मंगलवार, 18 अगस्त 2009

हमारी धर्मनिरपेक्षता को प्रमाण की आवश्यकता क्या है .....

कल अचानक ही महीनों के बाद झारखण्ड से बचपन की दोस्त का फ़ोन आया। बता रही थी .." जन्माष्टमी से ही तुम्हे बहुत याद कर रही थी मगर फ़ोन करने का समय अब निकाल पाई हूँ ...कैसी रही तुम्हारी जन्माष्टमी ...अब भी वैसी ही सजावट होती है क्या ...क्या क्या बनाया खाने में ..." जब उसे बताया की यहाँ हम लोग घर में झूला नही सजाते बल्कि मन्दिर ही जाते हैं तो कुछ निराश सी हो गयी। कहने लगी " तुम्हे याद है ना जन्माष्टमी पर मैं तुम्हारे घर जाती थी ...कितनी रौनक होती थी ...मैं उन दिनों को बहुत याद करती हूँ " और माँ की तबियत और उनके घर के सदस्यों {मेरा घर तो अब रहा नही ना...} के हाल चाल पूछते हुए अपनी खैर ख़बर भी देती रही । वह एक अध्यापिका है और अत्यधिक व्यस्त होने के कारण ही हमारी बातचीत महीनों में हो पाती है और जब बात होती है तो हमारे खजाने में इतना कुछ जानने बताने के लिए जमा हो जाता है ...आगे उसने बताया ..." अभी दो दिन पहले मेरी बेटी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी ...मैं जा रही थी उसकी क्लास में की पीछे से किसीने जोर से कंधे पकड़कर रोक लिए ...तुम्हे पता है ...कौन थी वो ...अरे वही ..हमारे पड़ोस में ...कई बार दीदी-दीदी करते हुए जाती थी ...उसकी बेटी भी मेरी बेटी की क्लास में ही पढ़ती है ." आगे उसने बताया ..." वो मुझसे गले मिल कर रो पड़ी थी . कहते हुए की मुझे लगता था इस अनजान शहर में कोई तो परिचित जरुर मिलेगा ...और हमारी नालायाकियों की { बहुत फिल्मे देखते थे } याद दिलाते हुए तुम्हारे लिए पूछ रही थी ..." सच है ..उस छोटे से कस्बे में जहा हम साथ पले बढे ...फिल्मों के अतिरिक्त मनोरंजन का और कोई साधन नही था ...मेरी उस सहेली के घर से कुछ क़दमों की दूरी पर ही सिनेमा हॉल होने के कारण कभी भी घुमते घामते पहुँच जाते ...बीडी -सिगरेट के धुएं की गंध के बीच लकड़ी की बेंचों पर दुपट्टे से पसीने पोंछते हुए{ रुमाल छोटी पड़ जाती थी } भी फ़िल्म अधूरी नही छूटती थी। काफी देर बातें होती रही ..." वो अपनी मैं थी ना...उनका क्या हाल चाल है ...आज कल कहाँ है ...कभी मिली हो क्या उनसे ..." अब वो हमारे विद्यालय की प्रधानाध्यापिका के लिए पूछ रही थी जो हमारे घर में कुछ समय पेइंग गेस्ट बन कर भी रही थी ...और जो स्कूल टाइम के बाद हमारी आंटी बन जाती थी।
अचंभित होंगे ना...इसमे ब्लॉग पर बताने जैसा क्या है ...और इनमे से किसी का नाम भी नही लिखा ...क्या ख़ास है इसमे ...बहुत ख़ास है ...मेरी जिस सहेली का फोन था वह थी लूसी जो ईसाई है ....उसके पड़ोस में रहने वाली लड़की जो बहुत सालों बाद उसे बेटी के स्कूल में मिली उसका नाम है जेबा और वो मुस्लिम है ...हमारी जिस प्रधानाध्यापिका के बारे में वह जानना चाहती थी ...जसबीर कौर ...सिख हैं ..और हम तो जो हैं ...आप सब को पता ही है...और हम सभी अपनी धर्म और धार्मिक परम्पराओं { आप चाहे इसे आडम्बर कह ले } के प्रति कुछ हद तक कट्टर भी है औए काफी हद तक उनका पालन भी करते हैं ...मेरी सहेली हर रविवार को विशेष मास में शामिल होने चर्च जाती है ...जेबा रमजान पर पूरे महीने रोजे रखती है ....लोह्डी पर आंटी की बांटी गयी रेवड़ियों की मिठास अभी तक याद है ... मगर हमारे रिश्तों में इससे कभी कोई फर्क नही पड़ता था..
आश्चर्य होता है ....उस छोटे से कस्बे में ....बहुसंख्यक अशिक्षित आबादी के बीच पले बढे हम लोग ...सामाजिक समरसता का यह पाठ कैसे सीख पाये ...कब सीख लिया हमने ...की अपने धर्म का पालन करने के लिए ना तो दूसरे को नीचा दिखाना जरुरी है ....और ना ही अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए अपने धर्म को जी भर कर कोसना ...हमने ये कब और क्यों कर सीख लिया ...हमारी शिक्षा दीक्षा में क्या कमी रह गयी ...पता नही ...!!

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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

अब मार के दिखा ..!!

अभी अभी बेटी को बस स्टाप तक छोड़ कर आयी हूँ। सुबह के समय चहुँ ओर विद्यालय की और दौड़ती बसें , ऑटो रिक्शा और गणवेश में सुसज्जित विद्यार्थिओं और उनके अभिभावकों की आवाजाही ही नजर आती है। बेटी के बस स्टाप पर ही कई विद्यालयों के बच्चे बस का इंतिजार करते हए आपस में चुहलबाजी करते नजर आ जाते हैं । आज जब वहां पहुंचे तो देखा दो बच्चे आपस में धींगा मस्ती कर रहे थे। देखते ही देखते उनकी मस्ती झगडे में बदल गयी।
दोनों बच्चों में से एक तो अच्छा खासा सेहतमंद गोल मटोल सा था उसका नाम था रोहित , वही दूसरा बच्चा थोड़ा हल्का फुल्का सा रमेश । दोनों में किस बात पर झगडा हुआ ये तो ज्यादा पता नही चला ..मगर शायद कोई पुराना मसला था . रमेश ने रोहित की शिकायत कर दी थे अपने अध्यापक से इसीलिए वह बहुत नाराज़ था। उसने छुटके को धमकाते हुए कहा "देख..अगर अगली बार तुने मेरी शिकायत की तो समझ लेना ..."
रमेश दुबला पतला था तो क्या हुआ ...तैश में आते हुए बोला ..." करूँगा ..बोल क्या कर लेगा."
"देख मेरे भाई ..तुझे इतने प्यार से कह रहा हूँ...तू नही करेगा शिकायत ...समझा।"
"हाँ.. हाँ... समझ गया ...नही...बोल ..तू क्या कर लेगा।"
अब तक तो रोहित को गुस्सा आ गया ..." तू ऐसे नही मानेगा" बोलते हुए दो थप्पड़ जड़ दिए।
रमेश ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाह मगर कामयाब नही हो पाया। गाल सहलाते हुए फिर से बोला ..." देख... अभी तो तुने मुझ पर हाथ उठा दिया ...मैं कुछ नही कह रहा...मगर अबकी तुने ऐसा किया तो अच्छा नही होगा।"
रोहित का गुस्सा और भड़क उठा...''क्या कहा ..क्या अच्छा नही होगा..."कहते हुए उसने एक चांटा और जड़ दिया।
बेबस सा रमेश थप्पड़ से तो नही बच सका मगर फिर भी बोला " देख मैं तुझे कह रहा हूँ.. मान जा ...अब मत उठाना मुझ पर हाथ..."अब और झगडा बर्दाश्त करने की हिम्मत नही थी। उनका बीच बचाव करते हुए दिमाग में क्या कुछ गूंजने लगा।
क्या हमारे देश की ... नागरिकों की यही हालत नही है... हर आतंकवादी घटना के बाद देश के कर्णधारों का यह बयान ..." आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ..." वे फिर-फिर कर आते हैं ...चोट पह्नुचाते हैं ...जान माल का नुक्सान होता है....अपने घावों को सहलाते हम फिर से यही नारा सुनते है ..."आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ...हम मुँहतोड़ जवाब देंगे..." वे फिर आते हैं ...कभी संसद भवन पर ....कभी ताज होटल ...कभी कोई रेल ...कभी कोई बस ....कभी किसी शहर में ....कभी किसी शहर में ....."
बहुत कुछ ऐसा ही चुनाव के दौरान होता है ...बढती महंगाई ...अव्यवस्था ....सामरिक सुरक्षा आदि मसलों पर किसी एक सरकार को संसद के बाहर का रास्ता दिखाने वाले हम ... शिकायत करते हैं उनसे...जो अब हमारी समस्यों पर ध्यान नही दिया तो ....!! जनता जनार्दन को भगवान मानने वाले चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही पेट्रोल- डीजल, रसोई गैस , रोजमर्रा की जरुरी चीजों के दाम कर दिए जाते हैं और एक बार बहुमत हासिल करने के बाद ....कौन सी जनता...कहाँ की जनता...और हम फिर से अपने घावों को सहलाते अगले चुनाव के इत्निज़ार में लग जाते है ..."अब चुनाव में जीत कर दिखाना..." .

बुधवार, 22 जुलाई 2009

ताऊ तेरी रामप्यारी !!

ताऊ तेरी रामप्यारी !!
उस दिन जब ताऊ अपने ब्लॉग पर रचनाएँ आमंत्रित कर रहा था ...रामप्यारी की बहुत सी सखियों की तो बांछें खुल गयी ...ज्यादा क्या कहूं ..आप सब जानते हो इस युग के सखा और सखियों के बारे में...सारी की सारी लग गयी ...अब आयेगा मजा ...जम कर रामप्यारी की पोल खोलेंगे ....पर ये ताऊ कम ना है ...पूरी फीडबैक रखे है ...झट रचनाएँ आमंत्रित करने का आप्शन रद्द कर दिया ...मगर रामप्यारी की सखिओं को जो खडबडी लग गयी ...कहाँ मानती ...बहुत मान मनौवल करने लगीं ...अपने ब्लॉग पर ही लगा दो हमरी पोस्ट ...वोह ताऊ तो रामप्यारी के बारी में कुछ छपने न देगा ... हमने भी सोचा ...के फरक पड़ेगा ...थोडी रामप्यारी की सखिओं की भड़ास निकल जायेगी ...तो फिर सुनो किस्सा ...

एक बार ताऊ के दरबरिओं ने भड़का दिया ताऊ को ...कुछ पता है तमने ...तुम तो बड़े खुश हो रहे हो ...की रामप्यारी को घर घर की निगरानी पर लगा दिया है ...कुछ पता है ...यूँ आँख मूँद कर भरोसा करना ठीक ना है ...किसीने तो रामप्यारी के पीछे भी लगा निगरानी करने को ...बात ताऊ के जच गयी ...
इब क्या था ...ताऊ ने अपने तोते रामखिलावन को लगा दिया रामप्यारी के पीछे ...
जहाँ जहाँ रामप्यारी जाती ...रामखिलावन भी पीछे लगा रहता ....रामप्यारी परेशान ...यह कुन है जो रात दिन पीछे लगा रहता है ...रामखिलावन अपनी मीठी मीठी बातों के जाल में रामप्यारी ने फांसने की कोसिस करने लागा ...
कान खड़े हो गए रामप्यारी के ...वा भी कोई कम ना है ...ट्रेनिंग जो ताऊ ने दी सै ...
तो ...एक दिन रामखिलावन बड़े लाड से बोला ...
रामखिलावन :- रे रामप्यारी ...तू मन्ने भोत अच्छी लागने लागी है ।
रामप्यारी :- तू भी मन्ने भोत अच्छा लागे है ।
रामखिलावन :- तो फिर बणा ले ना अपना ..
रामप्यारी :- ये तो कोई बात ना हुई ...काळ कोई और अच्छा लागने लगेगा ...।
रामखिलावन :- ना...रामप्यारी ...तू आखिरी होगी ।
रामप्यारी :- ओये रामखिलावन ...भीगी लकड़ी की जलावन ...मैं तेरी थोडी ना बोल री हूँ ...
मैं तो अपनी बात करे थी ...!!
बेचारा राम खिलावन जा पड़ा ताऊ के चरणों में ...ताऊ ये तेरी रामप्यारी !!
और ताऊ अपने मुछों पर ताव देता मुस्कुराता रहा ....देखा मेरी ट्रेनिंग का असर ....बेचारे दरबारी अपना मुंह लटका कर रह गए ।

जैसा की रामप्यारी की सखी रामदुलारी ने बताया ...