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राजस्थान के शेखावाटी इलाके में बोले जाने वाली मारवाड़ी भाषा शेखावटी है ....जैसे कि हमारे देश मे (विदेश में भी हो सकता है ) हर बीस कोस पर भाषा या बोली अपना रूप परिवर्तन कर लेती है , राजस्थानी भाषा या बोली भी कई तरह से बोली जाती है ....शेखावाटी , नागौरी , ढूँढाडी, मेवाडी, मारवाडी , मालवी आदि ... शेखावटी क्षेत्र मे राजस्थान के झुंझनु , सीकर , फतेहपुर , नवलगढ़ , चुरू आदि शहर आते हैं ...जबकि ढूँढाडी जयपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों मे बोली जाती है .... नागौरी हमारी मातृभाषा है इसलिए इसमें तो फ़र्राट बातचीत हो जाती है और पिछले २३ वर्षों से लगातार जयपुर मे रहने के कारण ढूँढाडी भी बोलना समझना हो जाता है ...नागौरी , शेखावटी और मारवाड़ी मे बहुत समानताएं हैं इसलिए इसमें भी बातचीत मे मुश्किल नहीं होती ...ढूँढाडी आम मारवाड़ी से थोड़ी भिन्न है ...इसमें छो ... छूं का प्रयोग होता है ....
जैसे यदि पूछना हो
क्या कर रहे हो तो इसे अलग- अलग मारवाड़ी बोली मे
काईं कर रिया हो ....काई करो हो...के करो हो ....काई कर रया छो आदि बोला जाता है ...
कहाँ जा रहे हो ....
कठ जावो हो , कठिन जा रिया हो , सीध चाल्या , कोड जा रया छो.....आदि
शेखावटी मे बात करते जैसे ही एक महिला ने हिंदी बोलना शुरू किया , मैं चौंक कर उसका मुंह देखने लगी ...उनकी हिंदी राजस्थान मे बोली जाने वाली नहीं थी ...उनका लहजा बिहार या बंगाल मे बोली जाने वाली हिंदी जैसा था ...मैंने उनसे पूछ ही लिया ," आप बिहार या बंगाल मे काफी समय तक रहे ये हो "....वे भी चौंक गयी ....बोली बिहार , बंगाल तो नहीं असाम मे काफी सालों तक रहे हैं हम लोंग ....पर आपने कैसे जाना ....मैंने हँस कर कहा कि बातचीत का लहजा आपकी पोल खोल देता है ....भाषा तो वही रहती है , मगर उसे बोलने का तरीका और हाव भाव जता ही देता है कि आप देश के किस हिस्से मे रह रहे हो या रह चुके हो ....
बिहार के एक छोटे से गाँव मे पढ़े -लिखे मारवाड़ी इंजिनीय र भैया वर्षों से विदेश मे हैं मगर जब भारत आकर हिंदी बोलते हैं तो उनका लहजा वही बिहारी ....कई बार अमिताभ बच्चन जी को बातचीत करते सुना ....उनकी हिंदी मे भी वही इलाहाबादी या बनारसी झलक ही जाता है ....उत्तरप्रदेश वासियों में लखनऊ , मुरादाबाद , बरेली , बहराईच आदि स्थान मे रहने वालों का "ल" बोलने का अंदाज उनकी पहचान करने के लिए काफी है ...दक्षिण भारतीयों की हिंदी /अंग्रेजी भाषा से तो उनकी पहचान कोई भी कर सकता है ...पंजाबी भाषा बोलने वालों को आधा स बोलने मे परेशानी होती है ...वे स्टेशन या स्कूल को सटेशन या सकूल बोलते हैं (अक्सर )....
ऐसे ही हरियाणा मे बोले जाने वाली हिंदी का ककहरा भी अलग ही है ....सब टी वी पर आने वाले हास्य धारावाहिक (FIR )मे चंद्रमुखी चौटाला के हरियाणवी लहजे का अनुकरण मुश्किल है ....
हैदराबादी हिंदी भी सबसे अलग है....किधर जाते , कायको आदि
मुम्बैया हिंदी की छटा हिंदी फिल्मों में जब तब मवाली पात्रों के माध्यम से बिखरती ही रहती है ...
अपुन ऐसेईच है भीडू , खाली पीली ...
आप लाख छुपाना चाहे मगर देश के किस हिस्से मे आप ज्यादा समय रहे हैं या आपका मूल स्थान क्या है , आपकी बातचीत का लहजा इसकी पोल खोल ही देता है....!