मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

गोवर्धन परिक्रमा .........



बहुत समय से गोवर्धन परिक्रमा का कार्यक्रम टल रहा था ...कभी मौसम के कारण तो कभी परिक्रमा मार्ग पर चल रहे निर्माण कार्य से होने वाली असुविधा के कारण ..मगर पिछले दिनों कमर कस ही ली कि कुछ भी हो परिक्रमा तो करनी ही है ...इधर घुटनों में कुछ तकलीफ के कारण घबराहट थी कि इतना पैदल चलना हो भी पायेगा या नहीं ...कहाँ तो शहर में एक किलोमीटर भी पैदल नहीं चला जाता ,और कहाँ परिक्रमा मार्ग पर २१ किलोमीटर की पैदल यात्रा नंगे पैर ...एक तसल्ली थी कि रिक्शे में बैठ कर भी परिक्रमा दी जा सकती है ...यही सोचा कि अगर चला नहीं जायेगा तो फिर इसे ही आजमाएंगे ....साथ में एक बुजुर्ग महिला थी ...उनके जोशोखरोश को देखकर हमने भी हिम्मत कर ली ...पूजा पाठ बहुत ज्यादा नहीं करती हूँ मैं और ना ही अन्धविश्वासी हूँ मगर फिर भी खुद का इस कदर पैदल चल लेना मुझे स्वयं को आश्चर्यचकित कर देता है ....


जयपुर से गोवर्धन के मार्ग पर ज्यादा स्थान राजस्थान की सीमा में आता है , बीच में लगभग किलोमीटर का मार्ग उत्तर प्रदेश की सीमा में है , फिर से राजस्थान ....सड़क की बदहाली शुरू होते ही ड्राइवर ने बताया कि अब हम उत्तर प्रदेश की सीमा में हैं तो सबकी एक साथ हंसी छूट गयी ...जब बिहार की सदियों पुरानी खस्ता हाल सड़के सुधारी जा सकती हैं तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं हो सकता ....किससे पूछा जाए ये सवाल ... इस पूरे मार्ग पर सरसों के लहलहाते खेतों ने मन प्रसन्न कर दिया ...अच्छी सर्दी और इससे पूर्व होने वाली बरसात ने खेतों पर दूर दूर तक जैसे पीली चादर ही बिछा रखी है ...


राहत की बात ये हैं कि गोवर्धन पर्वत के चौडाई में होने वाले विस्तार को रोकने के लिए जालियां लगाकर पर्वत को सुरक्षित किया गया है ...यहाँ वन विभाग का कार्य संतोषजनक है ... कुछ स्थानों पर नील गाय भी नजर गयी ...

खैर ...गिरिराज धरण का नाम लेकर शुरू कर दी पैदल यात्रा ...परिक्रमा के पहले पड़ाव में गिरिराज मंदिर में गोवर्धन पर्वत के मुखारविंद पर दुग्ध अर्पण कर प्रारंभ की गयी यात्रा लगभग 11किलोमीटर की है , जबकि दूसरी परिक्रमा " राधा कुंड परिक्रमा " लगभग 10 किलोमीटर की ....पूरी परिक्रमा 8 के आकार में की जाती है .....एक पूरी परिक्रमा के बाद फिर से दूसरी जगह से प्रारंभ कर दूसरी परिक्रमा ...इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ दुग्ध अर्पण सिर्फ दोपहर तक किया जा सकता है...श्रृंगार के बाद यकीन करना ही मुशिकल हो जाता है कि यह वही स्थल है जहाँ सुबह दुग्ध अर्पण किया गया था ... परिक्रमा पथ पर यात्रियों की सुविधा के लिए काफी कार्य किया जा रहा है हालाँकि अभी बहुत अधिक सुधार की दरकार है ...
मुखारविंद स्थल को लेकर भी भिन्न मत हैं ...कुछ लोंग परिक्रमा के पथ पर आने वाले दूसरे स्थान को ही वास्तविक पूजा स्थल मानते हैं ...



परिक्रमा मार्ग पर दोनों ओर बनी चाय , नाश्ते उपलब्ध कराती सैकड़ों दुकाने यात्रियों के विश्राम स्थल का कार्य भी करती हैं ...

उनके साथ ही लगभग हर दुकान पर बजती कृष्ण राधा की धुन , मीरा के भजन, सहयात्रियों के जय श्री राधे का जयघोष वातावरण में एक अलग सी चेतना भर देते हैं ... साथ चल रही बुजुर्ग महिला का उत्साह और आत्मविश्वास देखने योग्य था....रास्ते में पड़ने वाले चरण मंदिर में जहाँ सीढिया नहीं है , उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच ही चढ़ना पड़ता है , हम टालना चाह रहे थे , वे बड़े उत्साह के साथ चढ़ गयी....कई बार बैठना पड़ा उन्हें और सांस फूलती रही , मगर उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी ....ऐसे प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों का साथ हम सबमे ऊर्जा का संचार कर रहा था ...परिक्रमा पूर्ण होते रात गहरा गयी थी ....बिजली की व्यवस्था भी बहुत डगमगाई हुई थी ...ये गनीमत है कि शुक्ल पक्ष की एकादशी का चन्द्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ मार्गदर्शन कर रहा था ....परिक्रमा पूर्ण होते रात के लगभग बज गए थे ...पूजन के उपरांत विश्रामस्थल पर जाकर सबकी हालात ऐसी थी कि बस जहा जगह मिले वहीँ पसर जाए ....आरामदायक स्थान मिल गया फिर भी और सभी बिना खाए पिए लुढ़क लिए ...सुबह जल्दी उठकर मंगला आरती के दर्शन जो करने थे ...



क्रमशः

रविवार, 5 दिसंबर 2010

मेम साहब की कुतिया ......





में साहब की पामेरियन


कुत्तों के लगातार भौंकने की आवाज़ और गाड़ी के होर्न , कारिंदों की चहल -पहल से अनुमान लगाया कांता ने कि नगरनिगम की गाडी आ गयी है ...आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए ...

बोरी उठाये गली के कुत्तों के पीछे दौड़ते कर्मचारी और उनसे बच निकलने की कोशिश कुत्तों की ...बिल्ली चूहे या चोर पुलिस के खेल सा दृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है ...आजादी की कीमत तो ये कुत्ते भी खूब समझते हैं .... गली के कोने पर कूं - कूं करता पड़ा हुआ टौमी कराह रहा था ..पूरे दो दिन से वही एक जगह पड़ा हुआ ....कुछ दिन पहले उसकी पीठ पर घाव का निशान देखा था कांता ने ...दूसरी गली के कुत्तों के साथ जंग में घायल हो गया था बेचारा ...उसके होते किसकी मजाल थी कि किसी दूसरी गली का कुत्ता आये और भौंक कर चला जाए ...मगर इस बार घाव गहरा था ....अब तो बिलकुल ही हिलना डुलना मुश्किल था ...

पिछले कई महीनों से देख रही थी कांता इसे ...आस पास के घरों से रोटी मिल जाती थी और गली के कोने में ऐसे अलसाया पड़ा रहता , मगर जैसे ही कोई अजनबी नजर आता कान खड़े हो जाते उसके , दौड़ा भगा चलता आता ...भोंक भोंक कर नाक में दम कर देता ...कई बार कांता जब सब्जी लेने या किसी काम से घर से निकालती तो वह भी साथ हो लेता ...बाकायदा गली के आखिरी छोर तक उसके साथ चलता ....बच्चे हँसते थे उसपर ...बौडीगार्ड है आपका ....मोहल्ले वाले उसकी वफ़ादारी से बहुत प्रसन्न थे यहाँ तक कि कांता की कर्कशा पड़ोसन भी जो जब तब हर किसी से भिड जाती थी ...माली , सब्जी वाला , पेड -पौधों वाला , मोची ... ..मजाल है जो आजतक किसी को उसने वाजिब कीमत दी हो ..काम पूरा करवाने के बाद थोड़े बहुत पैसे बहुत एहसान के साथ पकड़ा देती इन लोगों को और यदि किसी ने साहस कर लिया पूरी कीमत मांग लेने का तो फिर उसकी खैर नहीं ....ऐसी महिला यदि किसी कुत्ते से खुश है , टिके रहने देती है गली में तो उसमे कुछ न कुछ ख़ास तो पक्का ही है ...

मगर घाव खाया टौमी ( नाम कांता ने ही दिया था ) जब से बीमार पड़ा है  उसके घाव में कीड़े पड़ गए हैं . वही महिला हाय तौबा मचाये रखती है ....जब भी कांता नजर आ जाती है उसे तो तीखा बोले बिना नहीं रहती ...
" रोटी दे दे र हिला लियो ...कत्तो बास मार है ...लोगां ना कियां क्यां काम सूझ ...आपक घर में क्यूँ ना राख लेव " (रोटी खिला कर मुंह लगा लिया इसे ...कितनी बदबू मार रहा है ...लोगों को भी क्या क्या काम सूझते हैं , अपने घर में क्यूँ नहीं रख लेते )....

टौमी


आखिर कांता ने नगरनिगम के पशु विभाग में फ़ोन कर बीमार कुत्ते की इत्तला कर दी ...और वही गाडी आ पहुंची थी उसे लेने ....इस हालत में टौमी भाग नहीं सकता था इस लिए आसानी से गिरफ्त में आ गया ....उसे ले जाते देख कांता को थोडा दुःख तो हुआ मगर उसे संतोष था कि पशु चिकित्सालय में उसका ठीक से इलाज़ हो सकेगा ...कम से कम उम्मीद तो यही थी ...

सुनो , रामलीला मैदान में सहकार मेला लगा है , तिब्बती मार्केट भी लगा हुआ है ...आज फ्री हूँ ...जो लाना है चल कर ले आओ ...फिर मुझे समय नही होगा तो जान खाओगी ..
गाड़ी की धुलाई करते हुए कांता के पति ने पत्नी और बच्चों को कहा .
दोनों बच्चे बड़े खुश हो गए . 
हाँ हाँ, पापा चलिए , मुझे नई डिजाईन की जैकेट लानी है . शायद तिब्बती मार्केट में मिल जाए .

व्यस्ततम बाजार में गाडी पार्क करते एक बड़ी सी गाडी पर कांता की नजर ठहर गयी . उसकी खिड़की से एक सफ़ेद झक पामेरियन कुतिया झाँक रही थी ...
बेबी , मुंह अन्दर करो , डोंट क्राई"...उसकी मोटी -सी मालकिन गोदी में लेकर लाड़ दुलार कर रही थी . बेबी के लिए एक अच्छा सा ब्लैंकेट देखना है . बहुत ठण्ड हो गयी है ..अपने पास बैठे व्यक्ति से कहा उसने .

कांता को एकदम से टौमी याद आ गया ....देशी कुत्तों को कहाँ यह सब नसीब है  . बेचारे गली -गली भटकते रहते हैं .  अक्सर दुत्कारे जाते हैं . कोई तरस खाकर कुछ खिला दे तो ठीक वरना ....

तभी देखा उसने एक गन्दा सा लड़का , मिट्टी में सना कपड़े से उस महिला की गाडी साफ़ करता रिरिया रहा था.....
दो रूपये दे दीजिये ...
अपने पप्पी के मुंह में महंगे बिस्किट ठूंसती महिला ने मुंह फेर कर अपने ड्राईवर से कहा . 
 अरे , हटाओ इसे ...गाड़ी साफ़ कर रहा है या और गन्दी कर देगा ...हटाओ इसे यहाँ से .

कांता की उदासी बढती गयी ...
.नर्म बिस्तर , ममतामयी गोद , गरम कपड़े ,महंगा खाना .  देशी कुत्ते ही क्यों , बिना घर बार वाले अनाथ बच्चों या घर -बार होकर भी मांगने को विवश बच्चों से भी अच्छे हैं विदेशी कुत्तों के नसीब.......
एक गहरी सांस लेकर खुद को सामान्य रखने की कोशिश करती मेले की ओर बढ़ चले कांता के कदम .






चित्र गूगल से साभार ....

बुधवार, 24 नवंबर 2010

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ....

कल दिन भर बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर रही ....ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल को सही ठहराते हुए एक बार नितीश फिर से बिहार के सिरमौर बन गए हैं ....

मैं एक आम गृहिणी हूँ ....राजनीति से मेरा दूर दराज का भी कोई सम्बन्ध नहीं है ...पिता की कर्मभूमि होने के कारण बचपन और किशोरावस्था की बहुत सी यादें इसी प्रान्त से जुडी हैं ......फिर एक आम भारतीय की तरह भी देश की राजनीति में क्या हो रहा है , क्यूँ हो रहा है , जानने की रूचि रहती ही है ...

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ...बिहार की जनता ने साबित कर दिया है कि अब धर्म, जाति , प्रान्त , भाषा की राजनीति के दिन बस लद ही गए हैं ....पटना के गाँधी मैदान से दीपकजी का कार्यक्रम भी देखा ..आम जनता उत्साहित है ....मीडिया हाउस के लिए भीड़ जुटाना अपने कार्यक्रमों की पब्लिसिटी का एक अंग हो सकता है , मगर इसमें कोई शक नहीं कि बीते पांच वर्षों में बिहार में शासन की मंशा देश और विश्व स्तर पर राज्य की प्रतिष्ठा कायम करने की रही है ....और इसका प्रभाव भी नजर आ ही रहा है ...

पिता के देहावसान के बाद कभी बिहार जाना नहीं हुआ मगर बिहार से लौटने वाले लोंग जब वहां की साफ़ चमकदार गड्ढों रहित सड़कों की बात करते हैं, तो एकबारगी यकीन नहीं होता ...वरना वहां हाई वे तक का बुरा हाल देखा है ...कई बार अपने कस्बे से पटना या मुजफ्फरपुर जाने में अनुमानित समय से कहीं अधिक समय लग जाने के कारण ट्रेन छूटते रह गयी ....याद आ रहा है ...एक बार कार से पटना से कस्बे तक के सफ़र को तय करते हुए धचके खाता छोटा भाई सारे रास्ते झुंझलाता रहा ....पिता, जिनका ज्यादा समय सफ़र में ही गुजरता था , चुटकी लेते हुए बोले..." अगर ऐसी जगह पर तुम्हे नौकरी करनी पड़ती , तो क्या हाल होता तुम्हारा "
" मैं तो नौकरी ही छोड़ देता " मेरे भाई का जवाब था ..." बेटा , मैंने भी यही सोचा होता तो तुम लोगों का क्या हाल होता " ...पिता मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले ....खैर , रास्ते में आम और लीची के खेतों से गुजरते भाई का संताप कुछ कम हुआ ...
जब भी बिहार की सड़कों की बात होती है , मुझे ये सफ़र बहुत याद आता है ...अच्छा लगता है सुनकर कि बड़े शहरों से लेकर छोटे ग्रामीण इलाकों तक की सड़कों में काफी सुधार हुआ है ....कहा ही जाता है कि किसी भी देश/प्रदेश के विकास का रास्ता वहां की सड़कें तय करती हैं ...

बिजली व्यवस्था का हाल अभी भी इतना दुरुस्त नहीं है ....अधिसंख्य लोंग बिजली के लिए सरकारी व्यवस्था से ज्यादा जेनरेटर पर निर्भर करते हैं और उसकी भी अपनी सीमा होती है ....उम्मीद है सड़कों की तरह इसमें भी सुधार होगा ही ...

पंचायतों और शहरी निकायों जैसे आम जनता से सीधे जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत सुरक्षित स्थान महिलाओं को प्रदेश के सरोकारों से सीधे सीधे जोड़ता है और माने या ना माने , इसका यथोचित शुभ प्रभाव नजर आता ही ... सुरक्षा और कानून व्यवस्था में सुधार के कारण डकैती, अपहरण जैसी आम घटनाएँ अब इतनी आम नहीं रही है ...अपनी फ्रेंड के पडोसी , पिता के जूनियर ऑफिसर , फॅमिली डॉक्टर के अपहरण की घटना तो आँखों देखी रही हैं ....और गोलियों और चीख पुकार की आवाज़ों के बीच दूर कहीं डकैती का अनुमान लगाते कालोनी के सभी परिवारों को इकठ्ठा भगवान् को याद करते हुए कुछ यादें भी ज़ेहन में रही हैं ...

जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नितीश की सरकार ने दिखा दिया है सरकारों की इच्छा शक्ति से प्रदेशों में मनचाहे बदलाव लाये जा सकते हैं ....वही बिहार की जनता ने भी साबित कर दिया है कि वे अब सिर्फ विकास की राजनीति में विश्वास करते हैं .... यही शुभेच्छा प्रत्येक प्रान्त की जनता और राजनैतिक दल की हो जाए , तो इस देश को अपने खोये गौरव को प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता ....

(प्रदेश की खुशहाली की कहानी मेरी सुनी हुई ही है या फिर अख़बारों में पढ़ा , टी वी पर देखा हुआ ...मेरी जानकारी में कुछ कमी हो तो अल्पज्ञता समझ कर क्षमा कीजिये )


बिहार की जनता की जीत के नाम ... हमारे शहर में (जयपुर) के गलता तीर्थ पर बिहार के लोक पर्व छठ के कुछ चित्र .....देर से लगा रही हूँ , मगर समय दुरुस्त है ....