गुरुवार, 22 मई 2014

संत हृदय नवनीत समाना ....

सद्जनों की संगति आचार /विचार और व्यवहार में परिवर्तन लाती ही है , ऐसे लोग संख्या में कम होते हैं जिन पर इसका विशेष प्रभाव नहीं होता ! माँ के पूज्य फूफाजी विद्वान शिक्षक थे।   जब कभी  छुट्टियों में घर आते , फुर्सत मिलते ही किताबें मंगवा कर प्रश्न पूछते , और न आने पर विस्तार से समझा भी देते हालाँकि ये स्मृतियाँ  उन दिनों की है जब ऐसा होता नहीं था कि हमसे कोई प्रश्न पूछा जाए और हम उसका उत्तर दे न सकें . उन दिनों शिक्षा से जीविकोपार्जन तो अवश्य होता था मगर वह व्यवसाय नहीं थी. हालाँकि एक दुक्का किस्से सुनने को मिल जाते थे सरकारी विद्यालयों के कि फलां शिक्षक ने छात्रों से फल , सब्जी , अनाज आदि मंगवाए।  शिक्षक के लिए शिक्षा देना विद्या का दान करने जैसा ही अधिक होता था . कोर्स की किताबों के सिवा नैतिक शिक्षा का ज्ञान भी अभिभावकों से अधिक गुरु से ही प्राप्त होता था . इसलिए पढ़ते हुए वे ज्ञान/ धर्म की चर्चा भी कर लिया करते थे . और हम तो ठहरे हम , जिज्ञासा और प्रश्न करते रहना तो अब तक इस अधेड़ावस्था में भी नहीं छूटा  तो तब तो बचपन ही था .

एक बार "कल्याण " पत्रिका से संस्मरण सुनाते हुए वे उपदेशकों पर चर्चा करने लगे . पंडितों /ज्ञानियों या सन्यासियों का सुख सुविधाओं का उपयोग करना मुझे आश्चर्यचकित करता ही था . वे किसी गुरु की अगवाई के किस्से सुना रहे थे . साधू महात्मा जी का बड़ी गाडी में आना , लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करना  मुझे हैरान कर रहा था . उनके बड़प्पन का  लिहाज करते हुए भी मैंने पूछ ही लिया कि सन्यासियों को इस ठाठ बात की क्या आवश्यकता है . वे जनता को भोग लिप्सा से दूर रहने को कहते हैं , स्वयं क्यों डूबे रहते हैं !
मेरी शंका को समझ लिया उन्होंने . प्रत्यक्ष कुछ कहा नहीं , मगर एक दूसरा किस्सा सुना दिया अपने गुरु जी का . हुआ यूँ कि उनके गुरु जी को किसी अमीर शिष्य ने महँगी घड़ी भेंट की .  गुरु जी हर समय उस घड़ी को धारण किया करते।  उनके  एक शिष्य को बहुत अखरता।  कई दिनों तक वह देखता रहा , मन मे सोंचता रहा कि गुरूजी हमे तो माया मोह त्यागने का उपदेश देते हैं , मगर स्वंयं इतनी महँगी घड़ी पहने रखते हैं।  गुरूजी से उसकी मानसिक स्थिति छिपी नहीं रही।   उन्होंने शिष्य को पास बुलाया और कहा , मैं बहुत समय से देख रहा हूँ कि तुम कुछ पूछना चाहते हो , तुम्हारे मन मे जो भी शंका है , खुलकर कहो।  
शिष्य  ने झिझकते हुए पूछ  लिया - आप हमें भौतिक वस्तुओं के प्रति लालसा न रखने का उपदेश  देते हैं , मगर  स्वयं इतनी महँगी घडी पहनते हैं !
गुरूजी स्नेह पूर्वक मुस्कुराये, तुम्हे यह  घडी बहुत पसंद है !
किसे पसंद नहीं होगी , आपको भी है इसलिए आपने पहन रखी है।

गुरूजी  ने तत्काल घडी हाथ से उतारकर शिष्य को दे दी।  इसे हर समय पहने रखना !

अब शिष्य बड़ा  प्रसन्न हुआ।  मूल्यवान होने  के कारण  वह हर समय घडी पहने रखता मगर उसकी हिफाजत के लिए प्रयत्नशील भी बना रहता। घडी की देखभाल और चिंता में उसके दैनिक प्रभावित होने लगे। स्नान - ध्यान में विघ्न पड़ने लगा।  एक दिन स्नान के लिए जाते समय उसने घडी उतार कर रखी।  जरा सी आँख चूकते घडी अपने स्थान से गायब।  हर तरफ  हेर लेने पर भी  घडी का कही पता न चला ।  उसे बहुत दुःख हुआ और जार जार रोने लगा।  उसे भय भी था की गुरूजी  ने उसकी ख़ुशी को देखते हुए घडी प्रदान की थी और उसकी हिफाजत के लिए निर्देश भी दिए थे, मगर वह उसे संभाल न सका।  
एक  दो दिन के बाद गुरूजी की नजर उसपर पड़ी , वह फिर से वैसे ही उदास , चिंतित !
 गुरूजी  ने पास बुलाकर  उसकी उदासी का कारण पूछा।  सर झुकाया अश्रुपूरित नेत्रों के साथ उसने  घडी के खो जाने की बात बताई और साथ ही उनसे क्षमायाचना करने लगा।  
गुरु  जी ने उसे आश्वस्त किया  कि आश्रम से घडी कहाँ खो जायेगी , यही कहीं मिल जायेगी। साथ ही सभी शिष्यों  को बुलाकर घडी को तलाशने के निर्देश दिए।  खोजबीन करते आखिर एक शिष्य को वह घडी मिल ही गयी, किसी पेड़ की डाल पर लटकी।  शायद किसी पक्षी की करामात रही हो , या किसी शिष्य की ही !  
गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया , और  उनकी उपस्थिति में घडी ढूंढ  लाने वाले शिष्य से कहा.…   यह घडी तुमने  परिश्रम से ढूंढ ली है , इसलिए अब इसे तुम ही रख लो !
इस पर  पहले  वाले शिष्य का प्रतिवादी स्वर गूंजा - मगर यह घडी तो मेरी है , आपने इसे मुझे दिया था !

मगर यह घड़ी मैंने तुम्हे दी थी , जो मुझे भी किसी ने भेंट की  थी।   इस शिष्य ने तो इसे परिश्रम से प्राप्त किया है , इसलिए इसका अधिकार होना चाहिए ! गुरूजी के चेहरे पर स्मित मुस्कान थी।
मगर  दूसरे शिष्य ने भी घडी लेने  से इंकार कर दिया  यह कहते हुए कि  मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।

अब पहले शिष्य को अपनी गलती का एहसास हुआ।  उसे समझ आया कि गुरूजी के लिए मूलयवान घडी का कोई मोल नहीं था. श्रद्धापूर्वक भेंट की गयी वस्तु को वे धारण तो किये हुए थे , मगर उनका उस घडी या वास्तु से कोई मोह नहीं था।

विद्वान शिक्षक भी मुझे समझा रहे थे। ऐसे ही सही मायनों में संत वे हुए जो किसी प्रलोभन अथवा मोह माया में अटकते नहीं।  उनका स्वागत किया श्रद्धा से , उन्होंने प्रेम से स्वीकार किया !  वे सुविधा के लिए लालायित नहीं हैं , ना प्रयत्नपूर्वक सुविधा प्राप्त करना चाहते हैं मगर इन अमीर  भक्तों को इस प्रकार आत्मसंतुष्टि मिलती है तो यही सही ! यदि वे सिर्फ झोपडी / मुफलिसी / असुविधा में रहने वालों को ही उपदेश देते रहेंगे तो सुविधाभोगी उन तक पहुंचेंगे ही नहीं।  जबकि इस वर्ग में सद्विचार का प्रसारण अधिक आवश्यक है ताकि वे गरीबों/वंचितों  के कष्ट  का कारण समझें , कष्ट को समझे और उसके निराकरण में अपना सहयोग कर सकें। उनमे सद्विचारों का रोपण उनकी सुविधाजनक स्थितियों में ही करना होगा , वरना वे विमुख ही होंगे ! संत पानी में रहकर भी सूखे रह सकते हैं , सुविधाएँ उनके मार्ग का व्यवधान नहीं होती।  वे प्रत्येक स्थिति को ईश्वर प्रदत्त मानकर निरपेक्ष भाव से  रहते हैं।


नोट -  अनेकानेक तथाकथित धार्मिक/सामाजिक  संस्थाओं के सन्दर्भ में न पढ़े जो धर्म और समाज सेवा की आड़ में व्यभिचार और नाकारापन को बढ़ावा देती हैं !! 

शुक्रवार, 9 मई 2014

रोशनी है कि धुआँ..... (8 )



मध्यम वर्ग में पली बढ़ी तेजस्वी अपने तेज के दम पर ही आगे बढती आयी है , कार्यालय की मुसीबतों से लड़ कर विजयी होते इस बार उसने लडाई लड़ी अपनी सखी के लिए , साथ ही उस स्त्री के लिएभी  , जिसने बेटी के रूप में लड़कियों को ताना या निपटा दी जाने वाली जिम्मेदारी ही समझा था . 

अब आगे ...

                                   


मिसेज वालिया ने बेटी के दिन पर दिन पीले पड़ते चेहरे और खाना खाने की इच्छा नहीं होने को बिगड़ते रिश्ते के कारण तनाव और पढाई के साथ कॉलेज की भागदौड़ ही समझा था , मगर एक दिन जब कॉलेज से लौट कर बेहद थकान के साथ सीमा ने खाया पीया सब उलट दिया तो उन्हें चिंता होने लगी थी उसके स्वास्थ्य की भी . लेडी डॉक्टर ने बधाई के साथ जो सूचना दी , उसने एकबारगी उन्हें खुश भी किया था , शायद आने वाले बच्चे की ख़ुशी में परिवार के मतभेद सुलझ सके , मगर सीमा और अधिक चिंतित हो गयी थी . मिसेज वालिया यह खुशखबरी लेकर सीमा के ससुराल पहुंची तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था , सौरभ घर पर ही मौजूद था , वह दुबई से अपनी नौकरी छोड़ कर आ चूका था . उसके माता पिता ने बहुत अधिक प्रसन्नता न जाहिर करते हुए भी वे सीमा को अपने घर छोड़ जाने की ख्वाहिश प्रकट की , मगर सौरभ ने इस पर कुछ नहीं कहा और वहां से उठकर चला गया . उसी शाम  सीमा के फोन पर सौरभ का फोन आया तो जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची थी , वह भी टूट गयी . नशे में फोन पर ही भारी गालीगगलौज करते हुए उसके चरित्र पर अंगुली उठाते सौरभ का यह रूप इससे पहले सीमा ने नहीं देखा था . सौरभ का यह रुख देखते सीमा तय नहीं कर पा रही थी कि वह आगे क्या करेगी , उसकी पढाई , करिअर , जीवन सब अधरझूल में था . अँधेरे आंसुओं में डूबते एक रात पेट में उठे भीषण दर्द ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया , आने वाली जिंदगी ने खुद अपना रास्ता तलाश कर लिया था , उसने मुक्त कर दिया सीमा को. यह खबर जब सीमा के के ससुराल पहुंची तो तीनो प्राणी चीख पुकार उठे कि उनके खानदान के वारिस को जानबूझकर इस दुनिया में आने नहीं दिया गया . सीमा और उसके माता पिता हैरान थे कि कल तक जिस बच्चे को स्वीकार ही नहीं किया जा रहा था , वह इतना अजीज हो गया आज कि उसके न होने का कारण भी सीमा के मत्थे ही मंड दिया गया . मगर सीमा के लिए मुश्किलें यही समाप्त नहीं होने वाली थी , हॉस्पिटल से घर पहुँचते उसके सामने कानूनी नोटिस था जिसके अनुसार वह घर के कीमती जेवर और रुपयों के साथ लापता थी . उस नोटिस का जवाब देने के लिए वकील से मिलने जुलने का दौर चल रहा था इन दिनों !गहरी सांस लेकर सीमा ने अपनी कहानी समाप्त की .  उत्पीडन और शोषण के अनेकानेक केस से रूबरू होने के बाद भी तेजस्वी को इस मामले में कुछ कहना सूझा नहीं . खिड़की से बाहर देखा उसने , बाहर घिरता अँधेरा उसके दिल में घर करने लगा था जैसे मगर  अपनी सखी से सब कहकर सीमा का मन हल्का हो गया था .  अब वह बहुत संयमित लग रही थी .
चलती हूँ अब , बहुत रात हो गई सी दिखती है .
सॉरी , यार . तुम दिन भर से थकी मांदी लौटी थी , अपना दुखड़ा रोने में मैंने यह ध्यान ही नहीं रखा .
कोई बात नहीं  , मुझे अच्छा लगा कि मैं तुम्हारे लिए इतनी विश्वसनीय हूँ कि तुम बेहिचक सब कह सकी . चिंता मत करो , सब ठीक ही होगा . अपनी परीक्षा की तैयारी अच्छी तरह करो , कुछ मदद चाहती हो तो भी कहना .
अवश्य ही , खाना खा लो बेटा. मिसेज वालिया उसे बड़े स्नेह से कह रही थी . उनके शब्दों की आर्द्रता ने छुआ तेजस्वी के मन का कोई कोना , बीत कुछ वर्षों की कडवाहट जो उसने कभी जाहिर नहीं की थी , घुल कर बह गयी जैसे उसमे .
नहीं आंटी , माँ इन्तजार करती होंगी . आप सीमा का ख्याल रखिये . मैं अभी चलती हूँ ....स्नेह से भरी तेजस्वी  ने जवाब दिया और दरवाजा खोल कर बाहर निकल आई . माँ-पिता और भाई बहन खाने पर लिए उसका ही इन्तजार कर रहे थे . माँ ने कुछ पुछा नहीं , सिर्फ खाना परोसती रही . तेजस्वी को माँ की यह बात भी बहुत पसंद आती है कि वे चुप रखकर सुनने का इन्तजार करती है . खाने के बाद बालकनी में बैठी माँ बेटी देर रात सीमा की परेशानियों पर विचार करती रही , क्या हल निकलेगा इसका !!
अगला दिन बहुत व्यस्त था तेजस्वी की लिए , सीमा के माता पिता के साथ वह भी वकील बत्रा से मिलने चली गयी थी. उन्होंने सीमा को कोर्ट में प्रताड़ना का केस दर्ज करवाने की सलाह दी मगर वह इसके लिए तैयार नहीं थी . उसके मन में हलकी सी उम्मीद थी कि वह सौरभ से मिलकर बात करेगी तो शायद बात संभल जाए . आखिर तेजस्वी के प्रयासों के फलस्वरूप मध्यस्थ की सहायता से सीमा के कॉलेज में सौरभ का आना तय हुआ क्योंकि वह उसके घर आने के लिए बिलकुल तैयार नहीं था . सौरभ सीमा से मिलने कॉलेज पहुंचा तब भी नशे में ही धुत था . सीमा ने  अपना पक्ष समझाने की बहुत कोशिश की , मगर सौरभ टस से मस ने हुआ.  सीमा का हाथ पकड़कर ग्राउंड में ले आया और चीखने चिल्लाने  लगा ,  कॉलेज के अन्य साथियों ने भरसक प्रयास कर उसे चुप कराया और उसकी गाडी में ले जाकर बैठाया . सुलह की यह आखिरी कोशिश नाकाम हो गयी थी , मगर पास ही मौजूद तेजस्वी के कैमरे में उसकी हरकतें कैद हो चुकी थी . तेजस्वी ने जब यह मिसेज वालिया और उनके परिवार को दिखाया तो वे समझ गए कि अब सुलह की कोई गुन्जाइश नहीं रही हालाँकि वे यह भी जानते थी कि कोर्ट में सीमा के चरित्र हनन की कोशिशों को सामना करना इतना आसान नहीं था . तेजस्वी ने अपने कैमरे की गवाही के साथ ही सौरभ की नशे की आदतों , बुरे व्यवहार  एक मजबूत पक्ष अवश्य खड़ा कर लिया था . तेजस्वी ने सीमा को कुछ बताये बिना ही उसके सास ससुर से अपने सुबूतों के साथ संपर्क किया तब वे समझ चुके थे कि अब सीमा को कोर्ट में बुलाना उनके लिए मुसीबत हो सकता है . वे हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगे और सीमा को वापस ससुराल बुला लेने की बात भी कर उठे .  तेजस्वी जानती थी कि उसके लिए इस तनावपूर्ण  तकलीफदेह व्यवहार को भूला पाना संभव नहीं होगा मगर वह सीमा से मिलकर ही आखिरी फैसला करना चाहती थी . सीमा ने सौरभ के साथ आगे जीवन बिताने में असमर्थता प्रकट की . आखिर तय यह हुआ कि आपसी सहमति के आधार पर तलाक लिया जाएगा , और सीमा के विवाह में होने वाला खर्च , दहेज़ में दिया गया सामान सहित  उसका स्त्रीधन उसे वापस दिया जाएगा . भरण पोषण के लिए सौरभ से रकम लेने में सीमा की कोई रूचि नहीं थी .
तेजस्वी को सीमा के लिए दुःख अवश्य था कि मात्र 24 वर्ष की उम्र में उसने क्या नहीं देखा , मगर फिर भी उसके मुश्किल समय में मददगार होने का आत्मसंतोष भी था.
मिसेज वालिया को समय ने सबक दिया है कि बेटी का विवाह हो जाना ही कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है , उनके सामने सपनों , महत्वाकांक्षाओं का विस्तृत संसार है , उनका साथ देना है , उत्साह बढ़ाना है .जब तब तेजस्वी की सहायता से  गदगद हुई जाती बलईंयाँ लेती हैं , बेटी हो तो तेजस्वी जैसी !
सीमा के जीवन में भी धीरे- धीरे खुशियाँ लौट आएँगी . कडवे दुखद समय को भूलने में कुछ समय तो लगेगा ही . समय ने उसे सिखाया है बहुत कुछ ....
तेजस्वी ने जो बाहर की दुनिया में सीखा , सीमा को घर की चाहरदिवारियों ने ही सिखाया . चुनौतियाँ , कठिनाई , कहीं भी कम नहीं !
अब मिसेज वालिया नहीं करती किसी पर कटाक्ष , यही कहती नजर आती है - बेटी है तो क्या , पढाओ लिखाओ , अपने पैरों पर खड़ा करो , जीने दो उन्हें अपनी जिंदगी , शादी /विवाह भी समय पर हो ही जायेंगे !!
तेजस्वी की एक और यात्रा पूर्ण हुई , हालाँकि चुनौतियों का सफ़र सतत है . उसे अभी अपने जीवन के अनगिनत सोपान इसी दृढ़ता और साहस के साथ तय करने हैं !!
धुंए के पार रोशनी है , विश्वास और  दृढ़ता कायम रहे तो धुंध को चीर कर रोशनी की लकीर पहुँचती ही है !!

(पूरी कहानी को दो भागों में एक साथ यहाँ भी पढ़ा जा सकता है )


चित्र गूगल से साभार!


शनिवार, 19 अप्रैल 2014

रोशनी है कि धुआँ..... (7)





तेजस्वी के जेहन में कौंधी माँ की शंका जो उन्होंने सीमा की सगाई के समय व्यक्त की थी ," तुम्हे सीमा के ससुर का स्वभाव कैसा लगा ".
सीमा कहते हुए कुछ देर के लिए रुकी थी और तेजस्वी सोच रही थी ये माताएं सचमुच अंतर्ज्ञानी होती है . बचपन में उनसे छिप कर की जाने वाली शरारतें भी वे झट से ताड़ लेती थी .किचन में से आवाज लगा लेती , तुम लोग सोफे पर क्यों उछल रहे हो , दूध का वेशिन में उड़ेल दिया न . बच्चे हर बार हैरान हो जाते .  माँ , आप एक साथ क्या- क्या कर लेती हो . आपको सब कैसे पता चल जाता है . ममता से भरी माँ मुस्कुराती . बच्चों के जन्म के समय ईश्वर माँ की पीठ पर भी आँख उगा देते हैं और चार अदृश्य हाथ भी देते हैं . कुछ भी शरारत करते उन्हें याद रहता कि  माँ की पीठ पर लगी आँखें उन्हें देख रही है .

सीमा की आवाज जैसे किसी अंधे कुंए से आ रही थी . उसे ससुराल में अजीब सा भय लगने लगा था हालाँकि वह अपने आप को समझाती कि कहींं उसका भ्रम तो नहीं रहा . कहींं उनके स्नेह को उसने गलत अर्थ तो नहीं दिया.  यदि ऐसा हुआ तो कितना बड़ा पाप अपने सर पर ले रही है वह . हर समय कशमकश अथवा अपराधबोध  में घिरी रहती .  एक दिन बेडरूम से अटैच्ड बाथरूम से बाहर निकल बेध्यानी में साड़ी पहनते जब उसकी नजर दरवाजे पर गयी तो उढ़के दरवाजे के पास एक साया सा नजर आया . वह धीमे चलते कमरे से निकल कर किचन तक आई तो फ्रिज में ठन्डे पानी की बोतल निकलते उसके ससुर सास से चाय बनाने की फरमाईश करते नजर आये . वह घबराई पसीने से भरी उलटे पैरों  कमरे तक पहुंची और अनुमान लगाती रही कि उसके कमरे के सामने से होकर रसोई तक जाने में कितना समय लगता लगेगा!

 एक बार फिर उसने डरते हुए भी  स्वयं को धिक्कारा . नहीं . इस तरह की शंका व्यर्थ है . मगर मन में बैठे भय ने कमरे में रहते उसे दरवाजे की सांकल बंद रखने को मजबूर कर दिया . यदि दरवाजा खुला रहता तो हर समय सावधान रहने की उसकी कोशिश न उसे सोने देती , न ही किसी काम में मन लगा पाती . अपने मन की शंका को अपने साये तक से भी छिपा कर रखना और अपनी संभावित गलत दृष्टि के अपराधबोध  और चिंता में डूबे उसका स्वास्थ्य गिरता जाता था . आँखों के नीचे काले घेरे होने लगे . सीमा अपनी स्थिति का बयान किसी से नही कर सकती थी . घर में काम करते हर समय घबराए ,चौकस रहते उससे काम में गलतियाँ होती जाती . कभी कप गिलास टूट जाते. रसोई से डायनिंग टेबल तक लाते खाने के डोंगे गिर जाते . डोर बेल बजने पर हर प्रकार से निश्चिन्त होने पर ही खोलने की उसकी आदत , घर में अकेले न  रहने का इसरार , सास अब उससे नाराज रहने लगी थी .
छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए सौरभ के घर आने से उसे कुछ राहत मिली क्योंकि वह ज्यादा समय घर में ही बिताता था. इस बार उसके व्यवहार में कुछ परिवर्तन भी था . देर से सही , कुछ खुशियाँ उसके हिस्से में आई तो . मगर जब छुट्टियों के बाद वह वापस काम पर जाने लगा तो सीमा ने उसके अच्छे मूड को ध्यान में रख कर अपनी पढाई मायके में रहकर पूरी करने की इच्छा प्रकट कर दी .
सौरभ इस पर सहमत नहीं था . उसके जाने के बाद मम्मी पापा के अकेले रह जाने की चिंता के साथ ही उनके बुरे मान जाने का भय भी था . फिर भी कुछ दिनों के अंतराल पर मायके आने -जाने और रहने की स्वीकृति देते हुए उसने अपने माता पिता को भी सूचित किया . सास यह सुनकर थोड़ी नाराज हुई . क्या तकलीफ है यहाँ इसे . अपना कमरा , अपना घर . कोई पाबंदी नहीं . लोग सवाल भी करेंगे , मगर सौरभ ने नई ब्याहता पत्नी के बिगड़ते स्वास्थ्य और अनुरोध की लाज रखते हुए माँ को मना ही लिया . सौरभ के जाने के बाद कुछ दिनों के लिए सीमा मायके रह आई . दाम्पत्य प्रेम की आभा, दुश्चिंताओं से मुक्ति और आराम . उसके चेहरे पर पुरानी रंगत लौट आने लगी थी .
एक सप्ताह बात पुनः लौटी ससुराल तो सास ,ससुर दोनों ही चहक उठे .
सुनती हो .  इसकी नजर उतार देना . और खूबसूरत हो आई हमारी बहू तो .
उसके ससुर अपनी पत्नी को सम्बोधित कर रहे थे. सास स्नेह से मुस्कुराई  मगर सीमा के चेहरे पर भय और सकुचाहट एक साथ उजागर हो आई .
दुश्चिंता और शक एक बार मन में घर कर जाए तो .व्यक्ति की सोच घड़ी की सूई की उलटी दिशा में चल देती है . हर कथन अथवा कार्य अपने विपरीत अर्थ में भाषित हो मानसिक कष्ट देता प्रतीत होता है . कहींं दोष उसकी सोच का ही हो . सीमा स्वयं को यह समझा साहस बटोर लाती .
एक बरसात के दिन सीमा कॉलेज से लौटी . रेनकोट और हेलमेट ने उसे पूरा गीला होने से तो बचा लिया था मगर फुहार ने मन का मौसम सीला कर दिया था . अपनी मस्ती में गुनगुनाते अपने कमरे की ओर बढ़ते उसके कदम ठिठक से गए .
आज फिर उसके श्वसुर घर पर ही थे . झिझकते हुए उसने पूछ ही लिया , आप अभी घर पर कैसे ! ऑफिस के काम से शहर से बाहर जाना है , पैकिंग के लिए जल्दी आना पड़ा . तुम थोड़ी देर आराम कर लो . फिर मदद कर देना .
मदद के नाम से सीमा की सिट्टी पिट्टी गुम थी . वह कमरे में गयी और तेजी से दरवाजा बंद कर लिया  . गीले कपड़े तक बदलने की इच्छा नहीं हुई उसकी . घबराई सी बैठी थी वह कि कब वे उसे पुकार ले ।  क्या कहकर वह कमरे से बाहर आने से मना करेगी , यही सोचती डरती सिमटी बैठी रही . कुछ देर में अपने दरवाजे पर खटखट की आवाज़ से तीव्र हुई उसकी धडकनों के कारण पैरों तक ने जैसे उसका साथ छोड़ दिया . उसने दबे पाँव दरवाजे और खिड़की की सांकल अच्छी तरह चेक की और आँखें बंद कर लेटने का नाटक करने लगी . एक दो बार की खटखट के बाद दरवाजे पर आहट बंद हो गयी और सोने का नाटक करते जाने उसकी आँख कब लग गयी, उसे पता ही नहीं चला  .
नींद खुलने पर उसने देखा खिड़की से बाहर शाम का धुंधलका छाने लगा था .
ओह , कितनी देर सोती ही रह गयी. साथ ही उसे अपना भय भी फिर से याद आने लगा .

नींद भी क्या अजब शै है. बड़े से बड़ा दुःख और भय नींद में महसूस नहीं होते . ऐसे समय में नींद आ जाना राहत देता है तन मन दोनों को . दुःख के हाथो कलेजे फटने से रह जाते है उनके जिन्हें नींद आ सकती हो . चिंता , आशंकाओ से घिरे भी नींद आ ही जाती है . मानव प्रजाति के लिए प्रकृति की यह महत्वपूर्ण देन है .

धीमे से द्वार खोल देखा उसने . किचन से खटर पटर आती आवाज ने उसे आश्वस्त किया कि सासू माँ लौट आई थी घर . कॉलेज से आकर भूखे ही सो गयी थी , भूख भी सताने लगी थी अब उसे .  वह रसोई की ओर बढ़ गयी . सास के चेहरे पर नाराजगी साफ़ झलक रही थी .
ऐसे भी क्या घोड़े बेच कर सोना आता है तुम्हे , घर में कोई आये कोई जाए , किसी से कोई मतलब नहीं . पापा ने कहा भी था मदद करने को मगर तुम अनसुनी कर जाकर सो गयी , ये क्या तरीका है . क्या कर रही थी तुम इतनी देर !
मुझे अकेले घर में डर लगता है .
अकेले कहाँ थी तुम . तुम्हारे ससुर थे न घर में  और अपने घर में किससे डर लगता है ! तुम्हे अपने मायके में डर नहीं लगता था कभी !
वह आगे कुछ न कह सकी .  बस पैर से जमीन कुरेदती सी चुपचाप खड़ी रही . उन्होंने सीमा से यह पूछना भी उचित नहीं समझा कि उसने खाना खाया या नहीं . पेट में कुलबुलाते चूहों की अनदेखी कर वह रसोई में सास का हाथ बंटाने लगी . मगर अच्छा यह रहा कि दो तीन दिन के लिए उसे भय से राहत मिल गयी थी .

सप्ताहांत का दिन उसके लिए मनहूस होने वाला था, उसने सोचा नहीं होगा . कॉलेज से लौटी ड्राइंगरूम में टीवी देखते सोफे पर ही  लेटी सीमा को नींद आ गयी थी . मेनगेट का दरवाजा कब खुला , कौन अन्दर दाखिल हुआ उसे कुछ खबर ही नहीं रही . गालों पर कुछ सरसराहट से चौंक कर उसकी नींद खुली तो स्तब्ध सीमा को कुछ सोचने में भी वक्त लगा . सोफे पर उसके करीब कोई बैठा था जिसकी गोद में उसका सर था. घबराकर तेजी से उठते हुए वह स्वयं से बहुत नाराज थी . इतनी निश्चिंतता से वह सो कैसे सकती थी . स्थिति समझ में आते ही अपना आपा खोकर उसकी चीख निकल पड़ी  .
आप यहाँ क्या कर रहे हैं . दरवाजा बंद था.  भीतर कैसे आये ?
चाबी थी मेरे पास . बेल की आवाज पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो लॉक खोलकर अन्दर आ गया . मगर तुम इतना घबरा क्यों गयी . तुम्हे सोते देख उठाना उचित नहीं समझा . तुम आराम करो .
अपना बैग उठाकर वे अन्दर चले गए. मगर सीमा के लिए अब इस स्थिति में उस घर में अकेले रहना संभव नहीं था . हर समय भय के साये में रहना उसे मानसिक रूप से थका रहा था . उसी शाम सौरभ भी लौटा . मगर सीमा को समझ नहीं आ रहा था कि किस प्रकार वह अपना भय सौरभ के आगे प्रकट करे .
यदि सौरभ ने उस पर विश्वास नहीं किया .  यदि उसका भय भी बेबुनियाद रहा , भ्रम रहा हो तो वह स्वयं से कैसे नजरें मिलाएगी . मन को मजबूत कर उसने सौरभ  से अपने मायके में रहने  या उसके साथ ही जाने की बात की तो सौरभ का सौम्य दिखने वाला चेहरा गुस्से से तमतमा उठा .
क्या मतलब है तुम्हारा . क्यों जाना है तुम्हे मायके रहने या मेरे साथ . यही रहना होगा तुम्हे मेरे मम्मी पापा के साथ . क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ !
 सौरभ के तेज चीखने की आवाज सुन उसके माता पिता भी वहीँ आ गए थे . एकांत में कही अपनी बात  पर तेज चीख कर हंगामा करते देख सीमा अपमान और ग्लानि से भर  उठी .
क्या बात है सौरभ ! इतना क्यों चीख रहे हो . क्या हुआ ?
कुछ नहीं माँ .  सीमा अपने मायके रहना चाहती है या मेरे साथ .
सौरभ की माँ को बुरा लगाना स्वाभाविक था . थोड़ी नाराजगी भरे शब्दों में वे बोली .   घर में कुल तीन प्राणी हैंं . काम का कोई दबाव नहीं है . कॉलेज जाने की छूट है .  पूछो इससे ये फिर भी ये ऐसा चाहती है .

हाँ ! बताओ क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ . क्या कहती सीमा.
परेशानी कुछ नहीं है  , मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ.

सौरभ की माँ दुःख और क्षोभ में भर उठी . इतने चाव से बहू लेकर आये थे मगर पता नहीं था कि उसे हमारी आवश्यकता नहीं . वह हमारे साथ नहीं रहना चाहेगी . कुछ महीनोंं की ही गृहस्थी हुई है अभी और इनके अलग रहने के ख्वाब जाग उठे हैं . उनकी आँखों से बहते आँँसू ने सीमा को अपराधबोध से भर दिया . विवाह से पहले सौरभ के माता- पिता के व्यवहार से प्रभावित सीमा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसे इन परिस्थितियों का सामना करना होगा . अपने छोटे से घर में अपने पति और उसके माता -पिता के साथ रह उनकी खुशियों और दुखों को जीना और साझा करना ही ध्येय समझा था उसने . मगर अब हर समय इस भय के साये में सौरभ के बिना उसका उस घर में रहना असंभव था . सौरभ के मना करने के बावजूद उसके जाने के बाद अपना बैग उठाकर वह मायके चली आई थी . सौरभ को यह पता चला तो वह सीमा को फ़ोन कर उसने अपनी नाराजगी प्रकट की  और कभी घर वापस न लौटने का फरमान सुना दिया था .
उधर सौरभ को  बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्य करने के प्रयास में अंततः दुबई में नौकरी मिल गयी थी . दुबई जाने की तैयारियों के लिए हालंकि वह कुछ दिन के लिए अपने शहर आया मगर सीमा से मिलने या उसको बुलाने की कोई कोशिश नहीं की . सीमा को इस खबर का पता उसके किसी मित्र से तब पता चला जब वह दुबई जा चुका था .
सौरभ के बिना उसे ससुराल जाना मंजूर नहीं था और उसके दुबई चले जाने के बाद वैसे भी उसके रास्ते बंद हो चुके थे . मिसेज वालिया ने सीमा को समझाने की बहुत कोशिश की कि उसे ससुराल में रहना चाहिए अपने सास ससुर के साथ.  मगर सीमा के लिए नहीं जाने का कारण बताना इतना आसान नहीं था .
बेटी की जिद के आगे मजबूर उन्होंने एक दो बार उसके सास ससुर से मिलकर बात करने की कोशिश की मगर वे इसे पति -पत्नी के बीच का मामला बताकर दूर हो गए . अब जो भी बातचीत हो सकती थी , वह सौरभ के दुबई से लौटने पर ही संभव थी . सौरभ के लौटने का इन्तजार करते सीमा ने अपनी पढाई पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया . फाइनल सेमेस्टर की तैयारी में उसने रात दिन एक कर दिए .

क्रमशः .... अपने भय से मुक्ति पाने के लिए  लिए सीमा के उठाये कदम उसके लिए कितने घातक होंगे , वह स्वयं नहीं जानती थी , कौन उसके साथ होंगा , कौन नहीं !

चित्र गूगल से साभार ....