मंगलवार, 23 नवंबर 2010

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!

(इनकी सफाई ऐसी होती है)
( सफाई का महत्व तो ये छुटकू भी जानते हैं )


एक सफाई पसंद महिला अपनी सहेली के घर उससे मिलने गयी । जब उसने देखा कि उसकी सहेली का पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था , नाक भौं सिकोड़ती देर तक बस उससे यही शिकायत करती रही कि लोंग घर कितना गन्दा रखते हैं !!
दरअसल उसके घर वार्षिक सफाई का कार्य चल रहा था . सफाई करते समय एक बार पूरा घर गन्दा होता ही है . उस महिला को बुरा लगा , मगर अपने घर की व्यवस्था देखकर चुप लगा गयी .
कुछ समय बाद जब उसका घर फिर से साफ़ सुथरा चमकदार हो गया , उसने अपनी सहेली को खाने पर बुलाया .  खाना खाने के बाद सहेली के चमचमाते घर को देखकर बहुत प्रभावित हुई .

" तुम आजकल घर बहुत साफ़ रखने वाली हो , कोई नयी कामवाली रख ली है क्या "

  नहीं ..मेरे घर की साफ़- सफाई के लिए मैं दूसरों पर निर्भर नहीं करती ...उस दिन जब तुम आई थी , वार्षिक सफाई का काम चल रहा था इसलिए सब बिखरा हुआ था  . उस महिला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया

" तो तुमने उस दिन कुछ कहा क्यों नहीं , तुमने बताया भी नहीं और मैं यूँ ही बक- बक करती रही "

 उस दिन मैं चुप रही क्यूंकि तुम उस दिन सही थी ...उस दिन का सच वही था!

दोनों ने एक साथ अच्छा समय व्यतीत किया . घर लौट कर उस महिला ने अपने घर का मुआइना किया . उस महिला की तुलना में उसे अपना घर बहुत गन्दा लग रहा था । घर के कई कोने , सिंक के नीचे , फर्नीचर के पीछे कई जगह कचरा छिपा पड़ा था . . इससे पहले उसने कभी गौर ही नहीं किया था .

उस दिन से उसने प्रण लिया कि अगली बार दूसरों की त्रुटियों पर टोकने से पहले स्वयं पर अंकुश रखेगी , कम से कम उस उस कमी पर तो अवश्य ही, जो स्वयं उसमे भी है!

होता है ना कई बार ऐसा ....!

क्या यह सिर्फ घर और उसकी सफाई की ही बात है ....!



चित्र गूगल से साभार !

सोमवार, 15 नवंबर 2010

प्रशांत का आत्मविश्वास ....ज्योति का संतोष ...क्या सही था !


कौन बनेगा करोडपति में अत्यधिक आत्मविश्वास में प्रशांत बातर एक करोड़ कमाकर गँवा बैठे ...बहुत बेहतरीन ढंग से खेलते और अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए प्रशांत एक लाईफ लाइन के होते हुए भी एक करोड़ कमाने के बाद 5 करोड़ कमाने के लालच (आत्मविश्वास !)के जैकपोट प्रश्न पर अटक गए 3.20लाख पर ही उन्हें संतोष प्राप्त करना पड़ा ...

इसी गेम के एक एपिसोड में जयपुर की ज्योति चौहान ने 50 लाख के 10वें प्रश्न पर पर कोई लाइफ लाईन ना होने के कारण कोई रिस्क ना लेते हुए क्विट कर गयी ...ज्योति की दर्द भरी कहानी से शो के एंकर अमिताभ बच्चन जी इतने दुखी हुए कि उसके परिवारजन से प्रार्थना कर बैठे ...ज्योति जो कि एक कामकाजी महिला है , पुलिस सर्विस में कॉन्स्टेबल के पद पर कार्यरत हैं , से उनकी लव-मैरिज के कारण उनके परिवारजन बहुत नाराज हैं ....के बी सी के मार्फ़त ज्योति ने अपने परिवारजन से मार्मिक अपील की कि वे उससे कोई सम्बन्ध ना रखना चाहे , घर ना बुलाये मगर कम से कम फोन पर तो बात कर लें ...कर्ज के बोझ से दबी ज्योति अपनी बेटी के कान के छेद के ऑपरेशन के लिए भी परेशान हैं ...बहुत दुःख हुआ देखकर ...हमारे देश और समाज की ये भी एक तस्वीर है ....अपने पैरों पर खड़ी महिला के लिए भी प्रेम विवाह की राह इतनी कठिन है ....खैर , दुआ ही की जा सकती है कि कार्यक्रम में जीती रकम से उसकी आर्थिक , पारिवारिक और सामाजिक परेशानियाँ दूर हो सकें ...क्या महानायक अमिताभ बच्चन जी की अपील का भी उसके परिवार पर कोई असर नहीं होगा ....

प्रशांत और ज्योति दोनों ने गेम के जरिये धन(एक प्रकार से मुफ्त) .....प्रशांत को एक करोड़ मिल जाते यदि संतोष धन उनके पास होता ...मगर ५ करोड़ के लालच ने उन्हें ३ लाख २० हजार पर ही संतोष करने के लिए बाध्य किया ...ज्योति को मुफ्त में कमाए हुए धन की भी कीमत पता थी , क्यूंकि जिस परिस्थिति से वे गुजर रही है , एक एक पैसा उनके लिए कीमती था ....वही प्रशांत को एक करोड़ पर भी संतोष नहीं था ...

मन और मस्तिष्क लड़ रहे हैं इस बात पर कि प्रशांत ने क्या गलत किया ...क्या उनके आत्मविश्वास को लालच का नाम दिया जाना चाहिए था ...क्या जीवन में इस तरह के रिस्क नहीं लिए जाने चाहिए ...क्या होता यदि प्रशांत ५ करोड़ जीत जाते ... सभी उनके आत्मविश्वास और रिस्क लेने की क्षमता पर मुग्ध होते ...
सही मुहावरा क्या होगा .......
" गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में " ....या
" लालच बुरी बला है ".... !






तस्वीर गूगल से साभार ....

बुधवार, 10 नवंबर 2010

ऐसी रही दिवाली ...कुछ तस्वीरें रावण मंडी की भी


त्यौहारी मौसम चल रहा है ...हालाँकि कुछ के लिए बीत चुका ...मगर बिहार, यू पी में छठ करने वालों और राजस्थान में कार्तिक स्नान करने वालों के लिए उत्सव कार्तिक पूर्णिमा तक चलेगा ...गोपाष्टमी , आंवला नवमी , देवउठनी एकादशी , पंचतीर्थ स्नान , कार्तिक पूर्णिमा ...आदि आदि ..।

जयपुर में इस बार दिवाली पर खरीददारी और रौशनी की बड़ी धूम रही ...बरसों बाद अच्छा मानसून , समय पर सरकारी कर्मचारियों को मिले भत्ते ने बाजार की रौनक बढ़ा दी ...हमारा तो कोई विशेष घूमना नहीं हुआ पुराने शहर के बाजार में ...मगर आस-पास के मार्केट में रौशनी का नजारा शानदार था ...जानकारों का कहना है कि जयपुर में इस बार जैसी रौशनी और सजावट पहले कभी नहीं हुई ...

हम तो दिवाली के एक दिन पहले तक साफ़ -सफाई में ही अटके पड़े थे ...मकान के पिछले खुले गलियारे को लोहे की ग्रिल द्वारा बंद करने का कार्य और उसके लिए बुलाये गए कारीगरों की बदौलत ...छोटे से कार्य के लिए 5 दिन तक घर कबाडखाना बना रहा ...और उसपर कारीगरों के नखरे ...समाजसेवा प्रेमी पतिदेव जाने कितने नीड़ों के निर्माण में नक्शा बनाने से लेकर मटेरिअल से लेकर कारीगर, मजदूर तक उपलब्ध कराने में अपनी श्रेष्टता साबित कर चुके हैं , मगर इस बार अपने घर के छोटे से काम में बुरे उलझे ...जो कारीगर/मजदूर दंपत्ति इस कार्य के लिए आये थे , पति बेचारा (और ऑप्शन भी क्या होता है इन लोगों के पास !!) शांत , जितना पूछो उसका जवाब दे दे औरचुपचाप अपना काम कर ले ...मगरउसकी पत्नी ... !
कितनी बार टोक कर उसको चुप रहने के लिए कहना पड़ा ..... पता नहीं उसके पति ने क्या कहा सिर्फ अंदाजा ही लगा सकती हूँ , क्यूंकि उसके पति की तो आवाज़ मुझे सुनायी ही नहीं दी, जो सुनायी दिया वो थी उस महिला कामगार की गालियों की बौछार ...और उसका पति सर झुकाकर चुपचाप सुनता रहा ...सचुमच कुछ अलग -सा अनुभव था । गालियाँ देते पति और चुपचाप सुनती पत्नियाँ तो खूब देखी हैं , मगर ऐसा दृश्य पहली बार ही देखा ....जहा पति चुपचाप अपने काम में लगा रहता , वहां उसकी पत्नी ज्यादा समय उसे निर्देशित करने , गप्पे हांकने या आराम करने में बीतता ...हद तो तब हुई जब उसके निर्देशन का दायरा बढाकर मुझतक और पतिदेव तक पहुँचने लगा ...

दिन में तीन चार बार मजदूरों के लिए चाय बनाने का पति देव का निर्देश मुझे अखरता नहीं है क्यूंकि चाय पीना मुझे भी बहुत पसंद है और वो भी अदरक , कालीमिर्च आदि मसालों के साथ ... मगर ...
उधर से फरमाईश आई , " म्हारी चाय म काली मिर्च मत डाल्जो और चीनी थोड़ी बत्थी " (मेरी चाय में काली मिर्च मत डालना और चीनी थोड़ी ज्यादा )...फरमाईश की ये तो शुरुआत भर थी... दिवाली करीब आती जा रही थी और घर बिखरा पड़ा था ...दो दिन का कार्य 5 दिन में जाकर ख़त्म हुआ और रोज चख चख करते ...खैर जैसे तैसे उसको विदा किया और वार्षिक सफाई की शुरूआत हुई ...

पांच दिन में पूरे घर को साफ़ सुथरा बनाना हमारे जैसे आलसियों के लिए जंग लड़ने जैसा ही तो है ...जैसे तैसे निपटी साफ़ सफाई और मन गयी दिवाली भी ... रूप चतुर्दशी को खुद के रूप की बजाय रसोई का रूप सुधारा जा रहा था, कई नए पकवान बनाने का अरमान धरा रह गया ...बात सिमटकर बेसन की चक्की , नारियल मूंगफली की बर्फी पर ही अटक गयी ...थकान के मारे हाल बुरा अलग था ...
मगर जब पडोसी आंटी जी और अंकलजी से अपने वार्डरोब कलेक्शन की बडाई ,बच्चों और मेहमानों से मिठाई की , भाई दूज के दिन भाई- भाभीओं से खाने की तारीफ़ , और सबसे ऊपर कुछ महिलाओं का ये कहना ," अब आप अच्छे लगने लगे हो "...सुनी तो सब थकान उड़न छू हो गयी ...अब मारवाड़ियों का अच्छा लगना मतलब तो समझ ही गए होंगे ...बरसों से सेहतमंद लोगों के ताने सुनते रहे हैं कि हम तो खाते पीते घर के हैं , आपको खाना नहीं मिलता क्या ... अब हम भी खाते- पीते की श्रेणी में शामिल होने लगे हैं ... ये बात और है कि पतिदेव रोज योगा करने की सलाह देने लगे हैं . गृहिणियों की खुशियाँ कितनी छोटी -छोटी सी ही तो होती हैं ...तो कभी कभार उनके खाने की , घर सँभालने के गुणों की तारीफ़ कर देने में क्या जाता है ...नहीं क्या ...!!!!

दो दिन आलस मिटाने के बाद देखा कि बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था ब्लॉग पर , दिमाग सुन्न हो जाता है कभी -कभी...यूँ तो खाली ही है, बस थोथे चने की तरह कभी -कभी बज जाता है ...सोचा आज तो कुछ लिखना ही है ...जो लिख दिया है ...झेलिये !

दशहरे पर देवर की बेटी रहने आई दो दिन के लिए तो अपने बड़े पापा से रावण देखने की जिद करती रही ...वो भी एक दो नहीं , 10,50...पड़ोस में ही है एशिया की सबसे बड़ी रावण मंडी .....दिखा लाये पतिदेव भी ...