शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

यह नम्बर अस्तित्व में क्यों नहीं है ....



रोज सुबह की तरह ही मोबाइल का अलार्म बजा और श्रीमान जी ने झट से दबा दिया बटन कि  अभी बस बजता ही जाएगा .अलसाया मन अलार्म की एक क्लिक पर कहाँ उठता है , कुछ मिनट के अंतर पर कई बार मधुर ध्वनि सुन लेने के बाद ही सुप्रभात संभव है . मगर आज अलार्म बंद करते ही अचानक  चौंकते हुए उठे , जिसको अलार्म समझ कर बंद किया , वह मोबाइल की रिंग टोन थी . किसका फोन आ रहा था , इतनी सुबह . घडी में समय देखा तो सुबह के तीन बजकर अठावन मिनिट हुए थे . 

इतनी सुबह फ़ोन और वह फी किसी के लैंड लाईन नंबर से . चिंता स्वाभाविक थी , आखिर इस समय कोई फ़ोन क्यों करेगा , किस मदद की जरूरत थी , या कोई जरुरी सूचना थी , क्या सोचता होगा वह इंसान की मैंने मदद के समय फोन काट दिया , जाने क्या क्या विचार मन में डोलते रहे . थोड़ी देर इन्तजार होता रहा की देखें , कहीं अगला दुबारा ही फ़ोन मिला ले . मगर लगभग दस पंद्रह मिनिट तक फ़ोन नहीं आने पर एक विचार मन में बना की क्यं ना इसी नम्बर पर फोन कर पूछ लिया जाए , अब तो मोबाइल क्या लैंड लाईन फ़ोन पर भी इनकमिंग नंबर  दर्ज होने से मिस कॉल की सारी डिटेल मिल जाने की सुविधा रहती है . कही किसी ने गलती से ना मिला दिया हो , थोडा झिझकते हुए पुनः उसी नम्बर पर फोन किया तो उधर से आवाज़ आयी ." यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है ".   
अब तो होश फाख्ता होने ही थे . एक तो अनजान नंबर लैंड लाईन का , वो भी इतनी सुबह और वह नम्बर अस्तित्व में ही नहीं है . कुछ वर्षों पूर्व ऐसी घटना की बहुत चर्चा रही थी कि कुछ ख़ास नंबर से फ़ोन पर किसी महिला के रोने , सिसकने की आवाज़ आती थी , मगर उसी नम्बर पर फ़ोन करने पर सुनाई देता , यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है . भय और रोमांच मिश्रित   एक सिहरन सी हुई . रहस्यमय कथाएं या फ़िल्में इसी प्रकार तो देखी - सुनी जाती हैं . भटकती आत्मा से दूरभाष पर साक्षात्कार का एक अविस्मरणीय पल घटे बिना  रह गया .
अनजाने ही सही , क्या जरुरत थी बिना सुने ही कॉल ऑफ करने की ,बार -बार यही अफ़सोस सताता रहा .

ओह , हम भी किसी ऐसी रहस्यमय घटना के साक्षी होते रह गए क्या ..हालाँकि यह जानकारी तो थी की कुछ वी आई पी नम्बर भी सिर्फ सुने जा सकते हैं , उन पर कॉल बैक नहीं किया जा सकता है , फिर भी रहस्य तो था ही कि आखिर  यह फ़ोन हमारे पास क्यों आया . 

कैसे पता करें , किसका फोन नम्बर है , पड़ताल करते श्रीमान जी  बी एस एन एल की  वेबसाइट पर पहुंचे . यह भी अच्छा हुआ की लैंड लाईन नंबर था वर्ना मोबाइल नम्बर की तो डाइरेक्टरी भी उपलब्ध नहीं होती . सच करने पर पता चला की उक्त नम्बर उनके दफ्तर के सामने स्थित किसी सरकारी भवन का है। अब चिंता का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा था , जरुर किसी ने मदद के लिए फोन घुमाया होगा , मगर यदि ऐसा है तो नम्बर अस्तित्व में नहीं है , क्यों सुन पड़ रहा है . छुट्टी का दिन था , वर्ना ऑफिस जाकर ही माजरा जान आते . अब सोमवार का इन्तजार करने के सिवा चारा नहीं था . मगर दिन भर दिमाग में  यही उधेड़बुन चलती रही  , इतनी सुबह किसका फोन था , नम्बर क्यों नहीं लग रहा आदि -आदि .कई बार बच्चों से भी इस पर चर्चा हुई . अचानक शाम को चार बजे मोबाइल की आवाज़ पर बेटी ने उछलते हुए कहा ," पापा , यह तो फिर से वही नंबर  है . सुबह से इतनी पड़ताल हो चुकी थी कि फोन नम्बर रट ही गया था . हम सबकी उत्सुकता भरी निगाहों से जानना चाह रहे थी की आखिर यह रहस्यम कॉल किसकी है , किसकी हो सकती है। श्रीमान जी ने कॉल सुनते ही स्पीकर ऑन कर दिया . " यदि आपको जुखाम के साथ तेज बुखार ,सर में दर्द है तो स्वाईं फ्लू की जांच अवश्य करवा ले "  कम्प्युटराईज्ड ध्वनि में  स्वास्थ्य विभाग की जनहित चेतावनी जारी हो रही थी .  इस नंबर के अस्तित्व में नहीं होने की वज़ह समझ आ गयी . 

धत तेरे की ...सारे रहस्य की ऐसी -तैसी हो गई . 

अब हमारी सरकार की मुस्तैदी का जवाब क्या है , भोर के चार बजे फोन से नागरिकों को स्वाईंन  फ्लू के खिलाफ चेता  रही है , सही भी है , बीमारियाँ भोर अथवा शाम का समय देख कर थोड़े आती है . राहत भी हुई कि जनता को जागरूक करने के  सरकारी काम भी इतनी चुस्ती -फुर्ती से होते हैं . 
 पुरानी रहस्यमय घटनाओं के सन्दर्भ और स्रोत भी समझ आ गए कि  उक्त रहस्यमय घटनाओं  के पीछे किसी स्त्री की दारुण व्यथा नहीं , बल्कि उनके लिए ऐसे किसी नम्बर का प्रयोग कर शरारत ही रही होगी .

रहस्यमय संसार अचानक ही सामान्य सा लगने लग गया , ये भी कोई बात है भला !! 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

नैतिकता का पाठ !



बोलो बच्चों. आज की कहानी से क्या सबक सीखा ?

डस्टर  से  ब्लैकबोर्ड साफ़ करते मास्टरजी ने कक्षा में बच्चों की ओर मुख करते हुए पूछा .

उत्साहित मोहन ने हाथ खड़ा कर कहा  - सर ! मैं बताऊँ !!

हाँ हाँ .बताओ मोहन ...उसका उत्साह बढ़ाते हुए सोहनलाल जी ने पूरी कक्षा को चुप रह कर सुनने का आदेश दिया . 
जी सर!  हमने इस कहानी से सीखा कि जो आपको ईश्वर ने दिया है  उससे संतुष्ट रहना चाहिए . लालच  नहीं करना चाहिए . कभी किसी का धन चुराने की इच्छा भी नहीं रखनी चाहिए .

पास की सीट पर बैठा रोहित   बोल उठा -  सर ! ये झूठ बोल रहा है. कल इसने मेरे टिफिन में से खाना चुरा  कर खा लिया था .

चुराया कब था ? टेबल पर टिफिन बॉक्स रखा था . मैंने उठा कर खा लिया .ये क्या चोरी हुई . नहीं ना सर !....

अनुमोदन के लिए चमकदार हो उठी उसकी आँखे और मुंह बनाते मोहन को देख शिक्षक मुस्कुरा दिए .बचपन कितना भोला और निष्कपट होता है  . क्या होता जो बच्चे हमेशा बच्चे ही रह जाते . सोचते हुए  वे कुछ जवाब देते  इससे पहले ही घंटी की आवाज़ आयी और सभी बच्चे अपना बैग सँभालते उठ खड़े हुए . मोहन और रोहित कक्षा से बाहर निकलते हुए एक दूसरे का हाथ पकडे थे . 

कक्षा से बाहर निकलते हुए सोच रहे थे सोहनलाल जी  . बच्चे भी कितना कुछ सिखा देते हैं . शब्दों और भाषा की सजावट के बिना भी!!

सायकिल पर तेजी से पैडल मारते हुए सोहन लाल जी  को थोड़ी दूर पर काले बैग सी चमकती कोई चीज नजर आयी . पास जा कर देखा तो किसी का बटुआ जमीन पर गिरा  पड़ा था . इधर उधर नजर दौड़ते हुए सोहनलाल जी ने बटुए को खोल कर देखा . तीन- चार हजार रूपये , फोटो , कार्ड जैसी कई वस्तुएं उस बटुए में थी . सोहन लाल जी ने एक बार फिर इधर- उधर देखा . बटुए में से पैसे निकाल कर जेब के हवाले किये और पुनः बटुए को सड़क पर  फेंक दिया .

सोहनलाल जी की नजर नहीं पड़ी.  उनके पीछे साईकिल पर चलते मोहन और रोहित बहुत हैरानी से उन्हें ही देख रहे थे।   

सोहनलालजी को मिल गये आत्माराम जी भी पीछे आते हुए ...

क्या सोहनलाल जी!!
बच्चों को नैतिक शास्त्र पढ़ाते हो और स्वयं पाठ भूले हो .

ओहो ! आत्माराम जी . आप भी ...
बताईये  क्या करता इस बटुए का . पुलिस वाले के पास जमा  करता तो क्या जरुरी था कि  उक्त व्यक्ति को उसकी रकम मिल ही जाती.  व्यक्ति का नाम -पता ढूंढ कर उस तक पहुंचाता तो जाने कैसा व्यक्ति होता!!  कही मेरे गले ही पड़ जाता तो . कही मुझ  पर उसमे ज्यादा रकम होने का इलज़ाम लगा देता तो जेब से या जेल में भुगतनी पड़ती ईमानदारी की सजा . नैतिकता के पाठ जो भी पढाये जाए  उनको समयानुसार बदलाव के साथ स्वीकारने में ही भलाई है .

कहते तो ठीक ही हैं सोहनलाल जी.  आत्मारामजी अपनी राह चलते सोच रहे थे .


क्या आप भी सोहनलाल जी की राय से इत्त्तिफाक रखते हैं , हमसे मत पूछियेगा , इस पर एक संस्मरण अलग से लिखा जाएगा .

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

इस देश में अब कोई दामिनी ना हो .....



जाते हुए पुराने वर्ष ने इस देश के माथे पर इंसानियत को शर्मसार करने वाला ऐसा बदनुमा दाग लगा  दिया , जिसकी टीस वर्षों सालेगी . 
दादी की बात बार -बार याद आती रही , आजकल पशुओं की संख्या कम हो गयी है , क्योंकि वे मनुष्य रूप में जन्म लेने लगे हैं !!

देश की एक बेटी का हर माँ की बेटी हो जाना ,किस माँ  की आँख नम ना  हुई होगी !!

गहन मानसिक पीड़ा के इन क्षणों को कभी चुप होकर तो कभी कुछ  मुखर होकर पढ़ते रहे , सुनते रहे , देखते रहे , मनन और मंथन भी किया की  बहुत थूक चुके हम दूसरों पर , दूसरी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर .
अब समय आ गया है कि  स्वयं की धरती , संस्कृति और सभ्यता  पर ही एक भरपूर नजर डाल  ली जाए . 
नहीं , मैं निराशावादी नहीं हूँ ...जानती  और मानती हूँ , गिर कर संभलना , गिरे हुए को संभालना , किसी को गिरने से बचाना ही मानव जीवन के परम कर्तव्य और हेतु हैं ....दुर्दांत घटना पर शब्दों में कुछ कहने से बेहतर लगा रहा था  ,कुछ किया जाए, कुछ किया नहीं तो लिखा क्या जाए ! इसलिए थोडा बहुत कुछ किया भी गया हालाँकि  सोयी हुई सुखी आत्माओं को जगाना इतना आसान भी नहीं , मगर चेतना के प्रवाह को गति देने के प्रयास में लगे हुए हैं . 
गहनतम दुःख के इस क्षण में नम  आँखों से देश में युवाओं का  बड़ी संख्या में एकजुट होकर  प्रदर्शन करते हुए खुल कर अपनी मांगे रखने का  साहस , हौसले और जुल्म के आगे कदम नहीं रोकने की  इक नयी मिसाल कायम करते हुए देख गर्व भी हुआ .... 
मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना ने यह साबित कर दिया की इस देश में समाज , प्रशासन ,पुलिस और कानून का सम्मान अथवा भय अब कहीं नहीं रह गया है . और यह बेअदगी , बेहयाई रातों -रात नहीं हुई . इस समाज का हिस्सा , देश के नागरिक होने के नाते हम सब भी कहीं न कहीं इसमें जिम्मेदार हैं . 
मादक पदार्थों की सहज उपलब्धता और उनके सेवन पर कोई पाबन्दी नहीं होने ,  अश्लील फिल्मों , साहित्य , पत्र पत्रिकाओं का प्रचुर मात्र में वितरण इन घृणित घटनाओं के विशेष  उत्प्रेरक होते हैं . पुलिस और प्रशासन यदि इन पर रोक लगा दे तो समाज में अपराध की दर कम करने में बहुत आसानी होगी .इसके अतिरिक्त
स्वार्थपरक जयचंदी  मानसिकता , जनप्रतिनिधियों को चुनने में असावधानी , जन सेवा के विभिन्न क्षेत्रों को लाभ अथवा व्यापार केन्द्रित बनाने,   आदि ऐसे कारण  है जिसमे पुलिस अथवा प्रशासन से अधिक  समाज की  तथा समाज की इकाई होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी है . 

 परिवार और समाज में हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझे , अपने घर में अपने बच्चों को लिंगभेद के बिना अच्छी शिक्षा दे , सही- गलत का भान कराने हेतु घरों के साथ ही विद्यालयों में भी नैतिक शिक्षा अनिवार्य हो . परिवार और समाज स्त्रियों को दोयम ना मानते हुए बराबरी का हक़ दे , उनके सम्मान को सुनिश्चित करे . लड़कों की ही तरह लड़कियों के खानपान पर भी ध्यान देकर  शारीरिक तथा मानसिक सुदृढ़ता  के लिए प्रोत्साहित करें . प्रशासन को  भी यह सुनिश्चित करना होगा की इस देश में एक भी व्यक्ति निरक्षर ना रहे ,विद्यालयों में भी नैतिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए ,  उसे एक गैरजरूरी विषय के रूप में ना पढ़ाया जाए .

हर व्यक्ति अपने मोहल्ले , अपने गांवों , कस्बों और शहरों को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने में सिर्फ कानून पर निर्भर ना रह कर स्वयं की जवाबदेही भी तय करे . हमें इससे क्या , जैसा रवैया ना अपनाते हुए छेड़छाड़ की घटनाओं अथवा अश्लीलता की प्राथमिक अवस्था से ही अनदेखी ना करे . कई छोटी घटनाओं को सही समय पर रोक दिए जाने पर बड़ी दुर्घटनाएं टाली जा सकती है .

राज्य और शासन से यह अपील रहेगी ही -- शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता पर विशेष ध्यान दे . मादक पदार्थों और अश्लील साहित्य , फिल्मों आदि पर रोक लगाने के साथ ही इनमे लिप्त पाए जाने पर  कठोर सजाओं का प्रावधान रखा जाए . 
स्त्रियों के साथ होने वाली   ऐसी  घटनाएँ ना होने देने के लिए पुलिस सेवा में महिलाओं का प्रतिशत बढाया जाने के साथ ही चौकस गश्ती दलों का गठन हो . स्त्रियों के शारीरिक शोषण सम्बन्धी  घटनाओं  के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये जाएँ और कम से कम समय में कठोर से कठोर सजा का प्रावधान हो ताकि कानून के प्रति लोगो के मन में डर हो . ऐसी जघन्य घटनाओं के लिए  फांसी की सजा से कम और कोई सजा  मान्य ही नहीं हो. 
इस देश में अब कोई दामिनी ना हो ,   इसी संकल्प का प्रण लेने की गुहार के साथ   नए वर्ष की बहुत शुभकामनायें !!