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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

अस्मि - शिखा वार्ष्णेय


 

कई बार हम एकसार जीवन के इतने अभ्यस्त होते हैं कि क्या छूटता जा रहा है, हमें इसका अहसास ही नहीं होता. विशेष परिस्थितियों से गुजरते हुए अचानक से जीवन में बड़ा  परिवर्तन होता है जो उस समय में हादसा ही दिख पड़ता है परंतु आगे जाकर नवजीवन की नींव ही बन पड़ता है.

कुछ ऐसी ही कहानी है शिखा वार्ष्णेय की। कहानी  है उस उपन्यास की जिसकी मुख्य पात्र ऐला का जीवन हिचकोले खाते हुए आखिरकार उसे उस दुनिया में पहुँचा देता है जिसकी उसे  इच्छा जरूर रही होगी पर उसका सपना देखना छोड़ दिया होगा.

जीवन के इस पड़ाव पर आकर ऐला इतनी अधिक संतुष्ट होती  है कि वह कह उठती है "अस्मि" मैं हूँ...अभी मैं हूँ अपने पूरे अस्तित्व की स्वीकार्यता के साथ मैं हूँ.

ऐला के चरित्र से मध्य आयुवर्ग की वे स्त्रियाँ अपने आपको सम्बद्ध पायेंगी ही जो ऊपर से संपन्न व्वस्थित वैवाहिक जीवन जी रही होंगी जिसमें उन्होंने स्वयं को खो दिया होगा।

ऐला के  साथ ही इसमें एक शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे लड़के रियो की कहानी भी है . उसके अभिभावकों के लिए यह कठिन परिस्थिति रही होगी जब लड़के के शरीर में लड़कियों जैसा जीवन जीने की लालसा प्रकट हो रही हो. पर जब वह या उसके आसपास का परिवेश उसको उसी रूप में स्वीकार लेता है तब शायद जीवन से संतुष्ट होकर उसने भी यही कहा हो - अस्मि मैं हूँ. 

इसी उपन्यास में जापानी जीवन जीने की कला इकिगाई के बारे में भी जानकारी मिलती है . यह जानना रोचक है कि इस कला को पहाड़ों पर सामान्य शिक्षा दीक्षा वाले अति साधारण लोग भलीभांति जान रहे, जी रहे!

कुल मिलाकर उपन्यास का कथानक रोचक है जो भावी घटनाओं के प्रति उत्सुकता बनाये रखता है और आप पूरा उपन्यास एक साथ  ही पढ़ लेना चाहते हो.

कहानी, घटनाओं का बदलाव, चरित्र का विकास- सब कुछ है इस उपन्यास में जो इस विधा की प्रमुख विशेषता है.

अस्मि  शिखा वार्ष्णेय का  पहला उपन्यास है. परंतु इससे पहले वे घुमक्कड़ी पर आधारित दो पुस्तकें भी लिख चुकी हैं.  

शिखा वार्ष्णेय की अन्य पुस्तकों , पुरस्कारों आदि का विस्तृत वर्णन इस लिंक पर देखा जा सकता है.

https://vanigyan.blogspot.com/2023/07/blog-post.html?m=1

रविवार, 16 जून 2019

मुंबईनामा.....





जब हम छोटे थे. हाँ भई! हम भी छोटे मतलब बच्चे थे कभी. आज बड़े हो गये अपने बच्चों से कहो तो पेट पकड़ कर हँस ले यह कहते हुए कि इमेजिन ही नहीं होता कि आप लोग भी बच्चे थे.
मजाक में कही बात मगर गंभीर ही है. हम नहीं सोच पाते अपने बड़े बुजुर्गों के लिए कि उनका भी कभी बचपन , लड़कपन या युवावस्था भी रही होगी. माँ अचानक छोड़ गईं साथ तब सहानुभूति रखने वाले उम्र बताने पर कह देते चलो उम्र तो थी, नाती पोते , पड़पोते भी थे. मन कचोटता है स्वयं को मगर हमें तो कभी लगा ही नहीं.

हाँ तो जब हम छोटे थे तब मुंबई को मुख्यतः अमीरजादों और फिल्मी कलाकारों के कारण ही जानते थे.  छोटे से कस्बे में पत्र पत्रिकाओं द्वारा ही बाहर की दुनिया से जुड़े होते थे.
उन पत्र पत्रिकाओं विशेषकर फिल्मी पत्रिकाओं में इन सितारों   के भी फर्श से अर्श तक जाने के किस्से इस अंदाज में बयान होते कि सामान्य वर्ग से आये युवा भी सितारा बनने के लिए झोला उठाये चल देते थे. कुछ ही सफल होते और अधिकांश धोखे की कहानियों के पात्र बन जाते. मुंबई की बारिश और छोकरी, दोनों का भरोसा नहीं करना चाहिए. कब रास्ता बदल लें. यहाँ पेट भरना आसान है मगर घर मिलना नहीं. यही सुनते आये थे हमेशा।
शहरी क्षेत्र का विस्तार होते होते कहावतें किस्से और मान्यताएं भी बदलती ही जाते हैं. हमने जितना पत्र पत्रिकाओं से जाना था  उससे इस शहर और उसके बाशिंदों  की छवि ह्रदय हीन, मतलबपरस्त ही रही जहाँ किसी को किसी से कोई मतलब नहीं. आस पड़ोस में कौन रहता, क्या करता कोई जानना नहीं चाहता. दरअसल यहाँ लोगों की स्वयं के जीवन में इतनी भागदौड़ और उलझनें रहती हैं कि वह दूसरों के बारे में सोचे कब...मगर तीन वर्ष पहले जब मुंबई जाना हुआ तो यह भ्रम भी टूटा.
 राखी के दिन भरी दोपहर में अन्य विकल्प न होने के कारण  लोकल ट्रेन में जाने की जरूरत हुई . यूँ तो दोपहर में लोकल में इतनी अधिक भीड़ नहीं होती मगर राखी का दिन होने के कारण जबरदस्त भीड़ थी. एक ट्रेन मिस भी की मगर दूसरी भी वैसी ही लदी फंदी. भीड़ के धक्के से डब्बे में चढ़ तो गये मगर अंदर आगे बढ़ें कैसे.  अपने शहर में तो बस में भी चढ़ने का अभ्यास नहीं और यहाँ ऐसे फँसे कि लगा अंतड़ियां न पिचक जाये. जैसे तैसे धक्के खाकर पाँच छह कदम आगे बढ़ी. इतनी ही देर में दूसरा स्टॉप आ गया. भीड़ में कचूमर बना जा रहा था तभी एक स्त्री की तेज चीखती आवाज आई जो भीड़ को बुरी तरह हाथ और लात दोनों से धक्का दे कर आगे धकेल रही थी.
ट्रेन चलने पर जैसे-तैसे मुड़ कर देखा तो उसने अपनी बाहों से एक दूसरी स्त्री को घेर कर पकड़ा हुआ था जिसकी गोद में छोटी बच्ची भी थी. अधेड़ उम्र की उस स्त्री ने सीट पर बैठी सवारियों को उस बच्चे को गोद में लेने को कहा. कई हाथ आगे बढ़े. किसी ने बुरी तरह रोते बच्चे को गोद में लिया, किसी ने बच्चे की माँ केे पर्स को. अंदर सवारियां उस बच्ची को पुचकार कर चुप करा रही थीं , कोई अपनी बोतल से पानी पकड़ा रहा था, तो कोई टॉफी. थोड़ी -थोड़ी जगह बनाकर उस स्त्री को उसके बच्चे के पास पहुंचाया और एक लड़की ने उसके लिए अपनी सीट छोड़ दी. एक तरह से राहत की साँस लेती वह अधेड़ स्त्री अभी भी गेट के पास ही खड़ी थी कि अगला स्टॉप उसका ही था. जिस महिला पर चीखी थी जोर से, उसी से मुस्कुराते हुए कह रही थी  इतने छोटे बच्चे को लेकर चढ़ गई .बिल्कुल किनारे खड़ी थी कि ट्रेन चल पड़ी. मैं धक्का नहीं लगाती तो क्या करती.  मन धक सा हो गया. रोज कुछ न कुछ लोग गिरते हैं चढ़ते उतरते...
उस भीड़ में फँसे हुए भी मन एक प्रसन्नता से भर गया. भीड़ में तन्हा है कहीं तो कहीं सुरक्षित भी.
कान से सुने और आँखों से देखे में भी  कुछ तो फर्क होता है. वैसे देखने में भी आँखों को बस सीध में जो दिखता है, वही तो दिखता है. एक घटना से ही यह अनुमान भी लगा लेना कि धोखा होता ही नहीं, धोखे की पृष्ठभूमि तैयार करने जैसा ही है.
 इंस्टाग्राम पर हँसती मुस्कुराती तस्वीरों के पीछे का प्रत्यक्ष सन्नाटा हो कि लँगड़ी मारकर आगे बढ़ जाने वाले किस्से हों. इस शहर के धोखे की भी लंबी दास्तान दर्ज है दिल- दिमाग को झिंझोड़ती सी.
मगर फिर भी कुछ आकर्षण है इस शहर का. हवाओं में समुद्र के पानी की महक है तो जुबान पर उसके नमक का स्वाद भी. इसलिए लोग खींचे चले आते हैं आज भी सौ शिकायतें करते भी....
तभी तो  कहलाती है यह मायानगरी .