से संकलित छोटी पिस्तौल, लाठी, भाले आदि भी निकाल लिए थे. बात यह थी कि कॉलोनी के बाहर एक बस्ती में डाकूओं ने धावा बोल दिया था. 

जैसे-तैसे शोर कम होने की आवाज सुनाई दी यानि डकैत अपना काम करके लौट गये थे. धीरे-धीरे सब लोग भी  अपने घरों में लौट गये. कॉलोनी के बाहर घुप्प अँधेरों में किसी ने बाहर जाकर स्थिति का आकलन करना उचित नहीं समझा था. कई- कई दिनों तक बिजली रानी की और हमेशा के लिए पुलिस व्यवस्था के लापता रहने की बात आम ही थी वहाँ .  उस डरावनी रात के गुजर जाने के बाद जब मालिक लोग अपने सिक्यूरिटी प्रबंधक व अन्य अफसरों के साथ कॉलोनी की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने निकले तब  उन्हें बाउंड्री की ऊँची दिवारों  से लगे हुए उनसे भी  कहीं बहुत ऊँचे वृक्षों को देखकर चिंता हुई. शंका थी कि उन पेड़ों की लंबी शाखाओं का  सहारा लेकर चोर / डाकू कॉलोनी में कूद सकते थे.  तय किया गया कि बाउंड्री से लगने वाले घने पेड़ों को काट दिया जाये. दुख तो सबको होना ही था पर सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से जरूरी भी था.

हमारे घर के पीछे वाली पंक्ति के मकानों के मुँह बाउंड्री की दीवार की तरफ थे और वहाँ लगे आम , फालसा आदि के बड़े पेड़ों पर भी उनका अधिकार- सा था. पेड़ काटते हुए मजदूर जब एक घर के सामने पहुँचे , उस घर की हट्टीकट्टी स्वामिनी बाहर निकल आईं और पेड़ के सामने हाथ फैला खड़ी हुईं. 

मैं नहीं काटने दूँगी यह पेड़.

मजदूरों से होती हुई बात सिक्योरिटी अफसर पहुँच गईं पर माताजी न मानी तो नहीं ही मानी. पेड़ की रक्षा के लिए उसके नीचे खटिया बिछाकर बैठ गईं. सिक्योरिट अफसर के मार्फत मालिकों तक भी बात पहुँची होगी. वहीं से फरमान जारी हुआ किसी भी तरह समझा बुझा कर पेड़ काट देने का.

मजदूर कुल्हाड़ी उठाकर पहुँचे ही थे वृक्ष पर प्रहार करने की स्वामिनी की दर्द भरी आवाज गूँजी- इस पेड़ को काटोगे मतलब खजांची बाबू (उनके पति इसी नाम /काम से पहचाने जाते थे ) को काटोगे. 

 वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सन्न रह गया. मजदूरों के हाथ भी न उठें और उस पूरी पंक्ति में सिर्फ एक पेड़ जीवनदान पाकर वर्षों झूमता रहा, फल देता रहा. बहुत बाद में खजांची बाबू न रहे. उनका परिवार भी अपने पैतृक स्थान पर चला गया मगर वह पेड़ खजांची बाबू के पेड़ के नाम से गर्वोन्मत्त होकर सिर ऊँचा उठाये अपनी भुजाएं फैलायें आश्रय देता रहा.

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

सखियों की चौपाल (होलियाना)

 आपको वाट्सएप मैसेज किया था सुबह . अभी तक देखा नहीं!

तुम्हें पता तो है मैं नहीं देख पाता किसी का मैसेज.

किसी का मतलब? मैं 'किसी' में  हूँ.

अरे बाबा... 1000 मैसेज बिना पढ़े रखे हैं. उनकी अपडेट में तुम्हारा मैसेज नीचे चला गया होगा.

सही है वैसे. तुम्हारे फोन में वाट्सएप मैसेज पढ़ने जैसा क्या है.  (जोर से)

कैसे कैसे तो ग्रुप हैं.  फलाना समाज, ढ़िकरा कॉलोनी,  अनाप वैवाहिक विज्ञापन ग्रुप, शनाप रिटायर्ड ग्रुप, फलाने गुरूजी, आध्यात्मिक संदेश... क्या पढ़ने का मन करेगा. तुम्हें नींद आने के बाद कभी  तुम्हारा फोन चेक करती हूँ तो मैं ही बोर हो जाती हूँ... (धीमे से बड़बड़)

क्या कह रही हो. जोर से बोलो न!


कुछ नहीं. सब्जी क्या बनाऊँ!! 😊

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सखियों की चौपाल- 

पति पत्नी दोनों सोशल मीडिया में सक्रिय हो तो आपस में झगड़ा कम होता है. दोनों उसी में लगे रहते हैं. लड़ना झगड़ना भी वहीं चलता रहता है.

मेरे पति का क्या करूँ. वो तो फेसबूक,  वाट्सएप ज्यादा चलाते ही नहीं. सरसरी नजर से देखकर रह जाते हैं. रिटायर होने के बाद घर में ही रहना पड़ता है तो सारा झगड़ा आमने सामने ही होता रहता है.

ऐसा करो. उनका  वाट्सएप नंबर अपनी सखियों वाले ग्रुप में अपडेट कर दो. फिर देखना . उसी में व्यस्त रहेंगे . तो लड़ना झगड़ना भी नहीं होगा .

ना रे. . वो तो मेरी सखियों को आँख उठा कर भी नहीं देखते. सामने हो तो आँखें नीची कर साइड से निकल जाते हैं.

तो फिर समस्या तुम्हारा पति नहीं, सखियाँ हैं.उन्हें ही बदल डालो 😂


मंगलवार, 26 जनवरी 2021

चलो! चिंता करें...

 पिछले दिनों पड़ोस में कुछ निर्माण कार्य  (कंस्ट्रक्शन वर्क) चल रहा था. बेटी ने ध्यान दिया कि एक मजदूर दिन भर तगारी में भरकर ईंटे, रोड़ी और बजरी तीसरी मंजिल तक पहुँचाता रहा.

इनके पैर नहीं दुखते क्या मम्मी- सवाल को अनदेखा नहीं किया जा सकता था. 

दुखते तो होंगे ही . कुछ तो आदतन मजबूत हो जाते हैं. और फिर शायद इसलिए ये नशे के गुलाम होते हैं . दर्द से बचने के लिए नशा कर सो जाते हैं.

मुझे भी यही लगा कि  क्रेन की सुविधा से सारा सामान एक साथ उपर पहुँचा देना चाहिए था. पर  देखा कि इनका ठेकेदार( कॉंट्रेक्टर ) भी उनके साथ ही काम में लगा हुआ था. उसे देखते हुए मैंने सोचा कि वह क्रेन का खर्च कैसे 'अफोर्ड' (सहन) करेगा. आखिर इसका हल क्या होगा!

और तभी ध्यान आया कि  इन लोगों के अधिकार की बातें करने वाले आरामदायक वातानुकूलित घरों/दफ्तरों में सिर्फ  चिंता जताते ही (कभी जीवन में करनी/ फावड़ा न पकड़ते भी ) अपना बैंक बैलेंस कैसे बढ़ाते चलते हैं. 


वैसा ही तो कुछ किसानों  की चिंता करते लोगों के साथ हो रहा. सचमुच का किसान खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करते अन्न उपजाने में लगा है ताकि उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले ट्रैक्टरों सहित लालकिले पर चढ़ लें.

हमको भी लगता है देश/समाज की चिंता करते हम भी किसी दिन कोई राजनैतिक पद प्राप्त कर लेंगे पर इतना सारा दिखावा कर पायेंगे तब न. जैसे कि चिंता करते करते ही दिल्ली की सत्ता प्राप्त कर ली.

चलो चिंता करें!

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

ये तेरा घर ये मेरा घर...



देखो. इतने समय बाद चल रही हो. कुछ कहें तो चुप रहना.

उसने घूर कर पति की ओर देखा-  यह बात उन्हें क्यों नहीं कहते. तुम जानते तो हो. एक दो बार में तो मैं किसी को कुछ कहती ही नहीं.

कोई बात नहीं तीन-चार बार भी सुन लेना.

यह नहीं होगा. पाँचवीं बार तो मैं बोल ही पड़ूँगी. कहो तो चलूँ या रहने दूँ.

उनको कैसे कह सकता हूँ...

सच है, सुनने के लिए तो हमें ब्याह लाये थे.पर एक बात बताओ मैं क्यों सुनूँ.  क्या तुम मुझसे परिवार की सहमति के बिना प्रेम विवाह कर ले आये थे.

कैसी बात करती हो. पहले मम्मी, पापा और दीदी ने ही पसंद किया था तुम्हें.

अच्छा यह बताओ क्या मैं किसी गरीब परिवार से आई हूँ. दहेज के नाम पर कुछ नहीं लाई.

क्या तुक है इस बात की. मैंने खुद आगे बढ़कर कहा था कि तिलक में कुछ कैश नहीं लेना/देना है .

वह तो सही है. तभी तो हम साथ हैं. 

प्यारी सी मुस्कुराहट फैल गई अनुभा के चेहरे पर. पर फिर से सतर्क होते हुए अगला सवाल दाग दिया-

क्या मैं घर को साफ सुथरा नहीं  रखती. खाना अच्छा नहीं बनाती. वैसे तुम्हें बता  दूँ कि तीस वर्षों की गृहस्थी में 26 वर्ष तक घर का हर काम मैंने बिना मेड  की सहायता से किया है. बच्चों को बिना ट्यूटर पढ़ाया है .

क्या कह रही हो . मैंने कब कहा ऐसा. तुमने मैंने मिल कर ही किया है सब. वह प्यार से बाहों में भरने को हुआ पर अनुभा छिटक कर दूर हो गई.

क्या मेहमानों की आवभगत या लेनदेन में मैं मायका/ ससुराल में भेद करती हूँ!

ऐसा कब किसने कहा. मेरे भतीजे तो अकसर कहते थे कि तुम उनकी मम्मी से भी ज्यादा उनका खयाल रखती हो. 

हाँ. कई बार अस्पताल में भीें खाना/चाय आदि पैक कर ले गई हूँ. शादी ब्याह में भी अपना पराया समझे बिना सब काम किया है. यह ठीक है कि उन लोगों ने  भी हमारी जरूरत में हमारा साथ दिया. पर एक बात बताओ क्या मैं अनपढ़ गँवार हूँ.  क्या मैं नहीं जानती कब किससे कैसे बात करनी है. क्या मुझे बात करने की तमीज नहीं है!

ऐसा नहीं है पर तुम्हें गुस्सा आ जाता है.

अच्छा! क्या मुझे तुमसे और उनसे भी ज्यादा गुस्सा आता है और वह भी बिना कारण?

नाक खुजाते हुए इधर उधर ताकने के बाद हेलमेट उठाते हुए वह  बोला - अच्छा मेरी अम्मा. अब चल लो . तुम्हें मुझे जो सुनाना हो, सुना लेना पर वहाँ चुप रहना.

और मैं इतनी देर से क्या कर रही थी. .. दबे होठों में मुस्कुरा दी अनुभा.

क्या कहा.. 

कुछ नहीं.चलो जल्दी.आज मेरा किसी को कुछ और सुनाने का मूड नहीं. इससे पहले की मेरा मूड बदल जाये, चल आते हैं .


शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

सहायता की व्यथा...

 हमारी कॉलोनी में एक बुजुर्ग महिला प्लास्टिक का कट्टा (थैला) उठाये अक्सर चली आती है घर के बाहर झाड़ू लगाने या सफाई करने की आवाज लगाते. पूरी तरह सीधे भी खड़ी नहीं हो पाती उस स्त्री को देखकर करूणा उपजती है कि क्या कारण होगा जो इस उम्र में वह इस तरह शारीरिक श्रम कर पैसे कमाना चाहती है. पहले सफाईकर्मी नहीं होने के कारण उसे कई घरों में काम मिल जाता था परंतु इधर लगभग डेढ़ दो वर्ष से  उन्हें काम नहीं मिलता अधिक.  कुछ उनकी शारीरिक अवस्था देखकर भी लोग काम नहीं देते। मेरी एक सखी जब तब उनकी सहायता कर देती है थोड़ा बहुत काम करने पर . ऐसे ही इधर काफी समय से कुछ सफाई का कार्य नहीं होने के कारण उन्हें यूँ ही दस बीस रूपये दे दिया करते. अब होता यह कि वे हर तीसरे दिन चक्कर लगाने लगीं. 

बरसात के समय में हमारी तरफ सड़क का ढ़लान होने के कारण आगे से  बहुत सारी मिट्टी बहती हुई यहाँ इकट्ठी हो जाती है जिसे मैं स्वयं ही उठा लेती हूँ . मगर एक दिन उन बुजुर्ग स्त्री के आने पर मैंने उन्हें पूरी मिट्टी उठाकर बाल्टी में भर देने को कहा क्योंकि इसमें अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं थी. मैं वहीं खड़ी होकर देख रही थी ताकि बाल्टी भरने पर स्वयं ही उठा लूँ जिससे उन्हें तकलीफ न हो. मैंने ध्यान दिया कि मिट्टी इकट्ठा करती कुछ बड़बड़ा रही थीं. पास जाकर पूछा तो बोली कि उधर किसी ने सफाई की थी इतने पैसे दिये, इतने लूँगी आदि आदि . 

मुझे मन ही मन हँसी आई कि इन्हें इतना भरोसा भी  नहीं कि जब मैं कुछ साफ सफाई करे बिना ही महीनों से कुछ न कुछ दे रही हूँ तो क्या अभी कुछ नहीं दूँगी . परंतु इस बार उनकी अपेक्षा बहुत अधिक थी.

मैंने कहा- माताराम, उनका तो आपने गिना दिया कि इतने दिये, उतने दिये. और मैं जो इतने समय से दे रही हूँ तो क्या अब आपसे काम करा कर भी नहीं दूँगी!

एकदम से उनके व्यवहार में नरमी आ गई - हाँ बाई, देओ थे तो.

खैर, काम करके अपनी अपेक्षानुसार पैसे लेकर वे चलीं गईं. बात यहाँ समाप्त नहीं हुई.  मुहल्ले के दूसरे सम्पन्न घरों को छोड़कर  कुछ समय से उनसे कुछ कम उम्र की स्त्री भी उनके साथ ही आती है. जब उनको दस-बीस रूपये दूँ तो कहती है - बाई मन्ने भी दयो थोड़ा पीसा!  जाने उनको कैसे गलतफहमी हो गई है कि बाकी सबकी तुलना में हम ही अधिक धनवान है. 

नतीजा पिछले कुछ समय से उनकी पुकार कई बार अनसुनी करनी पड़ रही है !

छोटी -मोटी सहायता की यह व्यथा है तो बड़े -बड़े मददगार, समूह किस तरह झेलते होंगे उन लोगों, समूह की अनपेक्षित अपेक्षा को....