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मंगलवार, 26 जनवरी 2021

चलो! चिंता करें...

 पिछले दिनों पड़ोस में कुछ निर्माण कार्य  (कंस्ट्रक्शन वर्क) चल रहा था. बेटी ने ध्यान दिया कि एक मजदूर दिन भर तगारी में भरकर ईंटे, रोड़ी और बजरी तीसरी मंजिल तक पहुँचाता रहा.

इनके पैर नहीं दुखते क्या मम्मी- सवाल को अनदेखा नहीं किया जा सकता था. 

दुखते तो होंगे ही . कुछ तो आदतन मजबूत हो जाते हैं. और फिर शायद इसलिए ये नशे के गुलाम होते हैं . दर्द से बचने के लिए नशा कर सो जाते हैं.

मुझे भी यही लगा कि  क्रेन की सुविधा से सारा सामान एक साथ उपर पहुँचा देना चाहिए था. पर  देखा कि इनका ठेकेदार( कॉंट्रेक्टर ) भी उनके साथ ही काम में लगा हुआ था. उसे देखते हुए मैंने सोचा कि वह क्रेन का खर्च कैसे 'अफोर्ड' (सहन) करेगा. आखिर इसका हल क्या होगा!

और तभी ध्यान आया कि  इन लोगों के अधिकार की बातें करने वाले आरामदायक वातानुकूलित घरों/दफ्तरों में सिर्फ  चिंता जताते ही (कभी जीवन में करनी/ फावड़ा न पकड़ते भी ) अपना बैंक बैलेंस कैसे बढ़ाते चलते हैं. 


वैसा ही तो कुछ किसानों  की चिंता करते लोगों के साथ हो रहा. सचमुच का किसान खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करते अन्न उपजाने में लगा है ताकि उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले ट्रैक्टरों सहित लालकिले पर चढ़ लें.

हमको भी लगता है देश/समाज की चिंता करते हम भी किसी दिन कोई राजनैतिक पद प्राप्त कर लेंगे पर इतना सारा दिखावा कर पायेंगे तब न. जैसे कि चिंता करते करते ही दिल्ली की सत्ता प्राप्त कर ली.

चलो चिंता करें!

बुधवार, 8 जनवरी 2020

चीख पुकार और आँसुओं की पृष्ठभूमि....


दो तीन दिन पहले अचानक बच्चों के चीखने चिल्लाने की आवाज सुनकर अपनी दुखती कमर को सम्भालते बाहर गई तो अजब नजारा दिखा. पड़ोसी के मेनगेट के अंदर वही लड़का जोर जोर चीखता हुआ रो रहा था जिसे थोड़ी देर पहले ही बची हुई मिठाई का डब्बा पकड़ाया था. दो युवकों ने एक हाथ से गेट और दूसरे हाथ से बच्चे को पकड़ रखा था.  बच्चे को भीषण रोते (चीख पुकार) देख ममता जाग उठी और मैं उन दोनों के बीच जा खड़ी हुई.

क्या हुआ. मारो मत बच्चा है.

माताराम, अभी तो हाथ भी नहीं लगाया. हम मार नहीं रहे. सिर्फ पूछने में इतना चिल्ला रहा है.

दीदी, भाभी आदि से आंटीजी, माताराम में हुए प्रमोशन की पीड़ा बच्चों के रोने के आगे गौण थी. माताओं को बीच बचाव करते देख पड़ोसी के लॉन में झुरमुट में छिपी दो लड़कियां भी हाथ जोड़े मेरे सामने आ खड़ी हुईं. वे भी लगातार चीख कर रोती जाती थी.

 मैंने पूछा युवकों से कि आखिर हुआ क्या....

कुछ दूर पर ही एक मकान में निर्माण कार्य चल रहा है. ये युवक वहीं ठेकेदार/मजदूर थे. बताया उन्होंने कि साइट से कई बार लोहे की छोटी मोटी चीजें गायब हो रही थीं. मगर आज तो गजब ही हो गया. कल ही नया तिरपाल लाये थे.  जरा सी नजर चूकते ही उठा लिया. यह पूरा ग्रुप है. दो बड़ी महिलाएं भी इनके साथ है.  वे तिरपाल लेकर कहीं छिप गईं.  हम बाइक पर इनका पीछा करते आये तो हमें देखकर ये भी छिपने लगे.

यह सब सुनकर बच्चे और जोर से चीख चीख कर लोट पोट होने लगे.
हम दुविधा में झूल रहे थे सच जानकर भी बच्चों का रोना देखा नहीं जा रहा था.
आप देख लो. हमने हाथ भी नहीं लगाया. सिर्फ पूछ रहे हैं कि तिरपाल कहाँ छिपाया है, बता दे. हम कुछ नहीं कहेंगे... ये लोग ट्रेंड होते हैं.  बच्चों और महिलाओं को आगे कर देते हैं. मजमा लगाना जानते हैं कि इस तरह रोने चीखने पर लोग इकट्ठे हो जायेंगे और आप जैसी माताएं बीच बचाव करने आ जायेंगी.
 उनकी शिकायती नजरें जाने मुझसे यह कह रही थीं. (छोटी मोटी चोरी से बढ़ती हुई इनकी  आदतें महाचोर ही बनायेंगी. सब लोग सुरक्षा, शांति और बदलाव चाहते हैं पर करने की पहल नहीं करते ना ही दूसरों को करने देते हैं )
सीधे तरह नहीं बतायेंगे तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा. किंकर्तव्यविमूढ़ हुए हम किसी तरह युवकों को समझाने में सफल रहे कि आप थोड़ी दूर जाओ . हम इनको समझा बुझाकर पूछते है. वे युवक बाइक से कुछ दूर गये और इधर ये बच्चे उसकी विपरीत दिशा में तेजी से भागे.  मैंने यह भी ध्यान दिया कि पूरे समय की चीख पुकार,  लोट पोट होने में उसने मिठाई का डब्बा हाथ से नहीं छोड़ा था.
लंबी साँस लेते अपने सफल या असफल अभियान को देखकर भीतर आई तो दूर से फिर चीखने / रोने की आवाजें आ रही थी. शायद उन युवकों ने उन्हें  फिर से रोका था....

मेरे कानों में उससे भी बहुत किलोमीटर  दूर के बच्चों की  चीख पुकार गूँज रही थी और उन युवकों के सवाल भी.... क्या संयोग था! और मैं यह सोच रही कि आँसुओं और चीख पुकार की भी भिन्न भिन्न पृष्ठभूमि हो सकती है... कौन जाने कितने सच्चे कितने झूठे!

रविवार, 7 जून 2015

इन्हें क्षमा नहीं करना कर्नल!!

मणिपुर में इतने सैनिक मरे.
कश्मीर में उग्रवादियों ने पर सेना के काफिले पर हमला किया.
छत्तीसगढ में कैम्प पर धावा बोला .
 बारुदी सुरंग में उडा दी गई जीप मे इतने शहीद हुए. अपने शरीर के अँगो को खो बैठने वालों की तो सूचना भी नहीं मिलती.
इक्का दुक्का रोज मरने वालों की तो ऐसे भी कोई गिनती नहीं....उन्हें अखबार के एक नामालूम कोने में जगह मिलती है हालाँकि सैनिकों के कठिन जीवन की जानकारी का फिल्मांकन करते हुइ उनकी कार्यप्रणाली की सूचना लीक करने में कोई कोताही नहीं होती. तारीख बदली,खबर बदल जाती है.
बडे घोटालों, सामाजिक असमानता, सांप्रदायिकता , नारी शोषण की खबरों , उन पर प्रतिक्रिया , धरने , मोमबत्ती मार्च करने वालों की सलेक्टिव संवेदनशीलता ऐसे मौके पर जाने किस पाताल लोक में समाई होती है.
हो भी क्यों न!
नेता,अभिनेता,व्यवसायी, लोकसेवकों , समाजसेवकों की संतानें जो यह पेशा /पैशन नहीं अपनाती.  कठोर अनुशासन से बँधे सैनिक न पटरिया रोक कर आंदोलन कर सकते हैं और न ही भीषण दर्द सहकर कमजोर पड़ते हुए अपने साथियों के लिये नियम के विरुद्ध जा सकते हैं.  एक प्रकार से उचित ही है कि ऐसे डरपोक, संवेदना हीन, स्वार्थी , सुविधाभोगियों लोगों के साये से सेना बची ही रहे. मगर क्या वे हमारे कुछ आँसुओं के हकदार भी नहीं. सोचा कई बार होगा मगर गौतम राजऋषि के स्टेटस ????ने जैसे सूखे घाव की परत हटाई.

यह सिर्फ एक मेजर अथवा कर्नल  की पीडा नहीं प्रत्येक सैनिक और उससे जुडे , उसके परिवार , मित्रों की भी है. प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति की पीडा है.
कोफ्त होती है बहुत . आखिर कितने कृतघ्न होते रहेंगे हम कि उनके शौर्य प्रदर्शन में सहयोगी न भी हो सकें तो कम से कम उन्हें बता सकें कि उनके दुख में हर माँ का कलेजा छलनी है, हर बहन की दुआ का धागा उनकी खुशहाली भरे जीवन के लिये अभिमन्त्रित है.
यह लिखने का तात्पर्य यह कत्तई नहीं कि हमने कोई बीडा उठाया है या फ़िर खुद ऐसा कुछ कार्य कर लिया है बस यह बताना है कि उनके दुख में हमारी भी आंखें नम रहती हैं. वे थके  मांदे भयभीत अनगिनत जीवन के प्रेरक तत्व हैं , संजीवनी हैं.
आपके  त्याग  बलिदान , शौर्य, और पहरेदारी से निरपेक्ष रह सकने वाले गुनहगार हैं.
इन्हें क्षमा मत करना!